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0:00लगभग 1400 ईसवी की बात है। मरुभूमि जिसे
0:03तात्कालिक राजपूताना और वर्तमान में
0:05राजस्थान के नाम से जाना जाता है। बारिश
0:07की [संगीत] बूंदों ने भी यहां की मिट्टी
0:09को इतना नहीं सींचा होगा जितनी कि इस भूमि
0:11पर जन्मे शूरवीों ने अपने रक्त से इस पावन
0:14धरा की प्यास बुझाई है। इसी मरुभूमि में
0:16स्थित जैसलमेर की तपती रेत पर एक खुशहाल
0:18नगर बसा था। पोकरण इसी पोकरण में तमवर वंश
0:21के राजा ठाकुर अजमल जी का राज था। अजमल जी
0:24का पहला विवाह जैसलमेर के बुद्ध भाटी
0:26गोत्र [संगीत] के श्रवण सिंह जी की पोत्री
0:28तथा फामाजी री लाडली पुत्री मैनादे कंवर
0:31से [संगीत] हुआ। अजमल जी अपनी रानी मैनादे
0:33से अत्यधिक प्रेम करते थे। किंतु विवाह
0:35उपरांत कुछ वर्ष बीत जाने के बावजूद भी
0:37उन्हें संतान का सुख ना प्राप्त हो सका।
0:39जिसके बाद घर के बड़े बुजुर्गों द्वारा
0:41दबाव डालने पर उन्हें मजबूरन दूसरा विवाह
0:43करना पड़ा। ठाकुर अजमल जी का दूसरा विवाह
0:46जामनगर के जड़ेचा गोत्र के जामाजीरी लाडली
0:49जीवन दे कंवर से हुआ। किंतु भाग्य तो
0:51ठाकुर अजमल जी से रूठा था। माता मैणादे और
0:53माताजी वंदे का इसमें क्या दोष? समुद्र के
0:56समान पड़ी विशाल रेतीली भूमि किसी ऊंचे
0:58स्थान पर खड़े होकर देखें तो जहां तक नजर
1:01जाती थी पूरी धरती अजमल जी की थी। हजारों
1:03घोड़े और ऊंट, अपार, धन दौलत सब कुछ था
1:06उनके पास। परंतु उनके मन के किसी कोने में
1:09पुत्र प्राप्ति की एक ऐसी कसर थी जो हर
1:11सुख सुविधा के बीच उन्हें अपूर्ण बना देती
1:13थी। संतान की चाह किसको नहीं होती। अजमल
1:16जी बहुत ही दयालु, नेक और प्रजा से प्रेम
1:19करने वाले राजा थे। अक्सर मंदिरों में
1:21माथा टेकते, साधु संतों से आशीर्वाद लेते,
1:24यज्ञ हवन करवाते। [संगीत] किंतु इस दान
1:25धर्म का कोई लाभ नहीं हुआ। वर्षों बीत गए।
1:28परंतु ईश्वर ने अजमल जी को संतान का सुख
1:30नहीं दिया। संतान का सुख ना होना कहीं ना
1:32कहीं ठाकुर अजमल जी को खलता जरूर था। इतने
1:35वर्ष बीत जाने के बाद अब तो उन्होंने
1:37पुत्र प्राप्ति की। जो उम्मीद थी, वह
1:38[संगीत] भी त्याग दी। वह अपनी रानियों से
1:40अक्सर कहा करते कि कौन कहता है? मैंने
1:42संतान हूं। यह संपूर्ण प्रजा मेरी ही
1:44संतान है और ऐसा सिर्फ वह कहते [संगीत]
1:46नहीं थे। अजमल जी वास्तव में अपनी प्रजा
1:48से बहुत प्रेम करते थे। इसी समय अचानक से
1:50पोकरण क्षेत्र के लोगों में भय का माहौल
1:52बनने लगा। जिसका कारण था राक्षस भैरव भैरव
1:55राक्षस बेहद ही मायावी और खूंखार था। वह
1:57मानव पशु पक्षी और किसी भी जीवित प्राणी
2:00की गंध सूंघ उसका भक्षण कर जाता था। दूसरी
2:02तरफ पोकरण में अकाल पड़ गया [संगीत] और
2:04पोकरण की सारी जमीन बंजर हो गई। लेकिन कुछ
2:07ही दिनों बाद द्वारकाना की ऐसी लीला हुई
2:09कि पूरे पोकरण में मूसलाधार वर्षा होने
2:11लगी। कई वर्षों बाद ऐसी वर्षा से मिट्टी
2:14महक उठी और इसी सुगंध का आनंद लेने के लिए
2:16अजमल जी नगर भ्रमण के लिए निकल पड़ते हैं
2:18और साथ ही अकाल से सूखी पोखरण की मिट्टी
2:21की भी प्यास बुझ चुकी थी और पोखरण के
2:23किसान भी हाथों में हल को लिए खेत जोतने
2:25के लिए निकल पड़ते हैं और संजोग ऐसा बैठा
2:27कि खेतों में जाते समय उन्हें निसंतान
2:29अजमल जी के ही दर्शन क्यों हो जाते हैं
2:31किसानों ने जैसे ही राजा अजमल जी को देखा
2:34तो वहीं माथा पीट कर रुक जाते हैं और वापस
2:36अपने घरों की ओर रुख कर देते हैं क्योंकि
2:38समाज में रूढ़िवादी भावना थी कि अगर शुभ
2:40काम में किसी निसंतान आदमी के दर्शन हो
2:42जाते हैं तो उसे अपशकुन समझा जाता था और
2:45अजमल जी ने देखा तो वहीं स्तब्ध रह जाते
2:47हैं। जब अजमल जी ने किसानों [संगीत] को
2:49पीछे से पुकार लगाई और कहा कि बंधुओं इतने
2:52वर्षों के भीषण अकाल के बाद अब इतनी भारी
2:54वर्षा हुई है तो खेतों की तरफ जाते हुए आप
2:56यूं अचानक वापस क्यों जा रहे हो? राजदंड
2:58के भय से किसानों में इतना साहस नहीं हुआ
3:00कि अजमल जी को कारण बता सके। सभी किसान
3:03राजा के समक्ष सर झुकाए मौन ही खड़े रहे।
3:05प्रतिर ना पाकर अजमल जी असमंजस में
3:07बार-बार किसानों से पूछने लगे। तब एक
3:09किसान ने हाथ जोड़कर विनती करते हुए कहा
3:11कि महाराज अगर आप वचन दें कि कारण बताने
3:15के पश्चात हमें दंडित नहीं किया जाएगा।
3:17मैं वापस लौटने का कारण आपको बता सकता
3:19हूं। तभी अजमल जी ने वचन दिया। इस पर
3:21किसान ने बताया कि महाराज भले ही आप नेक
3:23दयावान और प्रजाप्रिय राजा है। किंतु ऐसी
3:25मान्यता है कि शुभ कार्य के लिए निकलते
3:27समय अगर किसी नपुत्र के दर्शन हो जाए तो
3:30वह अपशकुन माना जाता है और कार्य सिद्ध
3:32नहीं होता। महाराज आप निसंतान हैं। आपके
3:35दर्शन होना हमारे लिए अब शकुन है। इसलिए
3:37अब खेत जोतने नहीं जाएंगे। किसानों की कही
3:40बातों ने अजमल को भीतर तक झकझोर कर रख
3:42दिया। अजमल जी दुखी मन और भरे हृदय से
3:44महलों में लौट आए और द्वारकाधीश की
3:46प्रतिमा के समक्ष शिकायत करने लगे कि हे
3:48प्रभु यह क्या हो रहा है? जिस प्रजा को
3:51मैंने सदैव अपनी संतान के समान प्यार
3:53किया। आज उसी प्रजा के लिए मेरे दर्शन
3:55होना अपशकुन है। क्या निसंतान होना भी पाप
3:57है। तभी घिणी घनी ख्मा कहते हुए महल की
3:59दासी अजमल जी के पास आई। और जो कब से अजमल
4:02जी की बातें सुन रही थी और अजमल जी से
4:04कहने लगी महाराज आप मेरी बात माने तो
4:07योगीराज के पास जाइए। योगीराज बड़े ही
4:09सिद्ध पुरुष है। उन्हीं के आशीर्वाद से
4:11मुझे भी संतान की प्राप्ति हुई है। दासी
4:14की बात मानकर अजमल जी संत योगीराज के पास
4:16आ पहुंचे। योगीराज मां काली का परम भक्त
4:18था और उसे मां काली की तपस्या करने के
4:20परिणाम स्वरूप बहुत सी सिद्धियां प्राप्त
4:22थी। किंतु योगीराज को मिली अपार शक्तियों
4:24ने उसे घमंड से भर दिया था। और इसी के
4:26परिणाम स्वरूप योगीराज अजमल जी को टोंट
4:29कसते हुए कहा कि जिस नगरी में निपुत्र
4:31राजा है उसका अपमान नहीं होगा तो सम्मान
4:33होगा क्या? तुझे तो अपने द्वारकाधीश पर
4:35बहुत अभिमान है ना जा उन्हीं से पुत्र
4:37प्राप्ति की गुहार लगा। इतना सुनते ही
4:40अजमल जी उल्टे पांव महल की ओर आ गए और
4:42द्वारका जाने का निश्चय कर लिया। द्वारका
4:44पहुंचते ही अजमल जी द्वारकाधीश की प्रतिमा
4:46के सामने विलाप करने लगे और बार-बार गुहार
4:49करने लगे कि हे द्वारकानाथ मुझसे ऐसी कौन
4:51सी गलती हो गई जिससे सारी पीड़ा मुझे ही
4:54दे रहे हो। मूर्ति से कोई जवाब नहीं मिलने
4:56पर अजमल जी वापस मूर्ति से कहा। लेकिन
4:58अजमल जी को कौन समझाए कि भला पत्थर की
5:00मूर्ति कैसे बोल सकती है? और अंत में
5:02क्रोधित होकर अजमल जी चढ़ावा स्वरूप छड़े
5:05लड्डू से द्वारकानाथ की मूर्ति के सर पर
5:07फेंक दिया और मंदिर के पुजारी से शिकायत
5:09करने लगे कि आपका द्वारकाधीश बहरा हो गया
5:12है जो अपने भक्तों [संगीत] की एक भी नहीं
5:13सुनता। पुजारी ने सोचा कि यह पागल हो गया
5:16है और इसी को देखते हुए पुजारी ने कहा कि
5:18यह तो द्वारकानाथ की प्रतिमा है। यह कैसे
5:20[संगीत] बोल सकती है? तभी अजमल जी कहने
5:22लगे कि ऐसी बात है तो फिर द्वारकानाथ कहां
5:24रहते हैं। उनका कोई तो स्थान होगा ही।
5:26पुजारी ने अजमल [संगीत] जी से पीछा
5:28छुड़ाने के लिए सोचा कि अगर अजमल जी को
5:30समुद्र के लिए कह दूं तो शायद अजमल जी
5:33शांत होकर अपनी हट छोड़ देंगे और अपने महल
5:35में वापस लौट जाएंगे। और अजमल जी से कहा
5:37कि द्वारकाधीश तो समुद्र की तलवटी में
5:39रहते हैं। इतना सुनते ही अजमल जी समुद्र
5:42के पास जाकर डुबकी लगा दी। डुबकी लगाते ही
5:45समुंदर के अंदर अजमल जी को साक्षात
5:47द्वारकाधीश के दर्शन हो गए और अजमल जी ने
5:49द्वारकाधीश को कोटि-कोटि नमन किया। लेकिन
5:51अजमल जी ने भगवान विष्णु की ओर देखा तो
5:53भगवान विष्णु के माथे पर चोट लगी थी। चोट
5:55को देखते हुए अजमल जी ने द्वारकाधीश से
5:57कहा प्रभु आपके माथे पर चोट किस कारण आई
6:00है? द्वारकाधीश मंद मुस्कुराहट के साथ
6:02अजमल जी को कहा कि यह तो भोले भक्तों
6:04[संगीत] की भक्ति का प्रेम है। ऐसा सुनते
6:06ही अजमल जी द्वारकाधीश के पैरों में पड़कर
6:09क्षमा मांगने लगे कि प्रभु यह कैसा अनर्थ
6:11हो गया। तभी द्वारकाधीश अजमल जी से कहा कि
6:14अजमल किस लिए चिंता करता है? मैं स्वयं
6:16तुम्हारी प्रजा की पीड़ा और तुम्हारे पर
6:18लगा निसंतान का कलंक मिटाने के लिए आपके
6:21बड़े पुत्र के रूप [संगीत] में बरमदेव और
6:22छोटे पुत्र के रूप में मैं स्वयं तुम्हारे
6:24घर अवतार लूंगा। तभी अजमल जी कहने लगे कि
6:27प्रभु मुझे कैसे पता चलेगा कि आप स्वयं
6:29मेरे घर पधारे हैं। तभी द्वारकाधीश अजमल
6:32जी से कहा कि अजमल जिस दिन मैं तुम्हारे
6:34आंगन में पधारूंगा तो तुम्हारे आंगन में
6:36कुमकुम के पैरों के निशान होंगे और दूध का
6:38पानी हो जाएगा। तत्पश्चात अजमल जी पोकरण
6:41में लौट आए और कुछ ही दिनों बाद अजमल जी
6:43के आंगन में पुत्र का जन्म हुआ। लेकिन
6:45द्वारकाधीश द्वारा दिए परिचय के अनुसार
6:47महल में अभी भी आंगन में कुमकुम पैरों के
6:49निशान और दूध का पानी नहीं हुआ और अजमल जी
6:52चिंतित हो गए। फिर अजमल जी आसमान में
6:54चंद्रमा की ओर देख द्वारकाधीश को याद किया
6:56कि आज तो भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की
6:58द्वितीया है। फिर हे द्वारकानाथ आप मेरे
7:01आंगन में नहीं पधारे। तभी आसमान से एक
7:03तारा टूटकर महल की ओर आता है। [संगीत] महल
7:05में कुमकुम के पैरों के निशान और पानी का
7:07दूध हो गया। साथ ही पालने में बिरमदेव के
7:10पास कृष्ण अवतार के रूप में रामदेव जी की
7:12लालिमा बिखरने लगी। माता और पिता के लाड
7:14प्यार में बाबा कब 5 वर्ष के हो गए। पता
7:16ही ना चला। एक दिन रामदेव जी महल में खेल
7:19रहे थे। तभी उनकी नजर रास्ते से गुजर रहे
7:21एक घुड़सवार पर पड़ी। घुड़सवार को देखकर
7:24बाबा ने हठ पकड़ लिया और माता मैनादे से
7:26कहने लगे कि मुझे भी घोड़ा लाकर दो। मैं
7:28भी घोड़े की सवारी करूंगा। लेकिन जब बाबा
7:30को मनाने के लिए माता ने खूब जतन किए
7:33किंतु रामदेव [संगीत] जी ने बाल हठ नहीं
7:35छोड़ा तब माता ने दासी को भेजकर राजघराने
7:37के दर्जी को बुलावा भेजा और दर्जी को
7:39सुंदर कपड़े देते [संगीत] हुए कहा कि
7:41कुंवर रामदेव के लिए कपड़ों का सुंदर
7:43घोड़ा बनाकर लाओ। मखमली कपड़े को देखकर
7:45दर्जी के मन में लालच आया और उसने पुराने
7:48कपड़े का घोड़ा बनाकर ऊपर हरे रंग की झूल
7:50लगा दी और घोड़ा लेकर राज दरबार में आ
7:52पहुंचा। कुंवर रामदेव जी कपड़े के बने
7:54घोड़े को देखकर बहुत खुश हुए और दौड़ते
7:56हुए उत्साह से घोड़े पर जा बैठे। ज्यों ही
7:58बाबा रामदेव जी घोड़े पर सवार हुए तो
8:01कपड़े का घोड़ा आकाश मार्ग की ओर उड़ चला।
8:03यह देख माता मैनादे और राजा अजमल जी सहित
8:06पूरा राज दरबार आश्चर्य में पड़ गया। राजा
8:08अजमल जी को दर्जी पर बड़ा क्रोध आया और
8:11उन्होंने दर्जी के घर एक सेवक को भेजा और
8:13उस दर्जी को बुलाया। जब दर्जी राज दरबार
8:16में पहुंचा तो अजमल जी ने कहा कि सच-सच
8:18बताना कि तुमने उस कपड़े के घोड़े पर क्या
8:20जादू टोना किया है जिसकी वजह से कपड़े का
8:23घोड़ा मेरे कुंवर को लेकर आकाश में उड़
8:24गया। दर्जी कपड़े के घोड़े को आकाश में
8:27उड़ता देखकर दंग रह गया और डर के मारे
8:29थर-थर कांपने लगा और कहने लगा राजन मैंने
8:31कोई जादू नहीं किया। बार-बार गिड़गिड़ाने
8:34पर भी दर्जी की बात का अजमल जी को तनिक भी
8:36विश्वास नहीं हुआ। अजमल जी ने कहा कि अरे
8:38मायावी तांत्रिक यह सब तेरा किया धरा है।
8:40सैनिकों इस दर्जी को पकड़ कर कारागृह में
8:42डाल दो और सिपाहियों को आदेश दिया कि जब
8:44तक रामदेव कंवर घोड़े से नीचे ना आए तब तक
8:47इस दर्जी को अंधेरी कोठरी से बाहर मत
8:49निकालना। तब दर्जी कोठरी में पड़ा पड़ा
8:51रोने लगा और हाथ जोड़कर मन ही मन भगवान का
8:53स्मरण करने लगा। इस प्रकार दर्जी को विलाप
8:55करता देख बाबा [संगीत] को दर्जी पर दया आ
8:57गई और बाबा रामसा पीर घोड़े सहित काल
9:00कोठरी में प्रकट हुए। रामदेव कंवर के
9:02कोठरी में आते ही चारों ओर चांदनी फैल गई
9:04और उन्होंने दर्जी से कहा तुमने पुराने
9:06कपड़ों का घोड़ा बनाया इसलिए तुम्हें इतना
9:08कष्ट उठाना पड़ा जा मैंने तेरे सारे पाप
9:10खत्म किए तुमने घोड़ा बहुत सुंदर बनाया और
9:13हरे रंग की रेशमी झूल ने मेरा मन मोह लिया
9:15हे दर्जी आज से यह कपड़े का घोड़ा लीले
9:18घोड़े के नाम से प्रसिद्ध होगा जहां पर
9:19मेरी पूजा होगी वहीं पर मेरे साथ इस घोड़े
9:22की भी पूजा होगी। उसी समय भैरव राक्षस का
9:24आतंक 36 [संगीत] कोशों तक फैला हुआ था।
9:27आतंक इतना कि भैरव राक्षस के निवास स्थान
9:30से 12 12 कोसों तक एक भी मनुष्य का जीवित
9:33होना तो दूर की बात। भैरव जीवित जीव-जंतु
9:36तक को भी अपना निवाला बना चुका था। रात्रि
9:38के समय जब भी कोई बालक रोता तो उसकी माता
9:41यही कहती कि चुप हो जा। लल्ला नहीं तो
9:43भैरोड़ा राक्षस आ जाएगा। इसी दौरान एक दिन
9:46बाबा रामदेव अपनी मित्र मंडली के साथ गेंद
9:48खेलने के लिए पोकरण से 12 कोस दूर स्थित
9:51मैदान में आ पहुंचे। खेलते समय भुलवंश
9:53गेंद पास ही में स्थित बाली [संगीत] जी की
9:56कुटिया में जा गिरी। जहां हर रोज भैरव
9:58राक्षस का आवागमन था। बाली [संगीत] जी एक
10:00सिद्ध पुरुष थे। भैरव राक्षस के लिए
10:02उन्हें क्षति पहुंचाना असंभव था। लेकिन वे
10:05अपने तपोबल से केवल स्वयं की ही प्राण
10:07रक्षा करने [संगीत] में समर्थ थे। शाम
10:09ढलने को थी और साथियों ने ऐसा सुना था कि
10:11शाम ढलते ही बाली [संगीत] जी की कुटिया
10:14में भैरव राक्षस विश्राम करने आता है।
10:16उनके बार-बार मना करने के बावजूद भी
10:18रामदेव कंवर माने नहीं और गेंद लेने के
10:21लिए अकेले ही कुटिया में जा पहुंचे। तभी
10:22बानाथ जी ने कहा कि बालक यहां किस लिए आया
10:25है? तुरंत यहां से भाग जा नहीं तो अकाल
10:27मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा। भैरव राक्षस
10:29आने को है। बानाथ जी ने इतना कहा ही था कि
10:31भैरव राक्षस के पैरों की आवाज से धरती
10:33कांपने लगी। बालक के प्राण संकट में देख
10:35बानाथ जी को हड़बड़ी में कुछ समझ नहीं आया
10:38और रामदेव कंवर के प्राणों की रक्षा हेतु
10:40बानाथ जी ने रामदेव कंवर को एक कंबल में
10:42छुपा दिया। हालांकि उनको भली-भांति ज्ञात
10:44था कि उनका यह प्रयास विफल है। नरभक्षी
10:46दैत्य भैरव मनुष्य की गंध से उसका पता
10:49लगाने में सक्षम था। भैरव ने गंध को
10:51भांपते हुए कुटिया में प्रवेश किया और
10:53बानाथ से कहा कि यहां कोई मनुष्य है। मुझे
10:55गंध आ रही है। यह बाली ने भैरव राक्षस से
10:58कहा कि यहां मेरे अलावा कोई मनुष्य नहीं
11:00है। तुझे मेरी ही गंध आ रही होगी। बानाथ
11:03के अनंत प्रयत्नों के बावजूद भैरव राक्षस
11:05को उनकी बातों पर तनिक भी विश्वास ना हुआ
11:07और वह उस गंध का पीछा करते-करते उसी
11:09कुटिया में जा पहुंचा जहां बाबा कंबल में
11:11लिपटे आराम से सो रहे थे। भैरव राक्षस
11:14तुरंत कुंवर रामदेव के समीप पहुंचा और
11:16कंबल खींचने लगा। लेकिन वह कंबल खींचता ही
11:19रहा और कंबल लंबी होती चली गई। जिस प्रकार
11:21द्रोपदी [संगीत] चिर हरण के समय भगवान
11:23श्री कृष्ण ने उसकी साड़ी बढ़ा दी थी, उसी
11:26प्रकार रामदेव कंबवर भी अपनी लीला रचाते
11:28हुए भैरव राक्षस के साथ अटखेलिया करने
11:30लगे। लगातार घंटों तक कंबल खींचने के बाद
11:33अंततः भैरव राक्षस थक गया। उसे संदेह हुआ
11:35कि यह बालक कोई आम बालक नहीं अपितु अवश्य
11:38ही कोई मायावी है जो शायद यहां उसके प्राण
11:40हरने आया है। कुछ ही क्षण बाद बाबा रामदेव
11:43भैरव राक्षस को घसीटते हुए कुटिया से बाहर
11:45लेकर आ गए। तत्पश्चात दोनों में घमासान
11:47युद्ध चलता रहा। सभी पोखरण वासी इस दृश्य
11:50को देख आश्चर्यचकित हो गए कि भला छ वर्ष
11:53का अजमल सा कुंवर इस भैरू राक्षस पर भारी
11:56कैसे पड़ रहा है? क्योंकि जिस बालक के
11:58चमत्कार के चर्चे सुने थे आज उन्होंने
12:00अपनी आंखों से भी देख लिया था। एक लंबे
12:03घमासान के बाद अंततः रामदेव कुंवर ने भैरव
12:06राक्षस का अंत कर डाला। इससे एक तरफ तो
12:08पूरे पोखरण में खुशी का माहौल था तो दूसरी
12:11तरफ सिद्ध पुरुष बालीनाथ जी अभी भी उदास
12:13थे क्योंकि बालनाथ जी की कुटिया के पास
12:15पानी का कोई साधन नहीं था और भैरव राक्षस
12:18उनकी पानी [संगीत] की पूर्ति करता। इसको
12:20देख बाबा ने हाथ फैलाया और बानाथ जी के
12:22लिए एक तालाब बना दिया। अब भैरू राक्षस के
12:25वध के साथ ही पूरा पोखरण आतंक [संगीत] से
12:27मुक्त हो गया। किंतु दूसरी तरफ पोखरण के
12:30लोगों में छुआछूत की भावना, [संगीत] इतनी
12:32चरम पर कि छोटी जात के लोगों को पानी
12:34पिलाना तो दूर की बात उनका मुंह देखना भी
12:37अपशकुन माना जाता था। इन्हीं दिनों में एक
12:39दिन बाबा रामदेव नगर भ्रमण के लिए निकल
12:41पड़े और नगर भ्रमण करते-करते पोखरण की
12:44अंतिम सीमा पर जा पहुंचे। वहां बाबा
12:46रामदेव को [रोने की आवाज़] संदेह हुआ कि
12:47कोई छोटा बच्चा भूख के कारण रो रहा है। जब
12:50एक खेजड़ी के पास जाकर देखा तो खेजड़ी की
12:53छांव में मात्र छ दिन की बच्ची भूख के
12:55कारण विलाप कर रही थी। बाबा रामदेव ने
12:57बच्ची को उठाया और पेड़ के नीचे मिलने के
12:59कारण नाम रख दिया डाली बाई और अपनी बहन के
13:02रूप में स्वीकार कर महल [संगीत] की ओर चल
13:04दिए। जब बाबा रामदेव डाली बाई को लेकर महल
13:07में पहुंच गए। तभी मां काली का भक्त
13:10योगीराज वहां आ पहुंचा और अजमल जी को टोंट
13:12[संगीत] कसते हुए कहने लगा कि पता नहीं
13:14तेरा लाल किस घराने की लड़की को अपनी बहन
13:17बनाकर लाया है जिसकी मां का पता ना जात
13:19का। अरे अजमल तेरे इस लाल के कारण पूरा
13:21क्षत्रिय कुल कलंकित हो गया है। आपकी
13:23जानकारी के लिए बता दूं कि डाली बाई
13:25मेघवंश से थी और उस समय छुआछूत की भावना
13:28इतनी [संगीत] रूढ़िवादी कि निम्न कुल के
13:30लोगों से संबंध बनाना उच्च वंश के लोगों
13:32के लिए कलंकित होने जैसा था। जिसके कारण
13:34योगीराज को बाबा रामदेव द्वारा मेघवंश की
13:36डाली बाई को बहन [संगीत] के रूप में
13:38स्वीकार करना उचित नहीं लगा। लेकिन
13:40योगीराज को भला कौन समझाए कि भगवान को
13:42क्या क्षत्रिय क्या शूद्र वह तो सबको
13:44सम्मान दृष्टि से देखता है। इस प्रकार
13:46बाबा रामदेव के चमत्कारों और समाज सुधार
13:49के साथ-साथ पोखरण का शासन चल रहा था और
13:51इन्हीं दिनों में एक बार लाखू बंजारा नाम
13:53का व्यापारी बैलगाड़ी पर मिश्री बेचने
13:55हेतु बाबा के नगर में आ पहुंचा और पैसों
13:58के लालच में उसने राज्य के नियम की
14:00अवहेलना करते हुए व्यापार से संबंधित
14:02तत्कालीन लगने वाला चुंगी कर नहीं चुकाया
14:04और इसके बावजूद भी मिश्री बेचने लगा।
14:06संजोग ऐसा बैठा कि उसी दिन बाबा रामदेव
14:09नगर निरीक्षण के लिए निकल पड़े कि राज्य
14:11के नियमों का सही से पालन हो रहा है या
14:13नहीं और ऐसे ही निरीक्षण करते-करते लाखू
14:16बंजारा के पास आ पहुंचे जब बाबा ने लाखू
14:18बंजारे से पूछा मिश्री का चुंगी कर चुका
14:21दिया क्या अचानक से बाबा रामदेव को देख
14:23लाखू बंजारा घबरा उठा और घबराते हुए लाखू
14:26बंजारा ने जवाब दिया कि हुकुम मैं तो नमक
14:28बेचने आया हूं उसने ऐसा इसलिए कहा कि उस
14:30समय नमक पर कोई चुंगी कर नहीं लगता था ऐसा
14:33सुन बाबा रामदेव मुस्कुरा कर वहां से चल
14:35दिए चलते वक्त लाखू बंजारा ने पीठ पीछे
14:37बाबा रामदेव की बुराई करते हुए कहा कि
14:39कहीं का आया है हमसे लगान वसूल करने वाला।
14:41लेकिन बंजारे को कौन समझाए कि जिसके वह
14:43बुराई कर रहा है वह तो साक्षात विष्णु के
14:45अवतार है। और जैसे ही बाबा रामदेव महल की
14:48ओर प्रस्थान किया तो [संगीत] सारी मिश्री
14:49नमक में बदल गई। लेकिन लाखों बंजारे को इस
14:51बात की तनिक भी भनक नहीं लगी और मिश्री
14:54बेचने में मग्न हो गया और साथ ही मन में
14:56बढ़ते लालच से खुश भी हो गया। जब नगर के
14:58लोगों ने बंजारे से खरीदी हुई मिश्री का
15:00स्वाद लिया तो पता चला कि बंजारे ने
15:02उन्हें मिश्री के बहाने नमक पकड़ा कर
15:04बुद्धू बनाया है। इसी को देख सभी आग बबूला
15:06हो गए और हाथ हल्के करने [संगीत] के लिए
15:08बंजारे के पास चल दिए। नगर के लोगों को
15:10अपने पास आते देख बंजारा घबरा गया और मन
15:12ही मन सोचने लगा कि लाखू आज कैसी [संगीत]
15:14शामत आ गई। लोगों को पास आते देख लाखू
15:16बंजारे ने उनके सामने हाथ जोड़ लिए और
15:19पूछने लगा कि भाइयों मुझसे ऐसी कौन सी भूल
15:21हो गई जो मुझे मारने के लिए आए हो। ऐसा
15:23सुन नगर के लोगों ने कहा अरे बंजारे
15:25मिश्री के नाम पर नमक बेचता है। तेरी
15:27पिटाई नहीं करेंगे तो आरती करेंगे क्या?
15:29तभी बंजारे ने कहा कि यह तो मिश्री है।
15:31भला नमक कैसे बेचूंगा? और जब लाखू बंजारे
15:33ने मिश्री को खाकर देखा तो नमक निकला और
15:36लोगों ने पिटाई करना शुरू कर दिया। ऐसा
15:38होता देख लाखू बंजारा भांप गया कि उसने
15:40बाबा रामदेव से झूठ बोला था और उसी की सजा
15:42अब मिल रही है। संकट में देख लाखू बंजारे
15:45ने बाबा को पुकार लगाई कि हे प्रभु आपका
15:47यह भोला भक्त बड़े संकट में है। कृपया
15:49मेरी मदद करो। कुछ ही क्षण बाद बाबा
15:51रामदेव वहां पहुंच गए और बंजारा बाबा
15:53रामदेव को देख चरणों में जा गिरा और दया
15:56की [संगीत] भीख मांगने लगा। तभी बाबा
15:57रामदेव ने पिटाई करने वाले लोगों को शांत
15:59कराते हुए कहा कि इसके करे की इसे सजा मिल
16:02गई है। अब इसे छोड़ दो। तभी बंजारा रामदेव
16:04के चरणों में जा गिरा और माफी मांगने लगा
16:06कि प्रभु मुझसे बड़ा अन्याय हो गया। मुझे
16:08माफ कर दो। तभी बाबा [संगीत] रामदेव
16:10बंजारे की गलती के पश्चाताप को देख माफ कर
16:13दिया और फिर से सारा नमक मिश्री में बदल
16:15गया। मोर उसने चुंगी कर देकर अपना व्यापार
16:17शुरू कर दिया। अर्थात बाबा रामदेव ने कर
16:19की चोरी करने वाले को पर्चा देकर सभी को
16:21हमेशा सत्य के मार्ग पर चलने हेतु प्रेरणा
16:24प्रदान की। इसी प्रकार समय का पहिया चलता
16:26गया और कुछ ही दिनों बाद बाबा रामदेव बड़े
16:28हो गए। इधर रामदेव की बहन सुगना बाईसा की
16:31उम्र भी विवाह योग्य हो गई और संजोग ऐसा
16:33बैठा कि सुगना बाईसा का विवाह पुंगलगढ़ के
16:36परिहार राजघराने के कुंवर उदय सिंह के साथ
16:38तय कर दिया और मांगलिक मुहूर्त की घड़ी को
16:41देख परिहार घराने की बारात तोरण द्वार पर
16:43आ पहुंची। लेकिन दुर्भाग्य ऐसा रहा कि इसी
16:46घड़ी बीच योगीराज आ गया और पुंगलगढ़ के
16:48परिहारों को टोंट कसते हुए बोला कि अरे
16:51क्यों परिहारों की लाज शर्म को कलंकित कर
16:53रहे हो जिस कन्या को तुम विवाह करके ले जा
16:55रहे हो इनका छोटी जात के लोगों से संबंध
16:57है। इतना सुन सुगना बाईसा के ससुर ने
16:59बारात को तोरण द्वार से वापस ले जाने का
17:02ऐलान कर दिया। किंतु बाबा रामदेव के सामने
17:04एक ना चली और बाबा रामदेव ने अपनी बहन
17:06सुगना का विवाह विधिवत रूप से संपन्न
17:08कराकर घर से विदा किया। लेकिन जैसे ही
17:11सुगना बाईसा अपने ससुराल पहुंचती है तो
17:13पुंगलगढ़ के परिहार विवाह के समय अपनी एक
17:15ना चलने के कारण सुगना बाईसा को घर में
17:18नववधू [संगीत] की जगह एक दासी की तरह रखने
17:20लगे और परिहारों में बदला लेने की आग इतनी
17:22कि [संगीत] सुगना बाईसा को एक टाइम का
17:24खाना तक नसीब नहीं कराते और इधर बाबा
17:26रामदेव का विवाह अमरकोट के सरदार दलजी
17:29सोडारी पुत्री नेतल दे के साथ तय कर दिया।
17:31विवाह को करीब देख बाबा रामदेव ने राज
17:33दरबारी सेवक रत्न रायका को सुगना बाईसा को
17:36लाने के लिए भेज दिया। जैसे ही रत्न रायका
17:38पोंगलगढ़ के महल में प्रवेश किया तो
17:40परिहारों ने बदला लेने का उचित समय देख
17:42रत्न रायका को बंदी बनाकर कारावास में डाल
17:45दिया। दुविधा में देख जैसे ही रत्न रायका
17:47ने रामदेव को याद किया तो कारावास के ताले
17:49अपने आप खुल गए और रत्न रायका सुगना बाईसा
17:52को लेकर पोखरण पहुंच गया। अब वैशाख महीने
17:54की आखा 30 के दिन अजमलसा के कुंवर की
17:57बारात अमरकोट की ओर प्रस्थान कर दी और
17:59बारात तोरण द्वार पर पहुंच गई। जैसे ही
18:01अमरकोट महल के मंडप में अग्नि फेरे लेने
18:03का समय आया तो दलजी सोा के मन में चिंता
18:05बढ़ गई कि अब नेतल दे खड़ी कैसे होगी?
18:07क्योंकि लोकमान्यता के अनुसार नेतल दे
18:09जन्म से विकलांग थी। किंतु बाबा रामदेव
18:12मंद मुस्कुराहट के साथ दलजी सोढ़ा की चिंता
18:14भांप गए और अग्नि फेरे लेने के समय ऐसी
18:17लीला रची कि नेतल देव बेझक पैरों पर खड़ी
18:19हो गई और विवाह संपन्न के बाद बारात वापस
18:22पोखरण की ओर प्रस्थान कर दी और इस प्रकार
18:25बाबा रामदेव के चमत्कारों [संगीत] की
18:26चर्चा आसपास में फैलने लगी और रामदेव ने
18:29पोखरण से 12 किलोमीटर दूर रुणिचा नाम से
18:32एक नगर बसा दिया। जब यह [संगीत] बात अपने
18:33अहंकार में डूबे मक्का के पंच पीरों को
18:36पता चली तो उनको आघात हुआ कि इस संसार में
18:38उनसे बढ़कर और कौन आ गया और रामदेव जी की
18:40परीक्षा लेने [संगीत] के लिए रुिणीचा में
18:42आ गए। रुणिचा में आते ही रामदेव जी ने
18:44उनका खूब आदर सत्कार किया। लेकिन जब भोजन
18:46के समय सोहन थाल में भोजन परोसा गया तो
18:48पंच पीरों ने खाने से मना कर दिया कि हम
18:50तो खाना हमारे कटोरों में ही खाएंगे जो
18:52मक्का में भूल आए हैं। दूसरों के बर्तनों
18:55में भोजन नहीं करते। इतना सुन बाबा रामदेव
18:57ने आकाश की तरफ हाथ बढ़ाया और कटोरे हवा
19:00में उड़ते हुए रुणचा आ गए। ऐसा देख पंच
19:02पीर रामदेव के चरणों में गिर पड़े और बोले
19:04कि हे रामदेव हमें माफ कर दो हमसे बड़ी
19:07भूल हो गई। आप तो पीरों के भी पीर हो।
19:09इसीलिए आज भी बाबा रामदेव को मुस्लिम
19:11समुदाय के लोग रामसा पीर के रूप में पूजते
19:14हैं। इस प्रकार दिन दुखियों री सेवा करते
19:16हुए बाबा रामदेव ने अपनी नगरी के सभी
19:18लोगों को यह समाचार भिजवा दिया कि अब मेरे
19:20जाने का वक्त आ गया है। इस प्रकार रुणीचा
19:22गांव के लोग समाधि स्थल पर एकत्रित हो गए।
19:24लेकिन इसकी खबर जब डाली बाई को पड़ी तो
19:26डाली बाई शीघ्र ही नंगे पांव समाधि स्थल
19:29की तरफ चली आई और डालीबाई ने आते ही
19:31रामदेव जी से कहा कि हे प्रभु आप गलत
19:33समाधि को अपनी बता रहे हो यह समाधि तो
19:35मेरी है। रामदेव [संगीत] जी ने पूछा बहन
19:37तुम कैसे कह सकती हो कि यह समाधि तुम्हारी
19:40है। इस पर डाली बाई ने कहा कि अगर इस जगह
19:42को खोदने पर आंटी, डोरा और कांगसी निकलेगी
19:44तो यह समाधि मेरी होगी। गांव के लोगों
19:47द्वारा समाधि को खोदने पर वही वस्तुएं
19:49मिली [संगीत] जो कि डाली बाई ने बताई थी।
19:50तभी रामदेव जी को ज्ञात हुआ कि सत्य ही यह
19:53समाधि तो डाली बाई की है। डालीबाई ने अपनी
19:55सत्यता दर्शाकर प्रभु से कहा कि हे प्रभु
19:57अभी तो आपको इस सृष्टि में कई [संगीत]
19:59कार्य करने हैं और आप हमसे विदा ले रहे
20:01हो। रामदेव जी ने अपनी मुह बोली बहन
20:03डालीबाई को अपने इस सृष्टि में आने का
20:05कारण बताते हुए कहा कि मेरा अब इस सृष्टि
20:07में कोई कार्य बाकी नहीं रहा है। मैं भले
20:09ही दैहिक रूप से इस सृष्टि को छोड़कर जा
20:11रहा हूं। परंतु मेरे भक्त के [संगीत] एक
20:13बुलावे पर मैं उसकी सहायता के लिए हर वक्त
20:15हाजिर रहूंगा। इतना कहते हुए बाबा रामदेव
20:18विक्रम संवत 1442 भाद्रपद की शुक्ल एकादशी
20:21को जीवित समाधि ले लेते हैं। बोलो जय बाबा
20:24री।