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0:00बिहार के [संगीत] कुशीनगर जिले में गंडक
0:02नदी के किनारे बसा एक छोटा सा गांव है
0:05रघुनाथपुर। इसी गांव में रितेश नाम का एक
0:08सीधा साधा और बहुत मेहनती नौजवान रहता था।
0:12रितेश के परिवार में उसके पिता संतोष और
0:15उसकी माता रोशनी थी। रितेश का रोज का काम
0:19था। सुबह तर के उठना, गांव के तालाब और
0:22नदी में जाल डालना और ताजी मछलियां
0:25पकड़ना।
0:30वाह, आज तो बहुत ही बढ़िया और ताजी
0:34मछलियां हाथ लगी हैं। बाजार में गांव वाले
0:37इन्हें देखकर खुश हो जाएंगे।
0:40रितेश के पिता संतोष बाजार में पहले
0:43मछलियां बेचा करते थे।
0:45अब उनकी उम्र हो गई थी। तो रितेश इन
0:47मछलियों को टोकरी में भरता और गांव के
0:50बाजार में ले जाकर बेचता।
0:56उसकी पकड़ी हुई मछलियां इतनी [संगीत] ताजी
0:59होती थी कि पूरा गांव उसी से मछली खरीदना
1:02पसंद करता था। तभी सुबह-सुबह उसका रोज का
1:06ग्राहक महेंद्र भैया आते हैं।
1:10अरे रितेश भाई, आज तो काफी बड़ी मछलियां
1:13दिख रही है। जरा 1 किलो ताजी मछली तोल दो।
1:17और हां भाई काट के देना। क्या है कि मेरी
1:20पत्नी शाकाहारी है। उसको मछली पसंद नहीं
1:22है।
1:24आइए महेंद्र भैया आपके लिए तो हमेशा सबसे
1:28बेहतरीन मछली ही निकाल कर रखता हूं। अभी
1:31आपके लिए 1 किलो में काट कर देता हूं। और
1:34कल की मछली कैसी लगी आपको भैया?
1:38हां भाई तेरी ताजी मछलियों की बात ही अलग
1:41होती है। पूरा गांव जानता है कि रितेश की
1:44मछली स्वाद में सबसे स्वादिष्ट होती है।
1:47धन्यवाद भैया। यह तो आप लोगों का प्यार
1:50है। मैं तो हमेशा आप लोगों को बहुत ही
1:54अच्छा मछली और बेहतरीन स्वाद देना चाहता
1:57हूं।
1:58रितेश ने कुछ ही देर में मछली काटकर उसे
2:01ग्राहक को दे दिया।
2:05ग्राहक वहां से मछली लेकर चले जाते हैं।
2:11तभी वहां पर एक बंगालन महिला आती है।
2:16अरे भैया मेरे लिए आज हिलसा मछली कर देना।
2:19और हां बड़ी वाली का काटना।
2:22हमारे यहां ताजी ही मछली मिलती है।
2:25ठीक है भाई थोड़ा जल्दी देना। आज मेरा भाई
2:28आ रहा है गांव से तो थोड़ा जल्दी दे दो।
2:30अरे बिल्कुल दीदी। मैं अभी आपके लिए हिलसा
2:34मछली काट कर दे देता हूं।
2:37कुछ ही समय में उसके वहां बहुत ही ज्यादा
2:39भीड़ लग जाती है। रितेश एक मछुआरा था जो
2:43ताजी-ताजी मछली लेकर बाजार में बेचा करता।
2:47उसके एक सरल स्वभाव की वजह से लोग उसी के
2:50पास लेने अटैक्स थे। रितेश की ईमानदारी और
2:54बढ़ती बिक्री देखकर उसके चचेरे भाई अमित
2:57और श्याम जलन [संगीत] के मारे कुड़ने लगे।
3:00अमित और श्याम के पिता और रितेश के पिता
3:03संतोष सगे भाई थे। लेकिन इन दोनों भाइयों
3:06को रितेश की तरक्की बर्दाश्त [संगीत]
3:09नहीं हो रही थी।
3:12देख श्याम यह रितेश तो ताजी मछली के नाम
3:15पर खूब पैसे कमा रहा है। [संगीत] हमें भी
3:17कुछ करना होगा।
3:19ए भैया हम जाल डालना और मछली पकड़ना कहां
3:23जानते हैं?
3:24अरे छोड़ जाल डालना। हम शहर की बड़ी
3:27मंडियों से बर्फ में दबी हुई सस्ती मछली
3:29लाएंगे [संगीत] और गांव में रितेश से आधे
3:32दाम पर बेचेंगे। जब लोगों को सस्ता मिलेगा
3:34तो वह रितेश को भूल जाएंगे।
3:37यह दोनों भाई रितेश से जला करते थे और वह
3:41किसी ना किसी तरीके से रितेश का धना बंद
3:44करना चाहते थे। लेकिन रितेश कभी [संगीत]
3:47भी अपने भाइयों के प्रति ईर्ष्या नहीं
3:49रखा।
3:58अगले ही दिन दोनों भाई शहर चले जाते हैं
4:01और शहर में बासी और बर्फ में जमी हुई
4:04मछलियों को लेकर जाते हैं जो उन्हें ताजी
4:07मछली के आधे से भी कम दाम में मिल गया था।
4:11दोनों भाइयों ने अपने गांव के बाजार में
4:14ठीक रितेश के पास में ही अपना मछली का
4:16दुकान लगा लेते हैं।
4:19आप देखना भाई हमारी कमाई कैसे होगी। वो
4:22₹120 में बेच रहे हैं ना हम इसको ₹70 में
4:25बेचेंगे।
4:27आओ भाई आओ ₹0 किलो में मछली ले जाओ। रितेश
4:31से आधे दाम पर बेहतरीन मछली।
4:35इतना काम दाम देखकर लोग उन दोनों के मछली
4:39के दुकान पर आ जाते हैं।
4:42ए भाई सही में बताओ। ₹70 में तुम हमको
4:45मछली दे रहे हो।
4:47और नहीं तो क्या भाई? ₹70 में तुमको मछली
4:50मिलेगी। वो रितेश तो बस तुमको लूट रहा है।
4:54भाई मछली ताजी तो है ना या कम दाम में
4:57लेकर जा रहे हैं और बासी मछली तुम हमें
4:59पढ़ा रहे हो?
5:01यह कैसे बातें कर रहे हो भाई? [संगीत]
5:02ताजी मछली लेकर आए हैं शहर से। तुम ही
5:05सोचो शहर के बड़े-बड़े लोग यह मछली खाते
5:07हैं। यह तुम्हें खाने को मौका मिल रहा है।
5:10ठीक है भाई। वैसे मैं 2 किलो कर दो मेरे
5:13लिए।
5:16ऐसे ही ग्राहक बहुत सारे उसके वहां जमा हो
5:20जाते हैं और यह सब देखकर दोनों भाई बड़े
5:23खुश हो जाते हैं। सस्ता दाम सुनकर गांव के
5:28लोग रितेश [संगीत] को छोड़कर अमित और
5:30श्याम की दुकान पर दौड़े चले आए।
5:36अरे रितेश भाई मुझे 1 किलो पपदा मछली दे
5:39दो। बड़े दिन हो गए पपदा मछली खाए हुए।
5:43आज की ताजी मछली है। ₹120 किलो दूंगा।
5:48अरे भाई सामने अमित तो वही मछली ₹70 किलो
5:52में दे रहा है। तुम इतने महंगे क्यों बेच
5:54रहे हो?
5:55नरेश भाई मेरी मछली अभी नदी से निकली है।
5:59वो लोग दो दिन पुरानी बर्फ वाली मछली बेच
6:02रहे हैं। सस्ते के चक्कर में सेहत से
6:05खिलवाड़ मत करो। अरे छोड़ो भाई इतने सारे
6:08लोग तो ले रहे हैं और वैसे भी पकने के बाद
6:12सब मछली एक जैसी लगती है। मुझे तो सस्ते
6:15से मतलब है।
6:19देखते ही देखते दोनों भाइयों के मछली लगभग
6:22खत्म होने को थे। और इधर सुबह से शाम होने
6:26को थी। पर रितेश की मछलियां बिल्कुल नहीं
6:29बिकी थी।
6:32दोनों भाई तुम्हें जिस भी धंधे पर हाथ
6:35मारो वही धंधा खोल लेते हैं।
6:38अरे रितेश भाई लगता है तुम्हारी आज बोहनी
6:41भी नहीं हुई। तुम्हारे जैसे शहर से मछली
6:44लो और सस्ते में बेचो।
6:46तुम तो बोल ही मत भाई। शहर से बांसी मछली
6:50ले आए हो और आधे दाम में भेज रहे हो।
6:53हां हां देखते हैं। तुम्हारी इस ईमानदारी
6:56से तुम्हारे घर का चूल्हा कितने दिन चलता
6:58है।
6:59रितेश की आज कुछ भी बिक्री नहीं होती। वो
7:03अपने घर चला आता है।
7:08क्या हुआ रितेश बेटा? आज फिर टोकरी भरी
7:11हुई है। क्या आज भी बोहनी नहीं हुई?
7:15पिताजी गांव के लोग पैसों के लालच में
7:18अमित और श्याम की बासी [संगीत] मछलियां खा
7:21रहे हैं। मेरी ताजी मछलियों की किसी को
7:24कद्र ही नहीं रही।
7:26दोनों भाई तो ऐसे ही हैं। [संगीत] हम जब
7:28भी कुछ धंधा करते हैं वह बीच में आ जाते
7:31हैं। देखते हैं आगे [संगीत] क्या होता है।
7:33अमित और श्याम छल कर रहे हैं और छल ज्यादा
7:36दिन नहीं चलता।
7:38पर संतोष जी [संगीत] ऐसे तो घर का चूल्हा
7:40जलना मुश्किल हो जाएगा। अमित और श्याम तो
7:42इसे गांव से बाहर निकालने की फिरा में है।
7:45ठीक है। [संगीत] तुम कुछ दिन और अपना मछली
7:48बेच कर देखो। फिर भी वही रहा तो फिर कुछ
7:51करेंगे।
7:53उसके [संगीत] बाद रितेश अपने पिता की बात
7:55मान लेता है
8:02और बाकी दोनों की तरह और कुछ दिन और ऐसे
8:06ही मछली बेचने लगता है। लेकिन मजाल थी कि
8:10दोनों भाई इसका मछली वाला धंधा चलने देते।
8:14ऐसे ही कुछ दिन बाद रितेश ने अपना मछली
8:17बेचना बंद कर दिया।
8:21हो गया भाई। इसका तो टिकट कट गया। अब लगता
8:25है कल से ही और मछली बेचना बिल्कुल भी
8:28नहीं आएगा।
8:29हां, ठीक कहा अमित भाई। आप तो इस रितेश का
8:32टाई टाई फिक्स हो गया।
8:36उनकी बातें सुनकर बहुत ही ज्यादा गुस्से
8:38में रितेश अपने घर चलना है।
8:47पिताजी अब बस अब आगे से मैं मछली बेचना
8:51नहीं जाऊंगा।
8:52क्या होगा बेटा? शांत हो जा बेटा।
8:56क्या हो गया यह [संगीत] मत पूछो। पिताजी
8:59एक हफ्ता से हमारी मछली नहीं बिक रही है।
9:02ऊपर से आज तो दोनों भाई ने मेरा खूब मजाक
9:05उड़ाया।
9:06अगर मछली नहीं बेचेंगे तो क्या करेंगे अब
9:09हम?
9:10अगर गांव वाले कच्ची [संगीत] मछली की कद्र
9:12नहीं समझ रहे तो मैं उन्हें मछली पका कर
9:15खिलाऊंगा। मैं गांव के चौराहे पर मछली,
9:18करी [संगीत] और चावल का ठेला लगाऊंगा।
9:21आपकी सिखाई हुई रेसिपी और मेरी ताजी मछली।
9:24फिर देखते हैं यह लोग बासी मछली कैसे
9:27बेचते हैं।
9:29तभी वहां पर उसकी मां रोशनी आ जाती है।
9:33ठीक ही तो कह रहा है रितेश। ए ऐसे भी तो
9:36हमारा मछली का व्यापार नहीं चल रहा है।
9:38क्या पिताजी आज तक कोई भी गांव में मछली,
9:41करियर चावल का दुकान नहीं लगाया है। लोग
9:44हमारे यहां जरूर खाने आएंगे।
9:46ठीक है बेटा। तुझे जैसा ठीक लगे कल ही
9:49तुझे मछली बनाना बहुत ही अच्छे तरीके से
9:52सिखाऊंगा। रितेश ने अब अपना रास्ता बदल
9:55लिया था। उसने तय किया कि वह अब कच्ची
9:58मछली नहीं बल्कि बेहतरीन मछली करी चावल
10:02बेचेगा। अब आगे क्या होगा? क्या रितेश का
10:05ठेला चलेगा? और अमित श्याम अब कौन सी नई
10:08चाल चलेंगे?
10:11अगले दिन सूरज की पहली किरण के साथ ही
10:14रितेश और उसका पिता दोनों मिलकर मछली
10:17बनाने की तैयारी [संगीत] करते हैं। रितेश
10:20के पिता संतोष कोई आम आदमी नहीं थे। अगर
10:24गांव [संगीत] में शादी हो किसी का जन्मदिन
10:26हो तो मछली बनाने के लिए रितेश के पिता को
10:29ही बुलाया जाता था।
10:33देख बेटा रितेश [संगीत] मछली बनाना सिर्फ
10:36खाना बनाना नहीं एक कला है। जब सरसों
10:39[संगीत] का तेल कढ़ाई में कड़के और उसमें
10:41पिसे हुए मसाले पड़े तो उसकी खुशबू पूरे
10:44रघुनाथपुर को खींच लानी चाहिए। [हंसी]
10:48आपके हाथ का स्वाद तो पूरा गांव चख चुका
10:51है पहले से ही। अब मेरी बारी है कि मैं
10:54आपके कदमों पर खड़े उतारूंगा या नहीं।
10:58कुछ ही देर में दोनों ने मछली करी और चावल
11:01बना लिया जिसकी खुशबू काफी अच्छी आ रही
11:04थी।श
11:07बाजार की ओर निकल पड़ा लेकिन आज उसके कंधे
11:10पर मछलियों की टोकरी नहीं बल्कि एक नया
11:14संकल्प था।
11:17भले ही आज जेब खाली है लेकिन बापू का दिया
11:21हुआ हुनर है। आओ भाई आओ रघुनाथपुर में
11:25पहली बार आपको ताजी और स्वादिष्ट मछली करी
11:29और चावल।
11:31कभी मछली चावल का इतना अच्छा खुशबू सूंघ
11:34कर उसे गांव का पेटू राम खाने के लिए आ
11:37जाता है।
11:43अरे भाई यह कैसी सुगंध है? ऐसा लग रहा है
11:47जैसे नाक के रास्ते सीधे कलेजे में उतर
11:49रही है। अरे रितेश बाबू यह क्या नया तमाशा
11:52है? यह कच्ची मछली छोड़कर अब पका कर खिला
11:56रहे हो क्या?
11:58हां मोटू भाई अब ताजी मछली का स्वाद चखिए।
12:01यह लीजिए गरमा गरम चावल और ऊपर से यह
12:06गाढ़ी मसालेदार मछली करी। रितेश ने अपना
12:10मछली करी और चावल का एक प्लेट लगाया जो
12:14देखने में बहुत ही ज्यादा लाजवाब था। मोटू
12:17राम ने तुरंत खाने लगता है।
12:27आ उफ रितेश कसम मेरे खाने की। ऐसा स्वाद
12:32तो मां के हाथ के खाने में भी नहीं चखा।
12:34यह मछली है या मक्खन। मुंह में जाते ही
12:37घुल गई।
12:38भाई आज तो मेरी आत्मा तृप्त हो गई। पर यह
12:41पापी पेट और मांग रहा है। एक प्लेट और
12:45लगाओ।
12:48रितेश उसे ग्राहक की बातें सुनकर खुश हो
12:51जाता है क्योंकि आखिरकार [संगीत]
12:53उसके हाथ का खाना लोगों को पसंद जो आ रहा
12:56था।
13:00अरे आप सब लोगों के लिए ही तो यह दुकान
13:02खुला है। जितना खाना है खाओ भाई।
13:06देखते ही देखते पूरे चौराहे पर रितेश के
13:10मछली करी चावल की धूम मच गई। जो लोग अमित
13:14और श्याम की सस्ती बासी मछली के चक्कर में
13:16थे वे भी महक के पीछे खींचे चले आए।
13:22अरे भाई हमें भी एक प्लेट मछली और चावल दो
13:24भाई।
13:25ए भाई मुझे दो प्लेट देना। इसकी खुशबू
13:28बहुत अच्छी आ रही है।
13:32उसके ठेले पर लोग बड़े ही मजे से मछली,
13:35करी और चावल खा रहे थे।
13:38गांव वाले ऐसा स्वाद पहले कभी नहीं चुके
13:41थे। शाम होते ही रितेश खुशी-खुशी अपने घर
13:45चला आता है।
13:52पिताजी आपके सिखाए हुए मछली करी और चावल
13:56बेचकर आज मैंने कितने पैसे कमाए? गांव
13:59वाले तो खाते ही जा रहे थे और मोटा संतोष
14:02तो दो [संगीत] प्लेट खा गया।
14:04अच्छा है। अच्छा है बेटा। अब अच्छे से काम
14:07कर। लोगों [संगीत] को अच्छा स्वाद देना।
14:11आज रितेश और उसका परिवार काफी खुश था।
14:16अगले ही दिन पूरे गांव में यह बात फैल
14:18चुका था जिसके कारण उसके दुकान पर लोग
14:22सुबह से ही आने लगते हैं।
14:28अरे [नाक से की जाने वाली आवाज़] भाई कल
14:29से जो मैं खाकर गया हूं। मुझे तो इसका
14:32स्वाद इतना अच्छा लगा कि सुबह होते ही मैं
14:35तुम्हारे दुकान पर आ गया।
14:38अरे हां भैया अभी लगाता हूं गरमागरम मछली
14:42करी और चावल।
14:44रितेश फटाफट ग्राहकों को मछली करी और चावल
14:48दे रहा था। दोपहर तक उसकी दुकान पर काफी
14:51भीड़ हो गए थे। [संगीत] यह बात है दोनों
14:54भाई को भी पता चल जाता है। दूर खड़े अमित
14:57और श्याम अपनी खाली दुकान देख रहे थे।
15:02यह रितेश [संगीत] तो बहुत चालाक निकला
15:03श्याम। हमने इसकी कच्ची मछली की दुकान बंद
15:06करवाई तो इसने पका कर बेचना शुरू कर दिया।
15:09अगर ऐसा ही चला तो हमारा तो दीवाला निकल
15:12जाएगा। भैया लोग कह रहे हैं इसके हाथ में
15:16[संगीत] जादू है। हमें भी ठेला खोलना
15:18चाहिए। ठेला तो खोलेंगे पर पहले इस रितेश
15:23का नाम मिट्टी में मिलाना होगा।
15:30अगले ही दिन दोनों भाई ने अपना खेल लगा
15:33लिया और दोनों भी मछली करी और चावल बेचने
15:37लगे।
15:38आओ भाई आओ ताजी-ताजी मछली करी चावल खाने
15:41आओ। उसे रितेश से दाम में भी काम और स्वाद
15:44में भी दम।
15:46अमित और श्याम चिल्लाने लगते हैं, लेकिन
15:48फिर भी उनके वहां ग्राहक नहीं आते हैं।
15:54यह देखकर रितेश को भी बहुत ज्यादा गुस्सा
15:56आ जाता है।
15:59लो, फिर से यह दोनों मेरे धंधा कॉपी कर
16:02लिए। मेरे जैसे फिर से ठेला लगा लिए। लगने
16:06दो मेरे पिता के हाथों में जो स्वाद
16:08[संगीत] है, यह कहां दे पाएंगे ग्राहकों
16:10को?
16:15लगता है ग्राहकों को रितेश का ही मछली करी
16:18चावल पसंद है। लोग तो हमारी तरफ देख भी
16:21नहीं रहे हैं।
16:23लोग इसके पास स्वाद के लिए आते हैं ना तो
16:25आज मैं इसका स्वाद [संगीत] ही बिगाड़
16:27दूंगा। देख मैं क्या करता हूं।
16:30अमित ने अपनी जेब में लाल मिर्च का एक
16:33तीखा [संगीत] पैकेट छिपाया और ग्राहक बनकर
16:36रितेश के ठेले पर पहुंचा। वहां भारी भीड़
16:39थी।
16:42अरे अमित अपना ठेला छोड़कर मेरे ठेले पर
16:46क्या करने आए हो?
16:48तो क्या है कि हम लोग नया-नया ठेला खोले
16:51हैं। तो मैं तुम्हारे यहां मछली, करी चावल
16:54का स्वाद लेने आया हूं।
16:57उसके बाद रितेश ने उसको भी ग्राहकों के
17:00साथ मछली और चावल परोस दिया। जैसे ही उसने
17:03मछली भरोसा, अमित ने अपने जेब से लाल
17:06मिर्च का पाउडर निकाला और उसे मछली करी
17:09में मिला दिया और खाते ही चिल्लाने लगता
17:12है।
17:17आ बचाओ पानी पानी।
17:20अरे गांव वालों देखो इस रितेश ने इसमें
17:23क्या मिला दिया है। मेरा गला जल रहा है।
17:26यह मछली करी है या तेजाब?
17:28वहां खड़े ग्राहक उसे पूछने लगते हैं।
17:31अरे रे भाई क्या हुआ? क्यों चिल्ला रहे
17:33हो?
17:34देखो यह रितेश हमसे जलता है क्योंकि हमने
17:37सामने दुकान खोली है। इसने जानबूझकर इसमें
17:41इतनी मिर्च और पता नहीं क्या-क्या मिला
17:43दिया है।
17:44अरे भाई क्या हुआ? क्या हुआ? इतना क्यों
17:47चिल्ला रहा है भाई? नहीं भैया। यह क्या कह
17:50रहे हैं आप? मैंने तो अभी सबको खिलाया। सब
17:53ठीक थे।
17:55भाई आपको यकीन ना हो तो मेरा प्लेट खाकर
17:57देखो।
17:59तभी पास ही का एक ग्राहक उसका प्लेट से
18:01मछली करी चावल खाकर देखा है।
18:06हां भाई सही कह रहा है। यह अमित इसके
18:09प्लेट में तो बहुत ही ज्यादा मिर्ची है।
18:12यह बेचारा तो बस स्वाद लेने आया था। पर यह
18:15रितेश कैसा है? देखो इसके प्लेट में बहुत
18:18ज्यादा मिर्ची मिला दिया।
18:21अरे नहीं नहीं गांव वालों मैंने कुछ नहीं
18:24किया।
18:25रितेश की बात कोई नहीं सुनता है और सारे
18:28ग्राहक अमित और श्याम की दुकान पर चले
18:30जाते हैं।
18:34अमित और श्याम की आज काफी अच्छी कमाई हो
18:36जाती है।
18:39देखा श्याम मेरा तेज दिमाग आज कितना कमाई
18:43हो गया हम दोनों का।
18:45हां, अब धीरे-धीरे यह भी धंधा [संगीत]
18:46इसका बंद करवा देंगे।
18:49इधर रितेश की आज कुछ कमाई नहीं हुई थी। वो
18:52गुस्से से घर चला जाता है।
18:56घर जाकर रितेश अपने पिता को सारी बातें
18:59बताता है।
19:01पिताजी मैंने [संगीत] कुछ नहीं किया। फिर
19:04भी सब मुझे गुनहगार मान रहे हैं। अब क्या
19:07होगा?
19:08बेटा [संगीत] जब सच की परीक्षा होती है तो
19:11आग में तपना ही पड़ता है। अमित और श्याम
19:14को लगता है कि वे जीत गए। पर वो लोग फिर
19:17कोई साजिश करेंगे तो तो ठेला लगा। अगर इस
19:20[संगीत] बार उन्होंने खोज की तो हम भी
19:22उनके बदले जवाब देंगे।
19:29उसके बाद अगले ही दिन से रितेश ने अपना
19:32दुकान लगा लिया था। कुछ ग्राहक वाले ही
19:35अमित और श्याम की दुकान पर जा रहे थे।
19:38लेकिन श्याम और अमित के हाथों में वो
19:40स्वाद कहां था?
19:43भले ही हम वह बात सुनकर तुम्हारे पास आए
19:45हैं, लेकिन तुम्हारे हाथों में रितेश जैसा
19:48स्वाद नहीं है। भाई, हम तो जा रहे हैं
19:51रितेश के पास खाने के लिए।
19:54जितने भी ग्राहक थे, कुछ दिनों में समझ गए
19:57थे कि असली स्वाद तो रितेश के ही हाथों
19:59में है। आज से फिर से रितेश के यहां भीड़
20:02लगने लगती है।
20:05देख रहे हो? यह फिर से हमारे सारे ग्राहक
20:08छीन लिया। इसके लिए भी मेरे पास इलाज है।
20:12देखना कुछ ना कुछ करता हूं मैं।
20:14अमित अपने दिमाग में कुछ सोच रहा था। तभी
20:17वह वापस रितेश के दुकान पर श्याम के साथ
20:20जाता है।
20:29क्या हुआ? आप फिर से कुछ चाल चलने आए हो
20:32क्या दोनों?
20:33अरे हम तो तुम्हारे भाई हैं भाई। तुम ही
20:36बस हमें अपना भाई नहीं मानते।
20:39यह सब छोड़ो। बताओ क्या हुआ? क्यों आए हो
20:42यहां पर?
20:44देखो भाई, [संगीत] यह रोज-रोज की लड़ाई
20:47झगड़ा से हम भी दूर रहना चाहते हैं। मैं
20:49तो बोलता हूं गांव में एक प्रतियोगिता
20:52रखते हैं। कैसी प्रतियोगिता?
20:55देखो, गांव में एक प्रतियोगिता रखते हैं।
20:58जिसमें गांव के प्रधान और बड़े लोग हम
21:01दोनों का स्वाद चाहेंगे। और जिसका भी मछली
21:04और चावल प्रधान और गांव वालों को पसंद आया
21:07वही गांव में ठेला लगाएगा।
21:10रितेश ने उन दोनों [संगीत] की बातों को
21:12थोड़ा देर सोचा लेकिन वह भी रोज के किचकिच
21:15से तंग आ चुका था।
21:17मंजूर है लेकिन कल ही प्रतियोगिता करवाते
21:21हैं। कल नहीं दो दिन बात करते हैं।
21:26रितेश भी उनकी बातों में हां कर देता है।
21:29अब देखना होगा दोनों भाई क्या चल चलते
21:32हैं।
21:39दोनों भाइयों ने चुनौती तो दे [संगीत] दी
21:41थी लेकिन उन्हें खाना बनाना नहीं बल्कि
21:44बिगड़ना आता था।
21:47भैया चुनौती तो दे दी पर हमें तो करी का क
21:51भी नहीं आता। अगर हम हार गए तो गांव से
21:54बोरिया बिस्तर समेटना पड़ेगा।
21:58डर मत श्याम। रितेश [संगीत] का बाप संतोष
22:01चाचा दिल का बहुत भोला है। चल उनके पास
22:04चलते हैं। कुछ तो मदद करेंगे ही।
22:08लेकिन एक दिन में खाना बनाना हम नहीं सीख
22:10सकते। हमें कुछ और भी करना पड़ेगा।
22:14तुम चिंता मत करो। हम पहले उसी से खाना
22:17बनाना सीखेंगे। उसके बाद उनकी मछली और
22:20मसाले में हम फिर करेंगे।
22:26दोनों भाई अगले दिन में संतोष जी के पास
22:29पहुंचे [संगीत] और गिड़गिड़ाने लगे। संतोष
22:32जी ने मन ही मन एक योजना बनाई और बहुत
22:36गंभीर चेहरा बनाकर बोले
22:39देखो [संगीत] बच्चों तुम मेरे भतीजे हो
22:41इसलिए बना रहा हूं। रितेश का खाना इसलिए
22:44नहीं बिकता [संगीत] कि वह ताजी मछली लाता
22:46है बल्कि इसलिए क्योंकि हमारे खानदान पर
22:49[संगीत] दमदम बाबा की कृपा है। वे दूर
22:52जंगल के पीछे कुटिया में रहते हैं। वे एक
22:54जादुई राख देते हैं। [संगीत] उसे करी में
22:57डालते ही बासी मछली भी सोने जैसी और स्वाद
23:00में स्वर्ग जैसी हो जाती है।
23:03क्या [संगीत] जादुई पाउडर? क्या वे हमें
23:06भी देंगे चाचा?
23:08देंगे। वह तो सबकी मदद करते हैं। याद रखना
23:11[संगीत] यह बात तुम रितेश को नहीं बताओगे।
23:15दोनों भाई खुश हो जाते हैं।
23:25दोनों भाई शाम होते हैं जंगल की तरफ निकल
23:28जाते हैं। जंगल के बीच में उन्हें एक खास
23:31पोस्ट से बना घर दिखता है।
23:34लगता है यही घर है जिसका चाचा ने जिक्र
23:37किया था। चलो अंदर जाकर देखते हैं।
23:42उसके बाद दोनों भाइयों ने दबे पांव उसे
23:45कुटिया में कदम रखा। उसके अंदर एक बाबा
23:48बैठे हुए थे। दरअसल वो बाबा कोई और नहीं
23:52संतों से था।
23:55प्रणाम दमदम बाबा। हमें वो जादुई पाउडर
23:58चाहिए। हम दमदम बताओ कौन हो [संगीत] तुम
24:02और क्यों आए हो?
24:05हम पास के गांव से आए हैं। हम आपको परेशान
24:08करने नहीं आए हैं।
24:09दर हशर कल हमारा एक मुकाबला है। इसलिए
24:12आपके पास हो जादुई पाउडर लेने आए हैं।
24:16दमदम सुन रे बच्चा यह कोई मामूली पाउडर
24:19नहीं है। यह है स्वाद [संगीत] का जादू। बस
24:23एक चुटकी दाल और फीके खाने में भी आएगा
24:26तीन गुना स्वाद। दमदम।
24:30बाबा ने उन्हें एक पुड़िया थमा दी। दोनों
24:33भाई खुशी-खुशी वहां से निकले जाते हैं।
24:37रात के 3:00 बजे चुपके से रितेश के घर के
24:40पिछवाड़े पहुंचे। उन्होंने रितेश की ताजी
24:44मछलियां निकालकर सड़ी हुई बासी मछलियां भर
24:47दी और उसके मसालों में रेत और कंकर मिला
24:50दिए। उन्हें लगा कि अब रितेश का हारना तय
24:54है।
24:55अब इसके मसाले मछली सब बदल दिए हैं। ऊपर
24:58से बाबा के यहां चमत्कारी दवा भी ले आए
25:00हैं। अब हमें हराना मुमकिन ही नहीं
25:02नामुमकिन है। कल तो हमें जीतेंगे। अब चलो
25:06जल्दी हमें भी तैयारी करना है।
25:09उसके बाद दोनों ही भाई वहां से दबे पांव
25:12निकल जाते हैं।
25:15देखा पिताजी यह होगा मुझे पता था। इसलिए
25:18मैं आज रात को जगा हुआ था।
25:22[हंसी]
25:23अरे तुम चिंता मत करो। यह बहुत चालाक बनते
25:26हैं ना। कल का सारा सच गांव वालों के
25:28सामने आ जाएगा।
25:32सुबह के 11:00 बज रहे थे। चूल्हे जल चुके
25:36थे। रितेश शांत था। जबकि अमित [संगीत] और
25:39श्याम बाबा की पुड़िया हाथ में लिए
25:41मुस्कुरा रहे थे।
25:45अरे भाई जल्दी शुरू करो। मेरी आत्मा कल
25:48रात से ही तड़प रही है। रितेश बाबू आज
25:52अपनी वही चटकारेदार मछली खिलाओ कि पेट कहे
25:55बस और नियत कहे और।
25:58प्रतियोगिता शुरू की जाए।
26:01उसके बाद प्रतियोगिता शुरू की जाती है।
26:04दोनों ही खेलों में जोरों शोरों से मछली
26:07के लिए [संगीत] चावल बनाया जा रहा था। 1
26:10घंटे बाद दोनों की मछली करी तैयार हो
26:13[संगीत] जाते हैं।
26:15अब देखना है यह पाउडर मिलते ही हमारे खाने
26:18के गांव वाले दीवाने हो जाएंगे और यह
26:21दोनों बाप बेटों का धंधा अब से बंद हो
26:24जाएगा। [हंसी]
26:28तो ठीक है। अब हम सबसे पहले रितेश के मछली
26:32करी चावल खाएंगे। उसके बाद हम दोनों भाई
26:36का मछली खाएंगे। जिसका खाना सबसे बढ़िया
26:39होगा उसे गांव में ठेला लगाएगा अनुमति
26:42मिलेगा।
26:44अमित और श्याम मन ही मन हंस रहे थे
26:47[संगीत] कि अभी जैसे ही सरपंच जी सड़ी
26:49मछली खाएंगे रितेश की शामत आ जाएगी। रितेश
26:54ने थाली सजाई। गरमा गरम चावल और गाढ़ी
26:57मछली करी। [संगीत]
26:58पहला निवाला खाते ही हैरान रह गए।
27:03अरे यह क्या [संगीत] स्वाद है? रितेश बेटा
27:06कल की उस कड़वाहट के बाद आज यह स्वाद तो
27:09अमृत जैसा लग रहा है। मछली इतनी कोमल
27:12[संगीत] की मक्खन की तरह पिघल रही है।
27:16वाह अद्भुत मसालों का ऐसा संतुलन मैंने आज
27:20तक नहीं चखा रितेश। तुम्हारी ईमानदारी ने
27:23आज [संगीत] फिर दिल जीत लिया।
27:27यह कैसे हुआ? हमने तो सड़ी मछली डाली थी।
27:31अरे हमने जो रात को मछली रखी थी उसको शायद
27:35सुबह में यह लोग बदल दिए होंगे। कोई ना
27:37जीत तो हमारी ही होगी।
27:41अब बारी थी अमित और श्याम की। उन्होंने
27:44अपनी कढ़ाही में बाबा की वो जादुई पुड़िया
27:47उलट दी थी। बड़े घमंड के साथ उन्होंने
27:50सरपंच और साहूकार जी को थाली परोसी।
27:54खाइए हुजूर। यह है असली खानदानी जायका।
27:58खाते ही आपकी आत्मा तृप्त हो जाएगी।
28:01बड़ा तारीफ कर रहा है भाई अमित। खाने के
28:04बाद ही पता चलेगा वो तो। चल जल्दी से हम
28:07लोगों के लिए प्लेट लगा। देखते हैं तेरे
28:10हाथों में क्या जादू है।
28:13सरपंच जी ने जैसे ही पहला निवाला मुंह में
28:16लिया, उनका चेहरा नीला पड़ गया। उन्होंने
28:19तुरंत खाना थूक दिया और खांसने लगे।
28:22साहूकार जी ने जैसे ही [संगीत] चखा,
28:25उन्हें लगा जैसे मुंह में कचरा और रेत भर
28:28गई हो।
28:29थू थू यह क्या खिला रहे हो? यह मछली है या
28:33नाले का कीचड़? इसमें तो कंकर और मिट्टी
28:36भरी है। और यह कैसी गंदी बदबू आ रही है।
28:40[हंसी]
28:40धिक्कार है तुम पर। तुम गांव वालों को ऐसा
28:43जहर खिलाना चाहते थे। तुम दोनों ने रितेश
28:45को [संगीत] नीचा दिखाने के लिए खुद अपने
28:47खाने में कचरा मिला दिया। दोनों भाई हैरान
28:49होकर चौंक जाते हैं और कांपते [संगीत] हुए
28:52कहते हैं
28:55नहीं हुजूर ये हमने तो बहुत ही अच्छा खाना
28:58बनाया था और ऊपर से तो दमदम बाबा का जादुई
29:02पाउडर था उन्होंने कहा था इससे स्वाद बढ़
29:05जाएगा
29:07तभी भीड़ के बीच से संतोष जी आगे आए और
29:10[संगीत] अमित की आंखों में आंखें डालकर
29:13मुस्कुराए।
29:14दम दम बस एक चुटकी दाल और फीके खाने में
29:18भी आएगा [संगीत] तीन गुना स्वाद दमदम
29:23[हंसी]
29:27चाचा वो आवाज वो डायलॉग तो वो दमदम बाबा
29:32आप ही थे। अरे हम हार गए हैं श्याम। ये
29:37दोनों बाप-ब में हमारे साथ चालाकी कर दी।
29:40हमारे पास कोई सबूत नहीं है कि चाचा ही
29:43बाबा वो थे।
29:46अमित और श्याम को अपनी करनी पर
29:48शर्मिंदगीगी हुई [संगीत] लेकिन अब बहुत
29:50देर हो चुकी थी।
29:52फैसला सुनाया जाता है। अमित और श्याम ने
29:55ना केवल बेईमानी की बल्कि गांव वालों की
29:58सेहत से भी खिलवाड़ किया। आज से यह दोनों
30:02गांव के बाजार में कभी मछली नहीं बेचेंगे।
30:05और [संगीत] रितेश का ठेला ही इस गांव का
30:08एकमात्र असली स्वाद वाला ठेला होगा।
30:15रितेश की आंखों में आज जीत के आंसू थे। उस
30:18दिन के बाद से रघुनाथपुर में सिर्फ रितेश
30:21का ही बोलबाला रहा और [संगीत] अमित श्याम
30:24को अपनी दुकान हमेशा के लिए बंद करनी
30:26पड़ी। हमारी कहानी यहीं पर खत्म होती है।
30:30हमारे अगले वीडियो में बहुत सारे लोगों ने
30:33कमेंट किया था। जिसमें से कुछ लोगों का
30:35हमने इसमें नाम इस्तेमाल किया। अगर आप
30:38चाहते हैं कि अगले वीडियो में आपका नाम
30:41इस्तेमाल हो तो प्लीज प्यारा सा एक कमेंट
30:44कर देना।