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0:00सोचो अगर हर महीने की एक तारीख को [संगीत]
0:03तुम्हारे अकाउंट में ₹5 लाख आए और वह भी
0:07बिना किसी दुकान के बिना किसी कस्टमर को
0:10कॉल किए और बिना कोई ऐड चलाए। सुनने में
0:13यह किसी लॉटरी जैसा लगता है या फिर किसी
0:16स्कीम जैसा। लेकिन भाई [संगीत] यह ना
0:18लॉटरी है ना कोई स्कीम। यह एक बिजनेस मॉडल
0:22है और सबसे हैरानी [संगीत] की बात यह मॉडल
0:25तुम्हारे शहर में, तुम्हारी सोसाइटी के
0:27पास, तुम्हारे ऑफिस की बिल्डिंग में हर
0:29दिन काम कर रहा है। बस तुमने कभी उस पर
0:32ध्यान नहीं दिया क्योंकि यह इतना बोरिंग
0:34दिखता है कि दिमाग वहां [संगीत] रुकता ही
0:36नहीं। हर साल लाखों लोग इंडिया में अपना
0:39बिजनेस शुरू करते हैं। [संगीत] कोई कैफे
0:41खोलता है, कोई बुटीक, कोई जिम और कोई अपना
0:44खुद का ब्रांड बनाने निकल पड़ता है।
0:47शुरुआत हमेशा शानदार लगती है। Instagram
0:50पर फोटो, ओपनिंग डे की भीड़, [संगीत]
0:52दोस्तों की तारीफ। लेकिन 3 से 4 साल बाद
0:56कहानी बदल जाती है। या तो वह बिजनेस बंद
0:59हो चुका होता है या ओनर खुद सुबह से रात
1:02तक उसी दुकान में फंसा रहता है। बिजनेस
1:05उसके लिए फ्रीडम नहीं एक नई नौकरी बन जाता
1:08है। और इसी बीच कुछ ऐसे लोग भी होते हैं
1:12जिनके बिजनेस के बारे में शायद तुमने कभी
1:14सोचा भी ना हो। चलो तुम्हें ऐसे ही दो
1:16लोगों से मिलाता हूं। राघव और विवेक।
1:20दोनों ने एक ही साल शुरुआत की। दोनों के
1:22पास लगभग बराबर पैसा था। राघव ने एक
1:25ब्रांडेड फिटनेस स्टूडियो खोला। क्रोम
1:28इक्विपमेंट, एलईडी स्क्रीनंस, हर हफ्ते नई
1:31रील, पर्सनल ट्रेनर्स, शुरुआत में भीड़
1:34उमड़ी। तारीफ मिली। सबको लगा भाई ने कुछ
1:38बड़ा कर दिया। दूसरी तरफ विवेक ने कुछ ऐसा
1:42शुरू किया जिसे सुनकर लोग बोलते यह भी कोई
1:45बिजनेस है क्या? ना लॉन्च पार्टी, ना रील।
1:49बस कुछ गाड़ियां, कुछ ड्राइवर। और दो-तीन
1:52कंपनियों के साथ एक कॉन्ट्रैक्ट रोज सुबह
1:55एंप्लाइजस को ऑफिस छोड़ने का। 3 साल बाद
1:58क्या हुआ? राघव अब भी हर महीने नए मेंबर्स
2:02ढूंढ रहा था क्योंकि पुराने तीन-4 महीने
2:04में छोड़ देते थे और विवेक की गाड़ियां
2:07रोज अपने आप निकलती थी और महीने की एक
2:09तारीख को कंपनी का पैसा सीधे उसके अकाउंट
2:12में गिर जाता था। फर्क टैलेंट का नहीं था,
2:15मेहनत का भी नहीं था। फर्क सिर्फ इतना था
2:18राघव का बिजनेस उसकी रोज की मेहनत पर टिका
2:21था। [संगीत] जबकि विवेक का बिजनेस एक ऐसे
2:23सिस्टम पर टिका था जो बिना उसके भी चलता
2:26रहता। आज मैं तुम्हें ऐसे ही आठ हिडन
2:29बिजनेसेस दिखाऊंगा जो बाहर से राघव के जिम
2:32जितने ग्लैमरस नहीं लगते लेकिन अंदर से
2:34विवेक की गाड़ियों जितने मजबूत हैं। और
2:37आखिर में एक ऐसा प्रिंसिपल बताऊंगा जिससे
2:39[संगीत] तुम किसी भी बिजनेस को सिर्फ 30
2:41सेकंड में जज कर पाओगे। चलो शुरू करते
2:44हैं। [संगीत]
2:45नंबर नौ जनरेटर यानी डीजी सेट रेंटल और
2:49एएमसी बिजनेस। सुनकर हंसी आती है ना?
2:52[संगीत] भाई जनरेटर किराए पर देकर कोई
2:54अमीर बनता है क्या? लेकिन जरा सोचो किसी
2:57शादी में, किसी कंस्ट्रक्शन साइट पर या
3:00किसी फैक्ट्री में अचानक बिजली चली जाए तो
3:03उस वक्त जनरेटर मंगाना जरूरी नहीं मजबूरी
3:06बन जाता है। [संगीत] और मजबूरी में लोग
3:08प्राइस नहीं देखते। स्यूशन देखते हैं।
3:11इसीलिए ज्यादातर लोग जनरेटर खरीदते नहीं
3:14रेंट पर लेते हैं। क्योंकि इतना महंगा
3:16सामान साल में कुछ ही बार चाहिए होता है
3:19और असली कमाई सिर्फ रेंट से नहीं आती। हर
3:22मशीन को समय-समय पर सर्विसिंग चाहिए ही
3:24चाहिए। यही ईएमसी कॉन्ट्रैक्ट है जो
3:27बार-बार पैसा लाता रहता है। अब इसी सोच को
3:30थोड़ा आगे बढ़ाओ। अगर एक मशीन किराए पर
3:33देकर पैसा बन सकता है तो सोचो उस चीज का
3:36क्या जो रोज हजारों लोगों को चाहिए होती
3:39है यानी खाना। नंबर आठ इंस्टीट्यूशनल
3:42कैटरिंग यानी बड़े ऑफिसेस और कॉलेजों की
3:45कैंटीन कॉन्ट्रैक्ट बिजनेस। हर बड़े ऑफिस,
3:48हॉस्पिटल या कॉलेज में कैंटीन जरूर होती
3:50है। लेकिन उसे चलाने वाला ना कॉलेज का
3:52स्टाफ होता है ना ऑफिस का एंप्लई। यह किसी
3:55और कंपनी का कॉन्ट्रैक्ट होता है। दुनिया
3:57की सबसे बड़ी कैटरिंग कंपनियों में से एक
3:59SDxo यही मॉडल पूरी दुनिया में चलाती है।
4:02रोज हजारों प्लेट खाना लेकिन पेमेंट डेली
4:05कैश से नहीं मंथली बिलिंग से आती है। एक
4:08बार साल भर का कॉन्ट्रैक्ट साइन [संगीत]
4:09हो जाए तो रोज नया कस्टमर ढूंढने की टेंशन
4:12खत्म हो जाती है। और जहां रोज खाना
4:14पहुंचाने का सिस्टम है वहीं बगल में एक और
4:16सिस्टम भी छुपा है लोगों को खुद पहुंचाने
4:19का। नंबर सात एंप्लई और स्कूल ट्रांसपोर्ट
4:22कॉन्ट्रैक्ट बिजनेस। सुबह जो स्कूल बस
4:24बच्चों को लेने आती है या जो कैब किसी
4:27आईटी एंप्लई को ऑफिस छोड़ती है वो अक्सर
4:29स्कूल या कंपनी की अपनी गाड़ी नहीं होती।
4:32यह कॉन्ट्रैक्टर की होती है जिसने सालाना
4:34डील साइन की है। [संगीत] इस बिजनेस की
4:36सबसे बड़ी ताकत डिमांड का प्रेडिक्टेबल
4:39होना है। रोज वही रूट, वही टाइमिंग, वही
4:42बच्चे, वही [संगीत] एंप्लाइजज़। एक बार
4:45चार-प स्कूल या दो-तीन कंपनियों से टाई अप
4:47हो जाए तो गाड़ियां रोज अपने आप निकलती
4:50हैं। बिल्कुल विवेक वाली कहानी की तरह।
4:52[संगीत] अब तक हमने जो तीन बिजनेस देखे उन
4:55सब में एक चीज चुपके से कॉमन थी। कस्टमर
4:58के पास चॉइस नहीं थी, जरूरत थी। अगली
5:01बिजनेस में यह चीज और भी साफ दिखेगी। नंबर
5:04छह फायर सेफ्टी इक्विपमेंट और उसकी
5:07कंप्लायंस एएमसी। यह बिजनेस डर पर नहीं
5:10कानून पर टिका है। हर ऑफिस, मॉल, हॉस्पिटल
5:14और फैक्ट्री के लिए फायर एक्सटिंग्विशर
5:16लगाना और उनकी नियमित जांच कराना कानूनन
5:19जरूरी है। मतलब कस्टमर को जरूरत महसूस हो
5:22या ना हो वो सर्विस लेने को मजबूर है।
5:24क्योंकि कंप्लायंस ना हुई तो बिजनेस बंद
5:27हो सकता है। हर 6 महीने या साल में
5:30इंस्पेक्शन [संगीत] और रिफिल का
5:31कॉन्ट्रैक्ट रिन्यू होता है। जिस डिमांड
5:33को कानून चलाता है वो डिमांड कभी रुकती
5:36नहीं। अब तक जो चार बिजनेस देखे उनमें कोई
5:38सर्विस [संगीत] थी, कोई मशीन थी, कोई
5:40कॉन्ट्रैक्ट था। लेकिन अब जो चार बचे हैं
5:43वह सीधे तुम्हारी और मेरी रोज की जिंदगी
5:45से जुड़े हैं। नंबर पांच वाइट लेबल एटीएम
5:48फ्रेंचाइजी बिजनेस। 2012 में आरबीआई ने एक
5:52नया नियम बनाया। बैंकों के अलावा कुछ चुनी
5:55हुई गैर बैंकिंग कंपनियां भी अपने एटीएम
5:57लगा सकती हैं। जिन्हें वाइट लेबल एटीएम
6:00कहा जाता है। वक्रांगी जैसी कंपनी ने इसी
6:02नियम पर हजारों एटीएम छोटे शहरों और गांव
6:05में लगाए। जहां बैंकों का पहुंचना मुश्किल
6:07था। हर ट्रांजैक्शन पर एक छोटा सा कमीशन
6:10मिलता है और रोज लाखों लोग पैसा निकालते
6:12हैं। यहां भी वही नियम लागू होता है। मशीन
6:15नहीं सही लोकेशन गेम बदलती है। जो मशीन एक
6:19जगह टिक कर पैसा देती है [संगीत] वैसे ही
6:21एक और चीज है जो एक जगह टिक कर सिर्फ
6:23ध्यान बेचती है। तुम्हारा ध्यान। नंबर
6:26[संगीत] चार लिफ्ट और लॉबी डिजिटल ऐड
6:29स्क्रीन्स बिजनेस। अगली बार किसी बड़ी
6:31सोसाइटी या ऑफिस की लिफ्ट में जाना जरा
6:34ध्यान से देखना। एक छोटी सी डिजिटल
6:36स्क्रीन लगी होती है जिस पर एड्स चलते
6:38रहते हैं। यह स्क्रीन ना सोसाइटी की होती
6:40है ना किसी ब्रांड की। यह एक अलग कंपनी की
6:43होती है जो उस जगह से रोज गुजरने वाली
6:46हजारों आंखों को ब्रांड्स के हाथ बेचती
6:48है। एक बार स्क्रीन लग गई तो बस ऐड
6:50कॉन्ट्रैक्ट्स रिन्यू होते रहते हैं। बाकी
6:52काम अपने आप चलता रहता है। अब एक कदम पीछे
6:55हटो। शहर में जगह की कमी सिर्फ एड्स के
6:58लिए नहीं है। हमारे घरों में भी जगह की
7:00कमी है। [संगीत] नंबर तीन, सेल्फ स्टोरेज
7:03यानी लॉकर और स्टोरेज स्पेस रेंटल बिजनेस।
7:06शहरों में घर छोटे होते जा रहे हैं लेकिन
7:08सामान कम नहीं हो रहा। पुराना फर्नीचर,
7:11सीजन के कपड़े, बिजनेस का एक्स्ट्रा
7:13स्टॉक। इन्हें रखने की जगह चाहिए होती है।
7:16यहीं सेल्फ स्टोरेज बिजनेस काम करता है।
7:19एक बड़ा गोदाम लो। उसे छोटे-छोटे लॉकर्स
7:22में बांटो और महीने के हिसाब से किराए पर
7:24दो। ना रोज की झंझट, ना बड़ी टीम की
7:27जरूरत, बस स्पेस बना दो और [संगीत] लोग
7:29खुद पैसे देकर अपना सामान वहां रखने आ
7:31जाते हैं। नंबर दो कॉर्पोरेट यूनिफार्म और
7:35वर्कवेयर रेंटल बिजनेस। [संगीत]
7:37हर बड़े होटल, हॉस्पिटल, फैक्ट्री और
7:40सिक्योरिटी एजेंसी के स्टाफ को रोज साफ
7:42यूनिफार्म चाहिए होती है। बहुत सी
7:45कंपनियां अब यूनिफार्म खरीदती नहीं, रेंट
7:47पर लेती हैं। साथ में धुलाई और मेंटेनेंस
7:50भी शामिल [संगीत] होती है। कंपनी को ना
7:52खरीदने की झंझट, ना धोने का टेंशन। बस हर
7:55महीने एक फिक्स्ड बिल आता है। यह बिजनेस
7:58दिखने में सबसे बोरिंग है। लेकिन एक बार
8:0010-15 कंपनियों से कॉन्ट्रैक्ट हो जाए तो
8:03अगले महीने का रेवेन्यू पहले से तय है। उस
8:06महीने के शुरू होने से पहले ही। और अब आते
8:09हैं नंबर एक पर। लेकिन नंबर एक कोई बिजनेस
8:12नहीं है। वो एक अकेला नियम है जिसने इन
8:15आठों को करोड़ों का धंधा बना दिया।
8:17डीजे रेंटल हो, कैटरिंग हो, ट्रांसपोर्ट
8:20हो, फायर सेफ्टी हो, एटीएम हो, ऐड
8:24स्क्रीनंस हो, स्टोरेज हो या यूनिफार्म
8:26रेंटल। इन सब [संगीत] में एक ही चीज
8:28बार-बार दोहराई गई। कस्टमर एक बार पैसा
8:31नहीं देता, बार-बार देता है। यही है वो
8:34हिडन प्रिंसिपल, [संगीत] रेकरिंग
8:35रेवेन्यू। यही वो चीज थी जिसने विवेक की
8:38गाड़ियों को हर महीने पैसा दिया। जबकि
8:40राघव अपने जिम में रोज नए मेंबर्स के पीछे
8:42भागता रह गया। ज्यादातर लोग बिजनेस चुनते
8:45वक्त पूछते हैं प्रॉफिट [संगीत] कितना है?
8:48लेकिन जो लोग सच में पैसा बनाते हैं, वह
8:49एक अलग सवाल पूछते हैं। यह प्रॉफिट कितनी
8:52बार रिपीट होगा? यही एक सवाल तुम्हें भीड़
8:55से अलग कर देता है। तो, अगली बार जब भी
8:58कोई बिजनेस आईडिया दिमाग में आए, बस एक
9:00चीज चेक करना। [संगीत] क्या यह मुझे एक
9:03बार पैसा देगा या हर महीने की एक तारीख