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0:00क्या आपको मालूम है कि एआई के जरिए एक हाई
0:03क्वालिटी इमेज बनाना बेशक हमारे लिए काफी
0:05फन का काम है। लेकिन इस एक प्रोसेस में
0:08इतनी बिजली इस्तेमाल होती है जितनी हमारे
0:11मोबाइल फोन को फुल चार्ज करने में लगती
0:14है। Amazon, मेटा और Google जैसे जॉइंट्स
0:17इन एi कंप्यूटरटर्स की भूख मिटाने के लिए
0:19हर साल हजारों अरबों डॉलर्स सिर्फ
0:22कंप्यूटिंग पावर में इस्तेमाल होने वाली
0:24बिजली पर खर्च कर रहे हैं। लेकिन अब साइंस
0:27ने एi जैसे बिजली के भूखे पेट को भरने के
0:30लिए एक ऐसा रास्ता चुना है जो किसी के भी
0:34होश उड़ाने के लिए काफी है और वो कुछ और
0:37नहीं बल्कि इंसानी [संगीत] दिमाग के जिंदा
0:39सेल्स हैं। क्या जिंदा इंसानी दिमाग को
0:42वाकई माइक्रोचिप में डाला जा सकता है वो
0:45हमसे बातें कैसे करता है और सबसे बढ़कर यह
0:48एआई के मुकाबले में कितना एफिशिएंट साबित
0:51हुआ। zम टीवी के वीडियोस में एक बार फिर
0:53से खुशामदीद। नाजरीन आप इस वक्त अपनी
0:56स्क्रीन पर एक कंप्यूटर देख रहे हैं जो
0:58कॉर्टिकल नामी एक हाईटेक लैब में पड़ा है।
1:02यह कंप्यूटर दुनिया की सबसे मशहूर और
1:04वायलेंट गेम डूम खेल रहा है। वही गेम जो
1:08शायद आपने भी कभी अपने बचपन में खेली हो।
1:11पहली नजर में यह बिल्कुल एक आम सा मंजर
1:14लगता है। एक स्क्रीन सामने गेम चल रही है।
1:17लेकिन गौर से देखेंगे तो वहां इस गेम को
1:20खेलने वाला कोई इंसान नहीं बैठा। तो फिर
1:22यह गेम आखिर कौन खेल रहा है? यह गेम वाकई
1:26एक इंसान ही खेल रहा है। लेकिन वह इस
1:29स्क्रीन के सामने नहीं बैठा बल्कि वो इस
1:32मशीन के अंदर फंसा हुआ है। और सबसे डरावनी
1:35बात यह है कि वो इस मशीन से कभी बाहर निकल
1:39नहीं सकता। जी हां, यह कोई साइंस फिक्शन
1:42स्टोरी नहीं बल्कि एक खौफनाक हकीकत है। यह
1:45कंप्यूटर किसी आम सिलिकॉन चिप पर नहीं चल
1:48रहा बल्कि यह जिंदा इंसानी दिमाग के सेल्स
1:51पर चल रहा है। और वही जिंदा सेल्स इस वक्त
1:54इस स्क्रीन पर एनिमी मॉन्सर पर फायरिंग कर
1:57रहे हैं। लेकिन सवाल यह पैदा होता है कि
2:00आखिर साइंस को ऐसी क्या जरूरत पेश आ गई कि
2:03उन्हें कंप्यूटर बनाने के लिए जिंदा
2:05इंसानी दिमाग का इस्तेमाल करना पड़ा। इसका
2:08जवाब एक ऐसी चीज में छुपा है जिसके बगैर
2:11हमारी मॉडर्न दुनिया 1 मिनट भी नहीं चल
2:14सकती और वह है बिजली। आजकल हर तरफ
2:18आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई का शोर
2:21है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह एआई
2:23मशीनंस और सुपर कंप्यूटरटर्स कितनी खौफनाक
2:26हद तक बिजली पीते हैं। एआई में बिजली का
2:29इस्तेमाल इस कदर तेजी से बढ़ चुका है कि
2:31दुनिया के बड़े-बड़े दानिशों की नींदें
2:34उड़ चुकी हैं। Amazon जैसी जॉइंट कंपनी ने
2:37हाल ही में एi में $5 बिलियन की मजीद
2:41इन्वेस्टमेंट की है। और मार्क ज़करबर्ग की
2:43कंपनी मेटा भी पानी की तरह पैसा बहा रही
2:46है। सिर्फ और सिर्फ कंप्यूटिंग पावर और
2:49एनर्जी हासिल करने के लिए। इन बड़े एआई
2:52मॉडल्स को ट्रेन करने के लिए जितनी ताकत
2:54चाहिए होती है, वह हर 6 महीने में डबल हो
2:58जाती है। नतीजा यह निकल रहा है कि एआई को
3:00जिंदा रखने के लिए जितनी एनर्जी चाहिए और
3:03दुनिया में जितनी एनर्जी पैदा हो रही है,
3:06उनके दरमियान एक बहुत बड़ा और खतरनाक गैप
3:10पैदा हो चुका है। इन बड़ी टेक कंपनीज़ की
3:13घबराहट का अंदाजा आप इस बात से लगाएं कि
3:15अब इनकी जंग कोई बेहतर सॉफ्टवेयर बनाने
3:18में नहीं है। बल्कि अब जंग इस बात पर है
3:21कि कौन दुनिया की ज्यादा से ज्यादा बिजली
3:24पर कब्जा करेगा। हालात इस कदर संगीन है कि
3:27सालों पहले बंद किए गए खौफनाक न्यूक्लियर
3:30पावर प्लांट्स को दोबारा इस्तेमाल के
3:32काबिल बनाया जा रहा है ताकि इन भूखे एआई
3:35कंप्यूटरटर्स का पेट भरा जा सके। लेकिन इस
3:38पूरे मसले को हल करने के लिए कुछ
3:40साइंटिस्ट ने एक बिल्कुल मुख्तलिफ और
3:43थोड़ा सा डरावना रास्ता चुना है। उन्होंने
3:46देखा कि दुनिया का सबसे बेहतरीन एनर्जी
3:49एफिशिएंट सुपर कंप्यूटर कोई मशीन नहीं
3:51बल्कि इंसानी दिमाग है। क्योंकि हमारे
3:54दिमाग ने बिजली का यह मसला लाखों साल पहले
3:58ही हल कर लिया था। जरा सोचिए आपका दिमाग
4:01इस वक्त क्या कुछ कर रहा है। आप यह वीडियो
4:04देख रहे हैं। मेरी आवाज सुन रहे हैं। आपका
4:06दिमाग जिस्म के हर हिस्से को कंट्रोल कर
4:09रहा है। आपकी सांसे चला रहा है। और यह सब
4:13कुछ सिर्फ और सिर्फ 20 वाट की पावर पर चल
4:16रहा है। जी हां, 20 वाट्स। यह सिर्फ इतनी
4:20बिजली है जिस पर एक छोटा एलईडी बल्ब चल
4:23सकता है। दूसरी तरफ हम इंसान पूरे-पूरे
4:26पावर प्लांट्स की बिजली फूंक रहे हैं
4:28सिर्फ अपने दिमाग का आर्टिफिशियल वर्जन
4:31बनाने के लिए। और सबसे हैरत की बात हमारा
4:33दिमाग इन सुपर कंप्यूटरटर्स से लाख गुना
4:37तेजी से सीखता है। मिसाल के तौर पर अगर आप
4:40किसी एआई को सिखाएं कि आग कितनी खतरनाक है
4:43तो पहले हमें एआई को आग की लाखों तस्वीरें
4:46दिखानी पड़ेंगी। फिर उसे ट्रेन करना
4:49पड़ेगा कि यह कितनी खतरनाक हो सकती है।
4:52लेकिन एक छोटा सा बच्चा सिर्फ एक मर्तबा
4:55आग को देखे और महसूस करें तो पूरी जिंदगी
4:58उसको दोबारा ट्रेन करने की जरूरत नहीं
5:01पड़ेगी। पर इंसानी दिमाग तो हमारे जिस्म
5:04का हिस्सा है। इसको कंप्यूटर चिप में फिट
5:06करना कैसे पॉसिबल हो सकता है? इस नामुमकिन
5:10को मुमकिन करने के सफर में तीन ऐसे कदम
5:12उठाए गए जिसने कंप्यूटरटर्स की तारीख
5:15हमेशा हमेशा के लिए बदल दी। पहला कदम ईयर
5:19208 में उठाया गया। साइंटिस्ट की एक टीम
5:22ने एक चूहे के दिमाग से जिंदा सेल्स यानी
5:25न्यूरॉन्स निकाले। उन्हें ग्लास की डिश
5:27में उगाया और फिर उन जिंदा न्यूरॉन्स को
5:30तारों के जरिए एक छोटे से रोबोट के साथ
5:33जोड़ दिया। जब उन्होंने उस रोबोट को चलाया
5:36तो जो नजारा उनके सामने था उसने पूरी
5:39साइंटिफिक कम्युनिटी में तहलका मचा दिया।
5:42उस चूहे के जिंदा सेल्स ने उस रोबोट को
5:45वाकई चलाना शुरू कर दिया था। यह सुनने में
5:48शायद बहुत अजीब लगे, लेकिन यह सिर्फ एक
5:51शुरुआत थी। डिश में लगे इलेक्ट्रोड्स के
5:53जरिए उन न्यूरॉन्स ने आपस में राब्ता कायम
5:56किया और रोबोट को थोड़ी बहुत मूवमेंट दी।
5:59लेकिन यह किसी मुकम्मल दिमाग के आसपास भी
6:02नहीं था। वैसे यह दुनिया में पहली बार
6:05नहीं हुआ था कि किसी ने जिंदा गोश्त को
6:08मशीन से जोड़ा हो। इससे पहले एक और टीम ने
6:11लैंप्रे नाम की एक शिकारी मछली का दिमाग
6:14निकालकर एक रोबोट के साथ जोड़ा था। और जब
6:17वह रोबोट चलता था तो उसकी फुटेज देखकर
6:20किसी हॉरर मूवी का गुमान होता था। लेकिन
6:23इन तमाम तजुर्बों में दुनिया को एक बहुत
6:26बड़ा [संगीत] शक था। लोग पूछते थे कि क्या
6:29वाकई वो जिंदा सेल्स उस रोबोट को चला रहे
6:31हैं या उस मशीन का अपना कंप्यूटर उन सेल्स
6:35के रैंडम सिग्नल्स को पकड़ कर बेवकूफ बना
6:38रहा है। इन एक्सपेरिमेंट्स पर लोगों को
6:40काफी शक था तो किसी ने इनको इतना सीरियस
6:43ही नहीं लिया। फिर वक्त गुजरता गया और साल
6:462013 में इस कहानी में एक इंकलाबी मोड़
6:50आता है। शििया यामा नाका नाम के एक जैपनीज
6:53साइंटिस्ट ने दुनिया को एक ऐसा जादू
6:56सिखाया जिसने बायोलॉजी की तारीख हमेशा के
6:59लिए बदल दी। उसने दरियाफ्त किया कि अगर हम
7:02किसी इंसान के जिस्म का कोई भी आम सेल ले
7:05लें। मिसाल के तौर पर हमारी स्किन का छोटा
7:08सा टुकड़ा तो हम उस मुकम्मल जवान सेल को
7:11वक्त में पीछे ले जाकर वापस एक बिल्कुल नए
7:15और ब्लैंक सेल में तब्दील कर सकते हैं।
7:18यामनाका ने चार ऐसे जादुई प्रोटीनंस
7:21दरियाफ्त किए जो किसी भी सेल की मेमोरी
7:23कंप्लीटली वॉश कर देते थे और उस ब्लैंक
7:26सेल से आप जिस्म का कोई भी हिस्सा बना
7:29सकते थे। चाह तो दिल बना लें, गुर्दे बना
7:32लें या फिर सबसे डरनी बात जिंदा इंसानी
7:35दिमाग के न्यूरॉन्स। इस डिस्कवरी का मतलब
7:38यह था कि अब साइंटिस्ट को जिंदा दिमाग पर
7:41तजुर्बा करने के लिए किसी की खोपड़ी खोलने
7:44की जरूरत नहीं थी। वो सिर्फ किसी भी चलते
7:47फिरते इंसान की खाल का एक बाल के बराबर
7:50टुकड़ा लेकर लैब में असली इंसानी दिमाग
7:53उगा सकते थे। लेकिन कहानी यहां भी नहीं
7:56रुकी। साइंटिस्ट ने देखा कि अगर आप इन
7:59न्यूरॉन्स को फ्लैट ग्लास डिश पर उगाते
8:01हैं तो वह सिर्फ लेफ्ट और राइट फैलते हैं।
8:05लेकिन अगर उन्हें 3D माहौल दिया जाए जहां
8:07वो ऊपर नीचे आगे पीछे हर तरफ बढ़ सकें तो
8:11वह सेल्स खुद ब खुद वैसा ही छोटा सा गोल
8:14दिमाग बना लेते हैं जैसा मां के पेट में
8:17एक नन्हे बच्चे का बनता है। साइंस की जबान
8:20में दिमाग के इन जिंदा और चलते फिरते छोटे
8:23गोलों को ऑर्गनाॉइड कहा जाता है। और
8:26इन्हीं ऑर्गनाॉइड्स ने आगे चलकर साइंस की
8:29सबसे अजीब मशीन को जन्म दिया। यहां से
8:33एंट्री होती है कॉर्टिकल लैब्स नाम की वो
8:36ऑस्ट्रेलियन बायोटेक स्टार्टअप की जिसने
8:38ईयर 2022 में दुनिया को एक ऐसा झटका दिया
8:42जिसकी किसी को भी उम्मीद नहीं थी।
8:45उन्होंने इन तमाम पुराने तजुर्बों को एक
8:48साथ मिलाया और एक ऐसी खौफनाक इजाद दुनिया
8:51के सामने पेश की जिसे उन्होंने डिश ब्रेन
8:54का नाम दिया। उन्होंने लैब में एक ग्लास
8:57डिश रखी जिसमें तकरीबन 8 लाख जिंदा दिमागी
9:01सेल्स मौजूद थे। जिनमें से कुछ चूहे के थे
9:04और कुछ असली इंसान के। और फिर उन्होंने
9:07दुनिया को बताया कि उन्होंने इन जिंदा
9:09सेल्स को पोंग नाम की मशहूर आर्केेड गेम
9:12खेलना सिखाया है। इस खबर ने पूरी दुनिया
9:15में एक भौचाल भरपा कर दिया। इस तजुर्बे
9:18में दो बातें इंतहाई परेशान कुन थी। पहली
9:22बात तो यह कि ह्यूमन हिस्ट्री में पहली
9:24बार लैब में पड़ा गोश्त का एक जिंदा
9:27लोथड़ा किसी स्पेसिफिक गोल के तहत काम कर
9:30रहा था। और दूसरी उन्होंने इन सेल्स से
9:34बात करने का तरीका ढूंढ लिया था। बायोलॉजी
9:37के उसूलों के मुताबिक आप एक शीशे की डिश
9:40में उगते हुए गोश्त से सवाल नहीं पूछ सकते
9:43और ना ही वह आपको कोई जवाब दे सकता है।
9:46लेकिन कॉर्टिकल लैब्स ने यह नामुमकिन काम
9:49वाकई कर दिखाया था। लेकिन यहां सवाल पैदा
9:52होता है कि आखिर कैसे? लैब में बड़े इन
9:55दिमागी सेल्स को गेम खेलना कैसे सिखाया
9:58गया? क्योंकि किसी इंसान की तरह हम इन्हें
10:01शाबाश देकर इनकरेज नहीं कर सकते। इन
10:04साइंटिस्ट ने इंसानी दिमाग की एक बहुत ही
10:07बुनियादी और थोड़ी सी जालिमाना फितरत का
10:10इस्तेमाल किया और वह फितरत यह है कि हमारे
10:13दिमाग के सेल्स कस यानी शोर और बेतरतीबी
10:17से सख्त नफरत करते हैं। अगर आप किसी भी
10:20जिंदा न्यूरॉन को कोई ऐसा सिग्नल भेजें जो
10:22उसकी समझ से बाहर हो जो रैंडम और अजीब हो
10:26तो वह न्यूरॉन परेशान हो जाता है। उसे
10:29स्ट्रेस होने लगता है और वह उस बेतरतीबी
10:32से बचने के लिए हाथ-पांव मारना शुरू कर
10:34देता है। तो इन साइंटिस्ट ने दिमागी
10:37न्यूरॉन्स से आउटपुट लेने के लिए एक
10:39इंतहाई सिंपल लेकिन डरावना सेटअप बनाया।
10:43जब यह जिंदा सेल्स पोंग गेम में आती हुई
10:45बॉल को मिस कर देते थे, तो कंप्यूटर उन
10:48सेल्स पर इंतहाई बुरे, स्क्रेंबल्ड और
10:51रैंडम शोर वाले सिग्नल्स की बारिश कर देता
10:54था। यह इन सेल्स के लिए एक किस्म की तकलीफ
10:57और स्ट्रेस की हालत थी। लेकिन जब वह सेल्स
11:00बिल्कुल सही वक्त पर हरकत करके बॉल को हिट
11:03करते तो वह बुरा सिग्नल फौरन बंद हो जाता
11:06था। ना सिर्फ इतना बल्कि सेल्स को बताने
11:09के लिए कि उन्होंने सही काम किया है।
11:11उन्हें एक पुरकून सिग्नल भेजा जाता। कुदरत
11:15का यह इंतहाई हैरतंगेज प्रिंसिपल है जिसे
11:18फ्री एनर्जी प्रिंसिपल कहते हैं। आसान
11:21अल्फाज में यह असूल कहता है कि इस दुनिया
11:23में मौजूद हर जिंदा सेल हमेशा सरप्राइजेस
11:27और बेतरतीबी से बचने की कोशिश करता है
11:30ताकि अपनी दुनिया को प्रेडिक्टेबल रख सके।
11:32क्योंकि किसी भी जिंदा जिस्म के लिए
11:34अनएक्सेक्टेड चीज का मतलब होता है जान का
11:38खतरा। लेकिन इस अजीम और खौफनाक दरियाफ्त
11:41में एक बहुत बड़ी रुकावट थी। मसला यह था
11:44कि हम लैब में उस 3D दिमाग को उगा तो सकते
11:47थे लेकिन उनसे तारों के जरिए बात नहीं कर
11:50सकते थे। इसकी वजह यह थी कि माइक्रोचिप एक
11:53बिल्कुल फ्लैट सतह थी। अगर आप उस पर 3D
11:57गोल दिमाग रखें तो वायर्स और सेंसर्स
11:59सिर्फ सबसे नीचे वाले हिस्से को टच करते
12:02थे। बाकी पूरा दिमाग हवा में ही रहता था।
12:06इसलिए साइंटिस्ट ने उन सेल्स को एक फ्लैट
12:09सतह पर फैलाने का फैसला किया। उन सेल्स से
12:12बात करने के लिए दिमाग की असली शक्ल को
12:15कुर्बान करना पड़ा। और याद रखिए यह अभी तक
12:19पहला वर्जन था। इस मशीन का असली और डरावना
12:22रूप तो अभी सामने आना बाकी था। अब आते हैं
12:26उस सबसे बड़ी और खौफनाक खबर की तरफ।
12:29कॉर्टिकल लैब्स ने दुनिया के सामने एक ऐसा
12:32सुपर कंप्यूटर पेश किया जो मुकम्मल तौर पर
12:35जिंदा इंसानी सेल्स पर चलता है। इस मशीन
12:38का नाम है सीएल1। यह मशीन कोई छोटे बच्चों
12:41वाली पोंग गेम नहीं खेल रही बल्कि यह डम
12:44जैसी वायलेंट वीडियो गेम खेल रही है। और
12:47सबसे रोंगटे खड़े कर देने वाली बात यह
12:50सीएल वन कंप्यूटर तकरीबन 2 लाख खालिस
12:54इंसानी न्यूरॉन्स से बनाया गया है।
12:56उन्होंने स्किन सेल्स लेकर यमानाका
12:59प्रोटीनंस से उन्हें ह्यूमन न्यूरॉन्स में
13:01बदला और इलेक्ट्रोड्स पर बिछा दिया। जब यह
13:04सेल्स सही मूव करते तो उन्हें पुर सुकून
13:07सिग्नल मिलता। लेकिन जैसे ही गेम में
13:09उन्हें डैमेज पड़ता, तो वह उन पर दर्दनाक
13:12सिग्नल्स की बारिश कर देते। सिर्फ एक
13:15हफ्ते के अंदर-अंदर इन जिंदा इंसानी सेल्स
13:18ने डिश में पड़े-पड़े डूम गेम में घूमना
13:21और दुश्मनों पर गोली चलाना सीख लिया।
13:24लेकिन क्या वाकई यह जिंदा दिमाग अपने तौर
13:27पर गेम खेल रहा है या पीछे छुपा कंप्यूटर
13:30सब कुछ कर रहा है? डेवलपर शैन कॉल के ओपन
13:34सोर्स कोड से पता चलता है कि सिस्टम में
13:36तीन हिस्से हैं। सिलिकॉन एi चिप,
13:39ट्रांसलेटर और 2 लाख लाइव ह्यूमन
13:42न्यूरॉन्स। असल अकलमंदी बेशक सिलिकॉन चिप
13:45की है जो इनपुट सिग्नल पर रिएक्ट करता है।
13:48लेकिन जब एक्सपर्ट्स ने जिंदा सेल्स की
13:50जगह फेक रैंडम नॉइज़ सिग्नल्स भेजे तो
13:53कंप्यूटर ने सही रिएक्ट [संगीत] करना छोड़
13:56दिया। इसका मतलब साफ है कि वह जिंदा
13:58इंसानी सेल्स वाकई काम कर रहे हैं। इस
14:02रिसर्च से जहां अल्जाइमर्स और पार्किंस
14:04जैसी बीमारियों का इलाज ढूंढा जा सकता है,
14:07वहीं यह टेक्नोलॉजी एनर्जी के भूखे एआई
14:10मॉडल्स को पूरी तरह रिप्लेस करने की ताकत
14:13रखती है। आज फाइनल स्पार्क नाम की स्विस
14:16कंपनी इंटरनेट के जरिए जिंदा इंसानी
14:19न्यूरॉन्स किराए पर दे रही है। कोई भी
14:22मंथली फी पे करके दुनिया के किसी भी कोने
14:25से उनके मिनी ब्रेंस पर अपना कोड चला सकता
14:28है। उनका दावा है कि यह जिंदा सेल्स किसी
14:31आम माइक्रो चिप के मुकाबले में 10 लाख
14:34गुना कम पावर पर चल सकते हैं। दुनिया
14:37सिलिकॉन और माइक्रो चिप्स की दौड़ में आगे
14:40निकल रही है। लेकिन कुदरत ने हमें दिखा
14:42दिया कि असली कंप्यूटिंग पावर तो पहले से
14:45हमारे अंदर मौजूद थी। अब सवाल यह नहीं रहा
14:48कि एआई हमारी दुनिया पर कब्जा करेगी या
14:51नहीं? असल सवाल यह है कि क्या अगला सुपर
14:54कंप्यूटर लोहे और प्लास्टिक का होगा या
14:57जिंदा गोश्त और दिमाग का? इस खौफनाक
15:00फ्यूचर के बारे में आपकी क्या राय है?
15:02कमेंट्स में जरूर बताइएगा। उम्मीद है ZM
15:05टीवी की यह वीडियो भी आप लोग भरपूर लाइक
15:07और शेयर करेंगे। मिलते हैं अगली शानदार
15:10वीडियो में।