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0:00वेलकम टू हिडन जीनियस। साल था 1804, वेल्स
0:03के एक छोटे से इलाके में लोहा ढालने वाली
0:06फैक्ट्री के बाहर सैकड़ों लोग जमा थे।
0:08सबकी नजरें एक अजीब सी मशीन पर थी जो लोहे
0:11की पतली-पतली पटरियों पर खड़ी थी। लोग
0:13सोचते थे कि कोई घोड़ा ही बोझ खींच
0:15[संगीत] सकता है। लेकिन उस दिन वहां कोई
0:17घोड़ा नहीं था। उस दिन वहां एक ऐसी चीज
0:19खड़ी थी जो पहली बार दुनिया को दिखाने
0:21वाली थी कि भाप भी घोड़ा बन सकती है।
0:24कहानी का अंजाम क्या होगा कोई नहीं जानता
0:26था। एक शर्त लगी हुई थी। पैसे दांव पर थे।
0:29इज्जत दांव पर थी और सबसे बड़ी बात यह थी
0:31कि अगर यह मशीन चल गई तो दुनिया हमेशा के
0:34लिए बदल जाने वाली थी। इस कहानी को समझने
0:36से पहले जरूरी है कि हम थोड़ा पीछे चलें।
0:39उस जमाने में रेल जैसी कोई चीज मौजूद नहीं
0:41थी जैसी आज हम जानते हैं। कोल और मिट्टी
0:44ढोने के लिए लकड़ी की पटरियां बिछाई जाती
0:47थी। जिन पर घोड़े गाड़ी खींचते थे। एक
0:49घोड़ा डर्ट रोड पर जितना वजन खींच सकता
0:51था, उससे चार गुना ज्यादा वजन वही घोड़ा
0:54लोहे की पतली पटरियों पर खींच सकता था।
0:561767 में कोल ब्रुक डेल नाम की फैक्ट्री
0:59ने लोहे की पटरियां बनानी शुरू की जो
1:02लकड़ी से ज्यादा मजबूत थी। लेकिन सब
1:04[संगीत] कुछ फिर भी घोड़े के सहारे ही चल
1:06रहा था। उस वक्त दुनिया में न्यूकोमेन और
1:08जेम्स वॉट के स्टीम इंजंस मौजूद थे जो
1:11माइन से पानी निकालने के लिए बड़े कमाल का
1:13काम करते थे। लेकिन ये इंज इतने भारी और
1:16इतने बड़े थे कि इन्हें किसी गाड़ी पर
1:18लगाना नामुमकिन था। वॉट के इंजन में एक
1:20बड़ा कंडेंसर होता था जो पूरी मशीन का वजन
1:23कई टन तक बढ़ा देता था। सवाल यह था कि कोई
1:26ऐसा इंजन क्यों नहीं बनता जो छोटा भी हो
1:29और ताकतवर भी हो। यह सवाल सालों तक जवाब
1:31तलाश करता रहा और आखिरकार इसका जवाब एक
1:34ऐसे आदमी ने दिया जिसे दुनिया ने शुरू में
1:36ज्यादा संजीदगी से नहीं लिया। इस आदमी का
1:38नाम रिचर्ड ट्रेवथिक था। वो 1771 में
1:41कॉर्नवॉल में पैदा हुआ जहां उसका फादर
1:43माइंस में काम करता था। बचपन से ही
1:45ट्रेवथिक स्टीम इंजंस के इर्द-गिर्द घूमता
1:48रहा और उनको काम करते देखता रहा। कॉर्नवॉल
1:50में कोयला नहीं मिलता था। इसलिए माइन
1:52वालों को बाहर से महंगा कोयला मंगवाना
1:55पड़ता था और वॉट के इंजंस चलाने का खर्चा
1:57बहुत ज्यादा होता था। ट्रेवथिक [संगीत] के
1:59ज़हन में यही सवाल घूमता रीच था कि अगर
2:01इंजन को छोटा और हल्का बनाया जाए तो क्या
2:04वह फिर भी उतनी ही ताकत दे सकता है जितनी
2:07बड़ी मशीन देती है। उसने सोचा कि अगर भाप
2:09को ज्यादा प्रेशर पर रखा जाए तो बोईलर
2:12छोटा हो सकता है और भारी कंडेंसर की जरूरत
2:14ही खत्म हो जाएगी। यह आईडिया उस वक्त बहुत
2:17खतरनाक समझा जाता था क्योंकि हाई प्रेशर
2:19बोईलर कभी भी फट सकता था। वोट और उसके
2:22साथी बोल्टन इस आईडिया के सख्त खिलाफ थे
2:24और उन्होंने 1800 में ट्रेवथिक के खिलाफ
2:27एक लीगल इंजंक्शन भी ले लिया। लेकिन
2:29ट्रेवथिक नहीं रुका। उसने अपने तरीके से
2:31काम करना शुरू किया और आखिरकार ऐसा हाई
2:33प्रेशर बॉईलर बना लिया जो पुराने इंजन से
2:36कहीं ज्यादा प्रेशर बर्दाश्त कर सकता था।
2:381801 की क्रिसमस ईव को ट्रेवथिक ने अपनी
2:41पहली मशीन सड़क पर उतारी। उसका नाम था
2:43पफिंग डेविल। यह एक चार पहियों वाली गाड़ी
2:46थी जिसमें एक छोटा बॉईलर और एक लंबा चिमनी
2:49लगा हुआ था। उस दिन यह गाड़ी सात आदमियों
2:51को लेकर एक ऊंचा पहाड़ चढ़ी। यह पहली बार
2:54था जब भाप से कोई गाड़ी इंसानों को लेकर
2:56चली। [संगीत] लोग खुश थे, लेकिन खुशी
2:58ज्यादा देर ना चली। रास्ते में आग बुझ गई
3:01और लोगों को धक्का लगाकर गाड़ी को आगे
3:03बढ़ाना पड़ा। कुछ दिन बाद वह गाड़ी जलकर
3:05खत्म हो गई। लेकिन एक बात साबित हो चुकी
3:07थी। भाप से चलने वाली गाड़ी मुमकिन थी।
3:101802 में ट्रेवथिक अपने कजिन एंड्र्यू
3:13विवियन के साथ लंदन गया और वहां उन्होंने
3:15अपनी डिज़ पेटेंट करवा ली। इसी [संगीत] साल
3:18कोल ब्रुकडेल नाम की जगह पर एक लोकोमोटिव
3:20बनाया गया जो लोहे की वैगंस खींचने के लिए
3:23था। लेकिन इस बात का कोई पुख्ता सबूत नहीं
3:25मिलता कि वो कभी चला भी या नहीं। सिर्फ एक
3:27तस्वीर और एक खत इस मशीन के सबसे बड़े
3:30सबूत हैं। 1803 में ट्रेवथिक ने लंदन में
3:33भी एक स्टीम कैरस चलाई जो मेल और मुसाफिर
3:36दोनों लेकर चलती थी। लेकिन वह भी जल्दी ही
3:38खराब हो गई। हर बार वही कहानी दोहराई जा
3:40रही थी। मशीन काम करती थी लेकिन उसको
3:43संभालना मुश्किल था। अब क्रेविथिक के ज़हन
3:45में एक नया आईडिया आ चुका था। अगर सड़क की
3:47जगह लोहे की पटरियों पर यह मशीन चलाई जाए
3:50तो शायद ज्यादा वजन आसानी से खींच सकेगी।
3:52यह आईडिया उसे पेनीड्रिन आयरन वक्स तक ले
3:55गया। जहां सैमुअल होमफ्रे नाम का आदमी
3:57लोहा बनाने का काम करता था। होमफ्रे का एक
4:00दोस्त था जिसका नाम रिचर्ड क्रॉश था और
4:02दोनों के दरमियान अक्सर बहस होती रहती थी
4:04कि घोड़े से बेहतर कोई तरीका मिल सकता है
4:07या नहीं। आखिरकार दोनों के दरमियान 500
4:09गिनी की शर्त लग गई। शर्त यह थी कि अगर
4:12ट्रेविथिक की मशीन लोहा लेकर मरथे ट्रम
4:14रोड पर नहर तक पहुंच गई तो होमफ्रे जीत
4:17जाएगा। ट्रेविथिक ने अपनी सारी मेहनत इस
4:19एक मशीन में लगा दी। बोईलर बिल्कुल
4:21सिलेंडर जैसा था और उसके साथ एक बड़ा
4:23फ्लाई व्हील लगा हुआ था जो मशीन की हरकत
4:25को स्मूथ बनाता था। पिस्टन की ताकत गिय्स
4:28के जरिए पहियों तक पहुंचती थी। सबसे खास
4:30बात यह थी कि बोईलर की एग्जॉस्ट स्टीम
4:33सीधा चिमनी के अंदर भेजी जाती थी जिससे आग
4:35तेज जलती थी और पूरी मशीन की ताकत बढ़
4:38जाती थी। यह तरीका बाद में दुनिया भर के
4:40स्टीम लोकोमोटिव्स में इस्तेमाल होने लगा
4:42और आज तक इसे ब्लास्ट पाइप के नाम से जाना
4:44जाता है। मशीन का वजन तकरीबन 5 टन था जो
4:47उस जमाने की पटरियों के लिए काफी ज्यादा
4:49था। लेकिन अभी किसी को इस बात का अंदाजा
4:51नहीं था। 21 फरवरी 1804 को वो दिन आ गया
4:55जिसका इंतजार सब कर रहे थे। मशीन के साथ
4:57पांच वैगंस लगाए गए जिनमें 10 टन लोहा और
5:00तकरीबन 70 मजदूर सवार थे। सफर शुरू हुआ।
5:03रेलवे की पटरियां पहले से बिछी हुई थी।
5:05लेकिन कई जगहों पर ट्रैक की हालत खराब थी
5:08और रास्ते में रुकावटें भी थी। इसलिए
5:10ट्रेवथिक और उसके साथियों को दरख्त और
5:12पत्थर हटाकर रास्ता क्लियर करना पड़ा।
5:14पूरा सफर तकरीबन 15.7 कि.मी. का था और
5:17मशीन ने इसे 4 घंटे 5 मिनट में पूरा किया।
5:20हैरानी की बात यह थी कि पूरे सफर में
5:22सिर्फ तकरीबन 100 कि.ग्र. कोयला इस्तेमाल
5:25हुआ और बोईलर में एक बार भी दोबारा पानी
5:27नहीं डाला गया। यह खबर आग की तरह फैल गई।
5:29लोकल अखबार कैंब्रियन ने भी इस ट्रायल की
5:32तारीफ की और होमफ्रे ने खुश होकर कहा कि
5:34यह मशीन बिल्कुल घोड़े की तरह आसानी से चल
5:37रही है। ट्रेवथिक ने अपने दोस्त डेविस
5:39गिडी को खत लिखा और बताया कि अगली बार वह
5:4140 टन भी ले जाने के लिए तैयार है। लग रहा
5:44था कि ट्रेविथिक ने वह कारनामा कर दिखाया
5:46जो सालों से एक ख्वाब था लेकिन जश्न
5:48ज्यादा देर तक नहीं चला। वापस आते हुए
5:50रास्ते में एक छोटी सी [संगीत] बोल्ट टूट
5:52गई और बोईलर का पानी बाहर निकल गया। यह
5:54बोल्ट इतनी छोटी थी कि उसकी कीमत बस आठ
5:57पेंस [संगीत] थी। लेकिन उसी एक छोटी सी
5:59चीज ने पूरी मशीन को रोक दिया। होमफ्रे को
6:01मजबूर होकर घोड़े बुलाने पड़े ताकि खाली
6:04वैगंस वापस लाए जा सकें। यह सिर्फ शुरुआत
6:06थी असल मसले की। जब मशीन दोबारा उस रास्ते
6:09पर चली तो लोगों ने देखा कि बहुत सी
6:11पटरियां टूट रही हैं और उनके कनेक्टिंग
6:13प्लेट्स भी खराब हो रहे हैं। पूरा ट्रम
6:15रोड छोटे-छोटे लोहे के प्लेट से बना हुआ
6:17था जो हल्की घोड़े की गाड़ियों के लिए ठीक
6:19थे। लेकिन 5 टन वजन वाली मशीन के लिए
6:22बिल्कुल कमजोर साबित हुए। यहां पर एक
6:24दिलचस्प मोड़ आता है। ट्रेवथिक की मशीन ने
6:26अपना काम कर दिखाया था। वह चल चुकी थी।
6:28उसने बोझ खींच लिया था। लेकिन दुनिया जिसे
6:30इस कहानी की असली फेल समझती है, वह दरअसल
6:33मशीन की फेल नहीं थी बल्कि उस जमाने की
6:35पटरियों की कमजोरी थी। होमफ्रे और बाकी
6:38लोगों ने फैसला किया कि अब इस ट्रम रोड पर
6:40स्टीम मशीन का इस्तेमाल बंद कर दिया जाए
6:42और दोबारा घोड़े ही इस्तेमाल किए जाए।
6:44ट्रेविथिक की मशीन को रेल से उतार कर एक
6:46स्टेशनरी इंजन की तरह पंप चलाने और लकड़ी
6:49काटने के काम में लगा दिया गया। इस नाकामी
6:51के बावजूद ट्रेवथिक ने हार नहीं मानी।
6:531805 में उसने वाइलम कोलेरी के लिए एक नया
6:56लोकोमोटिव बनाया जिसमें पहली बार फ्लेंज्ड
6:59पहिए लगाए गए थे। लेकिन वहां की लकड़ी की
7:01पटरियां इतनी कमजोर थी कि यह मशीन कभी ठीक
7:03से चल ही नहीं सकी। 1808 में ट्रेवथिक ने
7:06अपनी आखिरी कोशिश की। उसने लंदन के यूस्टन
7:09रोड के करीब एक गोल्ड ट्रैक बनाया और उस
7:11पर एक नया लोकोमोटिव चलाया जिसका नाम था
7:14कैच मीहू कैन। लोग टिकट खरीद कर इस मशीन
7:16पर बैठ सकते थे और कुछ हफ्तों तक यह मशीन
7:19तकरीबन 12 मील प्रति घंटा की रफ्तार से
7:21चलती रही। लेकिन ट्रैक की कमजोरी और कम
7:23आमदनी की वजह से यह प्रोजेक्ट भी बंद हो
7:26गया। इसी के साथ ट्रेविथिक ने हमेशा के
7:28लिए लोकोमोटिव बनाना छोड़ दिया। अब सवाल
7:30यह उठता है कि अगर ट्रेविथिक की मशीन
7:32नाकाम हो गई तो फिर उसे इतना अहम क्यों
7:34माना जाता है? इसका जवाब बहुत सिंपल है।
7:37ट्रेविथिक ने वो सवाल हल किया जो सालों से
7:39कोई हल नहीं कर पा रहा था। उसने साबित
7:41किया कि भाप की ताकत से चलने वाली मशीन
7:44रेल पर बोझ खींच सकती है। यह आईडिया इतना
7:47पावरफुल था कि आने वाले इंजीनियर्स ने इसी
7:49बुनियाद पर अपनी मशीनंस बनाई। ट्रेवथिक की
7:52जिंदगी खुशियों भरी नहीं रही। वह बाद में
7:54साउथ अमेरिका चला गया और वहां भी नए
7:56प्रोजेक्ट्स पर काम करता रहा। 1833 में वह
7:59बहुत गरीब हालत में दुनिया से चला गया। जब
8:01तक दुनिया ने उसकी असली अहमियत समझी तब तक
8:04बहुत देर हो चुकी थी। ट्रेवथिक के जाने के
8:06बाद कई इंजीनियर्स ने उसके आइडियाज पर काम
8:08किया। 1812 में जॉन ब्लैंकिसप ने सालमका
8:12नाम का लोकोमोटिव बनाया जो पहला कमर्शियली
8:14सक्सेसफुल लोकोमोटिव था। 1813 में विलियम
8:18हेडली ने पफिंग बिल्ली बनाया जो आज भी
8:20म्यूजियम में मौजूद है। यह दोनों मशीनंस
8:22ट्रेविथिक के उसूल पर ही चल रही थी। लेकिन
8:24उन्होंने बेहतर पटरिया और ज्यादा मजबूत
8:27डिजाइन इस्तेमाल किया। सबसे बड़ा नाम जो
8:29इस कहानी में आता है वो है जॉर्ज
8:31स्टीफनसन। स्टीफनसन भी एक माइनर के घर
8:33पैदा हुआ था और उसने समझा कि असली मसला
8:36इंजन नहीं बल्कि ट्रैक [संगीत] है। उसने
8:38मजबूत लोहे की पटरियां बनाई और बोईलर्स को
8:40बेहतर बनाया। 1825 में उसकी बनाई हुई
8:43स्टॉकटन एंड डार्लिंगटन रेलवे दुनिया की
8:46पहली पब्लिक स्टीम पैसेंजर रेलवे बन गई।
8:481829 में उसके बेटे रॉबर्ट स्टीफनसन का
8:51बनाया हुआ लोकोमोटिव रॉकेट रेनल ट्रायल्स
8:54में जीता और पूरी दुनिया में स्टीम इंजन
8:56की डिजाइन हमेशा के लिए बदल दी। यहां एक
8:58दिलचस्प बात समझना जरूरी है। रॉकेट ने कोई
9:01नया उसूल इजाद नहीं किया। उसमें वही
9:03ब्लास्ट पाइप और हाई प्रेशर स्टीम
9:05इस्तेमाल हुआ जो ट्रेविक ने 25 साल पहले
9:08पेनीडरन में बनाया था। था। ट्रेविटिक ने
9:10रास्ता दिखाया था और स्टीफनसन ने उस
9:12रास्ते पर इमारत खड़ी की। आज जब हम जापान
9:14की शिनकानसन ट्रेन को 300 किमी/ घंटा से
9:18गुजरते देखते हैं या जब हम किसी भी जगह
9:20रेल का सफर करते हैं तो हम शायद ही कभी
9:22सोचें कि इसकी शुरुआत कहां से हुई? लेकिन
9:24अगर हम पीछे मुड़कर देखें तो सब कुछ उस एक
9:27छोटी सी मशीन से शुरू होता है जो 1804 में
9:30वेल्स की टूटी हुई पटरियों पर खड़ी थी।
9:32उसी मशीन ने पहली बार दुनिया को दिखाया कि
9:35इंसान भाप की ताकत से जमीन पर भी उतनी ही
9:37तेजी से चल सकता है जितनी वह पानी में
9:40चलता था। लेकिन यह सिर्फ एक मशीन की कहानी
9:42नहीं थी [संगीत] जिसने दुनिया बदली। ऐसी
9:44ही एक और कहानी है जिसमें एक छोटा सा
9:46आईडिया आखिरकार पूरी इंसानी तारीख का रुख
9:49मोड़ देता है। अगर आप ऐसी ही छुपी हुई
9:51इन्वेंशंस और उनके पीछे छुपे हिडन जीनियस
9:54को डिस्कवर करना चाहते हैं तो हिडन जीनियस
9:56को सब्सक्राइब करें क्योंकि अगली कहानी
9:58शायद उस इन्वेंशन की हो जिसने आपकी दुनिया
10:00बदल दी।