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DAY-7 | LIVE Upanishad Gyanamrit | Janjgir, Chhattisgarh | Raseshwari Devi Ji

Raseshwari Devi Ji · 12,139 words · 56 min read

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0:01गोविंद राधे

0:04राधे राधे गोविंद

0:07गोविंद राधे

0:10राधे राधे गोविंद

0:14गोविंद राधे

0:17राधे राधे गोविंद

0:20गोविंद राधे

0:23राधे राधे गोविंद

0:27गोविंद राधे

0:30राधे राधे गोविंद

0:33गोविंद राधे

1:07राधे राधे गोविंद

1:10गोविंद राधे

1:13राधे राधे गोविंद गोविंद गोविंद राधे

1:20राधे राधे गोविंद

1:23गोविंद राधे

1:26राधे राधे गोविंद

1:29गोविंद राधे

1:32राधे राधे गोविंद

1:36गोविंद राधे

1:39राधे राधे गोविंद

1:42गोविंद राधे

1:45राधे राधे गोविंद

1:48गोविंद राधे

1:51राधे राधे गोविंद

1:55गोविंद राधे

1:58मेरे दो ठाकुर

2:01गोविंद राधे

2:04मेरे दो ठाकुर

2:08गोविंद राधे

2:11मेरे दो ठाकुर

2:14गोविंद राधे

2:17मेरे दो ठाकुर

2:20गोविंद राधे

2:23ब्रज रस की एक बूंद पिला दे

2:29ब्रज रस की एक बूंद पिला दे

2:39राधे राधे

2:41अलबेली सरकार की

2:44जय।

2:45श्रीमद् सद्गुरु सरकार की

2:48जय।

2:50उपनिषद ज्ञान अमृत की सातवा दिवस पर आप

2:54सभी श्रोताओं का अभिनंदन है, नमन है।

3:01पूजनीय देवी जी हमारे बीच पधार चुके हैं।

3:05अतः सभी श्रोताओं को अनुरोध है खड़े होकर

3:09उनका स्वागत करें।

3:26श्रीमद् पद वाक्य प्रमाण

3:30पाराणम

3:35वेद मार्ग प्रतिष्ठापनाचार्य

3:44निखिल दर्शन समन्वयचार्य

3:52सनातन वैदिक धर्म प्रतिष्ठा

3:59सत संप्रदाय

4:02परमाचार्य

4:07भक्ति योग रसा

4:13भगवन अनंत श्री विभूषित

4:19जगत गुरु एकज

4:24स्वामी श्री कृपालु जी महाराज

4:47अब मैं सादर आमंत्रित करती हूं।

4:53श्रीमान चरणदास महंत जी नेता प्रतिपक्ष

4:59छत्तीसगढ़ विधानसभा

5:02एवं उनके सुपुत्र सूरत महंत जी

5:17श्रीमती कमला पाटले जी पूर्व सांसद

5:22जांजगीर चांपा

5:26कृपया आप मंच पर पधारे

5:30एवं

5:32देवी जी के स्वागत करें।

5:43श्रीमान चरण दास महंत जी

5:54श्री जय सिंह अग्रवाल जी

5:58पूर्व विधायक कुरवा

6:06डॉक्टर श्यामलाल ओ जी कृपया आप मंच पर

6:11पधार कर देवी जी का स्वागत करें

6:26श्रीमती कमला पाटले जी

6:34डॉक्टर श्यामलाल जी

6:57डॉक्टर श्याम लाल जी

7:00पुष्प गुच्छ देवी जी का स्वागत करें।

7:51अब मैं देवी जी से निवेदन करती हूं कि वह

7:55अपना दार्शनिक प्रवचन प्रारंभ करें।

8:09ॐम

8:46करा

8:49रविवंदे

8:53ना पदार

8:55रविंदम

8:59मुखरविंदे

9:04विनिवेशम

9:09बटस पत्रस पुटे

9:14शयम

9:18बालम

9:19मुकुंदम

9:22मनसा

9:28बालम

9:30मुकुंदम

9:33हृदयम

9:36नमामि

9:43गुरुरा

9:48धनाष्ट

9:52गुरु

9:53परम दवतम

10:00गुरु

10:03परतरम

10:07नास्त

10:11कृपालु

10:14गुरुवे

10:18नम

10:30आनंद कंद सच्चिदानंद

10:33श्री कृष्ण चंद्र चरण चरणारविंद

10:36मकरंद मिलिंद महानुभाव

10:41दैनिक नियमानुसार पहले थोड़ी देर भगवन नाम

10:45संकीर्तन कर लीजिए पश्चात आप सब की सेवा

10:50करने का यत किंचित प्रयास किया जाएगा।

10:55भगवन नाम संकीर्तन में आप सभी लोग उदारता

10:59का परिचय देंगे।

11:55ओम

12:38राधे राधे गोविंद

12:44गोविंद

12:46राधे

12:48राधे राधे गोविंद

12:53गोविंद राधे

12:56राधे राधे गोविंद

13:01गोविंद

13:02राधे

13:04राधे राधे गोविंद

13:09गोविंद राधे

13:12राधे राधे हे गोविंद

13:17गोविंद राधे

13:20राधे राधे गोविंद

13:25गोविंद राधे

13:29राधे राधे गोविंद

13:33गोविंद राधे

13:36राधे राधे गोविंद

13:41गोविंद राधे राधे राधे राधे गोविंद

13:49गोविंद

13:51राधे

13:53राधे राधे गोविंद

13:57गोविंद

13:59राधे

14:01राधे राधे गोविंद

14:05गोविंद

14:07राधे

14:09राधे राधे गोविंद

14:14गोविंद राधे

14:17राधे राधे

14:20गोविंद

14:22गोविंद राधे

14:25राधे राधे गोविंद

14:30गोविंद राधे

14:33राधे राधे गोविंद

14:38गोविंद

14:39राधे

14:41राधे राधे राधे गोविंद

14:46गोविंद राधे

14:49तुम भी मोहे भूलो नहीं

14:54गोविंद राधे

14:57तुम भी मोहे भूलो नहीं

15:02गोविंद राधे

15:05तुम भी मोह भूलो नहीं

15:10गोविंद

15:11राधे

15:13तुम मोहे भूलो नहीं गोविंद राधे

15:21मैं भी तो ही भूलूं नहीं पल छिन आधे

15:29मैं भी तो ही भूलूं नहीं पल छिन आधे

15:37मैं भी तो ही भूलूं नहीं पल छिन आधे

15:45मैं भी जो ही भूल नहीं

15:50पल चिन राधे

15:53राधे राधे गोविंद

15:58गोविंद राधे

16:01राधे राधे गोविंद

16:06गोविंद राधे

16:09राधे राधे राधे गोविंद

16:14गोविंद राधे

16:17राधे राधे गोविंद

16:22गोविंद राधे

16:25राधे राधे गोविंद

16:29गोविंद राधे

16:33राधे राधे गोविंद

16:37गोविंद राधे राधे

16:41प्यार करो या मारो गोविंद

16:46राधे

16:48प्यार करो या मारो

16:53गोविंद राधे

16:56प्यार करो या मारो गोविंद

17:02राधे

17:04प्यार करो या मारो

17:09गोविंद राधे

17:13पाछा नहीं छोड़े हम

17:17पल चिन आधे

17:20पाछा नहीं छोड़े हम पल चिन आधे

17:28पाछा नहीं छोड़े हम पल चिन आधे

17:36पाछा नहीं छोड़

17:39हम बल छिन आधे

17:44गोविंद

17:46राधे

17:48गोविंद

17:49राधे

17:51गोविंद

17:53राधे

17:55गोविंद

17:57राधे

17:59राधे राधे गोविंद

18:03गोविंद राधे

18:06राधे राधे राधे गोविंद

18:11गोविंद राधे

18:14राधे राधे गोविंद

18:18गोविंद राधे

18:21राधे राधे गोविंद

18:26गोविंद राधे

18:34बोलिए वृंदावन बिहारी लाल

18:37की जय

18:39श्रीमत सतगुरु सरकार की जय

19:44अब आप सब लोग

19:47एकाग्रित होकर बैठे

19:52उतषत जागृत

19:56प्राप्त वर निबोधत

20:00कठो उपनिषद

20:06उपनिषद

20:08ब्रह्मांड का सर्वश्रेष्ठ

20:12एवं सर्वोपरि

20:15अलौकिक ज्ञान है।

20:20मानव मात्र को

20:23यह उपनिषदों का ज्ञान

20:28सदा से

20:30परमात्मा के बोध हेतु आत्मा के बोध हेतु

20:36मन को संयमित करने हेतु

20:39प्रेरित करता रहा है।

20:43तो उपनिषद के इस मंत्र की व्याख्या करते

20:47हुए

20:49अब तक आप लोगों ने जो कुछ जाना

20:55आइए एक बार दोहरा ले

21:00मनुष्य के मस्तिष्क में

21:05जब भगवान शब्द आता है

21:10तो तुरंत

21:13एक प्रश्न उठता है

21:16कि उपनिषदों का ज्ञान यह जो ब्रह्म विद्या

21:20है जिसको पाने का अधिकारी मनुष्य है। हम

21:24मानते हैं।

21:26लेकिन क्या

21:29भगवान की

21:31एकिस्टेंस है?

21:34हर एक के मस्तिष्क में कभी जीवन में यह

21:39बात उठती है।

21:42क्या प्रमाण है?

21:45कि भगवान है।

21:51और

21:54कई वर्षों से

21:59यह प्रश्न

22:03लोगों के मस्तिष्क में रहा है

22:07कि भगवान का प्रमाण क्या है? भगवान के

22:11एकिस्टेंस का प्रमाण क्या है?

22:17देखिए किसी भी

22:20तत्व को

22:22प्रमाणित किया जाता है

22:26तीन प्रकार से।

22:30पहला होता है प्रत्यक्ष प्रमाण, दूसरा

22:33होता है अनुमान प्रमाण और तीसरा होता है

22:39शब्द प्रमाण।

22:44प्रत्यक्ष प्रमाण का मतलब

22:48प्रूफ

22:53देखकर विश्वास करना

22:56बिलीविंग बाय सी

22:59हम जो सामने देखते हैं हम उसी पर विश्वास

23:04करते हैं। वैज्ञानिक लोग, साइंटिस्ट लोग

23:08वो चाहते हैं कि आप

23:12लैबोरेटरी में डसेक्ट करके एक्सपेरिमेंट्स

23:15के द्वारा हमें प्रमाणित करो कि भगवान है।

23:20तभी हम इसको मानेंगे।

23:24लेकिन

23:25और मैं आपको बताऊं

23:29हम लोग भी आश्चर्य करते हैं जब इस जगत को

23:32देखते हैं हमारे आंखों के सामने यह जगत और

23:36जब आंखें ऊपर की ओर जाती हैं आसमान की ओर

23:41वो चमकते हुए सितारे

23:44कितनी सुंदर चद्दर और उसमें

23:48तारे

23:51कितना सुंदर दृश्य होता

23:53रात्रि में

23:56हम सोचते भी हैं मन ही मन

24:01यह कैसे प्रकट हुआ?

24:05इतना सुंदर डिजाइन करने वाला कौन है? कोई

24:09तो डिजाइनर होगा। बिना डिजाइनर के तो

24:12डिजाइन हो नहीं सकता।

24:16अरे यहां तक कि

24:19आप रोज पानी पीते हैं। जिसने केमिस्ट्री

24:22पढ़ी होगी आप सब पढ़े लिखे हैं।

24:26वाटर को कहते हैं H2O

24:31यानी 2:1 दो एटम हाइड्रोजन का और एक

24:36ऑक्सीजन का मिलकर बना एच टू पानी।

24:42अब आश्चर्य की बात है कि वह दो एटम

24:45हाइड्रोजन और एक एटम ऑक्सीजन। यदि यही

24:50ऑक्सीजन दो एटम हो जाता है H2O2 तो वो हो

24:54जाता है हाइड्रोजन परऑक्साइड।

25:00क्या यथार्थता है।

25:03कितनी बारीकियां है।

25:07इतनी सी रेशो बदल जाने पर वो H2O2

25:11प्रॉपर्टीज ही बदल गई। उसका स्वभाव, उसका

25:14गुण सब बदल गया।

25:18कितने आश्चर्य की बात है।

25:21तो फिर मस्तिष्क में यह बात भी आनी चाहिए

25:24कि जब इतनी बारीकियां है तो इन बियों

25:29बारीकियों को सजाने वाला कोई तो होगा।

25:37किस प्रमाण की आप बात करते हैं? जिस आत्मा

25:40को लेकर आप जीवित हैं।

25:44यह आत्मा निकल जाए तो हम सब मुर्दे हो

25:46जाए। उसी आत्मा के बल से हम देख रहे हैं,

25:51सुन रहे हैं, सूंघ रहे हैं, स्पर्श कर रहे

25:54हैं, सोच रहे हैं, निर्णय ले रहे हैं। वो

25:57आत्मा की उपस्थिति ही तो परमात्मा का

26:02प्रत्यक्ष प्रमाण है। और क्या प्रमाण?

26:09कहां से आई? कैसे आई?

26:13किस द्वार से आई?

26:17और कैसे गई?

26:22यदि आप

26:26प्रत्यक्ष प्रमाण पर विश्वास करते हैं।

26:29आंखों का देखा हुआ विश्वास करते हैं। इसी

26:32आत्मा को हमने क्या देखा है? नहीं। तो

26:37विश्वास तो है ना कि कोई है जो चेतनता

26:40प्रदान कर रहा है। कोई आत्मा है

26:45सूक्ष्मति सूक्ष्म दिखाई नहीं पड़ती लेकिन

26:49बिना देखे भी आप मानते हैं या नहीं? तो

26:53बहुत सी वस्तुएं संसार में ऐसी हैं

26:58जिसको आपने देखा नहीं है

27:01लेकिन आप मानते हैं।

27:04हर बात आंख का देखा हुआ ही प्रमाण हम माने

27:09ये कोई जरूरी नहीं है।

27:14आपने अपने दादा को देखा है। हां दादा के

27:18दादा को हां अच्छा दादा के दादा के दादा

27:22को नहीं देखा यानी पर पर दादा को नहीं

27:25देखा नहीं तो जब आपने अपने दादा के दादा

27:29को दादा नहीं को नहीं देखा आप मानते तो है

27:32ना कि वह है

27:35फोटो वोटो तो लगी है देखा तो नहीं आपने

27:39आंख से लेकिन मान रहे

27:44अच्छा खैर छोड़िए

27:48आपके सामने तुरंत

27:52गाय का दूध दो के लाया गया

27:56और आपसे पूछा गया कि देखिए आप इस कंटेनर

27:59में इस दूध को लेकर बैठे हैं। मैं आपसे

28:03पूछती हूं इस दूध में मक्खन है।

28:09आप कहेंगे दिखाई तो नहीं पड़ता।

28:12तो इसका मतलब

28:15इसमें मक्खन नहीं है।

28:19अच्छा एक काम करो उसको एकांत में जमाओ।

28:24जमाया हां दही बना। हां तो यह दूध से

28:29ट्रांसफॉर्मेशन हुआ। दही बन गया। अब इस

28:31दही को बिलो मत

28:37मक्खन निकला। हां।

28:41तो यह तो वही दूध है ना जिसमें आपको मक्खन

28:45दिखाई नहीं पड़ रहा था। हां लेकिन आपने एक

28:49प्रक्रिया की एक प्रोसेस किया। उस प्रोसेस

28:52से वही जो उस दूध में मक्खन व्याप्त था।

28:56उस प्रोसेस उस प्रक्रिया से वो उभर के ऊपर

29:00आ गया।

29:04ऐसे ही

29:08बहुत सी चीजें ऐसी है जगत में जो वस्तु

29:11में सामने दिखाई नहीं पड़ती लेकिन जब आप

29:14प्रोसेस में जाते हैं तो वह प्रकट होती

29:17है। बिल्कुल ऐसे ही

29:23आपको आपकी आंख से भगवान नहीं दिखते।

29:27इसीलिए आप यह कंक्लूजन में पहुंच जाए कि

29:31भगवान नहीं है।

29:33ऐसा नहीं।

29:36पहले आप

29:39जो शास्त्रों में बताया गया है प्रोसेस

29:43भगवान को जानने का। आप उस प्रक्रिया को

29:47कीजिए। उस प्रोसेस से आगे बढ़िए। अपने

29:50हृदय को शुद्ध कीजिए। पावन कीजिए और

29:55पावन हृदय होने के पश्चात यदि उसका अनुभव

29:59ना हो तब आप डिक्लेअ कर सकते हैं डंके की

30:04चोट पे कि भगवान नहीं होते। हमने यह

30:08प्रोसेस फॉलो किया। हमें कुछ अनुभव नहीं

30:12हुआ। जब तक आपने प्रोसेस ही प्रारंभ नहीं

30:16किया है। आपको राइट नहीं है यह बोलने का

30:19कि भगवान नहीं होते।

30:24इसीलिए रामकृष्ण देव ने कहा

30:30दिन में तारे आपको सूर्य के प्रकाश से

30:35नहीं दिखाई पड़ते।

30:38यह आपके आंखों की कमी है। इससे यह सिद्ध

30:43नहीं होता कि दिन में तारे नहीं।

30:47ऐसे ही हमें भगवान हमारी अज्ञानता के कारण

30:52नहीं दिखते। इससे यह सिद्ध नहीं होता कि

30:56भगवान नहीं।

30:59जैसे

31:01मैं आपसे पूछती हूं

31:05दर्द दिखाई देता है।

31:08नहीं

31:12होता है ना? प्रेम दिखाई पड़ता है। होता

31:16है। उसी से दुनिया टिकी। उसी से संबंध

31:21टिके लेकिन वो दिखाई तो नहीं पड़ता।

31:24दया कृपा

31:29ये दिखाई तो नहीं पड़ते ना।

31:32लेकिन नहीं है ये आप कैसे कह सकते हैं? वो

31:36है आप महसूस करते हैं

31:40तो प्रत्यक्ष प्रमाण बहुत सीमित है।

31:43प्रत्यक्ष प्रमाण से भगवान को कोई जान

31:48नहीं सकता। और मैंने आपको शास्त्रों का

31:50प्रमाण दिया था कि उपनिषद कहता है जिस

31:54पैमाने से आप भगवान को जानना चाहते हैं वो

31:58पैमाना आपका इंद्रियां मन और बुद्धि तो

32:02प्राकृत है लिमिटेड और वो भगवान अनलिमिटेड

32:06है। अनलिमिटेड को लिमिटेड पैमाने से आप

32:10नहीं नाप सकते। वो ग्राह्य ही नहीं।

32:18जहां

32:20तक हमारी पहुंच है वहां से तो उसकी शुरुआत

32:23है।

32:26कहां जाएंगे आप?

32:28आपकी इंद्रियों की पहुंच तो मन तक भी नहीं

32:32है। मन की पहुंच तो बुद्धि तक भी नहीं है।

32:36बुद्धि की पहुंच आत्मा तक भी नहीं है। इस

32:39बुद्धि ने आत्मा को ही नहीं जाना आज तक।

32:44फिर परमात्मा को जानना।

32:49तो प्रत्यक्ष प्रमाण तो बहुत सीमित और

32:54धुंधला है। अनुमान प्रमाण हमारे यहां

33:02अनुमान प्रमाण को भी माना जाता है। हां ये

33:06प्रत्यक्ष प्रमाण से ऊपर है।

33:10इनफ्रेंशियल एविडेंस

33:17अनुमान प्रमाण अर्थात जैसे

33:21आप यू समझ सकते हैं

33:24कि आप

33:26वायर में करंट जा रही है। आपको दिखाई नहीं

33:30पड़ती।

33:32लेकिन जब आप बल्ब को जलता हुआ देखते हैं

33:35तो जलते हुए बल्ब से अनुमान लगा लेते हैं

33:39कि करंट है। इसको कहते हैं अनुमान प्रमाण।

33:44यत्र यत्र धूमस तत्र तत्र अग्नि

33:48अर्थात

33:50यदि धुआ दिखाई पड़ रहा है तो पक्की बात है

33:55कि वहां आग लगी थी

33:59तो धुए को देखकर अनुमान लगा लेना आग का

34:02इसको कहते हैं अनुमान प्रमाण

34:06ऐसे ही

34:08जब हम इस जगत को देखते हैं

34:12हम जब सूर्य को देखते हैं, चंद्रमा को

34:16देखते हैं, नक्षत्र ग्रह तारों को देखते

34:20हैं और उनके कार्यों को देखते हैं। इतना

34:24नियमित,

34:27इतना संयमित

34:30सारे काम

34:32संतुलित रूप से हो रहे हैं।

34:36देखिए विज्ञान नियमों को मानता है।

34:41यदि विज्ञान नियमों को मानता है चाहे वह

34:44केमिस्ट्री के नियम हो फिजिक्स के हो

34:48मैथमेटिक्स के थ्योरम्स हो

34:52चाहे जग्राफी हो कोई भी क्षेत्र हो विषय

34:57हो

34:59नियम है साइंस नियम को मानता है तो मुझे

35:03बताइए जहां साइंस लॉ को मान रहा है तो

35:07क्या उस लॉ को नियम को बनाने वाला कोई

35:10नहीं केमिस्ट्री, फिजिक्स इसमें जो नियम

35:14है उसको बनाने वाला कोई रहा होगा ना। तो

35:18जब साइंटिस्ट नियमों को मानते हैं तो बिना

35:22नियम बनाने वाले के नियम नहीं बने।

35:28ऐसे ही

35:30यह सारे ग्रह नक्षत्र, सूर्य, चंद्र आदि

35:34यह नियमित रूप से चल रहे हैं। कार्य कर

35:37रहे हैं।

35:40कैसे?

35:43कोई तो लॉ मेकर होगा।

35:49अरे यह संसार अपने आप बन गया। कैसे अपने

35:52आप बन गया? अपने आप कोई चीज होती है क्या?

35:59एक घड़ा मिट्टी का घड़ा

36:03जिसमें आप पानी पीते हैं गर्मी के दिनों

36:06में वो भी अपने आप नहीं बनता।

36:11कैसे बना वो घड़ा? आप कहेंगे मिट्टी से

36:15बना तो क्या मिट्टी अपने आप एकत्रित हो गई

36:17और घड़ा बन गया? नहीं नहीं जी वो ऐसा है

36:21कि कुम्हार ने बनाया।

36:24तो मिट्टी के घड़े को बनाने के लिए

36:26कुम्हार चाहिए ना? हां।

36:30लेकिन मैं कहूंगी केवल कुम्हार के होने से

36:33भी मिट्टी का घड़ा नहीं बन सकता। क्यों?

36:38अरे उस कुम्हार में दक्षता भी तो होनी

36:41चाहिए उसको बनाने की। हाथ कटे होंगे तो

36:45कैसे? नाम को कुम्हार है लेकिन हाथ नहीं

36:48है या जो डिजाइन हम चाहते हैं वो डिजाइन

36:52बनाने की दक्षता नहीं है।

36:55अच्छा चलो दक्षता भी है मूड नहीं है। नहीं

36:58बनाते आज हमारा मूड नहीं है। तो नहीं

37:02बनेगा।

37:04फिर

37:05कुम्हार को बनाने के लिए वो उपकरण भी

37:09चाहिए, इक्विपमेंट्स भी चाहिए तब घड़ा

37:12बनेगा। बिना

37:16उपकरणों के तो नहीं बनेगा ना। तो देखिए एक

37:20छोटे से घड़े को बनाने के लिए कितने

37:24फैक्टर्स चाहिए।

37:27मिट्टी भी चाहिए, उपकरण भी चाहिए, परिश्रम

37:30भी चाहिए, दक्षता भी चाहिए। फिर इसके

37:34पश्चात उसका मन भी होना चाहिए, इच्छा

37:37शक्ति भी चाहिए। फिर कुम्हार भी सही सलामत

37:41होना चाहिए। तब जाके वह घड़ा बनेगा।

37:46तो एक छोटे से घड़े को बनाने के लिए

37:51इतनी बातों का होना आवश्यक है। तब वो घड़ा

37:55बनता है। इतना बड़ा संसार

38:02संसती संसार

38:05गच्छति जगत

38:07ये अपने आप बन गया।

38:10इसको कोई बनाने वाला नहीं। कितने आश्चर्य

38:14की बात है।

38:19पृथ्वी

38:22ऐसी एक शक्ति से

38:25अपनी धुरी पर घूमती है।

38:29कितनी बड़ी पृथ्वी और कितनी भारी

38:33ट्रिलियंस ऑफ बिलियंस ऑफ टन्स की।

38:37इतनी भारी पृथ्वी अपने एक्सिस पर अपनी

38:41धुरी पर स्वयं घूमती है। किस शक्ति से? है

38:45ना कोई शक्ति?

38:48और वही शक्ति से वह अपने एक्सिस पर घूमती

38:51है। फिर वही पृथ्वी उसी शक्ति से सौरमंडल

38:56में भी चक्कर लगाती है।

39:02वही शक्ति

39:04हमारे भीतर हार्ट बीट हो रहा है। वही

39:07शक्ति लंग्स में हवा भर रही है।

39:11एक शक्ति

39:14हम बाहर भी देख रहे हैं। अपने भीतर भी देख

39:17रहे हैं। वही तो शक्ति है लेकिन

39:21वही चेतना हमारे भीतर

39:25परंतु

39:28वो भगवान है नहीं बोलेंगे

39:31नहीं बोलेंगे हम उसको भगवान

39:35इज्जत पर बट्टा लग जाएगा

39:40हम सब बैठे हैं अभी आराम से

39:47पृथ्वी घूम रही है।

39:51पृथ्वी घूम रही है लेकिन हम स्टैंड स्टिल

39:53है। आराम से बैठे जमीन पर जमीन हिल रही है

39:56क्या? नहीं। लेकिन पृथ्वी तो घूम रही।

40:02तो कोई तो होगा ना।

40:05यही शक्ति

40:08यही वह महान शक्ति है।

40:12इसका हम अनुमान लगाते हैं। कि हां भगवान

40:17होंगे। यह है अनुमान प्रमाण।

40:21लेकिन हमारे यहां शास्त्रों में कहा गया

40:25कि भाई डाउट हो सकता है। इसीलिए प्रमाणित

40:30को माना जाए तो हमारे यहां शब्द प्रमाण को

40:34ही सही माना गया। उसे ही स्वीकार्य किया

40:38गया। उसी को पूर्ण माना गया।

40:43प्रमाणिक माना गया। शब्द प्रमाण क्या है?

40:47जैसे संसार में

40:50हम मनुष्यों का स्वभाव है कि हम अपने से

40:56अधिक ज्ञान वाले को

41:00अधिक एक्सपीरियंस वाले को अथॉरिटी मानते

41:03हैं।

41:08जैसे हम पढ़ाई क्यों करते हैं?

41:12क्योंकि पहले दर्जे से लेकर

41:17पोस्ट ग्रेजुएट तक ले लीजिए।

41:21हमने अपने से अधिक ज्ञानवान किसी को माना,

41:26अनुभवात्मक माना और हमने अपने आप को

41:30सम्मिट किया, समर्पण किया।

41:34सिखाया गया ए अक्षर ऐसे होता है, अ ऐसे

41:37होता है। हमने बुद्धि नहीं लगाई। अक्ल

41:41नहीं लगाई।

41:44वह एक्सपीरियंस है, ज्ञानवान है। अथॉरिटी

41:47मान ली और मानकर हम ए से लेकर पोस्ट

41:51ग्रेजुएट तक पढ़ते रहे। सब पढ़ते हैं।

41:56सब पढ़ते हैं।

41:59मान लिया।

42:01और यही सबसे अच्छा प्रमाण है ज्ञान पाने

42:06का इंफॉर्मेशन पाने का शब्द प्रमाण

42:11चाहे अपरा विद्या लीजिए संसार की विद्या

42:15जो स्कूल कॉलेजेस से मिलती है चाहे कोई भी

42:19विषय की विद्या वो शास्त्र है आध्यात्मिक

42:23विद्या के वही बुक्स है आपकी अपरा विद्या

42:27संसारी विद्या के उसमें सारा ज्ञान

42:32किसी भी विषय का उस ज्ञान से आप ज्ञानी

42:36बनते हैं। इसको कहते हैं शब्द प्रमाण। तो

42:41संसार में भी यही शब्द प्रमाण पर विश्वास

42:46किया जाता है। उसी से ही हमें इंफॉर्मेशन

42:48मिलती है। ऐसे ही ईश्वरीय क्षेत्र में भी

42:53वेद को प्रमाण माना गया। उपनिषद को प्रमाण

42:59माना गया। उसी ब्रह्म विद्या को मानकर हम

43:04भगवान के बारे में जानते हैं, अनुभव करते

43:08हैं। क्योंकि वेद भगवान के शसों से प्रकट

43:12हुआ है। इसलिए वह अलौकिक दिव्य ज्ञान है।

43:16उसमें कोई दोष नहीं है। कोई कमी नहीं है।

43:22वह हर दोष से मुक्त है। वह भगवान का

43:27स्पिरिचुअल लॉ है।

43:32तो आपने यह जाना कि भगवान को

43:37यदि प्राप्त करना है इसी मनुष्य शरीर में

43:41तो हम अपने अक्ल से नहीं प्राप्त कर सकते

43:44अपितु

43:47यमे वैते ते

43:50आत्मा विते तनुम स्वा

43:56कठोपनिषद एक दो 23

43:59जब वो भगवान किसी सौभाग्यशाली जीव पर अपनी

44:04कृपा दृष्टि कर देगा तब उसकी कृपा को

44:08प्राप्त करके वो जीव भगवान को जान लेगा

44:12देख लेगा और कृतार्थ हो जाएगा।

44:16फिर प्रश्न उठा कि यह भगवत कृपा

44:21हम पर कैसे होगी?

44:27तो आपको बताया गया कि भगवान की कृपा को

44:31पाने के लिए हमें भगवत शरणागति करनी है।

44:37भगवान की शरण में जाना है।

44:42शरण में जाना क्या होता है? शरणागति

44:47कौन करेगा? तो बताया गया कि शरणागति करने

44:52वाला है मन।

44:54मन को भगवान को समर्पित करना है।

45:00तो यह समझ में नहीं आता कि हम बहुत सुनते

45:03हैं। शरणागति शरणागति गीता में डिटेल में

45:07वर्णन है। शरणागति का भगवान ने अर्जुन को

45:10शरणागति का ज्ञान दिया। समर्पण करने को

45:14कहा। लेकिन

45:17इसका स्वरूप क्या है?

45:21कैसे की जाए? शरणागति होती क्या है? थोड़ा

45:24इसको समझा दीजिए।

45:28आइए इसको थोड़ा समझ ले। देखिए मैं आपके

45:32समक्ष

45:36गीता का ज्ञान रखने जा रही हूं। और पूरी

45:42गीता को मैं आपको पांच मिनट में समझा

45:45दूंगी।

45:47सार उसका

45:51कुरुक्षेत्र का मैदान

45:55आगे

45:57सार्थक्य कर रहे हैं भगवान श्री कृष्ण और

46:03अर्जुन रथ पर सवार हैं। दोनों ओर सेनाएं

46:07हैं।

46:10अर्जुन का गांडीव उसके हाथ से सरक रहा है

46:15और शोकाकुल होकर

46:18अर्जुन कहता है गांडीव संसते हस्ताक्ष

46:24परिदते

46:31हे जनार्दन

46:33केशव मेरे हाथ से यह गांडीव छूट रहा है।

46:38मैं पसीना पसीना हो रहा हूं।

46:43क्यों?

46:45क्या बात है? अर्जुन

46:49सामने क्या देख रहा है? अर्जुन देख रहा है

46:53उसके

46:55भाई,

46:57उसके गुरुजन,

47:03कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, फिर पितामह, फिर

47:07सारी कौरव सेना, अर्जुन इन सबको देख रहे

47:10हैं।

47:11ये अर्जुन साधारण नहीं है।

47:15वैसे तो अर्जुन नर नारायण के अवतार हैं।

47:20लेकिन हम जीवों के बिहाफ

47:24हमारी तरफ से अज्ञानता का अभिनय कर रहे

47:29हैं अवतार काल में क्योंकि यदि वो हमारी

47:32तरफ से प्रश्न नहीं करेंगे तो हमें हमारे

47:37जीवन में शिक्षा कैसे मिलेगी?

47:41इसीलिए हमारी ओर से अर्जुन खड़े हैं।

47:45और अर्जुन अपनी दशा क्या दिखा रहे हैं?

47:48अर्जुन के साथ श्री कृष्ण है।

47:54लेकिन फिर भी जिस अर्जुन को यह पता है कि

47:59द्रोपदी का अपमान हुआ और स्वयं प्रतिज्ञा

48:03ली उसके खुले केश देखकर और अर्जुन को यह

48:07भी पता है कि युद्ध में लोगों का वध किया

48:10जाता है। वही अर्जुन

48:15केशव से कहता है कि मैं युद्ध नहीं

48:18करूंगा। क्यों?

48:22कि तैयारी के पश्चात भी

48:26जब उसने अपने रिश्तेदारों को देखा, अपने

48:30गुरुजनों को देखा

48:34तो वह लगाव,

48:36वह मोह

48:39वह मोह में बह चला।

48:42वो प्रतिज्ञा भूल गई।

48:45वो वचन भूल गए।

48:49सब भूल गया।

48:51और क्या कह रहे हैं? मैं युद्ध नहीं

48:54करूंगा।

48:57तब श्री कृष्ण जी ने कहा

49:01अर्जुन

49:04तुम्हें पता है तुम्हारा धर्म क्या है?

49:12तुम क्षत्रिय हो।

49:16तुम्हारा धर्म है वर्णाश्रम धर्म के

49:20अंतर्गत तुम्हारा धर्म है युद्ध करना। यदि

49:26क्षत्रिय अपने धर्म का पालन नहीं करता तो

49:29वह अधर्म है। इसीलिए यदि तुमने युद्ध नहीं

49:33किया तो यह अधर्म माना जाएगा और तुमको नरक

49:38मिलेगा।

49:41तब अर्जुन कहते हैं पूछते हैं श्री कृष्ण

49:44जी से कि केशव

49:48मैं तो लोगों की हत्या नहीं कर रहा

49:52कोई पाप नहीं कर रहा

49:56करना भी नहीं चाहता हिंसा नहीं करना चाहता

50:00ये तो अच्छी बात है फिर आप नरक क्यों दे

50:03रहे हैं नरक की बात क्यों कर रहे हैं

50:06क्योंकि तू अपने वर्णाश्रम धर्म का पालन

50:08नहीं कर रहा। ठीक ठीक ठीक।

50:13अर्जुन ने कहा यदि ऐसी बात है कि मुझे

50:16अपने क्षत्रिय धर्म का पालन करना है।

50:22यदि नहीं करूंगा तो मुझे नरक मिलेगा। तो

50:25मैं पूछना चाहता हूं यदि मैं युद्ध करूंगा

50:29तो मुझे क्या मिलेगा?

50:32तो श्री कृष्ण जी ने कहा दो पॉसिबिलिटीज

50:35हैं।

50:37यदि तू युद्ध में मारा गया

50:41तो तुझे

50:43स्वर्ग का संपूर्ण साम्राज्य मिल जाएगा।

50:47और यदि तू जीवित रहा तो पृथ्वी का सम्राट

50:51बनेगा। तेरे तो दोनों हाथ में लड्डू है।

50:57जो चाहे खा ले।

51:00तो युद्ध के लिए तैयार हो। तब अर्जुन ने

51:04कहा प्रभु

51:07आप कहते तो हैं कि मेरे दोनों हाथ में

51:10लड्डू है लेकिन दोनों में पोइजन है।

51:16वो ऐसे कि मैं यदि युद्ध नहीं करता हूं तो

51:21नरक मिलेगा फंसा।

51:24चलो इसको किनारे करो। लेकिन यदि युद्ध

51:27करता हूं तो भी फंसा। वो कैसे? क्योंकि

51:31यदि पृथ्वी का तो मुझे पता है।

51:36मैंने राज्य किया है। मैं सम्राट बन भी

51:39गया।

51:40तो क्या मुझे परमानंद मिलेगा? सदा के लिए

51:43आनंद मिलेगा?

51:46अरे जब तक पोस्ट है। ठीक है। पोस्ट से

51:50उतार दिए गए। कौन पूछता?

51:55आज राजा है हम अर्जुन ने कहा कल नहीं

51:58रहेंगे तो फिर दुख का ही दुख दुख का ही

52:01दुख

52:04तो महाराज परमानंद तो नहीं मिलेगा ना

52:11तो पृथ्वी का राजा भी बन जाऊं तो कौन सदा

52:14का लिए बनूंगा

52:16तो वहां भी दुख है

52:19और यदि मैं मारा गया

52:23तो स्वर्ग आप कह रहे हैं स्वर्ग का

52:26साम्राज्य मिलेगा वह भी नश्वर

52:29और फिर मैं इंद्र भी बन गया स्वर्ग सम्राट

52:32इंद्र तो भी माया का साम्राज्य तो वहां पर

52:36भी है दुख ही दुख है

52:40और फिर पुण्य समाप्ति में कुत्ते बिल्ली

52:44गधे की योनियों में भटकना पड़ेगा मुझे

52:47वहां स्वर्ग में भी परमानंद नहीं है तो ना

52:51स्वर्ग में परमानंद ना पृथ्वी में परमानंद

52:54और मैं चाहता हूं सदा के लिए आनंद

52:59और यह जो आप दे रहे हैं पृथ्वी या स्वर्ग

53:03यह तो बंधनकारी है और प्रभु

53:07मैं और बंधन में पड़ना नहीं चाहता।

53:12मुझे ऐसा उपाय बताइए जिससे मैं बंधन से

53:16मुक्त हो जाऊं। है कोई उपाय आपके पास वह

53:20बताइए।

53:22तब श्री कृष्ण ने कहा

53:25देखो अर्जुन

53:28यदि तुम

53:31पाप और पुण्य से मुक्त होना चाहते हो बंधन

53:35से छुट्टी पाना चाहते हो तो फिर

53:38सर्वधर्मान

53:40परित्यज

53:42मामेकम शरणम ब्रज अब उपाय बताया

53:48परमानंद प्राप्ति का उपाय उपाय जन्म मरण

53:52के बंधन से छूटने का उपाय यदि चाहते हो तो

53:57फिर कर्तापन को त्यागो

54:02अर्थात

54:03मैं अच्छा अच्छा कर्म करूंगा मैं यह

54:06करूंगा मैं वो करूंगा जिससे मैं महान

54:09बनूंगा पुण्य होगा

54:12यह मैं यह कर्तापन

54:16तो जब तुम स्वयं कर्ता बनके कार्य करोगे

54:21तो तुम्हारे कर्म का मैं फल दूंगा। वह

54:26पुण्य कर्म होगा तो पुण्य का फल मिलेगा।

54:29और यदि तुमने निकृष्ट कर्म किए, दुष्कृत

54:33किए, गलत कार्य किए तो वह पाप कर्म होंगे।

54:39उसका भी मैं दंड दूंगा।

54:42पाप कर्म में भी कर्तापन तुम्हारा ही है।

54:45पुण्य कर्म में भी कर्तापन तुम्हारा ही

54:49है। इसीलिए

54:51तुम ऐसा करो कि तुम पाप कर्म से भी मुक्त

54:56हो जाओ, पुण्य कर्म से भी मुक्त हो जाओ।

54:59उसके लिए अपना कर्तापन छोड़ो

55:04और तुम चुपचाप

55:07मन

55:08आत्

55:10म बुद्धि निवेश

55:13और कंक्लूड कर दिया भगवान ने

55:17भगवान ने कहा

55:20मन आत देखो तुम मन से ही विचार करते हो

55:26बुद्धि से तुम डिसीजन लेते हो यह तुम्हारा

55:30करतापन है

55:34निवेश है दे दो मुझे

55:40अब अपने मन से नहीं सोचना

55:45मेरी सोच में अपनी सोच मिला दो

55:50अपनी अक्ल नहीं लगाना। अपनी अक्ल से

55:53डिसीजन नहीं लेना।

55:56मेरी अक्ल से काम करो। यानी मेरी अक्ल में

56:00अपनी अक्ल जोड़ दो। इसी को कहते हैं

56:04समर्पण।

56:06और ऐसा नहीं है कि यह समर्पण आपको नहीं

56:09आता। हम सबको समर्पण करना आता है। सब ने

56:13किया है।

56:16रोज करते हैं।

56:20समर्पण की प्रक्रिया

56:22पैदा होते ही बालक समर्पित है अपनी मां

56:26को। वो कुछ नहीं करता। मां सब कुछ करती ना

56:29वो सोचता है ना वो निर्णय लेता है।

56:33चलिए

56:36और अच्छे से समझिए।

56:40हम बीमार पड़ते हैं। हां तो हम डॉक्टर के

56:44पास जाते हैं। जी हां। डॉक्टर पूछता है

56:47क्या हुआ? हम अपना रोग बताते हैं। डॉक्टर

56:51प्रिस्रिप्शन लिखता है। उसने दवाई लिख दी।

56:55देखो यह दवा सुबह खाना। यह दो गोली शाम को

56:58खाना। फिर चार दिन के बाद आकर मुझे

57:01दिखाना।

57:03आप डॉक्टर का मुंह देखते हैं। डॉक्टर साहब

57:09यह इतनी छोटी छोटी गोली दी आपने।

57:13इतना भारी भरकम मेरा शरीर।

57:17दो गोली सुबह दो गोली शाम चार दिन एक साथ

57:21खा लो

57:23जल्दी ठीक हो जाऊंगा

57:28तो डॉक्टर क्या कहता है यदि तुम ही डॉक्टर

57:32हो

57:34तुम्हें अपनी अक्ल लगानी है तो मेरे पास

57:36क्यों आए हो अपने आप कर लो जो करना है

57:39अपना इलाज

57:41मेरा टाइम वेस्ट क्यों कर रहे हो

57:45जाओ पहले अपना मेंटल इलाज कराओ फिर फिजिकल

57:48इलाज मेरे पास कराना भगा देगा डॉक्टर

57:52लेकिन यदि हमें सही में बीमारी का निदान

57:56चाहिए बीमारी सही करनी है तो हम क्या करते

58:00हैं डॉक्टर कहते हैं यह दो गोली सुबह खाना

58:03जी साहब ये शाम को खाना जी साहब

58:08अक्ल को दे दिया

58:11ना मन से कोई विचार ना बुद्धि से कोई

58:14डिसीजन अपनी बुद्धि को डॉक्टर की बुद्धि

58:18से जोड़ दिया। अपने विचार को डॉक्टर के

58:20विचार से जोड़ दिया। डॉक्टर जैसा कहता है

58:25वैसा हम करते हैं और इलाज हो जाता है।

58:29बुद्धि नहीं लगाते। इसी को कहते हैं

58:31समर्पण।

58:36हमने पढ़ाई की।

58:39शिक्षक के पास, टीचर के पास क्या किया?

58:44टीचर ने कहा नाइफ लिखो

58:46लिखो पहले के एन आई एफ ई

58:51सबने लिखा अब कोई सिरफिरा कहे

58:57टीचर जी आप मुंह से उच्चारण करते हैं नाइफ

59:02और लिखने को कहते हैं पहले के आपको तो

59:06कनाइ बोलना चाहिए

59:09तो

59:11शिक्षक क्या कहेगा टीचर कहेगा बेटा चुपचाप

59:15लिख लो मैंने भी लिखा था तुम भी लिख लो और

59:21यदि बुद्धि लगाओगे अग्र लगाओगे तो फिर

59:25जीवन भर निरक्षर भट्टाचार्य रहोगे

59:29सब ने चुपचाप लिखा

59:32साइलेंट है के अरे क्यों साइलेंट है ये

59:36साइलेंट क्या होता है अब इस पर यदि रिसर्च

59:39करने लगे हम तो हो गया फिर बंटा ढाल

59:43तो हम समर्पण करते हैं।

59:46तो जैसे टीचर के शरणागत होते हैं, जैसे

59:50डॉक्टर के शरणागत होते हैं।

59:54ऐसे ही

59:58भगवान कह रहे हैं कि यदि मेरी कृपा पाना

1:00:02चाहते हो तो जो मैंने शास्त्रों में बताया

1:00:06है जो मेरे उपदेश है जो गुरु कह रहा है

1:00:14जो मार्गदर्शन

1:00:16दिया जा रहा है।

1:00:20बस उसको करो।

1:00:24यही शरणागति हमने अनादि काल से नहीं की।

1:00:31तो शरणागति का अर्थ है मन एवं बुद्धि

1:00:37दोनों को अपने शरण्य को दे देना। जैसे

1:00:44एक सूखा पत्ता

1:00:49वो हवा के

1:00:54शरणागत होता है। हवा के प्रति समर्पित

1:00:57होता है।

1:00:59उस सूखे पत्ते को हवा उड़ाती है। वो

1:01:03चुपचाप उड़ता है। उड़ा के नीचे पटकती है।

1:01:06वो गिरता है। दक्षिण की ओर ले जाती है।

1:01:09पूर्व की ओर ले जाती है। वो कोई शिकायत

1:01:12नहीं करता।

1:01:14वो समर्पित है।

1:01:17मीरा ने यही तो कहा था।

1:01:22हे कृष्ण हे गिरधर

1:01:26तुम्हें मेरे साथ जैसा व्यवहार करना है

1:01:30करो।

1:01:32यदि मुझे

1:01:35हृदय से लगाने में तुम्हें सुख मिलता है

1:01:38तुम हृदय से लगाओ।

1:01:41मुझे

1:01:43पीठ दिखाने में तुम्हें सुख मिलता है।

1:01:46उदासीन रहने में सुख मिलता है तो उदासीन

1:01:50रहो।

1:01:52मुझे दुख देने में तुम्हें सुख मिलता है

1:01:55तो दुख दो। लेकिन मेरे तो गिरधर गोपाल

1:01:59दूसरो ना कोई

1:02:02मेरे प्रेम में कोई अंतर नहीं आएगा और

1:02:06इतना भी मत समझना कि तुम्हारे प्रतिकूल

1:02:10व्यवहार से मेरा प्यार मेरा प्रेम

1:02:13तुम्हारे प्रति कम होता जाएगा। मैंने

1:02:17तुम्हारे व्यवहार देखकर तुमसे प्यार नहीं

1:02:19किया। तुम जैसा व्यवहार करो मेरा प्रेम

1:02:23तुम्हारे प्रति उत्तरोत्तर बढ़ता ही

1:02:27जाएगा। क्योंकि मैं यह जानती हूं कि मेरा

1:02:30हित तुम्हारे चरणों में

1:02:34यह है शरणागति।

1:02:38अनुकूल व्यवहार हो तो भी प्रेम। प्रतिकूल

1:02:43व्यवहार हो तो भी प्रेम। देखिए हम लोगों

1:02:46की दशा क्या है? जब अनुकूलता रहती है तब

1:02:50तो हम कहते हैं बड़ी भगवान की कृपा है।

1:02:53बड़ी कृपा है। और जब दुख आता है जीवन में

1:02:57तो फिर लाल झंडा लेकर खड़े हो जाते हैं।

1:03:03इतना दुख हमारे जीवन में भगवान ने क्यों

1:03:05दिया? अरे भगवान किसी को दुख नहीं देते।

1:03:12यह सुख और दुख यह हमारे कर्मों का परिणाम

1:03:16है।

1:03:18भगवान तो केवल फल देते हैं भाई।

1:03:23इसीलिए तो वह शास्त्रों के द्वारा कहते

1:03:26हैं कि जिस समय कर्म संपादित करते हो उस

1:03:30समय ध्यान रखो कि इसका फल भी भोगना होगा।

1:03:35अच्छा करोगे। पुण्य पुण्य लोकम नयति पाप

1:03:40पाप मुभा्या मनुष्य लोकम मैं न्याय हूं।

1:03:46मुझे तो न्याय करना है।

1:03:50लेकिन जब हमारे ही कर्मों के परिणाम सामने

1:03:55आते हैं, जब हमको दुख भोगना पड़ता है तो

1:03:58हम शिकायत करते हैं भगवान से कि भगवान ने

1:04:02हमारे जीवन में इतना दुख दिया।

1:04:09रामावतार काल में

1:04:13एक

1:04:16प्रसंग आता है कि

1:04:20वनवास के समय प्रभु राम

1:04:24जब गुजर रहे थे

1:04:27झारखंड से तो उसी समय की घटना है कि पानी

1:04:32पीने के लिए एक सरोवर के पास गए

1:04:36तो अपना धनुष

1:04:38धरा पर रख दिया

1:04:41और पानी पी रहे थे। इतने में करने की आवाज

1:04:44आई तो तुरंत गए देखने के लिए कि क्या हुआ

1:04:49तो उन्होंने देखा कि एक मेंढक के ऊपर

1:04:52उन्होंने अपना धनुष रख दिया तो वो दब गया

1:04:55पिचक गया बेचारा तो करा रहा था

1:04:59तो प्रभु ने कहा कि

1:05:02अरे तूने मुझे आवाज नहीं लगाई

1:05:06तू आवाज लगा देता तो मैं दौड़ कर आ जाता

1:05:09तू आवाज ही नहीं लगाया

1:05:12मेंढक ने कहा प्रभु जब दूसरे कष्ट देते

1:05:16हैं ना तो मैं आपको आवाज लगाता हूं। लेकिन

1:05:22आप ही जब कष्ट दे रहे हैं तो मैं किसको

1:05:24आवाज लगाऊं?

1:05:27लेकिन यह तो मजाक है।

1:05:31वो

1:05:34मेंढक ने कहा कि प्रभु मैं यह नहीं कह रहा

1:05:37हूं कि आप मुझे कष्ट दे रहे हैं।

1:05:40यदि यह कष्ट मुझे मिल रहा है तो यह मेरे

1:05:45कर्मों का परिणाम है। इसीलिए मैंने आपको

1:05:50आवाज नहीं लगाई।

1:05:52और अब मैं आपसे निवेदन करता हूं कि प्रभु

1:05:57यह जो मुझे कष्ट मिल रहा है यह मुझे मिलना

1:06:00ही चाहिए क्योंकि मैंने वैसा कर्म किया

1:06:04है। आपसे बस प्रार्थना करता हूं कि मुझे

1:06:08इस कष्ट को भोगने की शक्ति प्रदान करें।

1:06:15तो चाहे अनुकूल चाहे प्रतिकूल परिस्थिति

1:06:20हो हमारा प्रेम हमारा विश्वास

1:06:25हमारी शरणागति हमारा समर्पण डगमगाए नहीं

1:06:31स्थिर रहे

1:06:35यह स्वरूप होना चाहिए हमारे समर्पण का

1:06:41और समर्पण करते हुए भी अहंकार ना हो

1:06:48एवं

1:06:50वो हमारी रक्षा अवश्य करेंगे। वो हमारे

1:06:54आत्मा की रक्षा अवश्य करेंगे। इसका

1:06:58विश्वास हो।

1:07:03तो इस प्रकार से यह है समर्पण।

1:07:08समर्पण का स्वरूप।

1:07:13तो समर्पण के लिए श्री कृष्ण कह रहे हैं

1:07:17कि मन और बुद्धि को देना होगा।

1:07:21लेकिन हमारा मन

1:07:25अनादि काल से

1:07:29इस संसार में आसक्त है। इस मन का लगाव इस

1:07:35जगत में है। संसार में भौतिक वस्तुओं में,

1:07:40व्यक्ति में, संग में, परिस्थितियों में

1:07:45क्यों है हमारा मन का लगाव? संसार में

1:07:49क्योंकि हमको यह भरोसा है

1:07:53कि आज नहीं तो कल निश्चित रूप से

1:07:59इसी जगत से मुझे सुख मिलेगा।

1:08:03जो अनंत सुख मैं पाना चाहता हूं वो सुख

1:08:07निश्चित रूप से मुझे मिलेगा। इसलिए अनादि

1:08:10काल से हम इस जगत में संसार में सुख खोज

1:08:14रहे हैं।

1:08:18स्त्री में, पति में, भाई में, बहन में,

1:08:21बेटे में, रिश्तेदार में, समाज में

1:08:26यह सुख की खोज में, वस्तु में, व्यक्ति

1:08:29में दौड़े जा रहे हैं। यह आशा है, यह

1:08:33भरोसा है। आज नहीं मिला, कल जरूर मिलेगा।

1:08:37और यही

1:08:40भरोसे से प्रयास करते करते

1:08:44अनंत जन्म बीत गए। आज तक किसी को संसार से

1:08:50अनंत सुख नहीं मिला। लेकिन फिर भी आज तक

1:08:55किसी ने यह जजमेंट नहीं दिया। वो प्रयास

1:08:58किए जा रहा है।

1:09:03केवल महापुरुष,

1:09:05केवल संत, संतों ने यह डिक्लेअ किया

1:09:12कि अनंत सुख तो उस आनंद घन में है।

1:09:17इसीलिए जब तक इस मन के लगाव को संसार से

1:09:23हटाएंगे नहीं,

1:09:26यह मन भगवान में लगेगा नहीं। भगवान की

1:09:31शरणागति करेगा नहीं

1:09:35और यह मन अपने आप संसार से हटेगा भी नहीं

1:09:41इसीलिए यह आवश्यक है कि हम यदि संसार के

1:09:47फैक्ट को जाने संसार के स्वरूप को

1:09:52उसकी रियलिटी को समझे भीतर से

1:09:59जब भीतर से समझेंगे, आत्मसात करेंगे,

1:10:04एक्सपीरियंस करेंगे तब प्रैक्टिकली

1:10:09हमारा मन संसार से हटेगा। जबरदस्ती कोई

1:10:13बात करने से वह तो हट योग है। कुछ नहीं

1:10:16होने वाला।

1:10:19तो प्रैक्टिकली जानना होगा कि संसार है

1:10:23क्या?

1:10:26देखिए यह जिस जगत को हम अपनी आंखों से देख

1:10:30रहे हैं ना यह पृथ्वी जल तेज वायु आकाश का

1:10:35यह संसार

1:10:37इतना ही संसार नहीं है।

1:10:42ये संसार

1:10:44स्थूल भी है और यह संसार सूक्ष्म भी है।

1:10:53वदती विश्वम कवयस्म

1:10:56नश्वरम

1:10:58पश्यती चा विदो विपश्चित

1:11:04तथाप मुहती तवा जमाया

1:11:09सुविस्मितम

1:11:11कृत्यमजम न तो स्मृतम

1:11:19हम इस संसार के लिए सुनते कि यह संसार

1:11:25असार है। एक दिन छूटेगा सबको छोड़ना है।

1:11:30नश्वर है। यह सब हम सुनते हैं। बोलते भी

1:11:35हैं। अरे यह जगत मिथ्या है। भ्रांति है।

1:11:39एक दिन छोड़ना ही होगा। लेकिन यह सब बोलने

1:11:43पर भी हम सब इसी संसार में

1:11:48लिप्त भी होते हैं।

1:11:54मोह में बहते भी हैं, लगाव भी होता है।

1:12:01कहने वाले कि संसार मिथ्या है। वह भी मोह

1:12:06में बह जाते हैं।

1:12:13तो संसती संसार

1:12:17सरकने वाले का नाम संसार

1:12:21गच्छति जगत चलने वाले का नाम जगत

1:12:28कुछ पार्टी कहती है कि यह संसार

1:12:32ऊपर की ओर सरक रहा है। इसका विकास हो रहा

1:12:37है।

1:12:39और दूसरी पार्टी कहती है कि नहीं नहीं

1:12:43संसार की अवनति हो रही है। संसार नीचे की

1:12:48ओर जा रहा है। का हरास हो रहा है। यह दो

1:12:52पार्टी है इस जगत में।

1:12:55यह दो पार्टी का नाम है। एक है भौतिकवादी,

1:13:01दूसरे हैं आध्यात्मवादी।

1:13:04जो भौतिकवादी हैं

1:13:07उनका

1:13:10सिद्धांत है भगवान नहीं होते। जो कुछ है

1:13:14बस यह भौतिक जगत है। शरीर ही सब कुछ है।

1:13:18शरीर को सुख दो।

1:13:23मौज मस्ती करो। मरने के बाद किसने देखा

1:13:27है?

1:13:30चारवा का सिद्धांत है। भौतिकवादियों का

1:13:34सिद्धांत। वो शरीर को मानते हैं। आत्मा को

1:13:37नहीं मानते।

1:13:40यावत जीवेत सुखम जीवेत ऋणम कृतम पवे भस्म

1:13:46भूतस देहस पुनरागमनम कुत जब तक जियो

1:13:52सुख से जियो मौज मस्ती करो

1:13:58मरने के बाद किसने देखा है

1:14:03तुम तो जब तक हो

1:14:07खा लो उड़ा लो मौज कर लो यह भौतिकवादियों

1:14:11का सिद्धांत

1:14:12यह एक पार्टी

1:14:15तो भौतिकवादी पार्टी जो है वह कहती है

1:14:18संसार का उत्थान हो रहा है। इसका विकास हो

1:14:21रहा है।

1:14:25और दूसरी पार्टी है आध्यात्मवादी

1:14:29जो

1:14:31शरीर और आत्मा दोनों को मानती है।

1:14:36आ्यात्मवादी कहते हैं मैं आत्मा हूं और इस

1:14:41आत्मा का यह शरीर है। मेरा शरीर है।

1:14:47ये दोनों को मानते हैं।

1:14:50तो आध्यात्मवादी कहते हैं संसार की अवनति

1:14:55हो रही है। और दोनों पार्टी का कहना ठीक

1:14:58है। गलत कोई नहीं कह रहे। अब देखिए

1:15:02यदि आ्यात्मवादी कहते हैं कि संसार की

1:15:05अवनति हो रही है।

1:15:09हम लोग सतयुग में कहां थे?

1:15:12फिर द्वापर में और नीचे आ गए। त्रेता में

1:15:15और नीचे आ गए। फिर द्वापर में और नीचे आ

1:15:18गए। और कलयुग में नीचे आए और आज कलयुग में

1:15:23क्या हाल है। सब आपके सामने है।

1:15:27कितनी अवनति होती जा रही है।

1:15:30तो आध्यात्मवादी गलत नहीं बोल रहे

1:15:35और

1:15:37भौतिकवादी

1:15:39वो क्या कहते हैं कि संसार की उन्नति हो

1:15:42रही है।

1:15:45देखिए पाषाण युग स्टोन एज

1:15:50आप सब ने पढ़ा होगा

1:15:54तो पाषाण युग में

1:15:59कैसा युग था हम कुछ नहीं जानते थे

1:16:03कपड़ा वपड़ा पहनना यह सब कुछ पता नहीं था

1:16:07गुफाओं में रहते थे लेकिन आज देखिए हम

1:16:11लोगों को आज विज्ञान ने कितनी प्रगति कर

1:16:15लिए आज तो हमारा दैनिक जीवन एआई से चलता

1:16:19है।

1:16:21इतनी विकास की विज्ञान की उन्नति

1:16:27तो यह दो पार्टी

1:16:31तो भौतिकवादी भी गलत नहीं कह रहे और

1:16:34आध्यात्मवादी भी गलत नहीं कह रहे।

1:16:39इसीलिए

1:16:41किसी भी वादी को किसी का तिरस्कार नहीं

1:16:46करना चाहिए।

1:16:49लेकिन गड़बड़ी यही है। आध्यात्मवादी जो है

1:16:52वह भौतिकवादी का तिरस्कार करते हैं। अपमान

1:16:56करते हैं। भौतिकवादी जो है वो

1:16:59आध्यात्मवादी का अपमान करते हैं।

1:17:04लेकिन ये गलत है। क्यों? वो इसीलिए

1:17:10क्योंकि हम एक नहीं हम दो हैं।

1:17:15एक आत्मा

1:17:18और दूसरा शरीर

1:17:23और

1:17:25जिंदा रहने के लिए दोनों की आवश्यकता है।

1:17:31एक एक शब्द पर ध्यान दीजिएगा।

1:17:37दोनों की आवश्यकता है। यह शरीर को

1:17:43इस भौतिक जगत की आवश्यकता है।

1:17:47कोई आध्यात्मवादी यह नहीं कह सकता कि हम

1:17:50राधे-राधे बोलकर जिंदा रह जाएंगे।

1:17:55शरीर को जो जो चाहिए विटामिंस, प्रोटीनंस,

1:17:59मिनरल्स

1:18:01वो सब देना होगा।

1:18:04ठीक ठीक देना होगा। यदि हमने लापरवाही की

1:18:08तो फिर प्रकृति दंड देगी हमको।

1:18:12फिर हम बीमार पड़ेंगे।

1:18:15रोग होंगे हमको।

1:18:18तो इसीलिए शरीर को स्वस्थ रखने के लिए यह

1:18:23भौतिकवाद की हमको आवश्यकता है। हां ध्यान

1:18:27रखिए भौतिकवाद की आवश्यकता है। उपयोग करना

1:18:33है। उपभोग करेंगे डेंजरस।

1:18:43आप जिन आप जाना जो चाहते हैं कृपया चले

1:18:47जाइए एक ही बार कोई प्रॉब्लम नहीं है।

1:18:49मुझे सूचना दी गई थी कि एक घंटे में आप

1:18:53सबको जाना है तो आप कृपया प्रस्थान

1:18:56करेंगे। मुझे बुरा नहीं लगेगा। जिनको जाना

1:19:00है कृपया प्रस्थान कीजिए।

1:19:20हां आप लोग इधर ध्यान दीजिए।

1:19:25तो भौतिकवादी

1:19:32आध्यात्मवादी कहते हैं कि हमें भौतिकवाद

1:19:35की आवश्यकता नहीं। यह गलत।

1:19:39हमें भौतिकवाद की आवश्यकता है इस शरीर को

1:19:43स्वस्थ रखने के लिए। और दूसरी ओर

1:19:49कोई भी आध्यात्मवादी यह नहीं कह सकता कि

1:19:55हमें भौतिकवाद की आवश्यकता नहीं

1:20:02और कोई भी भौतिकवादी यह नहीं कह सकता कि

1:20:06हमें आध्यात्मवाद की आवश्यकता नहीं।

1:20:12फिर से ध्यान दीजिए। कोई भी भौतिकवादी

1:20:17यह नहीं कह सकता कि बस

1:20:22सब कुछ मिल रहा है। हमको संसार में मौज से

1:20:26खा रहे हैं, पी रहे हैं।

1:20:30हमें आध्यात्मवाद की आवश्यकता नहीं।

1:20:35ऐसा भी नहीं। क्यों? क्योंकि आप यह देख

1:20:39रहे हैं कि जितनी विज्ञान की प्रगति हो

1:20:42रही है, जितना एडवांसमेंट, जितना

1:20:45मॉडर्नाइजेशन हो गया है, जितनी हमें

1:20:49उपलब्धियां है, भौतिक वस्तुओं की, उतना ही

1:20:54आप यह भी देख रहे हैं कि बुद्धि विकृत

1:20:59होती जा रही है। बुद्धि विक्षिप्त होती जा

1:21:04रही है। आज चिंताएं बढ़ गई हैं।

1:21:09आज मर्डर सुसाइड नॉर्मल बात हो गई

1:21:16क्योंकि बुद्धि विक्षिप्त

1:21:19इतनी विकृत बुद्धि

1:21:22तो यदि इस भौतिक वस्तुओं से इस भौतिक जगत

1:21:30की वस्तु व्यक्ति वातावरण से

1:21:34यदि हमें सब कुछ मिल जाता

1:21:40जो भौतिकवादी कहते हैं कि हमें

1:21:42आध्यात्मवाद की आवश्यकता नहीं तो फिर यह

1:21:47डिप्रेशन ये ए्जायटी ये मर्डर

1:21:51ये सुसाइड ये सब क्यों? ये चिंताएं क्यों?

1:21:56यह समस्याएं क्यों?

1:22:01तो इसीलिए हमको जीवन में यह लेकर चलना है

1:22:05कि यदि हम शरीर और आत्मा दोनों हैं तो

1:22:10दोनों मशीनरी को सही रखने के लिए शरीर भी

1:22:15मशीन और यह आत्मा दोनों को सही रखने के

1:22:19लिए हमें भौतिकवाद एवं आध्यात्मवाद दोनों

1:22:25की आवश्यकता है। बराबर

1:22:30क्योंकि

1:22:34यह ध्यान में रखना है। बार-बार मैं एक ही

1:22:38बात को कह रही कि हम केवल शरीर नहीं

1:22:43हम शरीर और आत्मा दोनों से युक्त हैं।

1:22:49आदि जगत गुरु शंकराचार्य

1:22:53एवं उनके अनुयाई

1:22:58आदि जगतगुरु शंकराचार्य अद्वैतवाद के

1:23:01प्रवर्तक उन्होंने यही प्रचार किया कि यह

1:23:05जगत मिथ्या है। यह संसार मिथ्या है।

1:23:11इसके पश्चात

1:23:14और तीन जगत गुरु आए।

1:23:18जगतगुरु

1:23:20रामानुजाचार्य,

1:23:22जगत गुरु नारकाचार्य,

1:23:25जगत गुरु माधवाचार्य

1:23:29यह वैष्णव थे।

1:23:33इन तीन जगत गुरुओं ने कहा कि संसार

1:23:38मिथ्या नहीं संसार सत्य है।

1:23:45700 वर्ष बीत गए माधवाचार्य जी के पश्चात

1:23:50और

1:23:52किसी को जगतगुरु नहीं बनाया गया। हां उन

1:23:56जगतगुरुओं की

1:24:00पद्धति चली आई। जैसे आदि जगत गुरु

1:24:03शंकराचार्य हुए। फिर उसके पश्चात उनके

1:24:08सिंहासन पे उनके उत्तराधिकारी उनके

1:24:12शिष्यों को बिठाया गया और वो परंपरा वो

1:24:15शंकराचार्य नाम से ही वह पद्धति चली आई।

1:24:20ऐसे ही समस्त जगत गुरुओं के पद्धति चल रही

1:24:24है।

1:24:25लेकिन मैं बात कर रही हूं ओरिजिनल मूल

1:24:29जगतगुरु शंकराचार्य

1:24:32तो ऐसे जगतगुरु चार हुए जगतगुरु

1:24:35शंकराचार्य जगुरु नारकाचार्य जगतगुरु

1:24:39रामानुजाचार्य और जगतुगुरु माधवाचार्य

1:24:43माधवाचार्य जी के पश्चात

1:24:48माधवाचार्य जी को हनुमान जी का अवतार

1:24:50बताया जाता है। रामानुजाचार्य जी को

1:24:53सुदर्शन चक्र का अवतार कहते हैं।

1:24:57नबारकाचार्य जी को

1:25:00शेष का अवतार कहते हैं।

1:25:04और

1:25:07शंकराचार्य जी तो साक्षात

1:25:12शंकर हैं।

1:25:14निब्बारकाचार्य जी सुदर्शन चक्र के अवतार।

1:25:17रामानुजाचार्य जी शेष के अवतार। मैंने

1:25:21उल्टा कह दिया

1:25:23तो यह सब अवतार है भगवान के अवतार

1:25:30तो 700 वर्ष तक किसी को भी जगत गुरु की

1:25:34उपाधि से विभूषित नहीं किया गया।

1:25:37700 वर्ष के पश्चात 1957 में

1:25:4414 जनवरी को मकर संक्रांति के दिन

1:25:52काशी में

1:25:55एक सभा

1:25:57काशी विश्वत परिषद

1:26:00काशी विद्वत परिषद भी कहा जाता है उसको आज

1:26:03से 100 वर्ष पहले की बात है यह सभा हुई थी

1:26:09इसका गठन हुआ था

1:26:12लेकिन 1957 की बात है कि वहां उस काशी

1:26:16विद्वत परिषद में शास्त्रार्थ हुआ करते थे

1:26:19और जगत गुरु की उपाधि

1:26:23दी जाती थी।

1:26:26तो 1957 की बात है। बड़े-बड़े प्रकांड

1:26:31विद्वान देश विदेश से वहां एकत्रित हुए और

1:26:35वे सब विद्वान एक एक

1:26:39आध्यात्मिक विषयों के मर्मज्ञ

1:26:43विलक्षण ज्ञान सब लोगों को किसी को

1:26:48न्याय किसी को सांख्य किसी को योग

1:26:54कोई भागवत के मर्मज्ञ कोई रामायण के

1:26:57मर्मज्ञ

1:26:59और सबकी उम्र कोई 60 साल कोई 70 साल के

1:27:04वृद्ध पूरे तो यह सब एकत्रित हुए

1:27:10और वहीं पर

1:27:1336 वर्ष के एक युवक

1:27:19उनके समक्ष अकेले

1:27:23एक और

1:27:2536 वर्ष का एक युवक अकेला और दूसरी ओर यह

1:27:30विद्वान सब प्रकांड

1:27:35इनके बीच शास्त्रार्थ हुआ।

1:27:38इन विद्वानों ने

1:27:41अनेक प्रकार के प्रश्न रखे।

1:27:46और यह ऐसे प्रश्न थे

1:27:51जिसका उत्तर आज तक इनको मिला नहीं था।

1:27:56भ्रांति बनी हुई थी।

1:28:00जैसे उदाहरण के तौर पर संसार सत्य है या

1:28:06संसार मिथ्या जिस पर मैं अभी चर्चा कर रही

1:28:09हूं। उन नौ

1:28:12द प्रश्नों में यह भी एक प्रश्न था

1:28:18नौ दिन तक शास्त्रार्थ चलता रहा

1:28:24और

1:28:26वो युवक

1:28:30उसने इससे पहले

1:28:34कभी इस प्रकार से प्रवचन नहीं दिया था।

1:28:39सम्मेलन कराए थे लेकिन स्वयं प्रवचन नहीं

1:28:43दिया था और किसी को पता नहीं था कि उन्हें

1:28:47संस्कृत आती भी है या नहीं क्योंकि

1:28:50उन्होंने कभी संस्कृत बोली ही नहीं। अब इन

1:28:54विद्वानों ने कहा कि यदि यह युवक हमारे

1:28:58साथ शास्त्रार्थ करेगा तो इसे संस्कृत में

1:29:02ही करना पड़ेगा।

1:29:05और उस

1:29:07युवक के साथ में जो उनके

1:29:11सहचर थे उन्होंने यू ही कह दिया ठीक है

1:29:16ठीक है हमारे गुरु जी को संस्कृत आती है

1:29:20पूछा भी नहीं कि आप हिंदी में बोलेंगे या

1:29:24संस्कृत में बोलेंगे वो इतने निश्चिंत

1:29:27होकर कह गए हां वो संस्कृत में बोलेंगे तो

1:29:32ये युवक इन्होंने कहा ठीक है। तुम यदि बोल

1:29:35ही दिए हो तो हम संस्कृत में ही बोल देते

1:29:38हैं।

1:29:39और नौ दिन तक

1:29:42प्रत्येक

1:29:44प्रश्नों का

1:29:48उत्तर दिया।

1:29:50हर प्रश्न को काटा है

1:29:55शास्त्रीय प्रमाण से

1:29:58और उस

1:30:00ज्ञान की विलक्षणता को देखकर वो जितने

1:30:06काशी के पंडित थे नतमस्तक हो गए।

1:30:13उन सब ने कहा कि हम काशी के पंडित इतनी

1:30:17जल्दी कभी किसी से हार नहीं मानते।

1:30:22जब तक

1:30:26हमारी कसौटी पर कोई खड़ा खरा नहीं उतरता

1:30:30हम छोड़ते नहीं कसते रहते हैं। लेकिन इस

1:30:35युवक की

1:30:39विलक्षणता

1:30:42ज्ञान की विलक्षणता, व्यक्तित्व की

1:30:45विलक्षणता को देखकर हम नतमस्तक होते और

1:30:50इन्हें

1:30:53धन्य मान्य

1:30:56जगत गुरुम पद

1:31:00सोयम समभजते

1:31:05इस युवक को

1:31:07हम जगत गुरु उत्तम पद पद से विभूषित करते

1:31:12हैं।

1:31:14और वो युवक और कोई नहीं।

1:31:17मेरे ही गुरुदेव

1:31:19जगतगुरु स्वामी श्री कृपालु जी महाराज

1:31:25जिस समय इन्हें जगतगुरु की उपाधि मिली उस

1:31:29समय वो 36 वर्ष के थे। 500 प्रकांड

1:31:33विद्वानों के समक्ष उन्होंने संस्कृत में

1:31:37शास्त्रार्थ किया था।

1:31:42उन विद्वानों ने उन्हें

1:31:46जिन उपाधियों से विभूषित किया श्रीमद् पद

1:31:50वाक्य प्रमाण पारावारीण

1:31:54वेद मार्ग प्रतिष्ठापनाचार्य

1:31:57निखिल दर्शन समन्वयाचार्य

1:32:00सनातन वैदिक धर्म प्रतिष्ठापन सत संप्रदाय

1:32:04परमाचार्य

1:32:06भक्ति योग रसावतार

1:32:09भगवत अनंत श्री विभूषित जगत गुरु 108

1:32:15स्वामी श्री कृपालु जी महाराज

1:32:22कृपालु जी महाराज को सबसे पहले मैं बताना

1:32:25चाहूंगी

1:32:28अवतारी पुरुष घोषित किया गया

1:32:34भक्ति योग रसा अवतार

1:32:38यह देव पुरुष है। यह साधारण

1:32:42पुरुष नहीं है।

1:32:45यह भक्ति योग का जो सार है रस उसको कहते

1:32:52हैं प्रेम उसके अवतार हैं।

1:32:56क्योंकि उन्होंने व्यक्तित्व देखा गुरुदेव

1:33:00का कि जब वह भगवन नाम संकीर्तन कराते थे

1:33:05तो वह भगवत प्रेम का दर्शन उनके

1:33:07व्यक्तित्व में होता था। नेत्रों से अश्रु

1:33:10जल बहना रोमांच होना और अष्ट सात्विक

1:33:14भावों का उद्रेक जैसे रामकृष्ण देव और

1:33:18चैतन्य महाप्रभु में दिखाई पड़ता था। ऐसे

1:33:22लक्षण उन विद्वानों ने देखे और कहा यह

1:33:26साधारण नहीं भक्ति योग रसावतार

1:33:32और इसके साथ साथ उनके विलक्षण ज्ञान को जब

1:33:36सुना श्रवण किया तब

1:33:42वो कहने के लिए ठहरे नहीं श्रीमद् पद

1:33:45वाक्य प्रमाण ये जो कहते हैं प्रमाणित

1:33:49कहते हैं

1:33:52पाराण

1:33:55वेद मार्ग प्रतिष्ठापनाचार्य

1:33:57जो कहते हैं वेद सम्मत कहते हैं। वेद को

1:34:02छोड़ के एक बात नहीं करते। वेद हमारी निधि

1:34:06है।

1:34:10वेद मार्ग प्रतिष्ठापनाचार्य

1:34:13ये आचार्य हैं। इन्होंने

1:34:17वेदों की को पुन स्थापित कर दिया है। वेद

1:34:21को प्रमाण मानते हैं। निखिल दर्शन समन्वय

1:34:26आचार्य

1:34:30कृपालु जी महाराज किसी भी

1:34:34संप्रदाय किसी भी सिद्धांत

1:34:37उसका विरोध नहीं करते। यहां तक कि केवल

1:34:42वैदिक दर्शन ही नहीं पाश्चात्य दर्शन का

1:34:45भी वो विरोध नहीं करते। अपितु वैदिक दर्शन

1:34:50के साथ पाश्चात्य दर्शन

1:34:54भौतिकवाद के साथ आध्यात्मवाद का समन्वय

1:34:58वैदिक के साथ पाश्चात्य का समन्वय

1:35:03यह समन्वय करते हैं। किसी का विरोध नहीं

1:35:07करते।

1:35:10इसीलिए इन्हें समन्वयचार्य की उपाधि दी

1:35:14गई।

1:35:18तो इस प्रकार से

1:35:21जगतगुरु स्वामी श्री कृपालु जी महाराज

1:35:25उनके समक्ष

1:35:28विरोधाभास वाले प्रश्न रखे गए जिसका

1:35:32उन्होंने समाधान किया तो उसी सम्मेलन में

1:35:36यह प्रश्न था कि यह बताइए संसार सत्य है

1:35:41या संसार मिथ्या तो जो उन्होंने उत्तर

1:35:45उत्तर दिया था। वही मैं आपके समक्ष रखने

1:35:49जा रही हूं।

1:35:51गुरुदेव ने समझाया

1:35:54कि देखो

1:35:57संसार दो प्रकार का होता है।

1:36:01यह दोनों बातें सही है। संसार सत्य भी है

1:36:06और संसार मिथ्या भी है। इस प्रकार से कि

1:36:11जिस संसार को तुम अपनी आंख से देख रहे हो।

1:36:15पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश का यह संसार

1:36:19इसको भगवान ने बनाया है। यह सत्य है।

1:36:25इसमें कोई परिवर्तन नहीं हो सकता।

1:36:32इसी को हम गवारी भाषा में कह सकते हैं

1:36:35बाहर का संसार।

1:36:38ठीक।

1:36:40लेकिन

1:36:43एक संसार हमारा मन बनाता है।

1:36:50बहुत ध्यान से सुनिएगा।

1:36:54एक संसार

1:36:57हमारा मन बनाता है।

1:37:02तो मन में जो हमारे आइडियाज उत्पन्न होते

1:37:06हैं, विचार उत्पन्न होते हैं, यह आइडियाज,

1:37:11ये विचार यह बदलते रहते हैं। परिवर्तनशील

1:37:16है।

1:37:18और क्योंकि यह हमारे अंतःकरण में विचार

1:37:21बनते हैं और हमारा अंतःकरण प्राकृत है,

1:37:25मिथ्या है। इसीलिए हमारे बनाए हुए मन के

1:37:29विचार भी मिथ्या है। इसलिए मन में जो

1:37:33संसार बनता है वो भीतर का संसार है और मन

1:37:38वाला संसार मिथ्या है।

1:37:41इस प्रकार से दो प्रकार का संसार एक बाहर

1:37:45का संसार एक भीतर का संसार

1:37:53और ये दोनों प्रकार के संसार में हमें यह

1:37:57समझना है

1:38:00कि कौन सा संसार हमारे लिए भयानक है।

1:38:04देखिए भीतर वाले संसार को आप और अच्छे से

1:38:07समझ सकते हैं। जैसे मान लीजिए एक स्त्री

1:38:11खड़ी

1:38:13तो यह स्त्री भगवान की बनाई हुई

1:38:18सत्य।

1:38:22लेकिन

1:38:24उसी स्त्री को देखकर एक कहता है मेरी

1:38:27बिटिया खड़ी है। दूसरा कहता है उसी स्त्री

1:38:31को मेरी मां खड़ी है। तीसरा कहता है मेरी

1:38:37बहन खड़ी है। चौथा कहता है मेरी चाची खड़ी

1:38:42है। एक ही स्त्री है भगवान की बनाई सत्य।

1:38:46उसमें कोई परिवर्तन नहीं। लेकिन

1:38:50यह जितने लोग अपने मन से उस स्त्री के

1:38:54प्रति भावनाएं बना रहे हैं, विचार बना रहे

1:38:59हैं, उसमें परिवर्तन

1:39:04वो अलग-अलग है।

1:39:09तो भगवान के बनाए संसार में परिवर्तन नहीं

1:39:13लेकिन आइडियाज वो परिवर्तनशील है। इसीलिए

1:39:18मन का बनाया हुआ संसार मिथ्या और बाहर का

1:39:22बनाया हुआ संसार भगवान का है। वो सत्य। तो

1:39:26इस प्रकार से दो प्रकार का संसार बाहर का

1:39:30संसार

1:39:32बाहर का संसार और यह बाहर के संसार इसके

1:39:37लिए यह शरीर इस शरीर को इस बाहर के संसार

1:39:41की आवश्यकता है। वरना यह एक दिन भी जिंदा

1:39:45नहीं रह सकता। पृथ्वी, जल, तेज, वायु सब

1:39:49चाहिए।

1:39:52और

1:39:54भीतर वाला संसार यानी मन और बुद्धि जहां

1:39:59पर विचार उत्पन्न होते हैं

1:40:03और ये विचार कैसे हैं?

1:40:06मिथ्या

1:40:09गड़बड़

1:40:11मैंने जो अभी आपको बताया ना हमारी विकृत

1:40:14बुद्धि विक्षिप्त बुद्धि

1:40:18तो ये इन विचारों को सही करने के लिए,

1:40:23सुधारने के लिए भौतिकवाद के पास कोई सामान

1:40:28नहीं।

1:40:31शरीर स्वस्थ रख रख सकते हैं इस भौतिक जगत

1:40:35के

1:40:37वस्तुओं से।

1:40:41लेकिन मन को शुद्ध कैसे करें? मन को

1:40:45पवित्र कैसे करें? इसका कोई उपाय भौतिकवाद

1:40:49के पास नहीं। आज

1:40:53रशिया, चाइना, यह कंट्रीज

1:40:57जहां कम्युनिज्म है।

1:41:00ये बड़े-बड़े देश भी

1:41:05विश्व शांति की बात करते हैं।

1:41:09यूनिवर्सल पीस की बात करते हैं।

1:41:14यह जो आप

1:41:16शांति की बात करते हैं, पीस की बात करते

1:41:19हैं।

1:41:22बड़ी-बड़ी बातें

1:41:26भाईचारा रखो आपस में मिलके रहो

1:41:31करप्शन बंद करो

1:41:36लेकिन क्या करप्शन बंद हो गया

1:41:40सत्य बोलो

1:41:44ये बड़ी-बड़ी बातें सारा देश बोल रहा है

1:41:48सारे पॉलिटिशियंस बोल बोल रहे हैं। हम भी

1:41:51आपस में बोलते हैं। माता-पिता भी बच्चे को

1:41:54सिखाते हैं। लेकिन यह बोलने वाले भी क्या

1:41:59पालन कर रहे हैं? क्या करप्शन बंद हो गया?

1:42:03क्या झूठ बोलना बंद हो गया?

1:42:10नेताजी भी कहते हैं करप्शन बंद करो।

1:42:12भाईचारा रखो। अजी वो तो हम भी जानते हैं

1:42:16कि भाईचारा रखना है, करप्शन बंद करना है।

1:42:20लेकिन यह होगा कैसे?

1:42:23अरे अच्छी बात है करो। अरे वो तो हम भी

1:42:26जानते हैं कि ये अच्छी बात है। करें कैसे?

1:42:31बचपन से लेकर सुनते आए हैं। बेटा सत्य

1:42:36बोलो, सत्य बोलो और बड़े होते तक

1:42:38शास्त्रों से सुना सत्यम वध लेकिन होता तो

1:42:42नहीं।

1:42:44ना करप्शन बंद होता है, ना घुसखोरी बंद

1:42:47होती है, ना झूठ बोलना बंद होता है। कुछ

1:42:51तो बंद नहीं होता। सब तो वैसे ही चल रहा

1:42:53है।

1:42:57तो उसका कारण क्या है? क्यों बंद नहीं

1:42:59होता?

1:43:01उसका सीधा सा उत्तर है कि यह जो

1:43:06गंदगी है, यह जो विकार हैं हमारे,

1:43:10यह जो दोष हैं हमारे

1:43:14यह उठते कहां है? यह बनते कहां है?

1:43:20अंतःकरण में।

1:43:24अब अंतःकरण को पवित्र करने का तो कोई उपाय

1:43:28नहीं सोचा हमने।

1:43:31जब जहां दोष उत्पन्न होते हैं, जब उस मन

1:43:35को ही सही नहीं करेंगे

1:43:38तो वो दोष दूर कैसे होंगे? और जब दोष दूर

1:43:42ही नहीं होंगे तो बीमारी जाएगी कहां से?

1:43:45सब बनी रहेगी।

1:43:49तो हम मेन काम नहीं कर पा रहे हैं कि हम

1:43:52जो यह दोष है मन के मन बुद्धि के अंतःकरण

1:43:56के वो दोष चले जाए। हमारा अंतःकरण पवित्र

1:44:01हो जाए तो यह सारी बीमारी चली जाए।

1:44:05और इस बीमारी को दूर करने के लिए याद रखिए

1:44:09भौतिकवादी के पास कोई उपाय नहीं। भौतिक

1:44:13जगत में कोई उपाय नहीं। इसीलिए आप चारों

1:44:18ओर विकृति देख रहे हैं। चारों ओर चिंताएं

1:44:22देख रहे हैं। दुख देख रहे हैं। विकार देख

1:44:25रहे हैं।

1:44:27भौतिकवाद के पास इसका उपाय नहीं। इसका

1:44:31उपाय एकमात्र

1:44:34अध्यात्मवाद के पास

1:44:40क्योंकि

1:44:42अच्छा होना, पवित्र होना इसका कनेक्शन मन

1:44:47से है। मन की भावनाएं, मन के विचार, मन के

1:44:52आइडियाज तो मन पवित्र आध्यात्मवाद से

1:44:56होगा। भौतिकवाद मन को पवित्र नहीं कर

1:44:59सकता।

1:45:03यह स्वर्ण अक्षरों में लिख लीजिए।

1:45:07इसीलिए दोनों जरूरी है। शरीर को स्वस्थ

1:45:10रखने के लिए भौतिकवाद और आत्मा को, मन को,

1:45:14बुद्धि को स्वस्थ रखने के लिए

1:45:18आध्यात्मवाद।

1:45:23शरीर को भी अच्छा रखना है

1:45:28क्योंकि एक आध्यात्मवादी

1:45:33जो अपना उत्थान चाहता है

1:45:37उसको भी शरीर तो स्वस्थ रखना ही पड़ेगा

1:45:42क्योंकि यदि शरीर आपका स्वस्थ नहीं होगा

1:45:46बीमारियां होंगी विकार होंगे शरीर में

1:45:52तो ध्यान दीजिए जब आपका शरीर गड़बड़ होता

1:45:55है ना तो फिर मन भी गड़बड़ होता है। तो जब

1:46:00शरीर गड़बड़ होगा तो आप बताइए कि आपका मन

1:46:03भगवान में लगेगा।

1:46:07अभी तो शरीर ठीक है तो मन नहीं लगता।

1:46:15तो शरीर जब गड़बड़ होता है ना मैं तो

1:46:17कहूंगी कि जब हमारा शरीर गड़बड़ होता है

1:46:21तो जिन लोगों से हमारा विशेष लगाव है

1:46:25स्त्री पति बेटा

1:46:28उस समय तो यह भी भार लगते हैं।

1:46:34बहुत जोर के सिर में दर्द हो रहा है पति

1:46:37को। फट रहा है। बीपी हाई हो गया है। सिर

1:46:41फट रहा है। और इतने में पत्नी आई। सुनिए

1:46:45जी मुझे ना आपसे बहुत जरूरी बात करनी है

1:46:48बेटे को लेकर। देखो इस समय मेरे पास मत

1:46:51आओ। मेरा सिर फट रहा है। इस समय मेरा

1:46:54दिमाग खराब मत करो। कल बात करना। हैं?

1:46:58कैसे बातें कर रहे? कल तो बड़े प्यार से

1:47:00बोल रहे थे। कल तो बोल रहे थे तू बड़ी

1:47:02अच्छी है। आज क्या हुआ? डांट क्यों रहे हो

1:47:05मुझे? अरे बाबा मेरा सिर फट रहा है। इस

1:47:09समय मेरा पीछा छोड़।

1:47:12जा यहां से। मैं कुछ नहीं सुनना चाहता।

1:47:16देखिए वो स्त्री वो पत्नी जिससे सर्वाधिक

1:47:21लगाव है लेकिन सिर फट रहा है। बीपी हाई है

1:47:26तो वो पत्नी भी भार लगती है।

1:47:31तो बताइए जब शारीरिक प्रॉब्लम से

1:47:36जहां घोर लगाव है, आसक्ति है, वह भार लगते

1:47:40हैं। तो जब शरीर में बीमारियां होंगी तो

1:47:44ऐसा मन भी उदास तो ऐसा तंग मन भगवान में

1:47:49कैसे लगेगा?

1:47:52इसीलिए

1:47:55शरीर को भी स्वस्थ रखना है। इसलिए

1:48:00व्यायाम करो। जो जो शरीर के लिए आवश्यक है

1:48:05प्राणायाम व्यायाम

1:48:11शरीर में

1:48:14कैसा भोजन देना है कितना संतुलित आहार

1:48:17करना है कितना पेट खाली रखना है आदि आदि

1:48:20जो शास्त्रों में शरीर को स्वस्थ रखने के

1:48:24लिए बताया गया

1:48:27शरीर को स्वस्थ रखो

1:48:30और

1:48:32भीतर की मशीनरी को ठीक रखने के लिए

1:48:37हमें आध्यात्मवाद का सहारा लेना है।

1:48:43इसको भी ठीक करना है भीतर की मशीनरी को।

1:48:50क्योंकि सारी गड़बड़ी ये भीतर वाले संसार

1:48:55की है। याद है ना आपको भीतर का संसार?

1:48:58भीतर का संसार है। मन, बुद्धि, अहंकार ये

1:49:02अंतःकरण जहां हमारे विचार उत्पन्न होते

1:49:06हैं। जहां यह बुद्धि निश्चय लेती है, इसको

1:49:09मैं कहूंगी भीतर का संसार।

1:49:12तो यह जो भीतर का संसार है यह बड़ा भयानक

1:49:16है। बड़ा विराट है।

1:49:21भले ही

1:49:24यह बाहर का जगत

1:49:27आपकी आंखों के सामने नहीं है।

1:49:33लेकिन यदि भीतर का जगत है तो भी डेंजरस।

1:49:43उदाहरण से समझिए।

1:49:48आप रोज ऑफिस जाते हैं, नौकरी करने जाते

1:49:52हैं तो

1:49:54ऑफिस जब जाते हैं तो घर के लोग तो वहां

1:49:57नहीं रहते ना। तो इसका मतलब बाहर का जगत

1:50:01स्त्री पति बच्चे आदि तो नहीं है।

1:50:04तो बाहर का जगत तो नहीं है आपके पास। हां

1:50:09तो इसका मतलब आप इन सब से विरक्त हो गए।

1:50:13जी नहीं भले ही बाहर का जगत नहीं है तो भी

1:50:20यह भीतर का जगत इतना विराट है कि वह ऑफिस

1:50:24में बैठा बैठा भी उनका चिंतन करता है।

1:50:29है ना?

1:50:31मैं आपको यह दर्शन करा रही हूं भीतर के

1:50:34जगत और बाहर के जगत के

1:50:37यह इतना भयंकर है भीतर का जगत।

1:50:44इसलिए इस भीतर वाले जगत पर काम करना है।

1:50:49यदि यह भीतर का जगत समाप्त हो जाए।

1:50:57देखिए भीतर का जगत समाप्त से मतलब है

1:51:00पवित्र हो जाए।

1:51:03यदि यह अंतःकरण पवित्र हो जाए तो यह बाहर

1:51:07का जगत

1:51:09आप पर कोई प्रभाव नहीं डाल सकता। इसीलिए

1:51:13रामायण में तुलसीदास जी कहते हैं भरत ही

1:51:16हो न राज मद विधि हरि हर पद पाय

1:51:24भरत ने भीतर के जगत को पवित्र कर लिया।

1:51:30इसीलिए यदि उसे ब्रह्मा की सीट भी दे दी

1:51:35जाए विधि हरिहर

1:51:38ब्रह्मा विष्णु शंकर की भी सीट मिल जाए

1:51:42भरत को

1:51:44तो उसे मद नहीं हो सकता

1:51:48भरत ही हो ना राज मद क्योंकि वो भीतर के

1:51:52संसार को जीत चुके हैं। इसलिए यह बाहर का

1:51:56राज पाठ आदि

1:51:59कोई प्रभाव नहीं डालेगा भरत पर। उसको मद

1:52:02नहीं हो सकता।

1:52:06क्योंकि यह भीतर वाला संसार जो है यह बाहर

1:52:11वाले संसार को

1:52:14पाकर और बढ़ जाता है।

1:52:19देखिए मान लीजिए बाहर का संसार नहीं है।

1:52:26एक अंधा

1:52:28जन्मसूर

1:52:30अब उसने तो पैदा होते ही कभी यह बाहर का

1:52:33जगत नहीं देखा।

1:52:36तो उसके लिए बाहर का संसार नहीं है। लेकिन

1:52:40आपको जानकर आश्चर्य होगा

1:52:43कि एक जन्मा जिसने इस बाहर के जगत को नहीं

1:52:48देखा तो भी उसके भीतर का जगत इतना विराट

1:52:53है कि जाकर पूछ लीजिएगा किसी जो जन्म से

1:52:56अंधा है जन्मांध को वो सपना देखता है।

1:53:03अरे सपना तो हम

1:53:05सब देखते हैं क्योंकि सपने में वही देखते

1:53:09हैं ना जो इन आंखों से इस जगत में देखा

1:53:12है। वही हम सपने में चिंतन करके देखते हैं

1:53:16और थोड़ा अधिक देखते हैं यहां चलते हैं।

1:53:18सपने में उड़ते भी हैं।

1:53:21लेकिन जो देखते हैं इन आंखों से इस जगत को

1:53:25वही सपने में चिंतन के द्वारा देखते हैं।

1:53:28लेकिन जन्मांद जो है उसने तो इन आंखों से

1:53:32इस जगत को देखा ही नहीं। तो वो सपना कैसे

1:53:35देखता है? बिल्कुल हमारी तरह

1:53:40ये आश्चर्य

1:53:43यह है भीतर का जगत इतना विराट

1:53:48कि अंधे के लिए बाहर का जगत नहीं। और मैं

1:53:53अंधा माने जन्मांध की बात कर रही हूं जो

1:53:56जन्म से अंधा है। जिसने कभी देखा ही नहीं

1:53:59संसार को। ऐसा जन्मांद भी सपना देखता है।

1:54:05इसीलिए यह भीतर का संसार बहुत विराट है।

1:54:09उसी पर तो हमें सारा परिश्रम करना है। तो

1:54:14मैं आपको बता रही थी कि यह भीतर वाला

1:54:16संसार जब बाहर का संसार मिलता है इसको

1:54:25तो ये उसको पाकर बढ़ जाता है। द्विगुणित

1:54:30हो जाता है। एक बच्चा है अपने मम्मी से

1:54:33कहता है मम्मी मम्मी मम्मी हम टॉफी खाएंगे

1:54:36टॉफी खाएंगे।

1:54:39मम्मी कहती है टॉफी नहीं है बेटा नहीं है

1:54:42नहीं हम तो खाएंगे जिद कर रहा है तो यह

1:54:46टॉफी रूपी बाहर का संसार अभी वो वस्तु है

1:54:50नहीं उसके पास तो वो जिद करता है मान

1:54:55लीजिए मम्मी ने अलमारी खोली और वहां टॉफी

1:54:58का डिब्बा था

1:55:01अब उस बच्चे ने देखा तो जो टॉफी की मांग

1:55:07कर रहा था। जैसे ही उसको टॉफी दिखी

1:55:11अब वह अपने आप को कंट्रोल नहीं कर सकता।

1:55:17अब कंट्रोल नहीं कर सकता। यानी जब तक बाहर

1:55:20का जगत नहीं था तब तक ठीक। लेकिन जैसे ही

1:55:24पाया

1:55:27वो बढ़ जाता है। अब तो वह बच्चा लेकर ही

1:55:31रहेगा। चाहे जो हो जाए

1:55:34मां के सामने बेटा नहीं है।

1:55:38विदेश में है

1:55:41तो बाहर का जगत नहीं है। मां चिंतन करती

1:55:45है। अरे मेरे बेटे ने खाया होगा कि नहीं?

1:55:48ठीक से रोड पार कर रहा होगा कि नहीं? यह

1:55:51चिंतन मान लीजिए बेटा सरप्राइज देना चाहता

1:55:57है और मां चिंतन कर रही है अचानक

1:56:01मां के सामने आ जाए।

1:56:04तो जो बाहर का संसार नहीं था जैसे ही

1:56:07सामने आया

1:56:10तो बाहर वाले संसार को पाकर भीतर का संसार

1:56:15बढ़ गया। अब मां क्या करेगी? अब अपने आप

1:56:18को रोक नहीं सकती।

1:56:21अब तो वो उठेगी और गले लगा लेगी।

1:56:28जब बाहर का संसार नहीं रहता तो ऐसा नहीं

1:56:33है कि

1:56:36वो कामनाएं नहीं रहती। वो दबी रहती हैं।

1:56:40जब बाहर का संसार नहीं रहता है तो भीतर के

1:56:43संसार में वो इच्छाएं वो कामनाएं नष्ट

1:56:47नहीं होती। वो दबी रहती है। लेकिन जैसे ही

1:56:50वह सामने आता है जो दबी थी वह प्रकट हो

1:56:54जाती है।

1:56:57तो यह है भीतर का संसार।

1:57:01इसीलिए इस भीतर वाले संसार पर हमें विशेष

1:57:07रूप से

1:57:09काम करना है समझना है अजामे काम लोहित

1:57:14शुक्ल कृष्णा बी प्रजा सजना स्वरूपा अजो

1:57:20कोमानते

1:57:23जना नाम भक्त भोगा्य

1:57:27वेद कह रहा है

1:57:30यह भीतर का जगत यह अंतःकरण यह तीन गुणों

1:57:34वाला है। सतगुण, रजोगुण और तमोगुण यह

1:57:39त्रिगुणात्मिका माया का प्रभाव है हमारे

1:57:43भीतर वाले संसार पर।

1:57:46और यह तीनों गुण

1:57:49यह तीनों गुण हम सब में सब में

1:57:55जितने भी हम मायाधीन जीव हैं सब में यह

1:57:58तीनों गुण पाए जाते हैं। पति में भी तीनों

1:58:01गुण, पत्नी में भी, बेटे में भी, सब में

1:58:03तीनों गुण।

1:58:07और इन तीनों गुणों में कोई कोई गुण की

1:58:11प्राथमिकता होती है। किसी में सतोगुण की

1:58:15प्राथमिकता है। प्रधानता है। किसी में

1:58:19रजोगुण की प्रधानता है। किसी में तमोगुण

1:58:22की प्रधानता है। बाकी दो गुण भी रहते हैं।

1:58:27इसीलिए जो आपको बहुत शांत शील दिखाई पड़ता

1:58:30है उसमें सात्विक गुण की प्रधानता है। जो

1:58:34खूब

1:58:37राजसी प्रवृत्ति का है नाम कीर्ति

1:58:42कर्मठ

1:58:44राजसी भोजन रसिक

1:58:47तो

1:58:49उसमें रजोगुण की प्रधानता है जो नकारात्मक

1:58:55है हमेशा दूसरों का दोष देखना ईर्ष्या

1:58:58करना

1:59:01हिंसा करना क्रोध करना इसमें में तमोगुण

1:59:06की प्रधानता है। तो यह प्रधानता रहती है

1:59:09हमारे हमारे संस्कार के अनुसार लेकिन बाकी

1:59:13भी सतोगुण रजोगुण

1:59:17तमोगुण के साथ रहते हैं या रजोगुण के साथ

1:59:20बाकी दो गुण रहते हैं या सतगुण के साथ

1:59:23बाकी दो गुण रहते हैं। सब में यह तीनों

1:59:26गुण रहते हैं।

1:59:29जब

1:59:31जब गुणों में समानता होती है। ध्यान

1:59:36दीजिए।

1:59:37जब गुणों में समानता होती है

1:59:42तो हमारा

1:59:44एक दूसरे में लगाव हो जाता है।

1:59:48और जब गुणों में असमानता होती है तो हमारा

1:59:52आपस में टकरार हो जाता है।

1:59:57इसीलिए

1:59:58कुछ पॉइंट्स मैं आपको आज बताने जा रही

2:00:02हूं। एक पहला पॉइंट बताकर विराम दूंगी।

2:00:06बाकी के पॉइंट पर हम कल विचार करेंगे।

2:00:09पहले पॉइंट को याद करके जाइएगा।

2:00:16पहला पॉइंट

2:00:18हमेशा ध्यान रखिए कि जब तक हम इन तीन

2:00:23गुणों से युक्त हैं।

2:00:27कोई भी किसी के मुआफिक

2:00:32एक क्षण को भी नहीं रह सकता।

2:00:36कोई भी किसी के अनुकूल एक क्षण को भी नहीं

2:00:40रह सकता।

2:00:42यह जो हम दिन रात सोचते रहते हैं ना और

2:00:46टेंशन करते रहते हैं। अजी वो तो हमारी बात

2:00:50सुनता ही नहीं है। अजी वो तो हमारी बात

2:00:53मानता ही नहीं है।

2:00:57यही टेंशन है आपका।

2:01:01वह तो हमारे मुआफिक चलता ही नहीं है। वह

2:01:04हमारे अनुकूल ही नहीं है।

2:01:07तो यह ध्यान रखिए जब तक यह तीनों गुण है

2:01:11कोई किसी के अनुकूल नहीं रह सकता। जब

2:01:14गुणों में समानता होती है तो बस

2:01:18एडजस्टमेंट हो जाती है। प्यार हो जाता है।

2:01:21मान लीजिए आपकी पत्नी में भी सतगुण है और

2:01:26आप में भी सतगुण है। दोनों गुण समान है।

2:01:31तो प्यार हो जाएगा।

2:01:37लेकिन यदि

2:01:39एक में सत्वगुण है और एक में रजोगुण

2:01:44तो क्या होगा? फिर एडजस्टमेंट नहीं हो

2:01:47सकता।

2:01:51अच्छा

2:01:52यदि दोनों में सत्वगुण है

2:01:57तो भी टकरा रहे हैं। आप कहेंगे अजी अभी तो

2:02:00आपने बताया कि जब दोनों गुण समान होंगे तो

2:02:04प्यार होगा ना ना वो ऐसा है समान होने पर

2:02:08प्यार तो होता है लेकिन कुछ काल के लिए

2:02:11क्योंकि उसके बाद जैसे ही गुण में

2:02:14परिवर्तन होगा क्योंकि मात्रा में अंतर है

2:02:17ना तो गुण जैसे ही परिवर्तित होगा फिर

2:02:20टकरार क्या मतलब यूं समझिए

2:02:24दो सहेलियां है

2:02:28एक में

2:02:32सतगुण की मात्रा 12 आने हैं और दूसरे में

2:02:36सतगुण की मात्रा चार आने। ठीक? दोनों आए

2:02:40प्रवचन सुनने।

2:02:42अब दोनों में सतगुण है तो दोनों प्रवचन

2:02:45सुनने आए। एक ही गुण वाले हैं लेकिन

2:02:49मात्रा में अंतर है। एक में 12 आने हैं।

2:02:51एक में चार आने हैं। तो चार आने वाले का

2:02:54सत्वगुण जब समाप्त हुआ तो वह 12 आने वाले

2:02:58को कहती है ए ए

2:03:02क्या है? देख नहीं रही। देवी जी देख रही

2:03:04है। चुप रहो। अरे अब हमको कुछ समझ में

2:03:08नहीं आ रहा है। बस अब हम चलते हैं। अरे

2:03:12बैठो ना घर जाके क्या करोगी? खाना खाओगी?

2:03:16सो जाओगी तो थोड़ी देर की बात है बैठ जाओ

2:03:18ना जी मैंने कहा ना तुमसे कि मुझसे और

2:03:21नहीं बैठा जा रहा सब सिर के ऊपर जा रहा है

2:03:25चलो

2:03:28तो जिसमें चारा ने था सत्वगुण

2:03:32वो खड़ी हो गई वो बार-बार कह रही है बैठ

2:03:35जा ना मुझे जाना है अब वो उठ के चलती बनी

2:03:39बार आने वाली बैठी है चार आने वाली चली गई

2:03:43ये तो बीचबीच में उठ के आते

2:03:52डोंट माइंड

2:03:58तो गुणों में फर्क हो गया ना

2:04:01तो टकरार हो गई

2:04:05तो जब गुण समान एडजस्टमेंट जब गुणों में

2:04:09गुण समान लेकिन मात्रा में अंतर फिर

2:04:13डिटचमेंट

2:04:15और यदि गुणों में ही अंतर है। पतिदेव में

2:04:20रजोगुण है। पत्नी में सत्वगुण है। पत्नी

2:04:23ने पतिदेव से कहा सुनो जी हां वो एक देवी

2:04:29जी आई है रासेश्वरी देवी हां हां सुना है

2:04:32बहुत बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगे हैं।

2:04:36क्या वह लिखा है उपनिषद ज्ञानामृत

2:04:40जी हां दूसरे लोग बता रहे थे बहुत बढ़िया

2:04:43प्रवचन हो रहा है मेरी भी इच्छा हो रही है

2:04:46मैं भी जाऊंगी आप भी चलो ना

2:04:51मेरा

2:04:54कोई मन नहीं मेरा कोई विश्वास नहीं है इन

2:04:57सब चीजों में

2:04:59आई डोंट हैव एनी फेथ इन दिस टॉक्स

2:05:03डिस्कोर्सेज

2:05:04मुझे नहीं जाना

2:05:07तो ठीक है मैं जाऊं। हां ठीक है तुमको

2:05:10जाना है तो हो आओ। अब वो पत्नी आ गई। अब

2:05:14पति का जहां फेथ है पति गए। पत्नी का जहां

2:05:18फेथ है वह आई पत्नी का फेथ। प्रवचन में

2:05:22पति का फेथ दोस्तों में तो पतिदेव जी

2:05:25दोस्त के पास चले गए। अब

2:05:29दो घंटे बाद

2:05:31दोनों अपने अपने स्थान से लौटे।

2:05:36तो पतिदेव

2:05:39पत्नी से पूछते हैं क्यों प्रवचन सुनाई?

2:05:45जी हां सुनाई।

2:05:48अच्छा अच्छा कुछ समझ भी आया कुछ पल्ले भी

2:05:51पड़ा। नहीं बहुत बढ़िया बोलती है। अपन तो

2:05:55सोच रहे हैं कल भी जाएंगे। चुप रहो।

2:06:00एक दिन हमने बोल दिया हो गया।

2:06:06इतना ही तुमको जाने की पड़ी है तो आज ही

2:06:11चली जाओ देवी जी के साथ रहो जाके उनके पास

2:06:20तो देखिए ये गुणों में होता होगा मैं तो

2:06:23आईडिया से बता रही हूं आप लोग को

2:06:28तो

2:06:30गुणों में असमानता

2:06:32टकरार इसलिए इसमें आश्चर्य नहीं करना है

2:06:36कि वो हमारे साथ ऐसा व्यवहार क्यों कर रहे

2:06:38हैं? वो हमारे साथ ऐसा व्यवहार क्यों कर

2:06:41रहे हैं? यदि आप यह सिद्धांत अपने

2:06:46मस्तिष्क में बिठा ले

2:06:49कि जब गुण असमान होंगे तो टकरार होगी ही।

2:06:54यदि यह बात बिठा ले अपने मस्तिष्क में तो

2:06:5750% हमारी

2:07:00अशांति समाप्त हो जाए।

2:07:02हम बिना मतलब के बुद्धि लगाते रहते हैं।

2:07:05सोचते रहते हैं। ऐसा क्यों बोले? वह क्यों

2:07:08हुआ? यह क्यों हुआ? अरे उनमें जो गुण है

2:07:10उस अनुसार उन्होंने रिएक्ट किया। हम में

2:07:13जो गुण है हमने उसके अनुसार रिएक्ट किया।

2:07:16सीधीसीधी बात।

2:07:19कोई किसी के मुआफिक नहीं हो सकता। कोई

2:07:23किसी को अच्छा नहीं कह सकता।

2:07:29इसीलिए अच्छा कहलाने के चक्कर में मत

2:07:32रहिए। अच्छा बनने के चक्कर में रहिए।

2:07:38इस जगत में आपको कभी कोई अच्छा नहीं कह

2:07:42सकता। आमूल सिकन पयसा

2:07:47नबर वृक्षो मधुरत

2:07:51नीम का वृक्ष कड़वा ही होता है। उसे जितना

2:07:54भी दूध घी महू से शहद से सींच लीजिए तो भी

2:08:00वह कभी मीठा नहीं होगा।

2:08:03ऐसे ही संसार वालों के लिए आप जितना भी कर

2:08:08लीजिए यह संसार वाले आपको कभी अच्छा नहीं

2:08:14कहेंगे।

2:08:18इसलिए सावधान रहिए।

2:08:22जो जरूरी है जितना जरूरी है नैतिकता से

2:08:26चलिए, मूल्यों से चलिए, धर्म से चलिए।

2:08:32हाथी अपनी चाल चलत है। कुकुर भुके तो आ को

2:08:36भुकवा दे।

2:08:39हाथी जिस गली से निकलता है उस गली के

2:08:43कुत्ते भौकते हैं।

2:08:47अब मुड़कर यदि हाथी

2:08:51कुत्तों को जवाब दे तो क्या यह हाथी की

2:08:55शान है?

2:08:58हाथी मुड़कर नहीं देखता। भले ही कुत्ते

2:09:01सोचे कि हम इतनी जोर के भौके कि हाथी की

2:09:05हिम्मत ही नहीं पड़ी हमको मुड़ के देखने

2:09:08की।

2:09:12इसलिए केयर मत कीजिए।

2:09:16अरे वो क्या कहेगा? अरे वो क्या कहेगी?

2:09:21अरे आपका कंट्रोल दूसरे के हाथ में है

2:09:24क्या?

2:09:26वह आपके लिए क्या सोच रहा है? वह आपको

2:09:31क्या कहेगा?

2:09:34दिन रात इसी में परेशान है आप।

2:09:38बिटिया का ब्याह है। हां तो कर दो।

2:09:43अजी करें कैसे? अब क्या बताएं? उतने तो

2:09:47पैसे नहीं है। अरे जितने पैसे हैं उतने

2:09:49में करो। जी नहीं दुनिया वाले क्या

2:09:52कहेंगे?

2:09:54बताओ। अरे शादी दुनिया वालों की है या

2:09:57तुम्हारी अपनी बिटिया की?

2:10:01तुम बिटिया की शादी जितने में करोगे तो भी

2:10:05दुनिया वाले कहेंगे। तुम उधार लेकर करोगे

2:10:08तो भी दुनिया वाले कहेंगे। दुनिया वालों

2:10:12का तो काम ही है। वो तो कहेंगे ही।

2:10:16अब तुमने उधार लेकर ब्याह किया। तुम्हारी

2:10:20हैसियत है एक करोड़ की। तुमने उधार ले

2:10:24लिया। तीन करोड़ और तीन करोड़ उधार लेकर

2:10:27बिटिया का ब्याह किया।

2:10:31गिरवी रखा सब

2:10:34मेहमान आए खाना पीना हुआ बड़ा बड़े शानो

2:10:38शौकत से आपने किया।

2:10:41और जब मेहमान आए आपने पूछा आओ भगत में सब

2:10:45ठीक है ना बढ़िया तो आपके मुंह के सामने

2:10:47कह रहे क्या बढ़िया ब्याह किया आपने बहुत

2:10:50अच्छी अरेंजमेंट और फिर किनारे पर जाकर

2:10:54बोलते हैं दो नंबर का कमाया था खर्च कर

2:10:58दिया तो क्या हुआ

2:11:02यह दुनिया वाले यह बेचारे ने उधार लेकर

2:11:06किया और यह बोल रहे और आप सुन भी

2:11:10और आपको बुरा भी लग रहा है। तो यह तो

2:11:14दुनिया है। अरे इस दुनिया ने जब अग्नि से

2:11:19प्रकट होने वाली सीता जी को नहीं छोड़ा ये

2:11:23हमको क्या छोड़ेंग?

2:11:29इसलिए अच्छाई का सर्टिफिकेट

2:11:32दुनिया वालों से मत लीजिए।

2:11:36यह

2:11:37आज

2:11:40आपका सम्मान करेंगे। कल आपको गाली देंगे।

2:11:48इसीलिए

2:11:52अच्छा बनना है। जितना परिश्रम हम अच्छा

2:11:56कहलाने के लिए करते हैं। दिन रात यदि उससे

2:12:00बहुत थोड़ा परिश्रम अच्छा बनने के लिए कर

2:12:04जाए तो पता नहीं कितने अच्छे बन जाए।

2:12:09इसीलिए अच्छा बनना है। अच्छा बनना

2:12:15और अच्छे बनने के लिए भीतर वाले इस जगत को

2:12:19यानी इस अंतःकरण को शुद्ध करना है। पवित्र

2:12:23करना है। इसलिए इस भीतर वाले

2:12:27इस जगत पर विशेष रूप से विचार करेंगे। आज

2:12:32हमने एक पॉइंट पर विचार किया कि जगत में

2:12:36कोई किसी के मुआफिक नहीं होता और उसका

2:12:39कारण है यह तीन गुण। जब तक यह तीन गुण

2:12:43हैं, इन गुणों के हिसाब से ही हमारा

2:12:46व्यवहार होता है। गुण समान होते हैं तो

2:12:50एडजस्टमेंट हो जाता है। गुण में

2:12:53विपरीतताएं होती है, असमानता होती है तो

2:12:57टकरार हो जाती है। इसीलिए हमें

2:13:02इस जगत में इस सिद्धांत को लेकर व्यवहार

2:13:07करना है। इसी भीतर वाले जगत को लेकर और भी

2:13:11दो पॉइंट्स हैं जो हमें सिद्धांत रूप में

2:13:14अपने साथ रखने हैं। उस पर विचार किया

2:13:17जाएगा। लेकिन आज नहीं कल। बोलिए वृंदावन

2:13:21बिहारी लाल की

2:13:24जय।

2:13:24श्रीमद् सतगुरु सरकार की

2:13:28जय।

2:13:29अब लोग आप लोग पांच मिनट कीर्तन कर लीजिए।

2:13:32फिर आरती होगी।

2:13:37ऑफलाइन क्विज विनर्स विष्णु कुमार गुप्ता

2:13:42संगीता सिंह हेमंत साहू परमेश्वर राठौड़

2:13:48परेश कुमार सिंह

2:13:51ऑनलाइन क्विज विनर्स अनीमा त्रिपाठी

2:13:55भुवनेश्वर विमल चौधरी कोलकाता राघवेंद्र

2:14:00परमार राघवेंद्र परमार अकोला शौर्य राठौड़

2:14:06अकलतरा

2:14:08अरविंद कुमार जोशी उदयपुर सुजाता सोमती

2:14:15बेंगलुरु

2:14:17देवेश मिश्रा मुंबई

2:14:38तेरी कृपा का भरोसा

2:14:41भारी राधा रानी

2:14:45तेरी कृपा का भरोसा भारी राधा रानी

2:14:51तेरी कृपा का

2:14:54तेरी कृपा का भरोसा भारी

2:14:59राधा रानी

2:15:01तेरी कृपा का भरोसा हारी राधा रानी

2:15:07तेरी कृपा का

2:15:09राधे

2:15:10तेरी कृपा का

2:15:13राधे

2:15:14तेरी कृपा का भरोसा भारी राधा रानी

2:15:20तेरी कृपा का भरोसा भारी राधा रानी

2:15:26तेरी कृपा कृपा का भरोसा भारी राधा रानी

2:15:33तेरी कृपा का भरोसा भारी राधा रानी

2:15:39तू तो कृपा ही कृपा कर राधा रानी

2:15:46तू तो कृपा ही कृपा कर राधा रानी

2:15:52तू तो कृपा ही कृपा कर राधा रानी रानी

2:15:59तू तो कृपा ही कृपा कर राधा रानी

2:16:05तेरी कृपा का ना और छोर राधा रानी

2:16:12तेरी कृपा का ना और छोड़ राधा रानी

2:16:18तेरी कृपा का ना और छोड़ राधा रानी

2:16:25तेरी कृपा

2:16:27और छोड़ राधा रानी

2:16:31तू तो कृपा ही कृपा करे राधा रानी

2:16:38तू तो कृपा ही कृपा करे राधा रानी

2:16:44तेरी कृपा करना और छोड़ राधा रानी

2:16:51तेरी कृपा करना और छोड़ राधा रानी

2:16:57तेरी कृपा का राधे तेरी कृपा का राधे

2:17:04तेरी कृपा का भरोसा भारी राधा रानी

2:17:10तेरी कृपा का भरोसा भारी राधा रानी

2:17:16तेरी कृपा का भरोसा भारी राधा रानी

2:17:23तेरी कृपा का भरोसा सा

2:17:27राधा रानी

2:17:29तू तो कृपा की है मूर्त

2:17:34राधा रानी

2:17:36तू तो कृपा की है मूर्ति

2:17:40राधा रानी

2:17:42तू तो कृपा की है मूर्ति राधा रानी

2:17:49तू तो कृपा की है मूर्ति

2:17:53राधा रानी

2:17:55तू तो कृपा की है मूर्त

2:18:00राधा रानी तू तो कृपा की है मूर्त

2:18:06राधा रानी

2:18:08तेरी अगित

2:18:11शक्ति है राधा रानी

2:18:15तेरी अगतित

2:18:17शक्ति है राधा रानी तेरी अगनित

2:18:24शक्ति है राधा रानी

2:18:28तेरी अरित

2:18:30शक्ति है राधा रानी

2:18:34तेरी कृपा का

2:18:37राधे तेरी कृपा का

2:18:40राधे तेरी कृपा का भरोसा वारी राधा रानी

2:18:47तेरी कृपा का भरोसा

2:18:51राधा रानी

2:18:54तेरी कृपा का भरोसा भारी राधा रानी

2:19:00तेरी कृपा का भरोसा

2:19:04राधा रानी

2:19:06तेरी कृपा का

2:19:09राधे तेरी कृपा का

2:19:12राधे तेरी कृपा का भरोसा भारी राधा रानी

2:19:19तेरी कृपा का भरोसा

2:19:23राधा रानी

2:19:25तेरी कृपा का भरोसा भारी राधा रानी

2:19:32तेरी कृपा का भरोसा भारी राधा रानी

2:19:38तेरी कृपा का भरोसा भारी राधा रानी

2:19:44तेरी कृपा का भरोसा भारी राधा रानी

2:19:51तू कृपा ही कृपा कर राधा रानी।

2:19:57तू तो कृपा ही कृपा कर राधा रानी।

2:20:03तू तो कृपा ही कृपा कर राधा रानी।

2:20:10तू तो कृपा ही कृपा कर राधा रानी।

2:20:16तू तो कृपा ही कृपा करे राधा रानी तू तो

2:20:23कृपा ही कृपा करे राधा रानी

2:20:29तेरी कृपा का ना और छोड़ राधा रानी

2:20:35तेरी कृपा का ना और छोड़ राधा रानी

2:20:41तेरी कृपा का

2:20:45तेरी कृपा का

2:20:48तेरी कृपा का भरोसा

2:20:51हमारी राधा रानी

2:20:54तेरी कृपा का भरोसा

2:20:58राधा रानी

2:21:00तेरी कृपा का भरोसा भारी राधा रानी

2:21:06तेरी कृपा का भरोसा भारी राधा रानी

2:21:13तेरी कृपा का भरोसा सा भारी भारी नहीं

2:21:18भारी

2:21:20तेरी कृपा के बिना और कुछ नहीं इतना भरोसा

2:21:24है भरपूर भारी माने भरपूर

2:21:28तेरी कृपा का भरोसा भारी राधा रानी

2:21:34तेरी कृपा का भरोसा भारी राधा रानी

2:21:41राधे गोविंद

2:21:44गोविंद

2:21:45राधे भजो राधे गोविंद गोविंद राधे

2:21:51भजो राधे गोविंद

2:21:54गोविंद राधे

2:21:56राधे गोविंद

2:21:59गोविंद राधे

2:22:01राधे गोविंद

2:22:04गोविंद राधे

2:22:07राधे गोविंद

2:22:09गोविंद राधे

2:22:12राधे गोविंद

2:22:14गोविंद राधे राधे गोविंद गोविंद राधे भजो

2:22:22राधे गोविंद गोविंद राधे

2:22:26भजो राधे गोविंद

2:22:29गोविंद राधे

2:22:31भजो राधे गोविंद

2:22:34गोविंद राधे

2:22:36राधे गोविंद

2:22:39गोविंद राधे

2:22:41राधे गोविंद

2:22:44गोविंद राधे राधे गोविंद गोविंद राधे राधे

2:22:52गोविंद गोविंद राधे राधे गोविंद गोविंद

2:22:59राधे भजो राधे गोविंद गोविंद राधे भजो

2:23:05राधे गोविंद गोविंद राधे भजो राधे गोविंद

2:23:11गोविंद राधे भजो राधे गोविंद गोविंद राधे

2:23:16भजो राधे गोविंद गोविंद राधे राधे गोविंद

2:23:23गोविंद राधे भजो राधे गोविंद गोविंद राधे

2:23:32आरती प्रीतम प्यारी की बनवारी नथवारी की

2:23:40आरती प्रीतम प्यारे की ये बनवारी रखवारी

2:23:47की

2:23:48सिर मुकुट जन के शहर

2:23:55की

2:23:57प्रेम सच के रसीले नैन रसीले नैन रसीले

2:24:05सैन फूल नैन मनहारी

2:24:09के बनवाई

2:24:12लखवारी

2:24:14दो दगित

2:24:16परवारी

2:24:18लन

2:24:20छ न्यान

2:24:24अति न्यारी

2:24:26मुखान

2:24:30दम

2:24:33छवि न्यारी की रखवाली रखवारी

2:24:39की एक सिर सिर मोर मुकुट राजे एक सिर चुनर

2:24:46छवि

2:24:48सिर सिर छे बन

2:24:52संग ब्रजपाल लाडली लाल माल

2:24:57कृपालारी

2:25:00की जय हो

2:25:03रखवारी की आरती प्रीतम प्यारी की बनवारी

2:25:11रखवारी की आरती प्रीतम प्यारी की बनवारी

2:25:19रखवारी

2:25:21बोलिए वृंदावन बिहारी लाल की

2:25:25जय

2:25:26श्रीमत सतगुरु सरकार की

2:25:29जय जय जय श्री राधे

2:25:34जय जय श्री राधे

2:25:38जय जय श्री

2:26:20राधे-राधे।

2:26:22जो लोग आगामी कुछ दिनों में आयोजित होने

2:26:26जा रहा स्पेशल मेडिटेशन कार्यक्रम में भाग

2:26:30लेना चाहते हैं वो लोग कृपया एलईडी

2:26:33स्क्रीन में प्रोजेक्ट हुआ क्यूआर कोड पर

2:26:37अवश्य स्कैन करें और अपना नाम रजिस्टर

2:26:40करें।

2:26:42इसके साथसाथ एलईडी स्क्रीन के बाएं भाग

2:26:45में उपनिषद ज्ञानामृत का क्विज में भाग

2:26:49लेने के लिए क्यूआर कोड भी प्रोजेक्ट किया

2:26:53गया है। आप लोग दोनों क्यूआर कोड को

2:26:56अलग-अलग स्कैन करके दोनों में

2:27:01भाग ले सकते हैं।

2:27:04ब्रज गोपिका सेवा मिशन द्वारा प्रकाशित

2:27:07विभिन्न आध्यात्मिक पुस्तकें हमारे पुस्तक

2:27:11स्टॉल में अवेलेबल है। आप लोग पुस्तक

2:27:15स्टॉल को अवश्य

2:27:18पधारें।

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