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guruji shoot 3

BURZIN UNWALLA · 5,972 words · 28 min read

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0:00गुरु जी आपने दीक्षा क्यों ली?

0:06ये अपने आप में एक बहुत ही अच्छा सवाल है।

0:09मैंने दीक्षा मात्र 13 वर्ष की उम्र में

0:13ली। मैंने मेरी बहन जो भी वर्तमान में

0:17डॉक्टर साध्वी विद्युत प्रवासी जी हैं और

0:20मेरी माताजी पूजनीय रतन मालासी सिंह जी

0:23महाराज तीनों ने एक साथ दीक्षा ली। मां की

0:26प्रेरणा थी और गुरु महाराज की कृपा थी और

0:30यही कारण बना कि मेरे मन में संसार की

0:33असारता समझ में आई। मां की प्रेरणा थी कि

0:37बेटा संसार में भटकना नहीं है। संसार में

0:41रहोगे तो चार गतियों में लगातार भ्रमण

0:44करते रहोगे और हमें अपनी आत्मा का कल्याण

0:48करना है। आत्मा का एक लक्ष्य बना। आत्मा

0:50की रुचि बनी और वही कारण बना कि हमने संयम

0:55लिया दीक्षा ली तीनों ने हमने एक साथ

0:57दीक्षा ली पूज्य गुरुदेव आचार्य भगवंत

1:00श्रीमद् जिन कांति सागर सुरीश्वर जी

1:03महाराज साहब के कर कमलों से हमारी दीक्षा

1:06संपन्न हुई

1:09गुरु जी आशीर्वाद

1:13धर्म लाभ

1:20गुरु जी आपने दीक्षा क्यों ली?

1:24मेरी दीक्षा मेरे माताजी की प्रेरणा से

1:27हुई। मेरे पिताजी का स्वर्गवास जब मैं

1:31केवल चार वर्ष का था तब हो गया था। मैं

1:36मेरी छोटी बहन और मेरी मां हम तीन परिवार

1:40में थे। माताजी महाराज ने संसार की असारता

1:43को जाना और हमें समझाया और हमें बताया कि

1:47संसार में रहने से सुख नहीं है। संसार में

1:51रहने से संसार में परिभ्रमण होगा। चार

1:54गतियों में परिभ्रमण होगा। और यदि अपनी

1:57आत्मा का कल्याण चाहते हैं तो हमें दीक्षा

2:00लेनी होगी। क्योंकि शाश्वत सुख वही है। और

2:03मैंने मेरी बहन ने और मेरी माताजी ने

2:06तीनों ने एक साथ दीक्षा ली। जिस वक्त में

2:09दीक्षा हुई मेरी उम्र उस वक्त में 13 वर्ष

2:12की और मेरी बहन महाराज की उम्र केवल 10

2:15वर्ष की थी।

2:17आपने दीक्षा कब और क्यों ली?

2:22मेरे परिवार में मैं मेरी बहन और मेरी

2:26माताजी पिताजी का स्वर्गवास हो गया था जब

2:29मैं चार वर्ष का था। माताजी ने संसार के

2:33स्वरूप देखा। संसार की असारता को जाना और

2:36हमें प्रेरणा दे कि बेटा हमें दीक्षा लेनी

2:39है। संसार में नहीं भटकना है। क्योंकि

2:42संसार में भटकोगे तो ना मालूम अनंत काल तक

2:46कितने समय तक हमें संसार में भटकना

2:48पड़ेगा। हमें संसार से मुक्त होना है।

2:51संसार के परिभ्रमणा से मुक्त होना है।

2:55मोक्ष प्राप्त करना है। शाश्वत सुख

2:57प्राप्त करना है। और मां की प्रेरणा को

3:00प्राप्त करके मैंने बहन और माताजी तीनों

3:03के साथ में तीनों ने हमने एक साथ दीक्षा

3:06ली। मेरी मां पूजनीय माता जी महाराज साहब

3:09रतनमाला श्री जी महाराज साहब मेरी बहन

3:12साध्वी डॉक्टर विद्युत प्रभा श्री जी

3:14महाराज और मैं हम तीनों की दीक्षा एक साथ

3:18पालीताना में विक्रम संवत

3:222030 आषाढ़ वदी सप्तमी को पलीताना में

3:25पूज्य गुरुदेव आचार्य भगवंत श्रीमद् जन

3:28कांति सागर सुरेश्वर जी महाराज साहब के कर

3:31कमलों से हुई

3:35जैन सिद्धांतों को जैन जी लाइफ स्टाइल में

3:38कैसे अपना?

3:40जैन धर्म के सिद्धांत इतने सार्वजनिक है

3:44और सार्वकालिक है कि यह हर व्यक्ति के लिए

3:47उपयोगी है। वह चाहे बालक हो, चाहे युवा हो

3:50और चाहे वृद्ध हो। युवा लोगों में वर्तमान

3:53में जैन दर्शन की जो विशिष्टताएं हैं उनको

3:57जीवन में उतारने की बहुत जरूरत है।

3:59क्योंकि वे आवेश में आकर कभी-कभी अपने

4:03जीवन में कई समस्याएं खड़ी कर देते हैं।

4:06लेकिन जैन धर्म उन्हें जीना सिखाता है।

4:09युवा अवस्था में कैसे जीना, छोटी उम्र में

4:12कैसे जीना और कैसे शांत रहना और कैसे

4:15प्रगति करना यह सिखाता है और जैन दर्शन

4:18सिखाता है कि परिस्थितियां कैसी भी हो

4:21कितनी भी विपरीत क्यों ना हो लेकिन

4:23तुम्हें शांत रहकर और अपनी प्रगति के

4:26मार्ग पर आगे बढ़ना है। इसलिए जैन जी वाले

4:31युवा वाले जो लोग है जैन जी उम्र वाले जो

4:33लोग हैं वे निश्चित रूप से जैन दर्शन की

4:36आराधना करके जैन दर्शन को स्वीकार करके और

4:39जैन दर्शन को अच्छी तरह से समझ करके अपने

4:42जीवन में परिवर्तन ला सकते हैं और शाश्वत

4:46सुख का आनंद प्राप्त कर सकते हैं। इसको

4:49चेंज करना चाहिए ना।

4:51यदि घर में बैठे भी धर्म कर सकते हैं तो

4:54फिर दीक्षा क्यों ली जाती है?

4:58घर में रहकर सामान्य धर्म की आराधना तो की

5:01जा सकती है लेकिन आत्म धर्म की विशिष्ट

5:04आराधना तो संयम जीवन में ही होती है

5:07क्योंकि संसार के गृहस्थ जीवन में घर के

5:11जीवन में पाप बहुत है। आरंभ समारंभ बहुत

5:16है। जबकि संयम जीवन ऐसा उत्कृष्ट जीवन है

5:19जिसमें किसी भी प्रकार का आरंभ समारंभ

5:22नहीं है। किसी प्रकार की हिंसा नहीं है।

5:25एकदम शुद्ध जीवन है और शुद्ध जीवन से ही

5:28आत्मा का कल्याण हो सकता है। इसलिए जितने

5:31भी तीर्थंकर परमात्मा हुए उन्होंने भी

5:35चरित्र मार्ग ग्रहण करके दीक्षा लेकर ही

5:38अपनी आत्मा का कल्याण किया है। दीक्षा

5:42लेना अत्यंत जरूरी है। यदि हम अपनी आत्मा

5:46का कल्याण करना चाहते हैं।

5:49भगवान तो मोक्ष पधार गए हैं। फिर प्राणों

5:52की प्रतिष्ठा कैसे की जाती है?

5:55जितने भी मंदिर बनते हैं, मंदिर में

5:58परमात्मा की प्रतिमाएं बनती है जो यह अष्ट

6:01धातु से बनी होती है, चांदी की भी बनी

6:03होती है और पाषाण खंडों से भी बनी होती

6:05है। प्रश्न यह है कि उन प्रतिमाओं में

6:09भगवान के प्राणों की प्रतिष्ठा कैसे होगी?

6:12जबकि परमात्मा तो मोक्ष में पधार गए हैं।

6:14तो सच तो यह है कि परमात्मा की आत्मा

6:17मोक्ष में गई है। और यहां जो परमात्मा की

6:20प्रतिमा में प्रतिष्ठा होती है वह आत्मा

6:23की प्रतिष्ठा नहीं है। जीव की प्रतिष्ठा

6:25नहीं है। वह प्राणों की प्रतिष्ठा है और

6:28प्राण पुद्गल है। प्राण जड़ है। जिस समय

6:31तीर्थंकर परमात्मा इस भूमि पर विचरण कर

6:34रहे थे। उस समय में उन्होंने 10 प्राणों

6:37को भोगा। वे परम पवित्र प्राण वर्तमान में

6:40भी इस ब्रह्मांड में सूक्ष्म रूप में

6:42मौजूद है। आचार्य भगवंत विशिष्ट मुहूर्त

6:47में विशिष्ट मुद्राओं के साथ विशिष्ट

6:49मंत्रोारणों के साथ उन प्राणों का आह्वान

6:53करते हैं और उन प्राणों को परमात्मा की

6:56प्रतिमा में निक्षिप्त करते हैं। बस वही

6:58प्राण प्रतिष्ठा है। यह समझना जरूरी है कि

7:02प्राण प्रतिष्ठा है। जीव प्रतिष्ठा नहीं

7:05है। आत्मा की प्रतिष्ठा नहीं है। प्राणों

7:08की प्रतिष्ठा है और प्राण भी इतने पवित्र

7:10हैं कि उनके दर्शन करके और उनका स्पर्श

7:13करके हम अपने जीवन को कृतार्थ करते हैं।

7:18क्या जैन दर्शन सिर्फ फूड ओरिएंटेड ही है?

7:24जैन दर्शन अपने आप में जीवन दर्शन है।

7:27जीवन जीने की कला है। तो क्या खाना, कैसे

7:31खाना, क्यों खाना इसकी पूरी रहस्यात्मक

7:35विवेचना जैन दर्शन करता है। जैन दर्शन के

7:39अनुसार यदि हमारे जीवन का निर्माण हो तो

7:42हमारे जीवन में परम शांति और समाधि पैदा

7:46होती है। ना केवल इस जन्म में बल्कि अगला

7:49जन्म भी हमारा परम शांत और परम समाधिमय

7:53सुखमय हो जाता है। जैन दर्शन आहार के

7:56संबंध में विशिष्ट बातें बताता है।

7:59क्योंकि आहार से ही हमारे मन का निर्माण

8:02होता है। हमारा मन पवित्र कैसे हो? तो

8:04आहार भी उसके लिए पवित्र चाहिए। इसलिए

8:07पवित्र आहार ही व्यक्ति को करना चाहिए और

8:10समय का निर्धारण भी उसी प्रकार व्यक्ति को

8:13करना चाहिए ताकि व्यक्ति स्वस्थ बना रहे।

8:16व्यक्ति का तन व्यक्ति का मन दोनों ही

8:19स्वस्थ रहे और प्रसन्न रहे। इसलिए जैन

8:22दर्शन जीवन जीने की कला सिखाता हुआ बताता

8:25है कि कौन से द्रव्य हमें नहीं लेने चाहिए

8:28और कौन से द्रव्य हमें लेने चाहिए। क्या

8:31आप हमें यह बता सकते हैं कि चादर महोत्सव

8:33क्या था।

8:36अभी इसी वर्ष 6 7 8 मार्च

8:412026 को जैसलमेर में एक विराट महोत्सव का

8:45आयोजन किया गया। इसके पीछे मूल जो भूमिका

8:50बनी प्रथम दादा गुरुदेव जिन दत्त सूरी

8:53महाराज जिनका जन्म विक्रम संवत 1132 में

8:58गुजरात के दौलका नगर में हुआ। 9 वर्ष की

9:01उम्र में उन्होंने दीक्षा ली और उनका जो

9:04जीवन था इतना साधना से संपन्न था कि साधना

9:08के परिणाम स्वरूप देवी देवता उनके श्री

9:11चरणों में निवास करते थे और बड़े चमत्कारी

9:14महापुरुष हुए हैं। उनके चमत्कार की गाथाएं

9:18घर-घर में गाई जाती है। जिस समय में उनका

9:22स्वर्गवास हुआ। विक्रम संवत 1211 आषाढ़

9:25सुदी एकादशी को अजमेर नगर में उनका

9:29स्वर्गवास हुआ। स्वर्गवास के बाद में जब

9:32उनके उनके उनकी काया का अग्नि संस्कार

9:35किया गया। उस समय में यह देखकर लोग

9:39चमत्कृत रह गए कि उनकी काया तो भस्मीभूत

9:43हो गई। लेकिन उनके द्वारा धारण किए गए

9:46वस्त्र, चादर, चोलपटक, मुख वस्त्रिका ये

9:50सब अखंड रह गए और नहीं जले। यही चमत्कार

9:53था और यही दादा गुरुदेव की कृपा सकल श्री

9:56संग पर बरसी थी और हम कितने सौभाग्यशाली

10:00हैं कि वह चादर और वह चोलपटा आज भी हमारे

10:04पास में है। जैसलमेर के ज्ञान भंडार में

10:07आज भी वह सुरक्षित है। उस चादर चमत्कारी

10:11चादर की पूजा करने का विराट महोत्सव

10:14आयोजित किया गया जैसलमेर में जिसमें

10:17हजारों हजारों लोगों ने आकर चादर की पूजा

10:20की। वासक्षेप पूजा की उसका अभिषेक किया और

10:24अभिषेक जल से अपने जीवन को कृतार्थ किया

10:27और वासक्षेप लेकर अपने जीवन को धन्य धन्य

10:30बनाया।

10:34अगले भूमि में जिन शासन प्राप्त हो उसके

10:37लिए क्या करना चाहिए?

10:40इस जन्म में हम कितने सौभाग्यशाली है कि

10:44हमने जिन शासन प्राप्त किया। परमात्मा की

10:47वाणी प्राप्त की। परमात्मा की पूजा करने

10:51का अवसर मिला। अगले भ में भी हम जैन धर्म

10:55चाहते हैं, जिन शासन चाहते हैं, उसके लिए

10:58हमें केवल और केवल परमात्मा से प्रार्थना

11:01करनी है, आराधना करनी है, सामयिक करनी है,

11:04प्रतिक्रमण करना है। और इसके साथ-साथ अपने

11:07जीवन को कषाय रहित बनाना है। हमें क्रोध,

11:12मान, माया, लोभ इन सब का संवरण करना है।

11:15राग द्वेष से दूर होना है। धर्म की आराधना

11:19करके ही हम अगले भमों में परमात्मा का

11:22शासन प्राप्त कर सकते हैं और परमात्मा का

11:25शासन प्राप्त करके हम अपनी आत्मा का

11:28कल्याण कर सकते हैं।

11:32जैन साधु क्या है?

11:34जैन साधु अपने आप में इस दुनिया का सबसे

11:39बड़ा अचरज है। जब चारों ओर भोग का बाला

11:43बाला है। भौतिक संस्कृति का वातावरण है।

11:47ऐसे समय में जैन साधु परम सात्विकता के

11:51साथ में जीता है। जैन साधु की विशिष्टता

11:54है पंच महाव्रत। वह पांच महाव्रतों के साथ

11:57में जीता है। वो हिंसा नहीं करता। वह

12:00असत्य भाषण नहीं करता। वह चोरी नहीं करता।

12:04वह मैथुन का सेवन नहीं करता। वह अपने पास

12:07किसी भी प्रकार का परिग्रह नहीं रखता। जो

12:10आवश्यक उपकरण है उपयोग के लिए संयम जीवन

12:13की साधना के लिए उपयोगी उनहीं उपकरणों को

12:16अपने पास रखता है। मगर उनके प्रति भी उनके

12:19अंतर में कोई राग द्वेष नहीं होता। जैन

12:23साधु अपने साथ पैसा नहीं रखता। वाहन का

12:25उपयोग नहीं करता। पैदल चलता है और इसके

12:28साथसाथ परम शांत जीवन जीता है। प्रतिकूलता

12:32में भी परम आनंद का जीवन जीता है और सदा

12:35सदा परमात्मा की साधना में धर्म की आराधना

12:39में आत्मा की साधना में लीन रहता है। अपने

12:42लिए भोजन नहीं बनाता। वह घरघर जाता है और

12:46घरघर से अपने योग्य थोड़ा थोड़ा आहार लेकर

12:50के आता है और अपने जीवन को अपने जीवन की

12:54यात्रा को आगे बढ़ाता है। ऐसा परम शुद्ध

12:57परम सात्विक जीवन एक पंच महाव्रतधारी साधु

13:01परमात्मा महावीर का साधु जीवन जीता है।

13:07जय हिंद साधु को आप परिभाषित कीजिए।

13:13वर्तमान युग में वर्तमान युग के भौतिक

13:16वातावरण में सोशल मीडिया के इस युग में

13:20भौतिक संसाधनों की भरमार जहां है ऐसी

13:24स्थिति में बिना किसी संसाधन के जीता है

13:27जैन साधु परमात्मा महावीर का साधु जैन

13:30साधु की जो सिद्धांत बताए गए है जैन साधु

13:35के लिए जिस सिद्धांतों की प्रूपना

13:38परमात्मा महावीर ने की है पंच महाव्रतों

13:41का पालन करना

13:42इसमें जैन साधु अहिंसा का पालन करता है।

13:45किसी जीव की हिंसा नहीं करता। किसी जीव को

13:48कष्ट नहीं पहुंचाता। सत्य भाषण करता है।

13:50चोरी नहीं करता। मैथुन का सेवन नहीं करता।

13:53विजातीय का स्पर्श नहीं करता। और किसी भी

13:56प्रकार की मूल्यवान सामग्री अपने पास नहीं

13:59रखता।

14:01और जो अपने पास उनके साथ में उपकरण होते

14:04हैं उन उपकरणों का भी केवल उपयोग करता है।

14:08लेकिन उनके प्रति किसी प्रकार की आसक्ति

14:11नहीं रखता। वो जैन साधु अपने बालों का लोच

14:15करता है। माथे के बालों का, दाढ़ी मूछ के

14:17बालों का भी लूचन करता है। अपने हाथों से

14:20वो गाड़ता है और भोजन भी अपने लिए नहीं

14:22बनाता बल्कि घर-घर जाकर यथा योग्य जहां पर

14:26शुद्ध शाकाहारी भोजन मिलता हो वहां से

14:29अपने लिए थोड़ा-थोड़ा भोजन ग्रहण करके

14:31अपनी जीवन यात्रा को आगे बढ़ाता है। पैसों

14:34का भी स्पर्श नहीं करता। परम शांत रहता है

14:37और प्रतिकूलता में भी प्रसन्नता का जीवन

14:40जीता है और जैन साधु जो उपदेश देता है

14:43धर्म का उपदेश देता है जीवन कैसे सात्विक

14:46बने इनका उपदेश देता है ऐसा होता है जैन

14:49साधु

14:52जैन साधु पंच महाव्रत धारी होता है पंच

14:55महाव्रतों को धारण करता है पंच महाव्रतों

14:58का पालन करता है

15:04वर्तमान में नए मंदिर बन रहे हैं। उसके

15:07पीछे का क्या रास्त है?

15:10मंदिरों का निर्माण तो सतत होना चाहिए।

15:13अपने इतिहास में बताया गया है कि संप्रति

15:16महाराजा ने सवा लाख जैन मंदिर बनाए। सवा

15:19करोड़ जिन प्रतिमाओं को भराया। तो वर्तमान

15:23में जो जैन संस्कृति पूरे विश्व में नजर आ

15:26रही है। जैन संस्कृति की जो प्राचीनता है

15:29वो इन मंदिरों के कारण है। तो मंदिर के

15:31बिना तो श्रावक लोग दर्शन कैसे करेंगे और

15:34अपने सम्यक को निर्मल कैसे करेंगे? मंदिर

15:38हर गली-गली में होने चाहिए। हर गांव में

15:41होने चाहिए ताकि लोग परमात्मा के मंदिर के

15:43दर्शन करके अपने जीवन को नई दिशा दे सके।

15:47धर्म की दिशा दे सके। इसलिए मंदिरों का

15:50निर्माण अत्यंत जरूरी है।

15:54आत्मा पुनर्जन्म पूर्व जन्म ये कैसे सिद्ध

15:58होंगे?

16:01आत्मा का अस्तित्व सदा काल से है। अनंत

16:05काल से है। आत्मा अजर अमर है। प्रश्न है

16:08कि आत्मा है या नहीं? आत्मा तो है ही।

16:13क्योंकि केवल और केवल पंच महाभूतों से बना

16:16हुआ यह शरीर फिर यह मरेगा कैसे? अगर यह

16:20मरता है तो क्या कारण है? व्यक्ति जब

16:23मृत्यु प्राप्त करता है तो एक मिनट पहले

16:26वह बोलता है, वह खाता है, वह पीता है, वह

16:29हंसता है, वह रोता है। एक मिनट के बाद में

16:32ऐसा क्या हो जाता है कि उसका हंसना बंद,

16:35बोलना बंद, खाना बंद, पीना बंद। एक मिनट

16:38पहले उसे कोई चांटा मारे, कोई पिन चुबोए

16:41तो वह दर्द से चिल्लाता है और एक मिनट के

16:44बाद में ऐसा क्या हो जाता है कि कोई चाकू

16:47भी चला दे तब भी उसे कोई फर्क नहीं पड़ता।

16:50इससे सिद्ध होता है कि उसमें आत्मा थी बस

16:54वही निकल गई। आत्मा निकलने के बाद पंच

16:57महाभूत तो वैसे के वैसे थे। वही पृथ्वी,

17:00वही जल, वही वायु वो सब शरीर में वैसा था

17:03वैसा सारे तत्व मौजूद थे। फिर भी एक तत्व

17:07उड़ गया उसी का नाम आत्मा है और आत्मा है

17:10तो ही तो पुनर्जन्म है और तो ही पूर्व

17:13जन्म है। वर्तमान में ऐसे कितने ही उदाहरण

17:15मिलते हैं जिनको अपने पूर्व जन्म की

17:18स्मृति आई है। तो पूर्व जन्म की स्मृति ही

17:21ये सिद्ध करती है कि आत्मा है। आत्मा

17:24अनादि काल से है और आत्मा कभी भी मरती

17:27नहीं है। और जब आत्मा है तो पुनर्जन्म भी

17:30है और पूर्व जन्म भी है। और हम धर्म की

17:33आराधना इसलिए करते हैं कि हम अपनी आत्मा

17:36का कल्याण कर सके।

17:40रात्रि भोजन क्यों वर्जित है?

17:44परमात्मा महावीर ने और अनंत तीर्थंकरों ने

17:48रात्रि भोजन को पाप कहा है। दिन और रात

17:52में बहुत अंतर है। दिन में भोजन किया हुआ

17:56पाचन तंत्र को मजबूत करता है और वह भोजन

18:00आसानी से पचता है। रात्रि का भोजन पचता

18:03नहीं है। ऐसा साइंस भी मानता है। साइंस भी

18:06कहता है। और इसके साथ-साथ यह देखें कि

18:08रात्रि में कितने जीवों की उत्पत्ति हो

18:10जाती है। जीवों की हिंसा होती है। दिन की

18:13रोशनी में जीवो की उत्पत्ति नहीं है।

18:16रात्रि में जीवो की अनंत जीवो की उत्पत्ति

18:19हो जाती है और उन सब की हिंसा होती है। वो

18:21सब भोजन में गिरते हैं और हमारे जीवन को

18:24अस्त-व्यस्त कर देते हैं। अस्वस्थ बनाते

18:26हैं। रात्रि भोजन को इसलिए परमात्मा ने

18:30शास्त्रकारों ने महापाप माना है।

18:34क्या उपाय करें कि हम सुखी बने?

18:39इस जगत में हर प्राणी सुखी बनना चाहता है।

18:42सुख प्राप्त करना चाहता है। लेकिन प्रश्न

18:45यह है कि सुख आता कहां से है? अगर हम बहुत

18:48गहराई से देखेंगे तो पाएंगे कि सुख का मूल

18:52कारण पुण्य है। पुण्य का आधार धर्म है। जब

18:56व्यक्ति धर्म की आराधना करता है तो उसी से

18:59पुण्य का बंधन होता है और पुण्य के परिणाम

19:02स्वरूप व्यक्ति सुख को प्राप्त करता है।

19:05शांति को प्राप्त करता है। इसलिए हमें

19:08वर्तमान में पुण्य की साधना करनी चाहिए।

19:11धर्म की आराधना करनी चाहिए। जिससे हम सुखी

19:15बन सके और सुखी बनकर अपने जीवन को परम

19:19शांत और परम समाधिमय बना सके।

19:25का प्रारंभ कब से हुआ और इस परंपरा में

19:28कौन से महापुरुष हुए?

19:33परमात्मा महावीर की परंपरा

19:36सुधर्मा स्वामी से लेकर अविछिन्न रूप से

19:39लगातार चल रही है। वो समय था 11वीं

19:43शताब्दी का। 11वीं शताब्दी में विक्रम

19:46संवत 1075 के आसपास जब चंद्रगच्छ के

19:50परमात्मा महावीर की शासन परंपरा में अनेक

19:53गच्छ हुए। अनेक परंपराएं चली। वो कोटि गण

19:57से ये परंपरा आगे विख्यात हुई। निरग्रंथ

20:00गच्छ के नाम से भी विख्यात हुई। वज्र शाखा

20:03के नाम से भी और चंद्रकुल के नाम से भी।

20:06तो चंद्र गच्छ के आचार्य भगवंत आचार्य

20:09वर्धमान सूरी आचार्य जिनेश्वर सूरी वे

20:12विहार करते हुए पाटन नगर में पधारे। यह

20:15विक्रम संवत 1075 के आसपास की घटना है। और

20:19उस समय में वहां पर शिथिलाचारी साधु लोग

20:22रहते थे। थे तो साधु के वेश में उनके पास

20:25में भी ओगा था। मुंह पति थी। चादर

20:27परमात्मा की थी। लेकिन उनका जो आचरण था वह

20:30साधु जीवन के योग्य नहीं था। वे गद्दों पर

20:33बैठते थे, लंचन नहीं करते थे, पान इत्यादि

20:37चबाते थे और पैसा भी रखते थे और लोगों को

20:40मंत्र तंत्र ज्योतिष इत्यादि की विद्याएं

20:42अर्पण करते थे। इस प्रकार वो यति हो गए थे

20:46और वे जैन साधु के नाम से जैन साधु के नाम

20:51से सारा व्यवहार करते थे। उस समय में

20:53आचार्य जिनेश्वर सूरी पधारे पाटन नगर में

20:57और पाटन नगर में उनको रहने की जगह ना

20:59मिली। ऐसी स्थिति में दुर्लभ राजा की

21:02राजसभा में उनकी उपस्थिति में शास्त्रार्थ

21:06हुआ। उन यतियों के साथ में और शास्त्रार्थ

21:09में जब खरे रहे विजय बने और उनको राजा

21:14दुर्लभ ने आचार्य जिनेश्वर सूरी को खरतर

21:17विरुद्ध अर्पण किया। वही विरुद्ध आगे चलकर

21:20गच्छ के नाम से जुड़ गया और वही खरतर गच्छ

21:23कहलाया। इस खतरगच्छ की महान परंपरा में नव

21:26अंगी टीकाकार आचार्य अभयदेव सूरी हुए।

21:30प्रथम दादा गुरुदेव लाखों परिवारों को

21:32परमात्मा का मार्ग प्रदान करने वाले दादा

21:34जिनदत्त सूरी हुए। मणिधारी दादा जिन चंद्र

21:37सूरी हुए। तीसरे दादा जिन कुशल सूरी हुए।

21:40चौथे दादा अकबर को प्रतिबोध देने वाले जिन

21:43चंद्र सूरी हुए। और वही परंपरा आज तक

21:46विचिन रूप से चल रही है। पूज्य गणनायक सुख

21:49सागर जी महाराज हुए। आचार्य जन हरि सागर

21:51सूरी महाराज हुए और मेरे गुरुदेव पूज्य

21:54आचार्य भगवंत श्रीमद् जन कांति सागर

21:56सूरश्वर जी महाराज इसी परंपरा में हुए।

22:02खरतर का प्रारंभ कब हुआ और इसमें कौन से

22:06महापुरुष?

22:09परमात्मा महावीर की श्रवण परंपरा सुधर्मा

22:12स्वामी से प्रारंभ होकर वर्तमान तक

22:14अविछिन्न रूप से चल रही है। परमात्मा

22:17महावीर की शासन परंपरा गच्छ परंपरा श्रवण

22:21परंपरा कोटिगच्छ वज्र शाखा चंद्रकुल

22:26में होती हुई चंद्रगच्छ के आचार्य भगवंत

22:29विक्रम संवत 1075 के आसपास 11वीं शताब्दी

22:33में वे अपने गुरु आचार्य वर्धमान सूरी के

22:36साथ पधारे पाटन नगर में पाटन नगर में उनको

22:39रहने के लिए कोई स्थान ना मिला और ऐसी दशा

22:42में वहां पर राजा दुर्लभ जिनका राज्य चलता

22:45था वहां पर यति यति लोग थे वो यति लोग थे

22:48तो जैन साधु की वेशभूषा में उगा भी रखते

22:51थे चादर भी धारण करते थे लेकिन केस लंचन

22:54नहीं कराते थे और इसके साथ-साथ गद्ों पर

22:56बैठते थे पान चबाते थे पैसा भी इकट्ठा

22:58करते थे ऐसे वो जैन साधु थे तो उन्होंने

23:01उनको वहां पर रहने के लिए स्थान नहीं दिया

23:04तब राजा दुर्लभ की राजसभा में वहां पर

23:07शास्त्रार्थ हुआ उनकी उपस्थिति में

23:09शास्त्रार्थ हुआ और शास्त्रार्थ में विजय

23:11बने आचार्य जिनेश्वर सूरी राजा दुर्लभ ने

23:15खड़े हो ऐसा ऐसा कहकर उनको खरतर विरुद्ध

23:18दिया। वो चंद्रगच्छ के आचार्य थे। आचार्य

23:21जिनेश्वर सूरी वही परंपरा आगे चलकर बाद

23:25में सुहित नाम धारण करती हुई खरतरगच्छ के

23:28नाम से प्रसिद्ध हुई। खरतरगच्छ की

23:30प्रसिद्धि के पीछे आचार्य जिनेश्वर सूरी

23:33की पट परंपरा में हुए नवांगी टीकाकार

23:35अभयदेव सूरी और जिन वल्लभ सूरी उनके पट पर

23:39विराजे प्रथम दादा गुरुदेव जिन दत्त सूरी

23:41महाराज जिन्होंने लाखों परिवारों को

23:43वीतराग परमात्मा का अनुयाई बनाया उन्हीं

23:46से खतरगच्छ नाम ज्यादा प्रसिद्धि को

23:49प्राप्त हुआ। उसी परंपरा में मणिधारी दादा

23:51गुरुदेव जिन चंद्र सूरी जिन कुशल सूरी

23:54अकबर को प्रतिबोध देने वाले जिन चंद्र

23:56सूरी पूज्य गणनायक श्री सुख सागर जी

23:58महाराज आचार्य जिन हरि सागर सूरी जी

24:00महाराज इस प्रकार की परंपरा चलती हुई

24:02पूज्य आचार्य भगवंत श्रीमद् जिन कांति

24:05सागर सुरेश्वर जी महाराज मेरे गुरु महाराज

24:07हुए यह परंपरा लगातार अभी छिन्न रूप से

24:10वर्तमान में गतिमान है।

24:15दादा गुरुदेव का नाम बहुत सुनने में आता

24:17है तो उनके बारे में आप कुछ बता सकते हैं।

24:22परमात्मा महावीर की शासन परंपरा में अनेक

24:24गच्छ हुए। अनेक परंपराएं हुई। समय-समय पर

24:28अनेक गच्छों ने और अनेक परंपराओं में जन्म

24:30लिया। ऐसी स्थिति में खरदगच्छ की परंपरा

24:34में चार आचार्य भगवंत ऐसे हुए जिनको दादा

24:38साहब का संबोधन प्रदान किया गया और उसके

24:41पीछे एक रहस्य था कि उन दादा गुरुदेवों ने

24:44समाज के लिए जो काम किया धर्म के लिए जो

24:47काम किया और लोगों के उत्थान के लिए जो

24:49कार्य किया वही कार्य उन्हें इस संबोधन को

24:53प्रदान करने के पीछे मूल कारण बना। प्रथम

24:56दादा गुरुदेव जिंत सूरी महाराज ने लाखों

24:58परिवारों को परमात्मा महावीर का अनुय

25:01बनाया। सप्त व्यसनों से मुक्त कराया। वो

25:04समय था जिस समय में लोग मांसाहार, शराब

25:07इत्यादि जुआ इत्यादि व्यसनों में डूबे थे।

25:10दादा गुरुदेव ने घर-घर जाकर गांवगांव जाकर

25:14शहर-शहर घूमकर उन्होंने ऐसा प्रचार किया

25:17परमात्मा महावीर की देशना को देशना का कि

25:20हर जाति में वे गए। उन्होंने यह नहीं देखा

25:23कि कौन ऊंची जाति का है, कौन सामान्य जाति

25:25का है। बल्कि हर जाति में उन्होंने विचरण

25:28किया और विचरण करके लाखों परिवारों को

25:31व्यसनों से मुक्त करके परमात्मा महावीर का

25:34अनुयाई बनाया और यही कारण था कि लोगों ने

25:38समाज ने उनको परम प्रिय संबोधन, दादा साहब

25:41का संबोधन, सम्मान भरा संबोधन अर्पण किया।

25:45और चार ऐसे आचार्य भगवंत हुए। प्रथम दादा

25:48जिन दत्त सूरी मणिधारी जिन चंद्र सूरी जिन

25:52कुशल सूरी और जिन चंद्र सूरी इन चारों

25:55आचार्य भगवंतों को दादा गुरुदेव कहा जाता

25:58है।

26:00केसरिया जी तीर्थ का इतिहास बताओ।

26:04केसरिया जी तीर्थ का इतिहास अति प्राचीन

26:07है। ये परमात्मा पहले उज्जैन नगर में

26:11विराजमान थे। जिस समय में मुनि

26:13सुब्रस्वामी परमात्मा का शासन चल रहा था।

26:16हजारों लाखों वर्ष पहले की बातें हैं। वे

26:19परमात्मा आदिनाथ परमात्मा व मंदिर में

26:22विराजमान थे और उनके समय में श्रीपाल और

26:25मैना सुंदरी हुए। श्रीपाल को कोड रोग हुआ

26:27था। यही वो परमात्मा है। इन्हीं के

26:30प्रक्षाशाल जल से श्रीपाल का कोड रोग दूर

26:33हुआ था। ना केवल श्रीपाल का बल्कि उनके जो

26:36साथी थे 700 कोढ़ी उनका भी कोढ़ रोग

26:40इन्हीं आदिनाथ परमात्मा ऋषभदेव परमात्मा

26:43के प्रक्षाशाल जल से समाप्त हुआ था। कोढ़

26:46रोग दूर हो गया था। ऐसे चमत्कारी आदिनाथ

26:49परमात्मा वो उज्जैन से ये प्रतिमा जी बाद

26:52में बड़ौदा में आई और वहां दुलेव नाम का

26:56एक भील व्यक्ति श्रद्धावान व्यक्ति उसको

26:59सपना आया और वो दुलेव कावड़ लेकर परमात्मा

27:03की प्रतिमा को लेकर के चला। कावड़ में एक

27:06कावड़ में परमात्मा की प्रतिमा को रखा और

27:09दूसरे कावड़ में फूल रखा और यह परमात्मा

27:13वजनदार परमात्मा एकदम हल्के हुए और वह

27:17धुले लेकर के आया जहां वर्तमान में

27:19केसरिया जी है जहां पगलिया जी है केसरिया

27:22जी में वहां पर विराजमान किए और बाद में

27:25यह मंदिर बना और यहां पर केसरिया जी

27:28परमात्मा विराजमान हुए पूरे जैन समाज में

27:32और जैन समाज ही नहीं बल्कि आसपास के समस्त

27:35स्त इलाकों में केसरियानाथ परमात्मा का

27:38बड़ी चमत्कार केसरियानाथ परमात्मा का

27:41चमत्कार पूरे क्षेत्र में प्रसिद्ध है और

27:44सारे लोग कालिया बाबा के नाम से उन्हें

27:48पूजते हैं। उनके दर्शन करते हैं और दर्शन

27:51पूजा करके धन्यता का अपने जीवन में अनुभव

27:54करते हैं।

27:58जमीकंद क्यों नहीं खाना चाहिए?

28:02परमात्मा महावीर ने जमीकंद खाने का मना

28:05किया है। जमीकंद का अर्थ होता है जिस

28:08वस्तु को सूर्य की रोशनी नहीं मिलती जो

28:11जमीन में पैदा होती है ऐसी वस्तुएं जमीकंद

28:15कहलाती है। और वर्तमान का वैज्ञानिक

28:17संशोधन कहता है कि जिस वस्तु को सूर्य की

28:20रोशनी नहीं मिलती वह वस्तु शरीर के लिए

28:23लाभकारी नहीं होती। परमात्मा महावीर ने

28:26फरमाया है कि जमीकंद जितनी भी चीजें हैं

28:28चाहे वह आलू हो आलू के साथ-साथ प्याज हो,

28:32लहसुन हो इत्यादि जो चीजें हैं, गाजर है,

28:35मूड़ा है इत्यादि वो चीजें हैं जिनमें

28:38अनंत काय है। अनंत काय का अर्थ होता है एक

28:41हिस्से में अनंत जीव है। अनंत अनंत जीव

28:44है। तो एक हिंसा

28:49जमीकंद में घोर हिंसा है। अनंत जीवों की

28:52हिंसा है। अनंत जीवों की हिंसा के कारण से

28:55परमात्मा ने खाने से मना किया है। और इसके

28:58साथ-साथ शरीर के लिए भी वो लाभकारी नहीं

29:02है। शरीर को वो अस्वस्थ बनाती है।

29:06जमीकंद क्यों नहीं खाना चाहिए?

29:09परमात्मा महावीर ने जमीकंद खाने का मना

29:11किया है। जमीकंद का अर्थ होता है जो जमीन

29:15में पैदा होता है जिसे सूरज की रोशनी नहीं

29:18मिलती। परमात्मा महावीर ने फरमाया है कि

29:21इस जमी कंद में जितनी भी चीजें हैं चाहे

29:23वो आलू हो, प्याज हो, लहसुन हो, गाजर हो

29:26इन सबके सुई की नोक जितने हिस्से में अनंत

29:30जीव होते हैं। तो अनंत जीवों की हिंसा है

29:33और इसके साथ-साथ शरीर के लिए भी लाभकारी

29:36नहीं है। शरीर को नुकसान पहुंचाते हैं।

29:38इसलिए जमीक कंद से हमें दूर रहना चाहिए और

29:41जमीक कंद का त्याग करना चाहिए।

29:44आचार्य जिन कांति सागर सूरी जी के बारे

29:48में बताएं।

29:50मेरे गुरुदेव आचार्य जिन कांति सागर

29:52सुरेश्वर जी महाराजा उनका जन्म रतनगढ़ में

29:56विक्रम संवत 1968 मादी 11 को हुआ था थली

30:00प्रदेश में उन्होंने बचपन में ही अपने

30:03पिताजी के साथ दीक्षा ली थी आचार्य

30:05कालूगणी के निश्रा में तेरापंथ में 10

30:08वर्ष वहां रहे और उसके बाद में उन्होंने

30:11मंदिर मार्गी संप्रदाय में पुनः दीक्षा ली

30:14और खरतरगज में भी दीक्षित हुए उनका नाम

30:16रखा गया मुनि कांति सागर और वे आचार्य

30:19चार्य जिन हरि सागर सुरश्वर जी महाराज

30:21साहब के शिष्य बने। उनके जो सांसारिक

30:24पिताजी मुनि जी थे वे मुनि तेरापंथ में ही

30:27जीवन पर्यंत रहे। गुरु महाराज ने दीक्षा

30:30लेकर मंदिर मार्गी समाज में खतरगज समाज

30:33में दीक्षा लेकर जो शासन प्रभावनाएं की है

30:36उनकी शासन प्रभावनाएं अनगिनत है। पूरे

30:40भारत में उन्होंने भ्रमण किया और ऐसे समय

30:43में जिस समय में चीन का युद्ध चल रहा था

30:46और उस समय में देश के लिए जरूरत थी तब उस

30:49वक्त में हमारे गुरु महाराज ने उदयपुर

30:52चातुर्मास में लोगों को प्रेरणा देकर के

30:55धन संग्रह भी करवाया और इसके साथ-साथ जब

30:59आजाद नहीं हुआ था भारत तो उससे पहले गुरु

31:02महाराज ने भी आजादी के वातावरण में अपने

31:06आप को उतारा था और अंग्रेजों के विरुद्ध

31:09उन्होंने ने अपना एक जबरदस्त अभियान भी

31:12वहां पर प्रारंभ किया था। ऐसे हमारे गुरु

31:14महाराज थे। जब जिस समय में परमात्मा

31:18महावीर की 25वीं निर्माण शताब्दी का अवसर

31:21था। उससे तीन साल पहले दिल्ली में मणिधारी

31:25दादा गुरुदेव की अष्टम शताब्दी का महा

31:27महोत्सव था। ऐसे समय में चारों संप्रदाय

31:30के आचार्य भगवंत एकत्र हुए थे। दिगंबरों

31:33में आचार्य विद्यानंद जी महाराज, मंदिर

31:36मार्गी में हमारे गुरु महाराज, स्थानक

31:38वासी में मुनि सुशील कुमार जी महाराज और

31:41तेरापंथ में मुनि महेंद्र कुमार जी महाराज

31:44प्रथम इन चारों ने एकत्र होकर जैन ध्वज का

31:47निश्चय किया था। जैन ध्वज का निर्णय किया

31:50था और वही जैन ध्वज आज पूरे भारत में जैन

31:54प्रतीक के रूप में चलता है। जैन ध्वज के

31:56रूप में वो माना जाता है और जिस समय में

31:5925वीं निर्माण शताब्दी का आयोजन किया गया

32:02स्वयं गुरु महाराज उग्र विहार करके

32:04पावापुरी में पधारे और पावापुरी में उनकी

32:07पावन निश्रा में ही परमात्मा महावीर की

32:1125वीं निर्वाण शताब्दी परमात्मा महावीर का

32:14निर्माण स्थल पावापुरी में मनाया गया था।

32:17का वो महामोत्सव और बाद में गुरु महाराज

32:20जब विहार करते हुए मांडवला पधारे और

32:24मांडवला में मिक्सर पदी सप्तमी विक्रम

32:27संवत 2042

32:30गुरु महाराज अचानक बुखार आया और उसी बुखार

32:34में गुरु महाराज का स्वर्गवास हो गया। मगर

32:37एक रोज पहले गुरु महाराज ने मुझे बुला के

32:40कहा था कि बेटा मेरा अब समय आ गया है। अब

32:43मुझे विदा होना है। गुरु महाराज को पूरा

32:46ज्ञान हो गया था अपने स्वर्गवास का और जिस

32:50समय में उनका अग्नि संस्कार किया गया

32:52हजारों हजारों लोगों ने देखा कि अग्नि

32:55संस्कार के समय में चिता में से उनका हाथ

32:59एकाएक बाहर आया ऊपर उठा आशीर्वाद की

33:02मुद्रा में लहराया चारों ओर लहराया और

33:05लगभग 20 से 25 मिनट तक आशीर्वाद प्रदान

33:09करते रहे ऐसे गुरु महाराज जिनकी पावन

33:12स्मृति में वही मांडवला में जहाज मंदिर का

33:16निर्माण हुआ है। जहां हजारों हजारों

33:18यात्री आते हैं, लोग आते हैं और दर्शन

33:21करके धन्यता का अनुभव करते हैं।

33:26जहां उनका अग्नि संस्कार किया गया, वहां

33:29विश्व का पहला जज मंदिर बना और जहां

33:33हजारों हजारों यात्री आते हैं और दर्शन

33:36करके धन्यता का अनुभव करते हैं।

33:40ब्रज मंदिर की परिकल्पना कैसे?

33:44उदयपुर में हमारा चातुर्मास तय था। हम लोग

33:48मेरे माताजी महाराज, बहन महाराज इत्यादि

33:50सब साथ में विहार करते हुए हम केसरिया जी

33:53पहुंचे थे। केसरिया जी में परमात्मा के

33:55दर्शन किए और उस वक्त में मन को ऐसा लगा

33:58कि यहां पर जो सारी व्यवस्थाएं चल रही है

34:01उनमें सुधार होना चाहिए और यहां दादा

34:04आदिनाथ परमात्मा की कृपा का और ज्यादा

34:07विस्तार हो इसके लिए कोई ना कोई योग्य

34:09कार्य होना चाहिए। तो वहां एक विशाल भूखंड

34:12था। हमें गजेंद्र जी बंसाली मिले, बाफना

34:15जी मिले और इन सब से वार्तालाप करने के

34:18बाद में हमने तय किया कि वहां पर एक मंदिर

34:21का निर्माण हो। लेकिन मंदिर का आकार क्या

34:24हो? तो एक रोज बैठे-बैठे परमात्मा के

34:27मंदिर में बैठे-बैठे मन में विचार पैदा

34:29हुआ कि दादा आदिनाथ परमात्मा परमात्मा

34:32ऋषभदेव परमात्मा उनके शासन में सबसे पहले

34:35मोक्ष पधारे मरुदेवी माता उनके माताजी और

34:38मोक्ष जब पधारे तब वे हाथी के होदे पर

34:41विराजमान थे। यानी हाथी उनके लिए मोक्ष का

34:44वाहन बन गया। तो अचानक मेरे मन में आया कि

34:47क्यों नहीं यहां एक हाथियों वाला मंदिर

34:50बने और उसी कल्पना के अनुसार यहां पर गज

34:53मंदिर का निर्माण हुआ जो अपने आप में

34:56अद्भुत और अनूठा है।

34:59विपरीत परिस्थितियों में कैसे जीना?

35:04विपरीत परिस्थितियों में जीना यही तो सबसे

35:07बड़ी साधना है। और मूल बात यह है कि हमारे

35:11अंतर में धीरज हो। थोड़ी देर के लिए हम

35:13विचार करें कि परिस्थितियों का हम सामना

35:16कैसे करें? परिस्थितियों को हम अनुकूल

35:18कैसे बनाएं? थोड़ी सी अगर धीरज अपने अंतर

35:21में रखेंगे, गहरा चिंतन रखेंगे तो निश्चित

35:24रूप से विपरीत परिस्थितियां भी हमारे लिए

35:27अनुकूल बन जाएगी। और मूल बात यह है कि

35:29हमें अपने अंतर में समता रखनी है। धीरज

35:32रखनी है। धीर धीरज और समता से सारी विपरीत

35:36परिस्थितियां हमारे लिए अनुकूल बन सकती

35:39है।

35:42व्यस्तता भरी जिंदगी में भी शान और

35:44प्रसन्न कैसे रह पाते हैं?

35:51स्टार्ट

35:55व्यस्तता बाहर की तो जिंदगी में स्वाभाविक

35:58रूप से रहती है। लेकिन सबसे पहले हमारे

36:01अंतर में एक आत्म रस चाहिए। आत्म रुचि

36:03चाहिए। वह आत्मरुचि ही हमारे अंतर को

36:06प्रसन्न बनाती है और मैं जैसे अपने आप को

36:10सोचता हूं कि बाह्य समस्त परिस्थितियों से

36:12मैं अपने आप में अलग हूं और मुझे अपना

36:15देखना है। अपनी आत्मा का देखना है और मेरा

36:17हित किस में है? मेरा लाभ किस में है? तो

36:20अपने प्रसन्नता में रहने में, प्रसन्न

36:23रहने में, शांत रहने में। क्योंकि वही

36:26मेरा मूल स्वभाव है। मैं अपने स्वभाव का

36:28चिंतन करता हूं तो स्वाभाविक रूप से

36:31प्रसन्न रह पाता हूं और शांत रह पाता हूं।

36:34इसको चेंज करेंगे।

36:37गज मंदिर के वर्तमान स्वरूप में पूरे

36:40ट्रस्ट मंडल का जबरदस्त योगदान रहा है और

36:43इसके साथसाथ बाबूलाल जी बोहरा का खूब

36:46योगदान रहा है। विशेष रूप से गजेंद्र जी

36:49पंसाली का पूर्ण योगदान इसके निर्माण में

36:53रहा है।

36:55गज मंदिर के वर्तमान निर्माण में संपूर्ण

36:58ट्रस्ट मंडल का योगदान रहा है। श्रीमान

37:02अध्यक्ष बाबूलाल जी बोरा साहब उनका खूब

37:04योगदान रहा है। विशेष रूप से गजेंद्र जी

37:08बंसाली का पूर्ण समर्पण भावों से जो

37:10योगदान रहा है और उसी के फल स्वरूप गज

37:14मंदिर दिन दुनी रात चौगुनी प्रगति कर रहा

37:18है।

37:23व्यस्तता भरी जिंदगी में आप शांत और

37:26प्रसन्न कैसे रह पाते हैं?

37:30कितनी ही व्यस्त जिंदगी हो हमें जब अपने

37:33स्वभाव का स्मरण हो आता है। अपने उद्देश्य

37:36का भी स्मरण रहता है तब हम शांत और

37:39प्रसन्न रह पाते हैं। क्योंकि दीक्षित

37:42जीवन का उद्देश्य क्या है? दीक्षा हमने

37:45क्यों ली है? अपनी आत्मा के लिए ली है।

37:47आत्मा का कल्याण करने के लिए ली है। और

37:50आत्मा का कल्याण परम शांति में है। परम

37:53प्रसन्नता में है। इसलिए जब जब मुझे अपने

37:55उद्देश्य का स्मरण आता है, अपने स्वभाव का

37:58स्मरण आता है, तो मन परम शांति का अनुभव

38:01करता है। बाहर भले कितनी भी आपाधापी क्यों

38:04ना हो, बाहर भले कितनी भी प्रतिकूलता

38:06क्यों ना हो, बाहर कितनी भी व्यस्तता

38:09क्यों ना हो, मैं अपने में, अपनी चेतना

38:11में, अपनी आत्मा में मस्त रहता हूं और

38:15प्रसन्न रहता हूं। और सच तो यह है कि हर

38:18व्यक्ति अपने जीवन में कितनी भी व्यस्तता

38:21कितनी भी प्रतिकूलता हो तब भी अपने जीवन

38:24में परम शांति और परम समाधि परम प्रसन्नता

38:27का अनुभव कर सकता है। बस जरूरत है अपनी

38:30आत्मा के स्वभाव को जानने की और अपनी

38:33आत्मा में रमणता का आनंद प्राप्त करने की।

38:41किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

38:46परिवार में देखो तीन तरह की पीढ़ियां जीती

38:49है। बचपन भी, युवा अवस्था भी और वृद्ध

38:52अवस्था भी। तीनों पीढ़ियां हैं। उनके

38:55अलग-अलग सपने हैं। अपना अपना जीवन जीने का

38:59तरीका है। ऐसी स्थिति में समन्वय कैसे हो

39:02और एकता कैसे हो? और इसके लिए केवल एक ही

39:06काम करना होता है। परिवार के सारे सदस्य

39:08अगर सहनशील बनते हैं, थोड़ी सहनशीलता अपने

39:12अंतर में धारण करनी पड़ती है। सहन करना

39:14होता है। कभी-कभी अपनी बात मनवानी होती है

39:18तो कभी-कभी दूसरों की प्रसन्नता के लिए

39:21अपनी बात का त्याग भी करना होता है। जहां

39:24ऐसी दशा हो, जहां सहनशीलता हो, जहां त्याग

39:27हो, जहां प्रेम हो, जहां समर्पण हो, वहीं

39:30पर पारिवारिक एकता बनी रह सकती है। और

39:33पारिवारिक एकता ही जिंदगी की प्रसन्नता का

39:36और जिंदगी की सार्थकता का आधार बनता है।

39:42पारिवारिक एकता के लिए जरूरी है परस्पर

39:44संवाद। कम से कम 15 दिनों में एक बार पूरा

39:49परिवार एक साथ बैठे और बैठकर परस्पर संवाद

39:52करें। एक दूसरे के मन को समझने का, मन को

39:55खोलने का प्रयास करें। तो संवाद जितना

39:58गहरा होगा परिवार में उतना ही प्रेम, उतनी

40:01ही शांति, उतना ही समन्वय और उतनी ही एकता

40:04और ज्यादा बढ़ेगी और निश्चित रूप से

40:07परिवार में खुशियों का वातावरण बनेगा।

40:11गुरुदेव स्ट्रेस से कैसे मुक्ति?

40:16आजकल लोग तनाव में जी रहे हैं और

40:19छोटी-छोटी बातों में वे तनाव ग्रस्त हो

40:22जाते हैं और सत्य ये है कि छोटी-छोटी

40:25बातों को उतना महत्व नहीं दिया जाना चाहिए

40:28और तनाव के कारणों की खोज करनी चाहिए। अगर

40:31गहराई से बैठकर शांति से बैठकर तनाव के

40:34कारणों को खोजेगा और उन कारणों को दूर

40:37करने का प्रयास करेगा तो निश्चित रूप से

40:40तनाव हमारे अंतर से दूर होंगे। तनाव दूर

40:43करने का उपाय है थोड़ी देर शांति के साथ

40:46में बैठना, अच्छी तरह से सोचना, अच्छी तरह

40:48से समझना और तनाव के कारणों को दूर करना।

40:52समता से ही हम अपने तनावों को दूर कर सकते

40:55हैं।

40:59क्या धर्म सिर्फ ऊर्जा प्रत्येक प्रव में

41:02ही है?

41:04धर्म तो आत्मा का स्वभाव है। परमात्मा

41:07महावीर ने आगम में लिखा है वु सहाो धो

41:11वस्तु का अपना जो स्वभाव है वही उसका धर्म

41:15है। तो आत्मा का जो मूल स्वभाव है वही

41:17धर्म है। उस धर्म को प्राप्त करने के लिए

41:20आत्मा के मूल स्वभाव को प्राप्त करने के

41:22लिए जो क्रिया की जाती है वह धर्म क्रिया

41:26है। वो चाहे पूजा हो, चाहे सामयिक हो,

41:28चाहे प्रतिक्रमण हो। लेकिन जब ये भावों से

41:31किए जाते हैं तो यह धर्म बन जाता है। मगर

41:33यही धर्म नहीं है। परोपकार धर्म है। समता

41:37धर्म है। अपने अंतर में डूबना ये धर्म है।

41:40ध्यान करना धर्म है। अपने भीतर में आत्म

41:43गुणों को प्राप्त करने का पुरुषार्थ करना

41:46वही धर्म कहलाता है। और ये जो धर्म

41:49क्रियाएं हैं वो अपने आत्म धर्म को प्रकट

41:52करने में निमित्त बनती है। इसलिए इनको

41:54धर्म की आराधना का निमित्त कहा है।

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