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गांव में फिस करी | Gaon Me Fish Wala | hindi Kahani | Cartoon Stories

Jagan Toon · 4,269 words · 20 min read

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0:00बिहार के [संगीत] कुशीनगर जिले में गंडक

0:02नदी के किनारे बसा एक छोटा सा गांव है

0:05रघुनाथपुर। इसी गांव में रितेश नाम का एक

0:08सीधा साधा और बहुत मेहनती नौजवान रहता था।

0:12रितेश के परिवार में उसके पिता संतोष और

0:15उसकी माता रोशनी थी। रितेश का रोज का काम

0:19था। सुबह तर के उठना, गांव के तालाब और

0:22नदी में जाल डालना और ताजी मछलियां

0:25पकड़ना।

0:30वाह, आज तो बहुत ही बढ़िया और ताजी

0:34मछलियां हाथ लगी हैं। बाजार में गांव वाले

0:37इन्हें देखकर खुश हो जाएंगे।

0:40रितेश के पिता संतोष बाजार में पहले

0:43मछलियां बेचा करते थे।

0:45अब उनकी उम्र हो गई थी। तो रितेश इन

0:47मछलियों को टोकरी में भरता और गांव के

0:50बाजार में ले जाकर बेचता।

0:56उसकी पकड़ी हुई मछलियां इतनी [संगीत] ताजी

0:59होती थी कि पूरा गांव उसी से मछली खरीदना

1:02पसंद करता था। तभी सुबह-सुबह उसका रोज का

1:06ग्राहक महेंद्र भैया आते हैं।

1:10अरे रितेश भाई, आज तो काफी बड़ी मछलियां

1:13दिख रही है। जरा 1 किलो ताजी मछली तोल दो।

1:17और हां भाई काट के देना। क्या है कि मेरी

1:20पत्नी शाकाहारी है। उसको मछली पसंद नहीं

1:22है।

1:24आइए महेंद्र भैया आपके लिए तो हमेशा सबसे

1:28बेहतरीन मछली ही निकाल कर रखता हूं। अभी

1:31आपके लिए 1 किलो में काट कर देता हूं। और

1:34कल की मछली कैसी लगी आपको भैया?

1:38हां भाई तेरी ताजी मछलियों की बात ही अलग

1:41होती है। पूरा गांव जानता है कि रितेश की

1:44मछली स्वाद में सबसे स्वादिष्ट होती है।

1:47धन्यवाद भैया। यह तो आप लोगों का प्यार

1:50है। मैं तो हमेशा आप लोगों को बहुत ही

1:54अच्छा मछली और बेहतरीन स्वाद देना चाहता

1:57हूं।

1:58रितेश ने कुछ ही देर में मछली काटकर उसे

2:01ग्राहक को दे दिया।

2:05ग्राहक वहां से मछली लेकर चले जाते हैं।

2:11तभी वहां पर एक बंगालन महिला आती है।

2:16अरे भैया मेरे लिए आज हिलसा मछली कर देना।

2:19और हां बड़ी वाली का काटना।

2:22हमारे यहां ताजी ही मछली मिलती है।

2:25ठीक है भाई थोड़ा जल्दी देना। आज मेरा भाई

2:28आ रहा है गांव से तो थोड़ा जल्दी दे दो।

2:30अरे बिल्कुल दीदी। मैं अभी आपके लिए हिलसा

2:34मछली काट कर दे देता हूं।

2:37कुछ ही समय में उसके वहां बहुत ही ज्यादा

2:39भीड़ लग जाती है। रितेश एक मछुआरा था जो

2:43ताजी-ताजी मछली लेकर बाजार में बेचा करता।

2:47उसके एक सरल स्वभाव की वजह से लोग उसी के

2:50पास लेने अटैक्स थे। रितेश की ईमानदारी और

2:54बढ़ती बिक्री देखकर उसके चचेरे भाई अमित

2:57और श्याम जलन [संगीत] के मारे कुड़ने लगे।

3:00अमित और श्याम के पिता और रितेश के पिता

3:03संतोष सगे भाई थे। लेकिन इन दोनों भाइयों

3:06को रितेश की तरक्की बर्दाश्त [संगीत]

3:09नहीं हो रही थी।

3:12देख श्याम यह रितेश तो ताजी मछली के नाम

3:15पर खूब पैसे कमा रहा है। [संगीत] हमें भी

3:17कुछ करना होगा।

3:19ए भैया हम जाल डालना और मछली पकड़ना कहां

3:23जानते हैं?

3:24अरे छोड़ जाल डालना। हम शहर की बड़ी

3:27मंडियों से बर्फ में दबी हुई सस्ती मछली

3:29लाएंगे [संगीत] और गांव में रितेश से आधे

3:32दाम पर बेचेंगे। जब लोगों को सस्ता मिलेगा

3:34तो वह रितेश को भूल जाएंगे।

3:37यह दोनों भाई रितेश से जला करते थे और वह

3:41किसी ना किसी तरीके से रितेश का धना बंद

3:44करना चाहते थे। लेकिन रितेश कभी [संगीत]

3:47भी अपने भाइयों के प्रति ईर्ष्या नहीं

3:49रखा।

3:58अगले ही दिन दोनों भाई शहर चले जाते हैं

4:01और शहर में बासी और बर्फ में जमी हुई

4:04मछलियों को लेकर जाते हैं जो उन्हें ताजी

4:07मछली के आधे से भी कम दाम में मिल गया था।

4:11दोनों भाइयों ने अपने गांव के बाजार में

4:14ठीक रितेश के पास में ही अपना मछली का

4:16दुकान लगा लेते हैं।

4:19आप देखना भाई हमारी कमाई कैसे होगी। वो

4:22₹120 में बेच रहे हैं ना हम इसको ₹70 में

4:25बेचेंगे।

4:27आओ भाई आओ ₹0 किलो में मछली ले जाओ। रितेश

4:31से आधे दाम पर बेहतरीन मछली।

4:35इतना काम दाम देखकर लोग उन दोनों के मछली

4:39के दुकान पर आ जाते हैं।

4:42ए भाई सही में बताओ। ₹70 में तुम हमको

4:45मछली दे रहे हो।

4:47और नहीं तो क्या भाई? ₹70 में तुमको मछली

4:50मिलेगी। वो रितेश तो बस तुमको लूट रहा है।

4:54भाई मछली ताजी तो है ना या कम दाम में

4:57लेकर जा रहे हैं और बासी मछली तुम हमें

4:59पढ़ा रहे हो?

5:01यह कैसे बातें कर रहे हो भाई? [संगीत]

5:02ताजी मछली लेकर आए हैं शहर से। तुम ही

5:05सोचो शहर के बड़े-बड़े लोग यह मछली खाते

5:07हैं। यह तुम्हें खाने को मौका मिल रहा है।

5:10ठीक है भाई। वैसे मैं 2 किलो कर दो मेरे

5:13लिए।

5:16ऐसे ही ग्राहक बहुत सारे उसके वहां जमा हो

5:20जाते हैं और यह सब देखकर दोनों भाई बड़े

5:23खुश हो जाते हैं। सस्ता दाम सुनकर गांव के

5:28लोग रितेश [संगीत] को छोड़कर अमित और

5:30श्याम की दुकान पर दौड़े चले आए।

5:36अरे रितेश भाई मुझे 1 किलो पपदा मछली दे

5:39दो। बड़े दिन हो गए पपदा मछली खाए हुए।

5:43आज की ताजी मछली है। ₹120 किलो दूंगा।

5:48अरे भाई सामने अमित तो वही मछली ₹70 किलो

5:52में दे रहा है। तुम इतने महंगे क्यों बेच

5:54रहे हो?

5:55नरेश भाई मेरी मछली अभी नदी से निकली है।

5:59वो लोग दो दिन पुरानी बर्फ वाली मछली बेच

6:02रहे हैं। सस्ते के चक्कर में सेहत से

6:05खिलवाड़ मत करो। अरे छोड़ो भाई इतने सारे

6:08लोग तो ले रहे हैं और वैसे भी पकने के बाद

6:12सब मछली एक जैसी लगती है। मुझे तो सस्ते

6:15से मतलब है।

6:19देखते ही देखते दोनों भाइयों के मछली लगभग

6:22खत्म होने को थे। और इधर सुबह से शाम होने

6:26को थी। पर रितेश की मछलियां बिल्कुल नहीं

6:29बिकी थी।

6:32दोनों भाई तुम्हें जिस भी धंधे पर हाथ

6:35मारो वही धंधा खोल लेते हैं।

6:38अरे रितेश भाई लगता है तुम्हारी आज बोहनी

6:41भी नहीं हुई। तुम्हारे जैसे शहर से मछली

6:44लो और सस्ते में बेचो।

6:46तुम तो बोल ही मत भाई। शहर से बांसी मछली

6:50ले आए हो और आधे दाम में भेज रहे हो।

6:53हां हां देखते हैं। तुम्हारी इस ईमानदारी

6:56से तुम्हारे घर का चूल्हा कितने दिन चलता

6:58है।

6:59रितेश की आज कुछ भी बिक्री नहीं होती। वो

7:03अपने घर चला आता है।

7:08क्या हुआ रितेश बेटा? आज फिर टोकरी भरी

7:11हुई है। क्या आज भी बोहनी नहीं हुई?

7:15पिताजी गांव के लोग पैसों के लालच में

7:18अमित और श्याम की बासी [संगीत] मछलियां खा

7:21रहे हैं। मेरी ताजी मछलियों की किसी को

7:24कद्र ही नहीं रही।

7:26दोनों भाई तो ऐसे ही हैं। [संगीत] हम जब

7:28भी कुछ धंधा करते हैं वह बीच में आ जाते

7:31हैं। देखते हैं आगे [संगीत] क्या होता है।

7:33अमित और श्याम छल कर रहे हैं और छल ज्यादा

7:36दिन नहीं चलता।

7:38पर संतोष जी [संगीत] ऐसे तो घर का चूल्हा

7:40जलना मुश्किल हो जाएगा। अमित और श्याम तो

7:42इसे गांव से बाहर निकालने की फिरा में है।

7:45ठीक है। [संगीत] तुम कुछ दिन और अपना मछली

7:48बेच कर देखो। फिर भी वही रहा तो फिर कुछ

7:51करेंगे।

7:53उसके [संगीत] बाद रितेश अपने पिता की बात

7:55मान लेता है

8:02और बाकी दोनों की तरह और कुछ दिन और ऐसे

8:06ही मछली बेचने लगता है। लेकिन मजाल थी कि

8:10दोनों भाई इसका मछली वाला धंधा चलने देते।

8:14ऐसे ही कुछ दिन बाद रितेश ने अपना मछली

8:17बेचना बंद कर दिया।

8:21हो गया भाई। इसका तो टिकट कट गया। अब लगता

8:25है कल से ही और मछली बेचना बिल्कुल भी

8:28नहीं आएगा।

8:29हां, ठीक कहा अमित भाई। आप तो इस रितेश का

8:32टाई टाई फिक्स हो गया।

8:36उनकी बातें सुनकर बहुत ही ज्यादा गुस्से

8:38में रितेश अपने घर चलना है।

8:47पिताजी अब बस अब आगे से मैं मछली बेचना

8:51नहीं जाऊंगा।

8:52क्या होगा बेटा? शांत हो जा बेटा।

8:56क्या हो गया यह [संगीत] मत पूछो। पिताजी

8:59एक हफ्ता से हमारी मछली नहीं बिक रही है।

9:02ऊपर से आज तो दोनों भाई ने मेरा खूब मजाक

9:05उड़ाया।

9:06अगर मछली नहीं बेचेंगे तो क्या करेंगे अब

9:09हम?

9:10अगर गांव वाले कच्ची [संगीत] मछली की कद्र

9:12नहीं समझ रहे तो मैं उन्हें मछली पका कर

9:15खिलाऊंगा। मैं गांव के चौराहे पर मछली,

9:18करी [संगीत] और चावल का ठेला लगाऊंगा।

9:21आपकी सिखाई हुई रेसिपी और मेरी ताजी मछली।

9:24फिर देखते हैं यह लोग बासी मछली कैसे

9:27बेचते हैं।

9:29तभी वहां पर उसकी मां रोशनी आ जाती है।

9:33ठीक ही तो कह रहा है रितेश। ए ऐसे भी तो

9:36हमारा मछली का व्यापार नहीं चल रहा है।

9:38क्या पिताजी आज तक कोई भी गांव में मछली,

9:41करियर चावल का दुकान नहीं लगाया है। लोग

9:44हमारे यहां जरूर खाने आएंगे।

9:46ठीक है बेटा। तुझे जैसा ठीक लगे कल ही

9:49तुझे मछली बनाना बहुत ही अच्छे तरीके से

9:52सिखाऊंगा। रितेश ने अब अपना रास्ता बदल

9:55लिया था। उसने तय किया कि वह अब कच्ची

9:58मछली नहीं बल्कि बेहतरीन मछली करी चावल

10:02बेचेगा। अब आगे क्या होगा? क्या रितेश का

10:05ठेला चलेगा? और अमित श्याम अब कौन सी नई

10:08चाल चलेंगे?

10:11अगले दिन सूरज की पहली किरण के साथ ही

10:14रितेश और उसका पिता दोनों मिलकर मछली

10:17बनाने की तैयारी [संगीत] करते हैं। रितेश

10:20के पिता संतोष कोई आम आदमी नहीं थे। अगर

10:24गांव [संगीत] में शादी हो किसी का जन्मदिन

10:26हो तो मछली बनाने के लिए रितेश के पिता को

10:29ही बुलाया जाता था।

10:33देख बेटा रितेश [संगीत] मछली बनाना सिर्फ

10:36खाना बनाना नहीं एक कला है। जब सरसों

10:39[संगीत] का तेल कढ़ाई में कड़के और उसमें

10:41पिसे हुए मसाले पड़े तो उसकी खुशबू पूरे

10:44रघुनाथपुर को खींच लानी चाहिए। [हंसी]

10:48आपके हाथ का स्वाद तो पूरा गांव चख चुका

10:51है पहले से ही। अब मेरी बारी है कि मैं

10:54आपके कदमों पर खड़े उतारूंगा या नहीं।

10:58कुछ ही देर में दोनों ने मछली करी और चावल

11:01बना लिया जिसकी खुशबू काफी अच्छी आ रही

11:04थी।श

11:07बाजार की ओर निकल पड़ा लेकिन आज उसके कंधे

11:10पर मछलियों की टोकरी नहीं बल्कि एक नया

11:14संकल्प था।

11:17भले ही आज जेब खाली है लेकिन बापू का दिया

11:21हुआ हुनर है। आओ भाई आओ रघुनाथपुर में

11:25पहली बार आपको ताजी और स्वादिष्ट मछली करी

11:29और चावल।

11:31कभी मछली चावल का इतना अच्छा खुशबू सूंघ

11:34कर उसे गांव का पेटू राम खाने के लिए आ

11:37जाता है।

11:43अरे भाई यह कैसी सुगंध है? ऐसा लग रहा है

11:47जैसे नाक के रास्ते सीधे कलेजे में उतर

11:49रही है। अरे रितेश बाबू यह क्या नया तमाशा

11:52है? यह कच्ची मछली छोड़कर अब पका कर खिला

11:56रहे हो क्या?

11:58हां मोटू भाई अब ताजी मछली का स्वाद चखिए।

12:01यह लीजिए गरमा गरम चावल और ऊपर से यह

12:06गाढ़ी मसालेदार मछली करी। रितेश ने अपना

12:10मछली करी और चावल का एक प्लेट लगाया जो

12:14देखने में बहुत ही ज्यादा लाजवाब था। मोटू

12:17राम ने तुरंत खाने लगता है।

12:27आ उफ रितेश कसम मेरे खाने की। ऐसा स्वाद

12:32तो मां के हाथ के खाने में भी नहीं चखा।

12:34यह मछली है या मक्खन। मुंह में जाते ही

12:37घुल गई।

12:38भाई आज तो मेरी आत्मा तृप्त हो गई। पर यह

12:41पापी पेट और मांग रहा है। एक प्लेट और

12:45लगाओ।

12:48रितेश उसे ग्राहक की बातें सुनकर खुश हो

12:51जाता है क्योंकि आखिरकार [संगीत]

12:53उसके हाथ का खाना लोगों को पसंद जो आ रहा

12:56था।

13:00अरे आप सब लोगों के लिए ही तो यह दुकान

13:02खुला है। जितना खाना है खाओ भाई।

13:06देखते ही देखते पूरे चौराहे पर रितेश के

13:10मछली करी चावल की धूम मच गई। जो लोग अमित

13:14और श्याम की सस्ती बासी मछली के चक्कर में

13:16थे वे भी महक के पीछे खींचे चले आए।

13:22अरे भाई हमें भी एक प्लेट मछली और चावल दो

13:24भाई।

13:25ए भाई मुझे दो प्लेट देना। इसकी खुशबू

13:28बहुत अच्छी आ रही है।

13:32उसके ठेले पर लोग बड़े ही मजे से मछली,

13:35करी और चावल खा रहे थे।

13:38गांव वाले ऐसा स्वाद पहले कभी नहीं चुके

13:41थे। शाम होते ही रितेश खुशी-खुशी अपने घर

13:45चला आता है।

13:52पिताजी आपके सिखाए हुए मछली करी और चावल

13:56बेचकर आज मैंने कितने पैसे कमाए? गांव

13:59वाले तो खाते ही जा रहे थे और मोटा संतोष

14:02तो दो [संगीत] प्लेट खा गया।

14:04अच्छा है। अच्छा है बेटा। अब अच्छे से काम

14:07कर। लोगों [संगीत] को अच्छा स्वाद देना।

14:11आज रितेश और उसका परिवार काफी खुश था।

14:16अगले ही दिन पूरे गांव में यह बात फैल

14:18चुका था जिसके कारण उसके दुकान पर लोग

14:22सुबह से ही आने लगते हैं।

14:28अरे [नाक से की जाने वाली आवाज़] भाई कल

14:29से जो मैं खाकर गया हूं। मुझे तो इसका

14:32स्वाद इतना अच्छा लगा कि सुबह होते ही मैं

14:35तुम्हारे दुकान पर आ गया।

14:38अरे हां भैया अभी लगाता हूं गरमागरम मछली

14:42करी और चावल।

14:44रितेश फटाफट ग्राहकों को मछली करी और चावल

14:48दे रहा था। दोपहर तक उसकी दुकान पर काफी

14:51भीड़ हो गए थे। [संगीत] यह बात है दोनों

14:54भाई को भी पता चल जाता है। दूर खड़े अमित

14:57और श्याम अपनी खाली दुकान देख रहे थे।

15:02यह रितेश [संगीत] तो बहुत चालाक निकला

15:03श्याम। हमने इसकी कच्ची मछली की दुकान बंद

15:06करवाई तो इसने पका कर बेचना शुरू कर दिया।

15:09अगर ऐसा ही चला तो हमारा तो दीवाला निकल

15:12जाएगा। भैया लोग कह रहे हैं इसके हाथ में

15:16[संगीत] जादू है। हमें भी ठेला खोलना

15:18चाहिए। ठेला तो खोलेंगे पर पहले इस रितेश

15:23का नाम मिट्टी में मिलाना होगा।

15:30अगले ही दिन दोनों भाई ने अपना खेल लगा

15:33लिया और दोनों भी मछली करी और चावल बेचने

15:37लगे।

15:38आओ भाई आओ ताजी-ताजी मछली करी चावल खाने

15:41आओ। उसे रितेश से दाम में भी काम और स्वाद

15:44में भी दम।

15:46अमित और श्याम चिल्लाने लगते हैं, लेकिन

15:48फिर भी उनके वहां ग्राहक नहीं आते हैं।

15:54यह देखकर रितेश को भी बहुत ज्यादा गुस्सा

15:56आ जाता है।

15:59लो, फिर से यह दोनों मेरे धंधा कॉपी कर

16:02लिए। मेरे जैसे फिर से ठेला लगा लिए। लगने

16:06दो मेरे पिता के हाथों में जो स्वाद

16:08[संगीत] है, यह कहां दे पाएंगे ग्राहकों

16:10को?

16:15लगता है ग्राहकों को रितेश का ही मछली करी

16:18चावल पसंद है। लोग तो हमारी तरफ देख भी

16:21नहीं रहे हैं।

16:23लोग इसके पास स्वाद के लिए आते हैं ना तो

16:25आज मैं इसका स्वाद [संगीत] ही बिगाड़

16:27दूंगा। देख मैं क्या करता हूं।

16:30अमित ने अपनी जेब में लाल मिर्च का एक

16:33तीखा [संगीत] पैकेट छिपाया और ग्राहक बनकर

16:36रितेश के ठेले पर पहुंचा। वहां भारी भीड़

16:39थी।

16:42अरे अमित अपना ठेला छोड़कर मेरे ठेले पर

16:46क्या करने आए हो?

16:48तो क्या है कि हम लोग नया-नया ठेला खोले

16:51हैं। तो मैं तुम्हारे यहां मछली, करी चावल

16:54का स्वाद लेने आया हूं।

16:57उसके बाद रितेश ने उसको भी ग्राहकों के

17:00साथ मछली और चावल परोस दिया। जैसे ही उसने

17:03मछली भरोसा, अमित ने अपने जेब से लाल

17:06मिर्च का पाउडर निकाला और उसे मछली करी

17:09में मिला दिया और खाते ही चिल्लाने लगता

17:12है।

17:17आ बचाओ पानी पानी।

17:20अरे गांव वालों देखो इस रितेश ने इसमें

17:23क्या मिला दिया है। मेरा गला जल रहा है।

17:26यह मछली करी है या तेजाब?

17:28वहां खड़े ग्राहक उसे पूछने लगते हैं।

17:31अरे रे भाई क्या हुआ? क्यों चिल्ला रहे

17:33हो?

17:34देखो यह रितेश हमसे जलता है क्योंकि हमने

17:37सामने दुकान खोली है। इसने जानबूझकर इसमें

17:41इतनी मिर्च और पता नहीं क्या-क्या मिला

17:43दिया है।

17:44अरे भाई क्या हुआ? क्या हुआ? इतना क्यों

17:47चिल्ला रहा है भाई? नहीं भैया। यह क्या कह

17:50रहे हैं आप? मैंने तो अभी सबको खिलाया। सब

17:53ठीक थे।

17:55भाई आपको यकीन ना हो तो मेरा प्लेट खाकर

17:57देखो।

17:59तभी पास ही का एक ग्राहक उसका प्लेट से

18:01मछली करी चावल खाकर देखा है।

18:06हां भाई सही कह रहा है। यह अमित इसके

18:09प्लेट में तो बहुत ही ज्यादा मिर्ची है।

18:12यह बेचारा तो बस स्वाद लेने आया था। पर यह

18:15रितेश कैसा है? देखो इसके प्लेट में बहुत

18:18ज्यादा मिर्ची मिला दिया।

18:21अरे नहीं नहीं गांव वालों मैंने कुछ नहीं

18:24किया।

18:25रितेश की बात कोई नहीं सुनता है और सारे

18:28ग्राहक अमित और श्याम की दुकान पर चले

18:30जाते हैं।

18:34अमित और श्याम की आज काफी अच्छी कमाई हो

18:36जाती है।

18:39देखा श्याम मेरा तेज दिमाग आज कितना कमाई

18:43हो गया हम दोनों का।

18:45हां, अब धीरे-धीरे यह भी धंधा [संगीत]

18:46इसका बंद करवा देंगे।

18:49इधर रितेश की आज कुछ कमाई नहीं हुई थी। वो

18:52गुस्से से घर चला जाता है।

18:56घर जाकर रितेश अपने पिता को सारी बातें

18:59बताता है।

19:01पिताजी मैंने [संगीत] कुछ नहीं किया। फिर

19:04भी सब मुझे गुनहगार मान रहे हैं। अब क्या

19:07होगा?

19:08बेटा [संगीत] जब सच की परीक्षा होती है तो

19:11आग में तपना ही पड़ता है। अमित और श्याम

19:14को लगता है कि वे जीत गए। पर वो लोग फिर

19:17कोई साजिश करेंगे तो तो ठेला लगा। अगर इस

19:20[संगीत] बार उन्होंने खोज की तो हम भी

19:22उनके बदले जवाब देंगे।

19:29उसके बाद अगले ही दिन से रितेश ने अपना

19:32दुकान लगा लिया था। कुछ ग्राहक वाले ही

19:35अमित और श्याम की दुकान पर जा रहे थे।

19:38लेकिन श्याम और अमित के हाथों में वो

19:40स्वाद कहां था?

19:43भले ही हम वह बात सुनकर तुम्हारे पास आए

19:45हैं, लेकिन तुम्हारे हाथों में रितेश जैसा

19:48स्वाद नहीं है। भाई, हम तो जा रहे हैं

19:51रितेश के पास खाने के लिए।

19:54जितने भी ग्राहक थे, कुछ दिनों में समझ गए

19:57थे कि असली स्वाद तो रितेश के ही हाथों

19:59में है। आज से फिर से रितेश के यहां भीड़

20:02लगने लगती है।

20:05देख रहे हो? यह फिर से हमारे सारे ग्राहक

20:08छीन लिया। इसके लिए भी मेरे पास इलाज है।

20:12देखना कुछ ना कुछ करता हूं मैं।

20:14अमित अपने दिमाग में कुछ सोच रहा था। तभी

20:17वह वापस रितेश के दुकान पर श्याम के साथ

20:20जाता है।

20:29क्या हुआ? आप फिर से कुछ चाल चलने आए हो

20:32क्या दोनों?

20:33अरे हम तो तुम्हारे भाई हैं भाई। तुम ही

20:36बस हमें अपना भाई नहीं मानते।

20:39यह सब छोड़ो। बताओ क्या हुआ? क्यों आए हो

20:42यहां पर?

20:44देखो भाई, [संगीत] यह रोज-रोज की लड़ाई

20:47झगड़ा से हम भी दूर रहना चाहते हैं। मैं

20:49तो बोलता हूं गांव में एक प्रतियोगिता

20:52रखते हैं। कैसी प्रतियोगिता?

20:55देखो, गांव में एक प्रतियोगिता रखते हैं।

20:58जिसमें गांव के प्रधान और बड़े लोग हम

21:01दोनों का स्वाद चाहेंगे। और जिसका भी मछली

21:04और चावल प्रधान और गांव वालों को पसंद आया

21:07वही गांव में ठेला लगाएगा।

21:10रितेश ने उन दोनों [संगीत] की बातों को

21:12थोड़ा देर सोचा लेकिन वह भी रोज के किचकिच

21:15से तंग आ चुका था।

21:17मंजूर है लेकिन कल ही प्रतियोगिता करवाते

21:21हैं। कल नहीं दो दिन बात करते हैं।

21:26रितेश भी उनकी बातों में हां कर देता है।

21:29अब देखना होगा दोनों भाई क्या चल चलते

21:32हैं।

21:39दोनों भाइयों ने चुनौती तो दे [संगीत] दी

21:41थी लेकिन उन्हें खाना बनाना नहीं बल्कि

21:44बिगड़ना आता था।

21:47भैया चुनौती तो दे दी पर हमें तो करी का क

21:51भी नहीं आता। अगर हम हार गए तो गांव से

21:54बोरिया बिस्तर समेटना पड़ेगा।

21:58डर मत श्याम। रितेश [संगीत] का बाप संतोष

22:01चाचा दिल का बहुत भोला है। चल उनके पास

22:04चलते हैं। कुछ तो मदद करेंगे ही।

22:08लेकिन एक दिन में खाना बनाना हम नहीं सीख

22:10सकते। हमें कुछ और भी करना पड़ेगा।

22:14तुम चिंता मत करो। हम पहले उसी से खाना

22:17बनाना सीखेंगे। उसके बाद उनकी मछली और

22:20मसाले में हम फिर करेंगे।

22:26दोनों भाई अगले दिन में संतोष जी के पास

22:29पहुंचे [संगीत] और गिड़गिड़ाने लगे। संतोष

22:32जी ने मन ही मन एक योजना बनाई और बहुत

22:36गंभीर चेहरा बनाकर बोले

22:39देखो [संगीत] बच्चों तुम मेरे भतीजे हो

22:41इसलिए बना रहा हूं। रितेश का खाना इसलिए

22:44नहीं बिकता [संगीत] कि वह ताजी मछली लाता

22:46है बल्कि इसलिए क्योंकि हमारे खानदान पर

22:49[संगीत] दमदम बाबा की कृपा है। वे दूर

22:52जंगल के पीछे कुटिया में रहते हैं। वे एक

22:54जादुई राख देते हैं। [संगीत] उसे करी में

22:57डालते ही बासी मछली भी सोने जैसी और स्वाद

23:00में स्वर्ग जैसी हो जाती है।

23:03क्या [संगीत] जादुई पाउडर? क्या वे हमें

23:06भी देंगे चाचा?

23:08देंगे। वह तो सबकी मदद करते हैं। याद रखना

23:11[संगीत] यह बात तुम रितेश को नहीं बताओगे।

23:15दोनों भाई खुश हो जाते हैं।

23:25दोनों भाई शाम होते हैं जंगल की तरफ निकल

23:28जाते हैं। जंगल के बीच में उन्हें एक खास

23:31पोस्ट से बना घर दिखता है।

23:34लगता है यही घर है जिसका चाचा ने जिक्र

23:37किया था। चलो अंदर जाकर देखते हैं।

23:42उसके बाद दोनों भाइयों ने दबे पांव उसे

23:45कुटिया में कदम रखा। उसके अंदर एक बाबा

23:48बैठे हुए थे। दरअसल वो बाबा कोई और नहीं

23:52संतों से था।

23:55प्रणाम दमदम बाबा। हमें वो जादुई पाउडर

23:58चाहिए। हम दमदम बताओ कौन हो [संगीत] तुम

24:02और क्यों आए हो?

24:05हम पास के गांव से आए हैं। हम आपको परेशान

24:08करने नहीं आए हैं।

24:09दर हशर कल हमारा एक मुकाबला है। इसलिए

24:12आपके पास हो जादुई पाउडर लेने आए हैं।

24:16दमदम सुन रे बच्चा यह कोई मामूली पाउडर

24:19नहीं है। यह है स्वाद [संगीत] का जादू। बस

24:23एक चुटकी दाल और फीके खाने में भी आएगा

24:26तीन गुना स्वाद। दमदम।

24:30बाबा ने उन्हें एक पुड़िया थमा दी। दोनों

24:33भाई खुशी-खुशी वहां से निकले जाते हैं।

24:37रात के 3:00 बजे चुपके से रितेश के घर के

24:40पिछवाड़े पहुंचे। उन्होंने रितेश की ताजी

24:44मछलियां निकालकर सड़ी हुई बासी मछलियां भर

24:47दी और उसके मसालों में रेत और कंकर मिला

24:50दिए। उन्हें लगा कि अब रितेश का हारना तय

24:54है।

24:55अब इसके मसाले मछली सब बदल दिए हैं। ऊपर

24:58से बाबा के यहां चमत्कारी दवा भी ले आए

25:00हैं। अब हमें हराना मुमकिन ही नहीं

25:02नामुमकिन है। कल तो हमें जीतेंगे। अब चलो

25:06जल्दी हमें भी तैयारी करना है।

25:09उसके बाद दोनों ही भाई वहां से दबे पांव

25:12निकल जाते हैं।

25:15देखा पिताजी यह होगा मुझे पता था। इसलिए

25:18मैं आज रात को जगा हुआ था।

25:22[हंसी]

25:23अरे तुम चिंता मत करो। यह बहुत चालाक बनते

25:26हैं ना। कल का सारा सच गांव वालों के

25:28सामने आ जाएगा।

25:32सुबह के 11:00 बज रहे थे। चूल्हे जल चुके

25:36थे। रितेश शांत था। जबकि अमित [संगीत] और

25:39श्याम बाबा की पुड़िया हाथ में लिए

25:41मुस्कुरा रहे थे।

25:45अरे भाई जल्दी शुरू करो। मेरी आत्मा कल

25:48रात से ही तड़प रही है। रितेश बाबू आज

25:52अपनी वही चटकारेदार मछली खिलाओ कि पेट कहे

25:55बस और नियत कहे और।

25:58प्रतियोगिता शुरू की जाए।

26:01उसके बाद प्रतियोगिता शुरू की जाती है।

26:04दोनों ही खेलों में जोरों शोरों से मछली

26:07के लिए [संगीत] चावल बनाया जा रहा था। 1

26:10घंटे बाद दोनों की मछली करी तैयार हो

26:13[संगीत] जाते हैं।

26:15अब देखना है यह पाउडर मिलते ही हमारे खाने

26:18के गांव वाले दीवाने हो जाएंगे और यह

26:21दोनों बाप बेटों का धंधा अब से बंद हो

26:24जाएगा। [हंसी]

26:28तो ठीक है। अब हम सबसे पहले रितेश के मछली

26:32करी चावल खाएंगे। उसके बाद हम दोनों भाई

26:36का मछली खाएंगे। जिसका खाना सबसे बढ़िया

26:39होगा उसे गांव में ठेला लगाएगा अनुमति

26:42मिलेगा।

26:44अमित और श्याम मन ही मन हंस रहे थे

26:47[संगीत] कि अभी जैसे ही सरपंच जी सड़ी

26:49मछली खाएंगे रितेश की शामत आ जाएगी। रितेश

26:54ने थाली सजाई। गरमा गरम चावल और गाढ़ी

26:57मछली करी। [संगीत]

26:58पहला निवाला खाते ही हैरान रह गए।

27:03अरे यह क्या [संगीत] स्वाद है? रितेश बेटा

27:06कल की उस कड़वाहट के बाद आज यह स्वाद तो

27:09अमृत जैसा लग रहा है। मछली इतनी कोमल

27:12[संगीत] की मक्खन की तरह पिघल रही है।

27:16वाह अद्भुत मसालों का ऐसा संतुलन मैंने आज

27:20तक नहीं चखा रितेश। तुम्हारी ईमानदारी ने

27:23आज [संगीत] फिर दिल जीत लिया।

27:27यह कैसे हुआ? हमने तो सड़ी मछली डाली थी।

27:31अरे हमने जो रात को मछली रखी थी उसको शायद

27:35सुबह में यह लोग बदल दिए होंगे। कोई ना

27:37जीत तो हमारी ही होगी।

27:41अब बारी थी अमित और श्याम की। उन्होंने

27:44अपनी कढ़ाही में बाबा की वो जादुई पुड़िया

27:47उलट दी थी। बड़े घमंड के साथ उन्होंने

27:50सरपंच और साहूकार जी को थाली परोसी।

27:54खाइए हुजूर। यह है असली खानदानी जायका।

27:58खाते ही आपकी आत्मा तृप्त हो जाएगी।

28:01बड़ा तारीफ कर रहा है भाई अमित। खाने के

28:04बाद ही पता चलेगा वो तो। चल जल्दी से हम

28:07लोगों के लिए प्लेट लगा। देखते हैं तेरे

28:10हाथों में क्या जादू है।

28:13सरपंच जी ने जैसे ही पहला निवाला मुंह में

28:16लिया, उनका चेहरा नीला पड़ गया। उन्होंने

28:19तुरंत खाना थूक दिया और खांसने लगे।

28:22साहूकार जी ने जैसे ही [संगीत] चखा,

28:25उन्हें लगा जैसे मुंह में कचरा और रेत भर

28:28गई हो।

28:29थू थू यह क्या खिला रहे हो? यह मछली है या

28:33नाले का कीचड़? इसमें तो कंकर और मिट्टी

28:36भरी है। और यह कैसी गंदी बदबू आ रही है।

28:40[हंसी]

28:40धिक्कार है तुम पर। तुम गांव वालों को ऐसा

28:43जहर खिलाना चाहते थे। तुम दोनों ने रितेश

28:45को [संगीत] नीचा दिखाने के लिए खुद अपने

28:47खाने में कचरा मिला दिया। दोनों भाई हैरान

28:49होकर चौंक जाते हैं और कांपते [संगीत] हुए

28:52कहते हैं

28:55नहीं हुजूर ये हमने तो बहुत ही अच्छा खाना

28:58बनाया था और ऊपर से तो दमदम बाबा का जादुई

29:02पाउडर था उन्होंने कहा था इससे स्वाद बढ़

29:05जाएगा

29:07तभी भीड़ के बीच से संतोष जी आगे आए और

29:10[संगीत] अमित की आंखों में आंखें डालकर

29:13मुस्कुराए।

29:14दम दम बस एक चुटकी दाल और फीके खाने में

29:18भी आएगा [संगीत] तीन गुना स्वाद दमदम

29:23[हंसी]

29:27चाचा वो आवाज वो डायलॉग तो वो दमदम बाबा

29:32आप ही थे। अरे हम हार गए हैं श्याम। ये

29:37दोनों बाप-ब में हमारे साथ चालाकी कर दी।

29:40हमारे पास कोई सबूत नहीं है कि चाचा ही

29:43बाबा वो थे।

29:46अमित और श्याम को अपनी करनी पर

29:48शर्मिंदगीगी हुई [संगीत] लेकिन अब बहुत

29:50देर हो चुकी थी।

29:52फैसला सुनाया जाता है। अमित और श्याम ने

29:55ना केवल बेईमानी की बल्कि गांव वालों की

29:58सेहत से भी खिलवाड़ किया। आज से यह दोनों

30:02गांव के बाजार में कभी मछली नहीं बेचेंगे।

30:05और [संगीत] रितेश का ठेला ही इस गांव का

30:08एकमात्र असली स्वाद वाला ठेला होगा।

30:15रितेश की आंखों में आज जीत के आंसू थे। उस

30:18दिन के बाद से रघुनाथपुर में सिर्फ रितेश

30:21का ही बोलबाला रहा और [संगीत] अमित श्याम

30:24को अपनी दुकान हमेशा के लिए बंद करनी

30:26पड़ी। हमारी कहानी यहीं पर खत्म होती है।

30:30हमारे अगले वीडियो में बहुत सारे लोगों ने

30:33कमेंट किया था। जिसमें से कुछ लोगों का

30:35हमने इसमें नाम इस्तेमाल किया। अगर आप

30:38चाहते हैं कि अगले वीडियो में आपका नाम

30:41इस्तेमाल हो तो प्लीज प्यारा सा एक कमेंट

30:44कर देना।

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