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रामायण कथा । रावण ने कैसे धोके से किया माँ सीता का हरण

Tilak · 2,916 words · 14 min read

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0:00[संगीत]

0:01हमारी संस्कृति हमारे

0:04संस्कार सदा रहे हमारे

0:07साथ भारत के महान ग्रंथों और काव्यों का

0:10संपूर्ण

0:12संकलन सब्सक्राइब करें

0:15तिलक कई तरीके की एलईडी लाइट्स आपके घर और

0:18ऑफिस के लिए जीआर एलईडी लाइट्स मेक इंडिया

0:20ब्राइट कौन हो तुम लंकेश्वर

0:28रावण हां रावण जिसे तुम्हारी कामना ने

0:33इतना आतुर कर दिया है कि स्वयं तुम्हारे

0:36द्वार पर भिक्षा मांगने आया तुम्हारा यह

0:39साहस एक गीदड़ होकर सिंघनी की कामना कर

0:42रहे हो तुम्हारा अंत समय आ गया है यदि

0:46प्राण प्यारे हो तो अभी समय है चला जा

0:49यहां

0:49से तेरा ही नहीं तेरे सारे कुल का सर्वनाश

0:53हो

0:56[संगीत]

0:58जाएगा i

1:01[प्रशंसा]

1:06[संगीत]

1:47[संगीत]

1:50अरे पुत्र अरे पुत्र लक्ष्मण लक्ष्म

1:54भैया आइए जल्दी आइए एक अद्भुत दृश्य देखा

1:59है क्या हुआ सीते एक अलौकिक मृग हमारे

2:02आश्रम के पास घूम रहा है अलौकिक मृग हां

2:06कहां है आइए जल्दी आइए आइए स्वामी आइए

2:09जल्दी

2:11आइए देखिए देखिए वो प्रकृति के अद्भुत

2:15कार्य कररी वह अनोखा हिरण

2:21[संगीत]

2:30ऐसा विचित्र मृग कभी देखा है इसके सिंग

2:34देखिए लगता है सोने के हैं उसकी खाल भी

2:39सुनहरी है सचमुच अद्भुत

2:42विलक्षण देखा लक्ष्मण देख रहा हूं

2:46भैया स्वामी इसे किसी प्रकार पकड़ लीजिए

2:50ना

2:52ओहो कितना मन भावन वृ है

2:56पकड़ने क्या करोगी

2:58कल्याणी इसे अयोध्या ले जाएंगे देखकर सब

3:02विस्मय से चकित रह

3:04जाएंगे इसके पैरों में घुंगरू बांध दूंगी

3:08जब महल में छम छम चलेगा तो माताएं कितनी

3:12प्रसन्न होगी नहीं तो बनवास की स्मृति

3:15स्वरूप भरत भैया को फेर दे दूंगी जाइए ना

3:20जल्दी पकड़ लाइए लक्ष्मण तुम्हारी भाभी की

3:24इच्छा पूरी करनी ही

3:26पड़ेगी वास्तव में यह है भी बहुत सुंदर

3:31इसका रूप अनूप ही इसका शत्रु बन रहा

3:35है

3:37भैया इसके प्रति भाभी का मोह हमें किसी

3:41संकट में ना डाल

3:43दे मुझे तो यह स्मग माय जैसे जान पड़ता है

3:48य प्रकृति के विरुद्ध है अप्रकृतिक है

3:50असंभव

3:52है इस सृष्टि में असंभव कुछ नहीं है

3:55लक्ष्मण जो कुछ भी तुम कल्पना कर सकते हो

3:59वो इस में कहीं ना कहीं खड़ा जा चुका है

4:02ज्ञानी और विज्ञानी भी सृष्टि का सारा

4:05रहस्य नहीं जानते इससे यह सृष्टि मिथ्या

4:08नहीं हो जाती परंतु भैया जो प्रकृति के

4:11विरुद्ध है प्रकृति के विरुद्ध कुछ नहीं

4:13होता

4:14लक्ष्मण भरद्वाज मुनि के घर में पुत्र रूप

4:18में स्वर्ण शरीर वाले साथ हंस पैदा नहीं

4:21हुए थे इसी प्रकार सहस्त्र कोटि रूपों में

4:25जीव मिलते हैं

4:26लक्ष्मण भगवान की माया के सामने जन

4:29विज्ञान का तर्क काम नहीं करता भगवान की

4:32माया हो सकती है परंतु यह तो मुझे कोई

4:35राक्षसी माया जान पड़ती

4:37है याद है भैया एक बार दंडक वन में कई

4:41राक्षस इसी तरह मृग बन के आए थे ओहो अब

4:45दोनों भाई इसी तरह तर्क करते रहेंगे तो

4:47इतने में हिरण भाग जाएगा आप मेरी इतनी सी

4:50इच्छा पूरी नहीं कर

4:52सकते

4:54लक्ष्मण लगता है सीता मृग को पाए बिना

4:56मानेगी नहीं मैं भी चाहता हूं

5:02[संगीत]

5:13यदि मृग जीवित हाथ ना आया तो तो क्या

5:18हुआ उसकी मृग चम कितनी सुंदर है आपकी पूजा

5:22में आसन के काम आएगी

5:29[संगीत]

5:31भैया मुझे अब भी संदेह है कि कोई राक्षसी

5:35माया ना हो यदि राक्षस ही हुआ तो उसका अंत

5:39होना भी आवश्यक

5:43है लक्ष्मण तुम प कुटी में सीता के साथ

5:47सावधानी से इनकी रक्षा में रहना कहीं

5:50तुम्हारा संदेह सत्य ना हो मैं जान की

5:53इच्छा पूरी करने के लिए इस कांचन रख के

5:55पीछे जाता हूं जीवित अथवा मारकर शीख लौट

5:58आऊंगा लेकिन सावधान लक्ष्मण वन में कई

6:01राक्षस घूमते रहते हैं इसलिए किसी भी

6:04स्थिति में सीता को अकेली मत

6:06छोड़ना जो आज्ञा

6:11[संगीत]

6:18भैया निगम

6:22नेत शिव

6:25ध्यान ना पावा

6:31माया

6:33मृग

6:35पाछ सो धावा

6:40[संगीत]

8:05[संगीत]

9:19हाय

9:20लक्ष्मण हाय

9:23लक्ष्मण हाय

9:25लक्ष्मण हाय सीते

9:29फ सते फ

9:33सते

9:35लक्ष्मण लक्ष्मण लक्ष्मण तुमने सुना

9:40बचाओ बचाओ

9:44[संगीत]

10:07[प्रशंसा]

10:08[संगीत]

10:14तुम्हारे भैया बड़े अर्थ से हमें बुला रहे

10:16हैं व अवश्य किसी संकट में फस गए होंगे

10:20उनकी आवाज में कितनी करुणा है लता है बहुत

10:23सार राक्षी से खे लिया

10:25होगा लक्षमण तुमने नहीं सुनी उनकी पुकार

10:28सुनी है अी त तुम यही पर खड़े

10:32हो जाओ लक्ष्मण जाओ जाके उनको

10:37बचाओ लक्ष्मण क्या हुआ तुम जाते क्यों

10:42नहीं क्योंकि मैं जानता हूं भैया किसी

10:44संकट में फस ही नहीं

10:47सकते भाभी आपके स्वामी को देव असुर नाथ

10:51दानव कोई परास्त नहीं कर सकता ये कदाचित

10:53भैया की आवाज नहीं है ये कोई धोखा है आप

10:56इतने अधीर ना हो भाभी धीरज रखिए

11:00जिसका पति संकट में हो और सहायता के लिए

11:03पुकार रहा हो उसको तुम धीरज ति की बात

11:06सिखा रहे

11:07हो लक्ष्मण क्या तुम राक्षसों के डर के

11:11बारे अपने प्राण बचाने के लिए नहीं जा

11:14रहे मैंने तुम्ह इतना कार कभी नहीं समझा

11:17था भाभी अपने भाई के सामने धनुष उठा उठाकर

11:21अपनी वीरता के ंगे मारते रहते हो और आज आज

11:24सचमुच वीरता दिखाने का अवसर आया डरे हुए

11:28चहे की भाती अपने बिल से निकलना नहीं

11:30चाहते

11:32भाभी भाभी आप ऐसी बात ना कहिए आप नहीं

11:36जानती आप क्या कह रही है मैं अच्छी तरह

11:39जानती हूं तुम्हे जिस भाई ने तुम्हे अपने

11:41पुत्र की भाति पाला है आज उनके प्राण संकट

11:45में आ गए तो तुम डर के मारे अपनी भाभी के

11:47आचरण में आकर छुप

11:49गए क्या इसी समय यही तुम्हारा कर्तव्य है

11:52मेरा एक ही कर्तव्य है अपने बड़े भाई

11:55श्रीराम की आज्ञा का पालन करना और वो मुझे

11:57कह गए हैं कि मैं आपकी रक्षा के लिए ही

11:59रहू इसलिए मैं आपको किसी भी स्थिति में

12:01अकेला छोड़ के नहीं जा सकता मेरी रक्षा

12:04जिसके लिए मैं सारा संसार त्याग कर इस वन

12:07में रहने आई हूं जिसके बगैर मैं एक परल भी

12:10जीवित नहीं रह सकती आज जब उनके प्राम संकट

12:14में आ गए तो मेरी रक्षा करने से क्या लाभ

12:18लक्ष्मण अगर उनको कुछ हो गया तो मैं एक पल

12:21भी जीवित नहीं रह

12:25सकूंगी फिर मेरे मृत शरीर की रक्षा करते

12:27रहना और पालते रहना ने भाई की आ क्या भाभी

12:30आप समझती क्यों नहीं भैया पर कोई आज आ ही

12:33नहीं सकती तीनों लोगों में कोई ऐसा वीर

12:36नहीं जो उन्हे परास कर

12:39सके किस दुर्भाग्य के कारण आपकी बुद्धि

12:41इतनी हीन हो गई है जिसके पति के प्राण

12:44संकट में हो उस नारी के लिए इससे बड़ा

12:47दुर्भाग्य और क्या हो सकता

12:50है आज तुम हर धर्मी पर उतर आए

12:54हो सिद्धि तो तुम सदा से ही रहे हो परंतु

12:58अपनी काता कारण मेरी अवज्ञा भी करोगे इसकी

13:02मुझे आशा नहीं थी भाभी आप मुझे कायर मत

13:06कहिए कायर नहीं तो मेरी आज्ञा का पालन करो

13:10भाभी आप हट मत कीजिए कुछ अमंगल हो जाएगा

13:14तुम नहीं गए तो अमंगल हो ही जाएगा लक्ष्मण

13:19बातो में समय मत गवा

13:22[संगीत]

13:25हो ठीक है तुम नहीं जा सकते

13:29तो धनुष मुझे दे दो हर आर्य स्ती अपने पति

13:33की रक्षा करना अच्छी तरह से जानती

13:35[संगीत]

13:38है

13:41ला धनुष बान मुझे नहीं दे

13:46सकते ठीक है मैं ऐसे ही चली जाती हूं तुम

13:49यही रहो भाभी मुझे इतना विवश मत कीजिए बात

13:52ना करो कर्म करो

13:56कर्म अच्छी बात है

13:59आपकी आज्ञा का पालन करने के लिए आज पहली

14:02बार लक्ष्मण अपने प्रभु श्री राम की आज्ञा

14:05का उल्लंघन करता

14:07है आप कुटिया में चली

14:10[संगीत]

14:15जाइए

14:16माता आप ऊपर चली

14:21[संगीत]

14:24जाइए

14:25भैया मुझे क्षमा करना और

14:33[संगीत]

14:44[संगीत]

14:59माता गुरु की दी हुई मंत्र शक्ति से मैंने

15:02यहां एक अदृश्य दीवार बना दी

15:04है कोई भी इस लक्ष्मण रेखा को पार करके

15:07अंदर आने का साहस करेगा तो जलकर भस्म हो

15:10जाएगा इसलिए माता मेरी आपसे विनती है किसी

15:15भी परिस्थिति में राम भैया के आने तक आप

15:18अपने चरण इस रेखा से बाहर ना

15:19[संगीत]

15:25रखें हे वन के देवताओं समस्त प्राण

15:29मैं माता सीता को आपकी सुरक्षा में छोड़े

15:33जा रहा हूं इनकी रक्षा करना

15:40[संगीत]

16:00[प्रशंसा]

16:07[संगीत]

16:29[प्रशंसा]

16:29[संगीत]

17:14[संगीत]

17:16हो

17:29[प्रशंसा]

17:39इच्छा

17:41[संगीत]

17:44देही

17:46ान

17:47[संगीत]

17:52देही भिक्षा देही

17:58[संगीत]

17:59भिक्षा

18:01[संगीत]

18:03देही भिक्षा

18:08देही प्रणाम महत् मन कल्याण

18:12हो देवी हम बहुत दूर से आए हैं और भूखे

18:17हैं तुम्हारी कुटिया देखकर इस आशा से यहां

18:21आए हैं कि हमें कुछ खाने को मिल जाएगा

18:24अवश्य महात्म आप यही ठहरे मैं आपके लिए

18:28संभव भोजन लाती हूं

18:32देवी हम यात्रा से क्लांत है हमें विश्राम

18:36की भी आवश्यकता है क्षमा करें इस समय मेरे

18:39पति कुटिया में नहीं है इसलिए मैं आपका

18:42स्वागत नहीं कर सकती

18:46परंतु कृपा करके आप वही ठहरी मैं आपके लिए

18:51भोजन लाती हूं

18:59[संगीत]

19:06[प्रशंसा]

19:06[संगीत]

19:19[प्रशंसा]

19:20[संगीत]

19:57a अ

20:04[संगीत]

20:17[संगीत]

20:45ओम

20:48[संगीत]

21:00मेरी आपसे विनती है किसी भी परिस्थिति में

21:03राम भैया के आने तक आप अपने चरण इस रेखा

21:06से बाहर ना

21:09रखे

21:13मुनिराज मैं आपके लिए भोजन लाई हूं यह

21:20लीजिए ले आओ

21:23देवी कृपया आप ही को यहां आना होगा

21:29अब तो हमने आसन जमा लिया है यात्रा से थके

21:32हुए हैं बार-बार उठा नहीं जाता जो कुछ

21:36देना है यही ले आ भगवान मैं इस सीमा से

21:41बाहर नहीं आ सकती आप ही को कष्ट करना होगा

21:45देवी तुमको आर्य कन्या नहीं लगती द्वार पर

21:49आया हुआ अतिथि भगवान का रूप होता

21:53है और तुम हमारा तिरस्कार कर रही हो नहीं

21:56नहीं अतिथि देवता मेरे वहां ना आने का

22:00कारण आपका तिरस्कार करना नहीं वास्तव में

22:04मेरे देवर मेरी सुरक्षा के लिए एक सीमा की

22:07रेखा खींच गए

22:10हैं और अपनी शपथ देकर कह गए हैं मर्यादा

22:15की सीमा को त्याग कर बाहर ना जाना इसलिए

22:19मैं बाहर नहीं आ

22:20सकती कृपा करके अपनी बात का बुरा ना माने

22:24बस बहुत हो चुका तुम बारबार तिरस्कार कर

22:29रही हो पहले हमें कुटिया के अंदर आने से

22:32रोक दिया और अब दूर से खाना दे रही हो

22:35जैसे हम कोई पशु पक्षी हो ऐसा व्यवहार नी

22:39जाति के लोगों से किया जाता है कोई संत

22:42महात्मा द्वार पर आ जाए तो बड़े आदर से

22:45स्वयं उसके पास जाकर उसके चरण छूकर भिक्षा

22:48दी जाती

22:50है ठीक है हम तुम्हारे द्वार से भूखे ही

22:54चले जाएंगे लेकिन इस अपमान के बदले हम

22:58तुम्हें श्राप देंगे नहीं नहीं मुनिराज

23:02मुझ पर दया कीजिए मुझे अपनी पुत्री के

23:05समान समझकर मेरी समस्या और विवश को समझने

23:09की चेना कीजिए हम सब समझते हैं सब कुछ

23:13जानते हैं हम त्रिकाल दर्शी है मूर्ख

23:16स्त्री हम सब देख रहे हैं तुम्हारा पति इस

23:20समय एक सुवर्ण मृग का शिकार करने वन में

23:24भागा भागा फिर रहा है वह स्वर्ण मृग अपने

23:28सिंह से तुम्हारे पति को एक बार आहत कर

23:31चुका है फिर भी तुम्हारा पति उसके पीछे

23:34भाग रहा है हम श्राप देते हैं वही सुवर्ण

23:38मृग अपने तीखे सिंघो द्वारा तुम्हारे पति

23:41को नहीं नहीं अबने श्राप मत दीजिए मैं वही

23:45आती हूं आप मेरे पति को श्राप मत

23:48दीजिए श्राप मत दीजिए मुझ पर दया कीजिए

23:52मुझसे भूल हो गई है मैंने आपकी शक्ति को

23:55नहीं पहचाना था मुझे क्षमा कर दीजिए

24:00जाओ कन्या हमने तुम्हे क्षमा कर

24:03दिया हम तुम जैसी सुंदर नारी के अश्रु

24:07नहीं देख

24:08[संगीत]

24:12सकते मैं मिथिला नरेश महाराज जनक की

24:15पुत्री

24:16हूं मिथिला की

24:19राजकुमारी और इस अवस्था में ये कैसा दर्दे

24:24है जिस कांचन काया को देख देवता भी

24:29लालायित हो जाए उसे तुम इस घास फूस की

24:32कुटिया में नष्ट कर रही हो अ ऐसे नारी

24:36रत्न को तो किसी त्रिलोकी के राजा की

24:39पत्नी होना चाहिए

24:40था मेरे लिए तो मेरे पति ही त्रिलोकी के

24:44राजा है उनसे बढ़कर और कोई हो सकता है

24:48क्या अवश्य हो सकता

24:52है हम तुम्ह बताते हैं

25:01जिसके नाम से देवता नाग किन्नर असुर

25:04राक्षस अर्थात संसार के संपूर्ण प्राणी

25:08थर्र उठते हैं सूर्य चंद्र आदि नवग्रह

25:12जिसकी इच्छा से चलायमान होते हैं जो संसार

25:15के समस्त चराचर प्राणियों का स्वामी है

25:19जिसे देख वृक्षों के पत्ते भी भय से

25:21स्तब्ध हो जाते हैं अरे वायु भी जिसके

25:25सामने सांस नहीं ले सकती तुम तुम तो उस

25:28लंकाधिपति रावण की पत्नी होने योग्य हो

25:32ऐसे पाप पूण वचन कहते हुए तुम्ह लज्जा

25:35नहीं आती कोई महात्मा के वेश में तुम

25:38दुरात्मा हो कौन हो तुम तुम्हारा

25:42दास वही लंकेश्वर

25:53रावण हा रावण जिसे तुम्हारे कामना ने इतना

25:59आतुर कर दिया है कि स्वयं तुम्हारे द्वार

26:01पर भिक्षा मांगने आया है सीते आज तुम्हारा

26:05भाग्य उदय हो गया कल से हमारे राज महल में

26:095000 स्त्रिया पटने की भाति तुम्हारी सेवा

26:13करेंगी धूर्त तुमने यह कैसे सोच लिया कि

26:17तुम अपने वैभव का बखान करोगे और सीता

26:20तुम्हारे साथ चल देगी तुम इसी समय यहां से

26:23चले जाओ नहीं तो मेरे पति एक ही बाण में

26:26तुम्ह तुम्हारी लंका स भस्म कर

26:29देगी तुम जिस पति का मान करती हो वह तो

26:33धरती पर रंगने वाला एक मानव मात्र है हम

26:36जिन राक्षसों के राजा हैं वह तो इन मानवों

26:39को फल मूल की भाति अपना आहार समझते हैं

26:43तुम हम लोगों की शक्ति को नहीं

26:46जानती जानती हूं खर और दूषण भी तुम्हारे

26:50ही भाई थे ना जिन्ह रघुवर ने आन की आन में

26:53समाप्त कर दिया

26:55था तुम्हारा यह साहस एक गीदड़ होकर सिंघनी

26:59की कामना कर रहे हो तुम्हारा अंत समय आ

27:02गया है यदि प्राण प्यारे हो तो अभी समय है

27:06चला जा यहां से हमारा ऐसा अपमान करने का

27:09साहस आज तक किसी ने नहीं किया इसका परिणाम

27:12जानती हो और एक पतिव्रता सती की ओर ऐसी

27:16कुदृष्टि डालने की मूर्खता भी किसी ने

27:19नहीं की होगी इसका परिणाम जानते

27:22हो तेरा ही नहीं तेरे सारे कुल का सर्वनाश

27:25हो जाएगा मूर्ख हट जा सामने से फिर से उस

27:29रेखा के अंदर जाना चाहती

27:33है स्त्री एक बार अपनी मर्यादा की रेखा से

27:36बाहर आ जाए फिर उसका वापस जाना असंभव हो

27:40जाता

27:41है सीते अब तुम्हें रावण के हाथों कोई

27:45नहीं बचा

27:47सकता इसलिए चुपचाप अपनी सम्मति से मेरे

27:50साथ

27:52चलो लक्ष्मण आ

27:58मैया

27:59[हंसी]

28:00[संगीत]

28:02लक्ष्मण पुकार ले और

28:06पुकार लक्षमण इस समय व र में बहुत दूर है

28:10तुम्हारी पुकार उन तक नहीं पहुंच सकती

28:13सीते

28:28[संगीत]

28:30आ ल

28:33आ बचा रावण के हाथों तु कोई नहीं ब

28:37सकता बचा लक्ष्मण

28:43लक्ष्मण भैया

28:46[संगीत]

29:17भैया

29:18[संगीत]

29:22लक्ष्मण लक्ष्मण या आप लक्ष्मण तुम यहां

29:26क्यों चले आए सीता को अकेली छोड़कर

29:28तुम्ह मेरी आज्ञा का ध्यान नहीं मुझे

29:30क्षमा करें भैया आपकी पुकार सुनकर भाभी ने

29:33मुझे जोर देकर यहां भेज दिया जब मैंने

29:35इंकार किया तो उन्होने ऐसे मम वचन कहे कि

29:38मुझे विवश होकर य आना पड़ा य अच्छा नहीं

29:41हुआ भाई तुम्हारा कहना सत्य था व मृग के

29:44रूप में वही मारीच राक्षस था मरते मरते जब

29:47उसने मेरी आवाज बनाकर तुम्ह सहायता के लिए

29:49पुकारा तो उसके उसी प्रपंच से मैं समझ गया

29:52कि हमारे साथ छल किया गया है सीता अवश्य

29:55किसी विपत्ति में फस गई होगी लगता है व

29:58में हमें नहीं मिलेगी नहीं भैया ऐसा ना

30:00कहिए भाभी वहीं पर होंगी भगवान करे ऐसा ही

30:04हो चलो

30:09लक्ष्मण

30:11आ लक्षमण

30:14आलिया

30:17लक्ष्मण सीते मेरी बेटी सीते मैं आ रहा

30:21हूं आलिया कोई बचाओ लक्ष्मण कोई बचाओ बचाओ

30:27रुको

30:29रुको रावन

30:31रुको सीते सीते मैं आ रहा हू

30:35सीते इस पापी रावण से रक्षा कीजिए यदि आप

30:39नहीं लड़ सकते तो वन में जाक आर्य पुत्र

30:42रघुवीर और भैया लक्ष्मण को मेरी सूचना

30:44दीजिए जाइए जल्दी जाइए मेरी सहायता कीजिए

30:48तुम चिंता ना करो पुत्री मेरे जीते जी यह

30:52तुम्हे नहीं ले जा सकता रावण तुम तो बड़े

30:56वीर और पराक्रमी कहलाते हो एक निहाय

30:59स्त्री को इस प्रकार चोरों की भांती उठाने

31:02का नित करम तुम्ह शोभा नहीं देता तुम विद

31:06कुमारी को छोड़ दो य धर्म प्रायन और प्रति

31:09वता स् है इसका बलपूर्वक अपहरण करने से

31:13तुम निश्चित विनाश को प्राप्त करोगे बूढ़े

31:16जटाय रावण को शिक्षा देने आए हो जा किसी

31:20पेड़ पर बैठकर आराम कर मेरे रास्ते में

31:23मता आओ कहीं मुझे क्रोध ना आ जाए ती मैं

31:28बूढ़ा अवश्य हूं परंतु अब भी तुम जैसे

31:31अभिमानी का मान भंग कर सकता हूं सीता मेरी

31:34पुत्र वधु समान है मैं अपने प्राण देकर भी

31:37इसकी रक्षा करूंगा आज तू मेरे पंजों से

31:40मारा जाएगा

31:55[संगीत]

32:13कर

32:15[संगीत]

32:23[संगीत]

32:30[संगीत]

32:38[संगीत]

32:58[संगीत]

33:23[संगीत]

33:27आ

33:45[संगीत]

33:56[संगीत]

34:04इस पूरे निरपराध पक्षी के पर काटकर तुम

34:07अपने आप को भी समझते हो तुम्ह लज्जा आनी

34:11[हंसी]

34:17[संगीत]

34:24चाहिए सीधे

34:27[संगीत]

34:29भादी

34:32भा

34:35[संगीत]

34:40भा लक्षमण र नहीं है हो सकता हैना पर गई

34:45हो परंतु वो अकेली तो कभी नहीं जाती हो

34:47सकता है उद्यान में फूल चने गई ठीक है तुम

34:50नदी पर देखो मैं उद्यान में देखता हूं

34:53[संगीत]

35:03सीते

35:07भदी

35:11सीते

35:16हभी

35:18[प्रशंसा]

35:21सते

35:25भ सीते

35:27[संगीत]

35:41हनी

35:43सीते

35:46सीते

35:50सीते भाभी मैं जानता था लक्ष्मण कुछ अनौनी

35:55हो गई है

35:58[संगीत]

36:02[प्रशंसा]

36:09[संगीत]

36:10[प्रशंसा]

36:12[संगीत]

36:15[प्रशंसा]

36:18हे वन के वासियों यदि मेरे पति मुझे

36:22ढूंढते यहां आए न्हें आभूषण दिखा देना और

36:26कह देना मुझे रावण उठाकर ले गया

36:30है इससे कोई लाभ नहीं होगा जहां रावण

36:34तुम्हें ले जा रहा है उस स्थान का पता

36:36उन्हे कौन

36:38बताएगा निर्लज अपने ऊंचे कुल और अपनी

36:42वीरता की बड़ी बड़ी ंगे मारते थे क्या वीर

36:45पुरुष के यही लक्षण होते हैं जब पति घर

36:49में ना हो तो उसकी पत्नी को चोरों की भाती

36:51आकर चुरा कर ले जाए एक अकेली स्त्री पर

36:54आक्रमण करना ही तुम्हारी शूर वरता है

36:59मेरे स्वामी तुम्हारी तरह कार भीरो नहीं

37:02तुम मुझे आकाश पाताल कहीं पर भी छुपा लो

37:05मेरे स्वामी मेरी सहायता के लिए अवश्य

37:07आएंगे मेरे राक्षसों के सिवा किसी को आज

37:10तक यह भी पता नहीं कि लंका है कहां वहां

37:14पहुंचने से पहले तेरा पति रास्ते में भटक

37:17भटक कर मर जाएगा जिस प्रकार एक सांप की

37:21आंखें अंधेरे में भी दिखाई देती है उसी

37:23प्रकार पापी का पाप छुपाने से नहीं छिपता

37:26वृक्षों के के पत्ते पर्वतों के पत्थर और

37:29वायु की लहरें प्रकृति का कण कण मेरे

37:33रघुवर को तुम्हारे पाप मार्ग का पता

37:35बताएगी और जहां सीता होगी उसके स्वामी

37:38अवश्य वहां पहुंचेंगे इसका मुझे पूरा

37:41विश्वास है

37:43[संगीत]

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