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0:10सुबह के लगभग 7:00 बजे थे। लगातार तीसरे
0:13दिन भी आसमान काले बादलों से ढका हुआ था।
0:16मूसलाधार बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही
0:19थी। गांव के किनारे बने मिट्टी के छोटे से
0:22घर में रामू, उसकी पत्नी गौरी और उनका
0:25बेटा छोटू रहते थे। लेकिन आज उनके घर में
0:28एक और परिवार भी ठहरा हुआ था। दो अनजान
0:31मेहमान। एक पति और उसकी पत्नी जो पिछली
0:35रात बारिश में फंस जाने के कारण यहीं रुक
0:38गए थे। दोनों अभी भी घर के अलग कमरे में
0:40चुपचाप सोए हुए थे। घर में अजीब सी खामोशी
0:44थी।
0:52अजी रात तो किसी तरह निकल गई लेकिन अब
0:56सुबह हो गई है। मैं सुबह से यही सोच रही
0:59हूं कि इन मेहमानों को नाश्ते में क्या
1:02दूं? घर में आटे की डिब्बी लगभग खाली हो
1:05चुकी है। दाल भी बस मुट्ठी भर बजी है। अगर
1:09सब कुछ आज ही बना दिया तो शाम को छोटू
1:13क्या खाएगा?
1:14मैं भी यही सोच रहा हूं गौरी। रात को जब
1:17यह लोग भीगे हुए हमारे दरवाजे पर आए थे तब
1:20उनसे मना कैसे करता? इतनी तेज बारिश में
1:24अगर हम दरवाजा बंद कर देते तो शायद सारी
1:28उम्र खुद को माफ नहीं कर पाता।
1:30मैं मना करने की बात नहीं कर रही हूं अजी।
1:33लेकिन हालात देखिए। हमारे अपने घर में
1:36खाने का ठिकाना नहीं है। ऊपर से मेहमान भी
1:40हैं। अगर उन्हें सूखी रोटी भी देंगे तो
1:44मुझे शर्म आएगी। गरीबी से शर्म नहीं करनी
1:47चाहिए गौरी। बुरे व्यवहार से शर्म करनी
1:50चाहिए। हमारे पास जो है वही प्यार से खिला
1:53देंगे। शायद भगवान हमारी नियत देख रहा हो।
1:57हर बार आप यही कह देते हैं। लेकिन जब छोटू
2:01भूखा होकर मेरी तरफ देखता है ना तब मेरा
2:04दिल बैठ जाता है। इतने में छोटू उठकर बाहर
2:08देखने लगता है।
2:14बाबा बारिश अभी भी नहीं रुकी। क्या आज भी
2:18आप काम पर नहीं जाओगे?
2:20अगर बारिश थोड़ी भी कम हुई ना तो मैं जरूर
2:23जाऊंगा। चाहे पूरा गांव घूमना पड़े।
2:26बाबा मैं बड़ा होकर आपको कभी काम नहीं
2:29करने दूंगा। मैं बहुत सारे पैसे कमाऊंगा।
2:32फिर हमारे घर की छत भी नहीं बनवाऊंगा।
2:35रामू कुछ पल के लिए चुप हो जाता है। उसकी
2:38आंखें भर आती हैं।
2:39बस बेटा भगवान करे तेरी हर बात सच हो।
2:43रामू बाहर बारिश देखने चला जाता है।
2:50उधर गौरी चुपचाप रसोई में जाती है। वो आटे
2:54का डिब्बा खोलती है। फिर दाल का डिब्बा
2:56देखती है। दोनों लगभग खाली थे। वो कुछ पल
2:59तक वहीं खड़ी रह जाती है।
3:01अजी जरा इधर आइए। मैं आपको कुछ दिखाना
3:05चाहती हूं।
3:09क्या हुआ गौरी? इतनी घबराई हुई क्यों लग
3:12रही हो?
3:13देखिए यह पूरा आटा बचा है। बस इतना और यह
3:18दाल मुश्किल से एक बार की। तेल भी तली में
3:22रह गया है। नमक है लेकिन नमक से तो पेट
3:26नहीं भरता। मैं रात से यही हिसाब लगा रही
3:30हूं कि अगर सुबह मेहमानों को खिला दूं तो
3:33दोपहर में छोटू क्या खाएगा और अगर छोटू के
3:37लिए बचा कर रखूं तो मेहमानों को क्या
3:40खिलाऊं। समझ ही नहीं आ रहा कि क्या करूं।
3:44मुझे पता था कि घर की हालत खराब है। लेकिन
3:47इतनी खराब हो गई है इसका अंदाजा नहीं था।
3:50मैं आपको इसलिए नहीं बताती थी क्योंकि आप
3:53पहले से ही परेशान रहते हैं। लेकिन अब
3:56छिपाने जैसा कुछ बचा भी नहीं है। सुबह से
4:00मेरा मन रो रहा है अजी। घर में मेहमान
4:03बैठे हैं और मैं उनके लिए ढंग की चाय तक
4:07नहीं बना पा रही।
4:09गौरी गरीब होना कोई गुनाह नहीं है। गुनाह
4:12तब होता है जब आदमी अपना इंसानियत का धर्म
4:15छोड़ दे। हमारे पास जो है वही खिलाएंगे।
4:19अगर वह अच्छे लोग होंगे तो समझ जाएंगे और
4:22अगर नहीं समझेंगे तो भी मुझे कोई पछतावा
4:25नहीं होगा।
4:26आप हर बार इतनी बड़ी बातें कर लेते हैं
4:29लेकिन मैं एक औरत हूं अजी। मुझे मेहमान के
4:32सामने खाली बर्तन देखकर शर्म आती है।
4:36उधर दोनों मेहमान धीरे-धीरे जाग चुके थे।
4:41लगता है हम लोगों की वजह से इन्हें
4:43परेशानी हो रही है।
4:45हां, मैंने भी महसूस किया है। कल रात जब
4:49हम आए थे तब भी इनके घर की हालत देखकर
4:52मेरा दिल भर आया था।
4:54अभी कुछ मत कहना। पहले थोड़ा और देख लेते
4:58हैं।
4:59वो कुछ सोचता है। फिर बिना कुछ बोले अपनी
5:02पत्नी की तरफ देखता है।
5:03तुम फिर वही करने जा रहे थे?
5:06नहीं, अभी नहीं। सही समय आने दो।
5:10उनकी यह बात दूर खड़ा छोटू सुन तो लेता
5:12है, लेकिन उसे कुछ समझ नहीं आता।
5:16यह अजनबी चाचा बार-बार सही समय क्यों
5:19बोलते हैं?
5:20छोटू मेहमानों के पास जाकर बैठ जाता है।
5:24चाचा जी आपको बारिश अच्छी लगती है?
5:28पहले बहुत अच्छी लगती थी। लेकिन अब बारिश
5:31देखकर कुछ पुरानी बातें याद आ जाती है।
5:34कौन सी बातें? मेहमान आदमी कुछ पल के लिए
5:37चुप हो जाता है। उसकी आंखों में हल्की नमी
5:40दिखाई देती है।
5:42जब तुम बड़े हो जाओगे ना तब शायद समझ
5:45पाओगे कि कुछ बारिशें सिर्फ पानी नहीं
5:47लाती। कुछ पुरानी यादें भी साथ ले आती
5:50हैं। मुझे तो बारिश में कागज की नाव चलाना
5:53अच्छा लगता है।
5:54मेहमान आदमी मुस्कुरा देता है। लेकिन उसके
5:57चेहरे की मुस्कान के पीछे एक गहरा दर्द
6:00साफ दिखाई दे रहा था।
6:03बारिश लगातार बरस रही थी। छप्पर से पानी
6:06टपक रहा था। मिट्टी का आंगन पूरी तरह भीग
6:09चुका था। गौरी ने बचा हुआ थोड़ा सा आटा
6:12गूंथा और कांपते हाथों से रोटियां बेलने
6:15लगी। उसकी आंखों में आंसू थे। लेकिन वो
6:18उन्हें बार-बार पोंछ रही थी ताकि कोई देख
6:21ना ले।
6:22अजी जरा इधर आइए। मैं सुबह से अपने मन की
6:26बात दबाकर बैठी हूं। लेकिन अब और हिम्मत
6:29नहीं बची। आप खुद देख लीजिए। यह आटे की
6:33परात लगभग खाली हो चुकी है। बड़ी मुश्किल
6:37से पांच रोटियां बन पाएंगी। दाल भी बस
6:40इतनी बची है कि कटोरी के तले को छू सके।
6:44तेल खत्म होने को है। लकड़ियां भी गीली हो
6:47गई हैं। मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा। ऐसा
6:51लग रहा है जैसे एक मां और एक गृहिणी दोनों
6:55एक साथ हार रही हैं। मुझे अपने भूखे रहने
6:59का दुख नहीं है अजी। लेकिन जब छोटू मेरी
7:02तरफ उम्मीद से देखता है ना तब लगता है
7:05जैसे कोई मेरे कलेजे को मुट्ठी में दबा
7:07रहा हो।
7:08गौरी मेरी तरफ देखो। तुम खुद को इतना मत
7:12तोड़ो। मैं जानता हूं कि इस घर की हर
7:16मुसीबत सबसे पहले तुम्हारे सामने आती है।
7:19तुमने कितनी बार खुद भूखे रहकर मुझे और
7:22छोटू को खिलाया है। मैंने सब देखा है। बस
7:26कभी कहा नहीं। लेकिन एक बात याद रखना गरीब
7:30आदमी की सबसे बड़ी दौलत उसका दिल होता है।
7:34अगर आज हम अपने दरवाजे से किसी भूखे को
7:37लौटा दें तो शायद हमारे बर्तन भर जाएं।
7:41लेकिन हमारा मन सारी उम्र खाली रहेगा।
7:44मुझे भी डर लगता है। मुझे भी चिंता होती
7:47है कि कल क्या होगा। लेकिन मैं इतना जरूर
7:50जानता हूं कि भगवान देर करता है। अंधेर
7:53नहीं वो हमारी परीक्षा ले रहा है।
7:56हर बार आप भगवान का नाम लेकर मुझे समझा
7:59देते हैं। लेकिन कभी-कभी मेरा विश्वास भी
8:02डगमगा जाता है। सोचिए तीन दिन से बारिश हो
8:07रही है। आप मजदूरी पर नहीं जा पाए। घर में
8:10एक नहीं बचा। उधार देने वाले भी अब मुंह
8:14फेरने लगे हैं। ऊपर से मेहमान भी हमारे घर
8:18में हैं। मैं उन्हें बोझ नहीं कह रही।
8:22भगवान गवाह है। मैं ऐसा सोच भी नहीं सकती।
8:26लेकिन उनकी खातिरदारी ठीक से ना कर पाने
8:29का दुख मुझे अंदर ही अंदर खाए जा रहा है।
8:33अगर इंसान की इज्जत खाने की थाली से होती
8:36तो दुनिया के सारे अमीर सबसे अच्छे इंसान
8:39होते। लेकिन ऐसा नहीं है गौरी। इज्जत दिल
8:43से होती है। हम उन्हें झूठी शान नहीं
8:46सच्चा अपनापन दे रहे हैं। मुझे यकीन है
8:49अगर वह अच्छे इंसान होंगे तो हमारी मजबूरी
8:52समझ जाएंगे। कुछ देर बाद गौरी ने कांपते
8:55हाथों से थाली सजाई और मेहमानों के सामने
8:58रख दी।
8:58भैया बहन जी घर में बस यही बचा था। अगर
9:04खाने में कोई कमी रह जाए तो मुझे माफ कर
9:07दीजिएगा। सच कहूं तो पहली बार ऐसा लग रहा
9:10है कि मैं अपने घर आए मेहमानों की ठीक से
9:14सेवा भी नहीं कर पा रही। आप लोग बुरा मत
9:17मानिएगा। हमारे पास जो था हमने वही पूरे
9:21मन से बनाया है। दुनिया का सबसे स्वादिष्ट
9:24खाना कौन सा होता है? वो खाना जिसमें घी
9:28ज्यादा हो। ऐसा नहीं। वो खाना जिसमें
9:31मसाले ज्यादा हो। ऐसा भी नहीं। दुनिया का
9:34सबसे स्वादिष्ट खाना वो होता है जिसमें
9:37परोसने वाले का दिल मिला हो। और इस थाली
9:40में मुझे वही दिखाई दे रहा है। लेकिन एक
9:43बात मेरी समझ में नहीं आ रही। तुम दोनों
9:46की थाली कहां है? अरे हम लोग बाद में खा
9:49लेंगे। पहले आप लोग खाइए। मेहमान पहले
9:52खाते हैं घरवाले बाद में। छोटू ने पहले ही
9:55खा लिया। बस आप दोनों खा लीजिए। उसके बाद
9:59हम भी खा लेंगे। नहीं रामू मैं उम्र भर
10:03लोगों के चेहरे पढ़ता आया हूं। तुम्हारी
10:05मुस्कान बता रही है कि तुम सच नहीं बोल
10:08रहे। तुम्हारी आंखें कह रही हैं कि तुम
10:10भूखे हो। तुम्हारी पत्नी की कांपती
10:13उंगलियां बता रही हैं कि इस थाली को बनाने
10:16में उसने अपने हिस्से का खाना भी छोड़
10:18दिया है। अगर मैं यह सब देखकर भी चुपचाप
10:21खा लूं तो मुझसे बड़ा स्वार्थी कोई नहीं
10:23होगा।
10:24ऐसी बात नहीं है भैया। हम सच में बाद में
10:27खा लेंगे। आप लोग बेफिक्र होकर खाना शुरू
10:31कीजिए। उसी समय छोटू मासूमियत से बोल
10:34पड़ा।
10:34मां आप फिर झूठ बोल रही हो ना? मैंने सुबह
10:38देखा था कि आटे का डिब्बा खाली हो गया था।
10:41आपने खुद कहा था कि अब बस यही आखिरी
10:44रोटियां बनेंगी। बाबा ने भी सुबह से कुछ
10:47नहीं खाया। आपने भी नहीं खाया। आप दोनों
10:50हमेशा कहते हो कि हमें भूख नहीं है। लेकिन
10:54रात को जब मैं उठता हूं ना तब आपको
10:56चुपके-चुपके पानी पीते देखता हूं। क्या
10:59पानी पीने से सच में भूख खत्म हो जाती है?
11:02छोटू की बात सुनते ही पूरे घर में सन्नाटा
11:05छा गया।
11:06रामू अब एक शब्द भी मत कहना। जिस घर में
11:10मां-बाप अपने बच्चे के लिए भूखे रह जाते
11:13हो, जिस घर में मेहमान की इज्जत बचाने के
11:16लिए अपनी भूख छिपाई जाती हो, उस घर में
11:20बैठकर अकेले खाना मेरे बस की बात नहीं है।
11:23अगर खाना होगा तो हम सब साथ बैठकर खाएंगे।
11:27और अगर तुम लोग नहीं खाओगे तो मैं भी एक
11:30निवाला अपने मुंह में नहीं डालूंगा।
11:33साहब ऐसा मत कहिए। मेरे लिए सबसे बड़ी
11:37खुशी यही है कि मेरे घर आया मेहमान भूखा
11:40ना जाए। गरीबी तो हमारी किस्मत है लेकिन
11:43मेहमान का अपमान हमारी पहचान नहीं बन
11:46सकता। मैं हाथ जोड़कर कहता हूं आप खाना खा
11:49लीजिए। मुझे चैन मिल जाएगा और मुझे तब चैन
11:53मिलेगा जब तुम्हारा बेटा, तुम्हारी पत्नी
11:55और तुम तीनों मेरे साथ बैठकर यही रोटी
11:58खाओगे। याद रखना रामू भूख इंसान को छोटा
12:02नहीं बनाती। लेकिन किसी की भूख देखकर मुंह
12:05फेर लेना इंसान को जरूर छोटा बना देता है।
12:09मेहमान आदमी ने अपनी थाली से दो रोटियां
12:12उठाई और छोटू की तरफ बढ़ा दी। छोटू उसकी
12:15तरफ हैरानी से देखने लगा और गौरी की आंखों
12:18से आंसू बहने लगे। घर के अंदर गहरा
12:22सन्नाटा था। बाहर बारिश पहले से भी तेज हो
12:25चुकी थी।
12:30तभी मेहमान आदमी ने अपनी थाली रामू की ओर
12:33बढ़ा दी।
12:33रामू अगर तुम मुझे सच में अपना मेहमान
12:36मानते हो तो मेरी एक बात माननी पड़ेगी।
12:40मैं तुम्हारे घर का खाना तभी खाऊंगा जब
12:43तुम गौरी और छोटू भी मेरे साथ बैठकर यही
12:46रोटी खाओगे? तुम बार-बार मुझे सम्मान देने
12:49की बात कर रहे हो। लेकिन क्या तुम्हें
12:51लगता है कि मैं इतना छोटा इंसान हूं कि
12:54अपने सामने एक परिवार को भूखा देखकर आराम
12:57से खाना खा लूं? मुझे अपनी भूख से ज्यादा
13:00तुम्हारी मजबूरी दिखाई दे रही है। साहब
13:04मेरी गरीबी का मजाक मत बनाइए। मैं जानता
13:07हूं कि घर में बस यही आखिरी खाना है।
13:11लेकिन मैं यह भी जानता हूं कि मेहमान
13:13भगवान का रूप होता है। अगर आज आप लोग भूखे
13:16रह गए तो मैं सारी उम्र अपने आप को माफ
13:20नहीं कर पाऊंगा। आप मेरी जगह होते तो शायद
13:23यही करते।
13:24नहीं रामू शायद मैं तुम्हारी जगह होता तो
13:27इतना बड़ा दिल नहीं दिखा पाता। आज तुमने
13:30मुझे सिखाया है कि इंसान अमीरी से नहीं
13:33अपने व्यवहार से बड़ा बनता है।
13:35बहन मैं तुम्हारी आंखों में सुबह से डर
13:38देख रही हूं। तुम बार-बार मुस्कुरा रही हो
13:41लेकिन तुम्हारा दिल रो रहा है। तुम्हें इस
13:43बात की चिंता नहीं है कि तुम भूखी हो।
13:46तुम्हें इस बात की चिंता है कि कहीं
13:48तुम्हारे मेहमान यह ना सोच लें कि गरीब
13:51लोग मेहमान की इज्जत नहीं करते। सच कहूं
13:54तुम्हारे जैसी गृहिणी मैंने बहुत कम देखी
13:57है। गौरी कुछ बोल नहीं पाती। उसकी आंखों
14:00से आंसू टपकने लगते हैं और फिर ऐसे ही सब
14:03लोग मिलबांट के एक-दो रोटियां खा लेते
14:05हैं।
14:08इतने में बाहर हवा का तेज झोंका आता है।
14:12दरवाजा अपने आप खुल जाता है।
14:15सब लोग खाना खाकर बैठे हुए होते हैं।
14:18बारिश के साथ एक पुराना भीगा हुआ लिफाफा
14:21उड़ते-उड़ते घर के अंदर आ गिरता है।
14:24मां देखो कोई कागज उड़कर आया है।
14:27रामू लिफाफा उठाता है। उस पर सिर्फ एक नाम
14:30लिखा था रामू। लेकिन भेजने वाले का नाम
14:34नहीं था।
14:35यह हमारे नाम की चिट्ठी। लेकिन इस बारिश
14:39में कौन भेजेगा?
14:41रामू धीरे-धीरे लिफाफा खोलता है। अंदर
14:44केवल एक पर्ची थी। उस पर लिखा था, जिस
14:47मेहमान को तुमने अपने घर में जगह दी है,
14:50उसे पहचानने की कोशिश मत करना। सही समय
14:53आने पर सब सच खुद सामने आ जाएगा। पूरा घर
14:57सन्न रह जाता है।
14:59बाबा यह किसने लिखा होगा?
15:02मुझे नहीं पता बेटा। मैंने तो गांव में
15:05किसी से दुश्मनी भी नहीं की।
15:08गौरी की नजर धीरे-धीरे मेहमान आदमी की तरफ
15:11जाती है। वो बिल्कुल शांत बैठा था। जैसे
15:14उसे पहले से सब पता हो।
15:17भैया एक बात पूछूं?
15:20पूछो बहन।
15:21आप बुरा मत मानिएगा।
15:24लेकिन यह चिट्ठी क्या इसका आपसे कोई संबंध
15:27है? आप बार-बार कहते हैं कि सही समय आने
15:31दो। अब इस चिट्ठी में भी वही बात लिखी है।
15:36मेरा मन बहुत घबरा रहा है।
15:38मेहमान आदमी कुछ देर तक चुप रहता है। फिर
15:41धीरे से मुस्कुराता है।
15:43अगर मैं अभी तुम्हारे हर सवाल का जवाब दे
15:46दूं तो शायद तुम लोग मुझ पर विश्वास नहीं
15:49करोगे। और अगर मैं चुप रहूं तो तुम्हें
15:51मुझ पर शक होगा। इसलिए अभी इतना ही
15:54कहूंगा। मैं तुम्हारा दुश्मन नहीं हूं।
15:58लेकिन मैं यहां सिर्फ बारिश से बचने के
16:00लिए भी नहीं आया। रामू और गौरी एक दूसरे
16:03का चेहरा देखने लगते हैं। चिट्ठी को कई
16:06बार पढ़ने के बाद भी रामू की बेचैनी कम
16:09नहीं हुई। उसने एक पुरानी बोरी अपने सिर
16:12पर रखी और दरवाजे की ओर बढ़ गया। बाहर अब
16:15भी तेज बारिश हो रही थी।
16:20अजी इस मौसम में कहां जा रहे हैं? चारों
16:24तरफ पानी ही पानी है। कहीं फिसल गए तो
16:27मेरा मन बहुत घबरा रहा है।
16:30गौरी घर में बैठकर डरने से कुछ नहीं होगा।
16:34यह चिट्ठी किसने भेजी? क्यों भेजी? इसका
16:37पता लगाना जरूरी है। और अगर कहीं थोड़ा
16:40बहुत काम भी मिल गया तो शाम के खाने का
16:43इंतजाम हो जाएगा। तुम चिंता मत करो। मैं
16:46जल्दी लौट आऊंगा। बाबा यह पुराना छाता ले
16:49जाओ। इसमें दो जगह से पानी टपकता है।
16:52लेकिन पूरी तरह भीगने से तो बच जाओगे। तू
16:55बहुत बड़ा हो गया है बेटा। चल मैं जल्दी
16:58लौटता हूं।
16:59रामू बारिश में भीगी कच्ची सड़क पर
17:02धीरे-धीरे आगे बढ़ जाता है। गली पूरी
17:05कीचड़ से भर चुकी थी। कई घरों के दरवाजे
17:08बंद थे। लोग खिड़कियों से बारिश देख रहे
17:11थे। रामू सबसे पहले गांव के बूढ़े किसान
17:15काका शंभू के घर पहुंचा।
17:19काका काका बाहर आइए।
17:27अरे रामू इस बारिश में? क्या हुआ बेटा? सब
17:33ठीक तो है काका। कल रात दो मुसाफिर मेरे
17:36घर रुके हैं। आज सुबह किसी ने मेरे नाम की
17:40एक चिट्ठी भेजी। उसमें लिखा था कि उन
17:43मेहमानों को पहचानने की कोशिश मत करना। आप
17:46पूरे गांव को जानते हैं। क्या किसी अजनबी
17:50को इधर आते देखा था? नहीं बेटा। लेकिन रात
17:54देर से मुझे ऐसा लगा था जैसे कोई आदमी
17:58पीपल के पेड़ के पास खड़ा था।
18:01बारिश बहुत तेज थी। इसलिए चेहरा नहीं देख
18:05पाया। तू जरा संभल कर रहना।
18:07धन्यवाद काका। अगर कुछ और याद आए तो मुझे
18:10जरूर बताइएगा।
18:12रामू आगे बढ़ा।
18:16थोड़ी दूर पर हरिराम अपनी आधी खुली दुकान
18:19में बैठा था।
18:23लाला जी मुझे उधार में ही चाहिए। बस एक
18:27बात पूछनी थी।
18:29अब क्या पूछना है?
18:31क्या आज सुबह मेरे घर की तरफ किसी अजनबी
18:35को जाते देखा था?
18:37देखा तो था। एक आदमी काला कंबल ओढ़े
18:40तुम्हारे घर वाली तरफ गया था। मैंने आवाज
18:43दी लेकिन वो बिना पीछे देखे आगे बढ़ गया।
18:46मुझे लगा कोई रिश्तेदार होगा। फिर वो वापस
18:50आया। यही तो अजीब बात है। मैंने उसे लौटते
18:54नहीं देखा।
18:55रामू का चेहरा और गंभीर हो गया। उधर घर
18:58में गौरी चूल्हे के पास बैठी बुझती आग को
19:01जलाने की कोशिश कर रही थी। बहन मेरा मन
19:06बार-बार घबरा रहा है। ना जाने रामू कहां
19:09होगा। घर में खाने को कुछ नहीं बचा। ऊपर
19:13से यह रहस्यमई चिट्ठी ऐसा लग रहा है जैसे
19:17कोई अनहोनी हमारे आसपास घूम रही हो।
19:21हिम्मत रखो बहन। कभी-कभी सबसे काली रात के
19:25बाद ही सबसे उजली सुबह आती है। मुझे
19:29विश्वास है तुम्हारे परिवार के अच्छे दिन
19:31बहुत दूर नहीं है। दोपहर ढलने लगी थी।
19:34बारिश अब भी लगातार हो रही थी। लेकिन पहले
19:37जितनी तेज नहीं थी। रामू भीगे कपड़ों में
19:40धीरे-धीरे घर की ओर लौट रहा था। उसके मन
19:43में कई सवाल थे। चिट्ठी किसने भेजी? काला
19:46कंबल ओढ़े आदमी कौन था? और मेहमान आखिर
19:50क्या छिपा रहे थे? जैसे ही वह घर के पास
19:53पहुंचा, छोटू दौड़ कर बाहर आ गया।
20:00बाबा आप आ गए। मां सुबह से आपका इंतजार कर
20:03रही थी।
20:04हां बेटा बस थोड़ी देर लग गई। तेरी मां
20:08कहां है? अंदर हैं और वो चाचा-चाची भी
20:13चुपचाप बैठे हैं।
20:14रामू अपने बेटे के साथ अंदर गया
20:19और अपने मेहमानों के साथ बैठ गया।
20:23अजी आप ठीक तो हैं? इतनी देर क्यों लगा
20:27दी? मैं तो डर गई थी।
20:29कुछ पता नहीं चला गौरी। बस इतना मालूम हुआ
20:32कि सुबह कोई अजनबी हमारे घर की तरफ आया
20:35था। लेकिन वो वापस जाता किसी ने नहीं
20:39देखा।
20:40यह सुनते ही गौरी की नजर अनजाने में
20:42मेहमान आदमी की तरफ चली गई। वो शांत बैठा
20:46था।
20:49भैया अब तो सच बता दीजिए। आप लोग कौन हैं
20:54और हमारे घर आने के पीछे असली वजह क्या
20:57है? कुछ पल तक खामोशी छाई रही। फिर मेहमान
21:01आदमी ने गहरी सांस ली।
21:04रामू गौरी मैं जानता हूं कि अब तुम्हारे
21:08मन में डर भी है और शक भी। लेकिन मैं
21:11तुमसे एक बात कहना चाहता हूं। आज तक हमने
21:15तुम्हारे घर में एक पल भी अपने आप को
21:17पराया महसूस नहीं किया। तुमने हमें बारिश
21:20से बचाया। भूखे रहकर खिलाया और बिना पूछे
21:23अपनापन दिया। ऐसा व्यवहार हर किसी के बस
21:26की बात नहीं होती। लेकिन आप मुझे जानते
21:29कैसे हैं?
21:30मेहमान आदमी ने धीरे से अपनी भीगी पोटली
21:33खोली। उसमें से एक पुरानी तस्वीर निकली।
21:36तस्वीर धुंधली थी, लेकिन उसमें एक जवान
21:40लड़का दिखाई दे रहा था।
21:44क्या तुम इस लड़के को पहचानते हो?
21:47रामू ने तस्वीर हाथ में ली। वो ध्यान से
21:50देखने लगा। अचानक उसकी आंखें फैल गई।
21:55ये, यह तो मेरा बचपन का दोस्त, मोहन है।
21:59लेकिन, यह तस्वीर आपके पास कैसे? मोहन
22:03मेरा बड़ा भाई था। सालों पहले वह इस गांव
22:05में रहता था। उसने मुझे कई बार तुम्हारे
22:08बारे में बताया था कि एक गरीब लड़का है जो
22:11दूसरों के लिए अपना हिस्सा भी छोड़ देता
22:14है। मैंने तब उसकी बातों पर ध्यान नहीं
22:16दिया। लेकिन कुछ महीने पहले भाई की पुरानी
22:19चीजों में तुम्हारा नाम मिला। तब मैंने
22:22सोचा कि कभी तुम्हें ढूंढूंगा।
22:24तो फिर वो चिट्ठी किसने भेजी?
22:27वो चिट्ठी मैंने नहीं भेजी। लेकिन जिसने
22:29भी भेजी वह शायद हमें पहचानता है। हम यहां
22:33किसी का बुरा करने नहीं आए। सच कहूं तो हम
22:36तो बस एक रात रुकना चाहते थे। लेकिन
22:38तुम्हारा व्यवहार देखकर लगा कि भगवान हमें
22:41किसी खास वजह से यहां लाया है।
22:43रामू और गौरी एक दूसरे को देखने लगे। उनके
22:47मन का डर थोड़ा कम हुआ। लेकिन रहस्य पूरी
22:50तरह अभी भी नहीं खुला था। शाम होने लगी।
22:54बारिश अब हल्की फुहार में बदल चुकी थी।
22:57गौरी ने बची हुई थोड़ी सी दाल गर्म की और
23:00सबको साथ बैठाकर खिलाया। इस बार किसी ने
23:03अलग थाली नहीं रखी।
23:07छोटू मेहमान आदमी के पास बैठा मुस्कुरा
23:09रहा था।
23:10चाचा जी कल बारिश रुक जाएगी क्या?
23:13शायद बेटा। और कभी-कभी बारिश रुकने के साथ
23:17कुछ परेशानियां भी चली जाती हैं।
23:19उसने रामू की तरफ देखा।
23:29रामू कल सुबह मैं तुमसे एक जरूरी बात
23:32करूंगा। वही बात जिसके लिए शायद भगवान ने
23:35हमें तुम्हारे घर तक पहुंचाया है।
23:37रामू ने धीरे से सिर हिला दिया। बाहर
23:40बादलों के पीछे सहल की रोशनी झांकने लगी
23:43थी। और इसी उम्मीद के साथ वह रात बीती। एक
23:46ऐसी रात जिसके बाद रामू के जीवन की दिशा
23:49बदलने वाली थी।
24:01अगली सुबह होते ही बारिश लगभग रुक चुकी
24:03थी। कई दिनों बादलों के बीच से हल्की धूप
24:06निकल रही थी। लेकिन रामू के मन में अभी भी
24:09बेचैनी थी।
24:14मेहमान आदमी धीरे-धीरे उठकर बाहर आंगन में
24:17आया।
24:20रामू आज वो समय आ गया है जब तुम्हें सब सच
24:24जान लेना चाहिए। मैं भी रात भर यही सोचता
24:27रहा साहब। आखिर आप है कौन?
24:31मेहमान आदमी ने अपनी जेब से एक पुराना
24:34चमड़े का बटुआ निकाला। उसमें से एक पहचान
24:37पत्र और कुछ कागज बाहर निकाले।
24:39मेरा नाम विजय है। मैं कोई साधारण मुसाफिर
24:43नहीं हूं। मैं और मेरी पत्नी पिछले कई
24:46महीनों से अलग-अलग गांव में बिना पहचान
24:49बताए घूम रहे हैं। हम ऐसे लोगों की तलाश
24:52कर रहे थे जो गरीबी में भी इंसानियत ना
24:55छोड़े।
24:55तभी गौरी और छोटू भी बाहर आ गए और सब एक
24:58दूसरे का चेहरा देखने लगे।
25:01जिस रात हम तुम्हारे घर आए थे, वह सिर्फ
25:04बारिश से बचने के लिए नहीं था। हम
25:06जानबूझकर ऐसे घर की तलाश कर रहे थे जहां
25:10लोग मुश्किल में हो। हम देखना चाहते थे कि
25:13भूखा इंसान पहले अपनी भूख मिटाता है या
25:16किसी और की। रामू तुमने बिना हमें जाने
25:19अपना घर खोल दिया। गौरी ने अपने बच्चे का
25:22हिस्सा तक हमारे लिए बचा लिया और छोटू ने
25:25कभी शिकायत नहीं की। तुम तीनों हमारी हर
25:29परीक्षा में सफल रहे।
25:30गौरी की आंखों से आंसू बहने लगे।
25:33तो वो चिट्ठी?
25:35वो हमारे साथ आए एक आदमी ने भेजी थी। हम
25:38देखना चाहते थे कि डर के कारण कहीं तुम
25:40हमें घर से निकाल तो नहीं दोगे।
25:42तभी बाहर गाड़ियों के रुकने की आवाज आई।
25:44गांव के कुछ लोग चौंक कर रामू के घर की
25:47तरफ देखने लगा। अच्छे कपड़े पहने कई लोग
25:50उतर कर सीधे विजय के पास आए। सबने आदर से
25:54सिर झुका दिया।
25:56अरे यह तो कोई बहुत बड़े आदमी लगते हैं।
26:00रामू और गौरी बिल्कुल स्तब्ध रह गए।
26:03रामू मैं करोड़पति हूं। मेरे कई कारखाने
26:07और संस्थाएं हैं। लेकिन इतने बड़े घरों
26:10में भी मुझे तुम्हारे जैसा बड़ा दिल नहीं
26:12मिला।
26:13इतना सुनते ही गांव के लोग दंग रह गए।
26:16हरिराम जिसने कभी रामू को उधार देने से
26:19मना कर दिया था। दूर खड़ा शर्म से सिर
26:22झुका चुका था। विजय ने अपने साथ आए लोगों
26:25की तरफ देखा। एक आदमी एक बड़ा बैग लेकर
26:28आगे आया। उसने बैग खोल दिया। अंदर नोटों
26:32की गड्डियां भरी हुई थी।
26:38रामू यह ₹1 करोड़ हैं। मैं चाहता हूं कि
26:43आज से तुम्हारी गरीबी हमेशा के लिए खत्म
26:46हो जाए।
26:46गांव के लोग शौक गए। लेकिन जो अगले ही पल
26:50हुआ उसने सबको हिला दिया। रामू ने बैग की
26:55तरफ [संगीत] देखा। फिर धीरे से उसे बंद कर
26:57दिया।
26:58साहब अगर मैं सिर्फ पैसे के लिए आपकी सेवा
27:02करता तो शायद आज यह बैग ले लेता। लेकिन
27:06मैंने आपको भगवान का मेहमान समझकर घर में
27:09जगह दी थी। उस इंसानियत की कीमत मैं कभी
27:14नहीं ले सकता। मुझे माफ कर दीजिए। मैं यह
27:17पैसे नहीं ले सकता।
27:19गांव के लोग स्तब्ध रह गया। गौरी भी कुछ
27:22पल के लिए रामू को देखती रह गई। विजय की
27:25आंखें भर आई।
27:31रामू यही आखिरी परीक्षा थी और तुम इसमें
27:35भी सफल हो गए। मैं तुम्हें पैसे देकर
27:38तुम्हारी इंसानियत खरीदना नहीं चाहता था।
27:41मैं तो सिर्फ यह देखना चाहता था कि
27:43तुम्हारा दिल सच में इतना बड़ा है या
27:46नहीं। आज से तुम इस गांव में बनने वाले
27:49हमारे नए अनाथ आश्रम और विद्यालय के आजीवन
27:53प्रबंधक हो। हर महीने तुम्हें सम्मानजनक
27:56वेतन मिलेगा। रहने के लिए नया घर मिलेगा।
27:59छोटू की पूरी पढ़ाई की जिम्मेदारी मेरी और
28:02सबसे बड़ी बात अब तुम्हें कभी किसी के
28:05सामने हाथ नहीं फैलाना पड़ेगा।
28:07रामू और गौरी की आंखों से खुशी के आंसू
28:10बहने लगे।
28:20कुछ महीनों बाद उसी गांव में एक बड़ा
28:23विद्यालय बन चुका था। रामू अब भी उतना ही
28:26सरल था। गौरी रोज अनाथ बच्चों के लिए अपने
28:30हाथों से खाना बनाती थी। छोटू स्कूल की
28:33यूनिफार्म पहनकर पढ़ने जाता था। एक दिन
28:36छोटू ने पूछा।
28:39बाबा अगर उस रात आपने दरवाजा बंद कर दिया
28:43होता तो क्या होता? रामू मुस्कुराया।
28:47बेटा शायद उस रात हमने सिर्फ दो मेहमानों
28:51को नहीं अपनी किस्मत को भी बाहर ही छोड़
28:54दिया होता।
28:55कभी-कभी भगवान लोगों की जिंदगी में मेहमान
28:58बनकर आता है। लेकिन वह घर की नहीं दिल की
29:01चौखट पर दस्तक देता है। जैसे रामू के घर
29:05हुआ