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0:02कदीम जमाने की बात है। बगदाद के एक मशहूर
0:05और जरखेज शहर में सत्तार नाम का एक बेहद
0:08अमीर और लालची ताज़िर रहता था। सत्तार के
0:12पास आलीशान हवेली, [संगीत] बेशुमार बाघात
0:15और कीमती तजारती सामान का जखीरा था। लेकिन
0:18उसका दिल हमेशा ज्यादा से ज्यादा दौलत की
0:21हवस में जलता रहता था। वह बाजार के गरीब
0:25और मजबूर लोगों को महंगे दामों सामान
0:28बेचता, नापतौल में चालाकी से कमी करता और
0:31लोगों के हक पर डाका डालता था। उसकी इस
0:34बदनियती और कंजूसी की वजह से पूरा शहर
0:37उससे नालाम था। लेकिन उसके इख्तियार और
0:40दौलत के घमंड के आगे कोई बोलने की जुर्रत
0:43नहीं करता था। सत्तार ने अपनी हवेली के एक
0:46खौफिया तहखाने में सोने के सिक्कों और
0:50कीमती हीरों से भरा एक भारी संदूक छुपा कर
0:54रखा था। जिस पर वह दिन रात पहरा देता था
0:56और हर शाम उन सिक्कों को गिनते हुए ही
1:00उसकी रात गुजरती थी। एक सुबह हवेली से
1:03सत्तार के चीखने और चिल्लाने की जोरदार
1:06आवाजें आने लगी। उसका खुफिया तहखाना खुला
1:09पड़ा था और सोने के सिक्कों से भरा संदूक
1:12गायब था। ताज़िर सत्तार गुस्से और गम में
1:15पागल हो चुका था। उसने अपने तमाम
1:18मुलाजिमों और हवेली के पहरेदारों को एक
1:21जगह इकट्ठा किया और उन पर चोरी का इल्जाम
1:23लगाने लगा। वह चीख-चीख कर बोल रहा था कि
1:26अगर मेरा संदूक ना मिला तो मैं तुम सबको
1:29सुल्तान के सिपाहियों के हवाले कर दूंगा
1:31और जेल की मिल्लत में डाल दूंगा। बाजार
1:34में एक धमाका सा हो गया और बेकसूर मजदूर
1:37और खादिम खौफ से कांपने लगे। उसी वक्त
1:40बाजार के एक कोने में पुराने दरख्त के साए
1:43तले बेहलोल दाना तस्बीह हाथ में लिए
1:46खामोशी से यह सब तमाशा देख रहे थे। बेहलोल
1:49दाना अपनी अनोखी हिकमत और अकलमंदी के लिए
1:52पूरे शहर में मशहूर थे जो जिंदगी की
1:54हकीकतों को अजीब लेकिन सबक आमोज तरीकों से
1:58लोगों के सामने लाते थे। ताज़िर सत्तार की
2:01चीखो पुकार सुनकर बेहलोल दाना
2:04आहिस्ता-आहिस्ता उसकी तरफ बढ़े। सत्तार ने
2:07जब बहलोल दाना को आते देखा तो गुस्से में
2:09बोला कि तुम यहां क्या करने आए हो? मेरा
2:12सब कुछ लुट गया है। लेकिन बहलोल दाना ने
2:15बेहद सुकून के साथ कहा कि दौलत का खोना
2:18जितना बड़ा दुख है उससे कहीं बड़ा दुख
2:21हकीकत से अंधा हो जाना है। सत्तार ने
2:24गिड़गिड़ाकर कहा कि अगर आप में कोई हिकमत
2:26है तो मेरा चोर ढूंढ निकाले। बेहलोल दाना
2:30ने अपनी लाठी पर टेक लगाई और मुस्कुराकर
2:33कहा कि चोर कहीं दूर नहीं। इसी बाजार और
2:37हवेली के साए में छुपा है और कल सुबह उसका
2:40चेहरा सबके सामने आएगा। अगले दिन की सुबह
2:44होते ही ताज़िर सत्तार की हवेली के बाहर
2:47लोगों का एक भारी मजमा जमा हो गया। बाजारी
2:50ताज़िर, किसान और हवेली के तमाम मुलाजमीन
2:54खौफ और तजसुस के आलम में खड़े थे। सबके
2:58दिल में एक ही सवाल था कि आखिर बहलोल दाना
3:02इतने बड़े चोर को कैसे ढूंढ [संगीत]
3:04निकालेंगे? ताजिर सत्तार अपनी दौलत के गम
3:07में निहाल हवेली के मुख्य दरवाजे पर टहल
3:10रहा था। उसकी आंखें लाल थी और चेहरे पर
3:13बेचैनी साफ नजर आ रही थी। उसने जैसे ही
3:16बहलोल दाना को आते देखा वह फौरन उनकी तरफ
3:19दौड़ा और गुस्से और इ्तराब से भरी आवाज
3:22में बोला कि बहलोल तुमने वादा किया था कि
3:26आज चोर का पता चल जाएगा। आखिर वह चोर कौन
3:29है और मेरी दौलत कहां है? अगर तुमने सिर्फ
3:32मेरा वक्त जाया किया है तो मैं सुल्तान के
3:34पास जाकर तुम्हारी शिकायत करूंगा। बेहलोल
3:37दाना ने बेहद संजीदा और सुकून भरी नजरों
3:40से सत्तार को देखा और आहिस्ता से कहा कि
3:44जितना सब्र तुमने दौलत जमा करने में
3:46दिखाया उतना ही सब्र इंसाफ के लिए भी रखो।
3:49इसके बाद बेहलोल दाना ने सब लोगों को
3:52हवेली के सबसे बड़े कमरे में जमा होने का
3:55हुक्म दिया। जब हवेली के तमाम नौकर,
3:58पहरेदार और सत्तार के नजदीकी लोग कमरे में
4:02दाखिल हो गए तो बेहलोल दाना ने अपने झोले
4:05से एक पुरानी काली और अजीब सी लकड़ी की
4:08लाठी निकाली। वह लाठी देखने में बहुत आम
4:11सी लगती थी। लेकिन बेहलोल दाना ने उसे
4:14इतने एहतराम से उठा रखा था जैसे वह कोई
4:16जाहिरी चीज हो। मजमे में एक सन्नाटा छा
4:19गया और लोग एक दूसरे को हैरत से देखने
4:22लगे। बेहलोल दाना ने तमाम लोगों के सामने
4:25खड़े होकर कहा कि यह कोई आम लाठी नहीं है
4:29बल्कि यह मेरे बुजुर्गों की हिकमत से भरी
4:32हुई एक मखसूस लाठी है। इस लाठी की एक खास
4:35बात यह है कि जब यह किसी सच्चे इंसान के
4:38हाथ में आती है तो उतनी ही रहती है। लेकिन
4:41जैसे ही यह किसी चोर या झूठे [संगीत]
4:43इंसान के हाथ में जाती है तो रात भर में
4:46इसकी लंबाई एक बालिश के बराबर बढ़ जाती
4:49है। यह सुनते ही कमरे में मौजूद सभी लोग
4:52दंग रह गए। सत्तार ने हैरान होकर कहा,
4:55[गला साफ़ करने की आवाज़] कि क्या लकड़ी
4:56भी कभी खुद ब खुद बढ़ सकती है? बहलोल दाना
4:59ने मुस्कुराकर कहा, कि कुदरत के इंसाफ के
5:02आगे हर चीज झुकती है और यह लाठी आज रात सच
5:05और झूठ का फैसला करेगी। इसके बाद बहलोल
5:09दाना ने एक-एक करके तमाम मुलाजिमों और
5:11पहरेदारों को एक बराबर नाप की एक-एक लकड़ी
5:14दी और कहा कि तुम सब लोग यह लकड़ी अपने
5:18पास रखो और कल सुबह मेरे पास लेकर आओ।
5:20जिनके दिल पाक हैं उनकी लकड़ी वैसी की
5:23वैसी रहेगी। लेकिन जिसने सत्तार की दौलत
5:26चुराई है, उसकी लकड़ी रात भर में एक बालिश
5:28बढ़ जाएगी। तमाम नौकर खौफ और घबराहट के
5:32आलम में अपनी-अपनी लकड़ियां लेकर अपने
5:35कमरों की तरफ चले गए। उन सब में एक नौकर
5:38जिसका नाम याकूब था बेहद घबराया हुआ लग
5:41रहा था। रात के अंधेरे में जब पूरी हवेली
5:45सो रही थी। याकूब अपने कमरे में अकेला
5:47बैठा उस लकड़ी को घूर रहा था। उसके दिल
5:50में चोर का डर बैठ गया था कि अगर यह लकड़ी
5:53वाकई बढ़ गई तो कल सुबह सबके सामने मेरी
5:57चोरी पकड़ ली जाएगी। रात का अंधेरा गहरा
6:00होता जा रहा था और पूरी हवेली पर एक अजीब
6:03सा सन्नाटा छाया हुआ था। सभी मुलाजमीन और
6:07पहरेदार अपने-अपने कमरों में सो रहे थे।
6:10लेकिन याकूब की आंखों से नींद गायब थी। वह
6:13वही नौकर था जिस पर किसी को शक नहीं था।
6:16क्योंकि वह बरसों से ताजिर सत्तार के यहां
6:19काम कर रहा था। लेकिन सच्चाई यह थी कि
6:22सत्तार की बेइंतहा दौलत और उसके जुल्म से
6:25तंग आकर याकूब के दिल में लालच ने जगह बना
6:29ली थी। उसी ने मौका देखकर तहखाने से सोने
6:31के सिक्कों से भरा संदूक चुराया था और
6:34हवेली के पीछे एक पुराने कुएं के करीब
6:37जमीन में दफन कर दिया था। याकूब अपने कमरे
6:40के कोने में बैठा बेहलोल दाना की दी हुई
6:43लकड़ी को बार-बार देख रहा था। उसके माथे
6:46पर पसीने के कतरे ढल रहे थे और दिल की
6:48धड़कन तेज हो चुकी थी। उसके जेहन में
6:50बेहलोल दाना की बात गूंज रही थी कि जब यह
6:54लकड़ी किसी चोर के हाथ में जाती है तो रात
6:57भर में इसकी लंबाई एक बालिश बढ़ जाती है।
7:00याकूब ने अपने दिल में सोचा कि बेहलोल
7:03दाना कोई आम आदमी नहीं है। वह एक वली और
7:08दानिशमंद इंसान है। अगर उनकी बात सच निकली
7:12और यह लकड़ी कल सुबह बढ़ गई तो पूरे शहर
7:15के सामने मेरी इज्जत का जनाज़ा निकल जाएगा
7:19और सुल्तान के सिपाही मुझे जिंदा नहीं
7:22छोड़ेंगे| घबराहट और डर के मारे याकूब की
7:25अकल पर पर्दा पड़ गया। उसने अपनी चालाकी
7:28दिखाने का फैसला किया। उसने सोचा कि अगर
7:31यह लकड़ी रात भर में एक बालिश बढ़ने वाली
7:34है तो क्यों ना मैं इसे अभी से ही एक
7:36बालिश के बराबर काट दूं। जब यह रात को एक
7:39बालिश पड़ेगी [संगीत] तो कल सुबह काटने के
7:41बाद यह वापस अपनी असली लंबाई पर आ जाएगी।
7:44इस तरह बेहलोल दाना और ताजिर सत्तार
7:47समझेंगे कि मैं बेकसूर हूं और मेरी लकड़ी
7:50बिल्कुल नहीं बढ़ी। उसने फौरन अपने कपड़ों
7:53से एक तेज छुरे निकाला और बहुत एहतियात के
7:57साथ उस लकड़ी को आगे से एक बालिश के बराबर
8:00काट दिया। उसने कांटे हुए लकड़ी के टुकड़े
8:04को आग में जलाकर राख कर दिया ताकि कोई
8:07सबूत ना बचे। इसके बाद वह अजीब सी खुशी और
8:11सुकून के साथ अपने बिस्तर पर लेट गया।
8:14उसने समझा कि उसने बहलोल दाना की हिकमत और
8:17हिकमत अमली को शिकस्त दे दी है और अब उसे
8:20कोई नहीं पकड़ सकता। वह नहीं जानता था कि
8:23बहलोल दाना ने यह सब सिर्फ चोर के दिल में
8:26खौफ और घबराहट पैदा करने के लिए किया था।
8:29याकूब अपनी ही चालाकी के जाल में फंस चुका
8:32था और सुबह का सूरज उसके जवाल की दास्तान
8:36लाने वाला था। अगली सुबह की पहली किरण के
8:39साथ ही ताज़िर सत्तार की हवेली के आंगन में
8:43एक बार फिर पूरे शहर का मजमा इकट्ठा हो
8:47गया। बाजरी लोग छोटे ताज़िर और हवेली के
8:51तमाम मुलाजमीन बेचैनी से बेहलोल दाना का
8:54इंतजार कर रहे थे। आफताब की रोशनी ढलने के
8:58साथ ही बेहलोल दाना अपनी वही पुरानी लाठी
9:01टेकते हुए आंगन में दाखिल हुए। उनके चेहरे
9:04पर एक अजीब सा सुकून और मुस्कुराहट थी।
9:07जैसे वह पहले से ही जानते हो कि आज क्या
9:10होने वाला है। ताजिर सत्तार फौरन उनके पास
9:13दौड़ा और बोला कि बहलोल आफताब निकल आया
9:16है। अब देर मत करो और सबके सामने उस चोर
9:19का नाम जाहिर करो जिसने मेरी जिंदगी भर की
9:22कमाई चुराई है। बेहलोल दाना ने बेहद धीमे
9:26लहजे में कहा कि सब्र का फल हमेशा मीठा
9:29होता है। सत्तार आज हक और बाततिल का फैसला
9:32सबके सामने होकर रहेगा। इसके बाद बहलोल
9:36दाना ने तमाम मुलाजिमों और पहरेदारों को
9:40एक कतार में खड़े होने का हुक्म दिया। वह
9:42एक-एक करके हर नौकर के पास गए और उनके हाथ
9:46से दी हुई लकड़ियां लेने लगे। बहलोल दाना
9:50हर लकड़ी को अपनी पहली वाली मखसूस लाठी के
9:54साथ मिलाकर नापते और उस नौकर को एक तरफ
9:57खड़ा कर देते। पहले, दूसरे और तीसरे नौकर
10:01की लकड़ियां बिल्कुल बराबर निकले और वह
10:04बेकसूर साबित होकर एक तरफ खड़े हो गए।
10:07उनके चेहरों पर सुकून की लहर दौड़ गई।
10:11आखिर में बहलोल दाना याकूब के सामने आकर
10:14रुक गए। याकूब का चेहरा जर्द पड़ चुका था
10:17और उसकी टांगे खौफ से कांप रही थी। उसने
10:21बुझते हुए दिल और कांपते हाथों से अपनी
10:24लकड़ी बेहलोल दाना को पकड़ा दी। बेहलोल
10:27दाना ने जैसे ही उस लकड़ी को अपनी मकसूस
10:30लाठी से मिलाया, वह लकड़ी बाकी तमाम
10:32लकड़ियों से पूरी एक बालिश छोटी निकली। यह
10:36देखते ही आंगन में मौजूद तमाम लोगों में
10:38एक हैरत की लहर दौड़ गई। ताज़िर सत्तार ने
10:41गुस्से से चीखते हुए कहा, कि बहलोल, यह
10:44क्या मजाक है? तुमने तो कहा था कि चोर की
10:46लकड़ी एक बालिश बढ़ जाएगी, लेकिन इसकी
10:49लकड़ी तो एक बालिश छोटी है। बहलोल दाना ने
10:52एक गहरी सांस ली और मुस्कुरा कर कहा कि
10:55सत्तार यह लकड़ी कभी बढ़ने वाली नहीं थी
10:58क्योंकि कोई भी आम लकड़ी खुद-ब खुद बड़ी
11:01नहीं हो सकती। यह सिर्फ एक आम लकड़ी थी जो
11:03मैंने सबको बराबर नाप कर दी थी। लेकिन
11:06जिसके दिल में चोरी का पाप और खौफ था,
11:09उसने समझा कि लकड़ी वाकई बढ़ जाएगी और
11:12अपनी चालाकी दिखाते [संगीत] हुए इसको पहले
11:14ही एक बालिश काट दिया। याकूब ने जब यह
11:18देखा कि उसकी अपनी ही चालाकी ने उसका
11:21राजफाश कर दिया है। तो वह बेहलोल दाना के
11:24कदमों में गिर पड़ा और झाड़ो कतार रोने
11:27लगा। उसने सबके सामने अपना जुर्म कबूल कर
11:31लिया कि उसने ही तहखाने से सोने का संदूक
11:34चुराया था और कुएं के पास दफन किया था।
11:39याकूब के एतराफे जुर्म के बाद पूरे आंगन
11:42में सन्नाटा छा गया। ताजिर सत्तार गुस्से
11:45से लाल पीला हो चुका था। उसने फौरन अपने
11:48पहरेदारों को हुक्म दिया कि याकूब को
11:50बांधकर कुएं के पास ले जाई और वहां से
11:53सोने के सिक्कों से भरा संदूक निकालें।
11:56सिपाही याकूब को घसीटते हुए हवेली के
11:59पिछले हिस्से में ले गए और जमीन खुदवाकर
12:03वहीं संदूक बहाल कर लिया। सत्तार ने जब
12:06अपना सोने से भरा संदूक देखा तो उसकी
12:09आंखों में चमक आ गई। उसने फौरन संदूक को
12:12खोलकर एक-एक सिक्का गिना और जब तमाम दौलत
12:15पूरी निकली, तो उसके चेहरे पर एक मगरूर
12:18मुस्कुराहट फैल गई। उसने बहलोल दाना की
12:22तरफ देखा और एहसानमंदी के बजाय घमंड से
12:25बोला कि बहलोल तुमने मेरा माल ढूंढकर
12:28अच्छा किया। अब मैं इस चोर को सुल्तान के
12:30हवाले कर दूंगा ताकि इसे फांसी की सजा दी
12:34जाए। यह सुनकर बहलोल दाना ने एक गहरी सांस
12:37ली और आहिस्ता से सत्तार के करीब आए।
12:39उन्होंने सत्तार के कंधे पर हाथ रखा और
12:42कहा कि सत्तार माल तो तुम्हें वापस मिल
12:44गया। लेकिन क्या तुमने इस पूरे ककीस्से से
12:46कोई सबक सीखा? सत्तार ने हैरान होकर देखा
12:49और बोला कि सबका क्या सीखना चोर पकड़ा गया
12:52और मेरी दौलत मुझे मिल गई। बहलोल दाना ने
12:56आंगन में मौजूद सभी लोगों की तरफ इशारा
12:59करते हुए कहा कि असली चोर सिर्फ याकूब
13:02नहीं है बल्कि असली चोर तुम भी हो। ताजिर
13:05सत्तार गुस्से से तैश में आ गया और बोला
13:07कि तुम्हारी यह जुर्रत कि तुम मुझे इस शहर
13:10के सबसे अमीर ताजिर को चोर कह रहे हो।
13:14बेहलोल दाना ने बेहद सुकून और दानिशमंदी
13:17से जवाब दिया कि याकूब ने तो सिर्फ
13:19तुम्हारा सोना चुराया था जो तुम्हें वापस
13:22मिल गया। लेकिन तुमने बरसों से इस शहर के
13:24गरीबों, मजदूरों और मजबूरों का हक चुराया
13:28है। तुम नापतल में कमी करते हो। महंगे
13:30दामो सामान बेचते हो और लोगों की मजबूरी
13:33का फायदा उठाते हो। तुमने लोगों की
13:35खोशियां और उनका सुकून चुराया है। याकूब
13:38का जुर्म एक बार का था। लेकिन तुम्हारा
13:40जुर्म रोजाना का है। इस आंगन में खड़े
13:42तमाम लोग तुम्हारे जुल्म के गवाह हैं।
13:45क्या तुमने कभी सोचा कि तुम्हारी बेइंतहा
13:48दौलत ने तुम्हें कितना तन्हा और बेरहम बना
13:51दिया है। बेहलोल दाना की यह बातें सुनकर
13:54ताज़िर सत्तार के होश ठिकाने आ गए। उसके
13:57पास बेहलोल दाना की बात का कोई जवाब नहीं
14:00था। बाजार के तमाम लोग खामोशी से यह सब
14:03सुन रहे थे और उनके चेहरों पर बेहलोल दाना
14:06की हिकमत के लिए बेहद इज्जत थी। सत्तार ने
14:10शर्मिंदगीगी से अपना सर झुका लिया। उसके
14:13दिल में पहली बार अपनी बदनियती और लालच का
14:16एहसास हुआ। उसने फ़ौरन बेहलोल दाना के
14:19सामने हाथ जोड़े और अपने गुनाहों की माफी
14:22मांगने लगा। उसने ऐलान किया कि वह अपनी
14:25दौलत का एक बड़ा हिस्सा शहर के गरीबों और
14:28जरूरतमंदों में तकसीम करेगा और आइंदा कभी
14:31किसी के साथ बेइंसाफी नहीं करेगा। याकूब
14:34को भी उसकी गलती की सजा के तौर पर हवेली
14:38से निकाल दिया गया। लेकिन उसकी जान बख्श
14:40दी गई। इस तरह बहलोल दाना की अनोखी हिकमत
14:43ने ना सिर्फ एक चोर को पकड़वाया बल्कि एक
14:46जालिम ताजिर को भी सीधे रास्ते पर ले आया।
14:49इस कहानी से हमें यह सबक मिलता है कि
14:52इंसान चाहे जितनी भी दौलत जमा कर ले अगर
14:55उसके दिल में लालच और घमंड हो तो वह कभी
14:59सुकून हासिल नहीं कर सकता। लालच इंसान से
15:02उसकी अकल और इज्जत दोनों छीन लेता है।
15:06प्यारे दोस्तों, यह कहानी आप लोगों को
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