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श्रीमद भगवत गीता सार- अध्याय १ |Shrimad Bhagawad Geeta With Narration |Chapter 1|Shailendra Bhartti

Saregama Bhakti · 5,498 words · 25 min read

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0:00कि सारेगामा कारवां मिनी भक्ति गीत

0:08कि भगवत गीता गीता सार चैप्टर वन

0:14नमस्कार दोस्तों

0:16कि भगवत गीता और भगवत गीता के ज्ञान पर

0:20पसंद लोगों ने काम किया है

0:22ऑफिस जाने कितनी ही गीता आपने सुनी होगी

0:25परंतु मैं शैलेंद्र भारती अब आपके सामने

0:30प्रस्तुत कर रहा हूं भगवत गीता की एक और

0:33व्याख्या

0:35कि क्या विशेष है इस गीत में बीता में अगर

0:38कुछ विशेष हैं तो वह हैं श्रीकृष्ण व कि

0:43हम सब निमित्त साधन लेकिन यह मेरा प्रयास

0:48है कि हमारे आज के जमाने में यह ग्रंथ

0:51हमें रास्ता दिखाएं आसानी से गीता को हम

0:55सब समझ और अपने रोजमर्रा के जीवन में इसका

0:59उपयोग कर पाएं

1:01है वैसे गीता के बारे में बहुत कुछ कहा

1:04गया है सुना गया है शायद ही कोई ऐसा धर्म

1:08ग्रंथों का या जिस पर इतना लिखा गया

1:11कि ऐसा क्या खास है गीता में कि समय-समय

1:14पर यह और भी आवश्यक और मार्गदर्शक भी होती

1:18जा रही है

1:19को एकदम साधारण भाषा में अगर कहें तो भगवत

1:23गीता एक उत्तर है

1:26कि गीता एक उत्तर है दुनिया के हर पृष्ठ

1:30का जीवन से जुड़ा ऐसा कोई प्रश्न नहीं

1:33जिसका के उत्तर श्री कृष्ण भगवत गीता में

1:37नहीं देते

1:38कि हमारे मन-मस्तिष्क में कोई भी शंका

1:41परेशानी चिंता किसी भी तरह का आवेदक किसी

1:46भी तरह की दुविधा हो दुनिया के हर धर्म

1:49संकट हर डाइनर उत्तर-अ

1:53कि भगवत गीता में अठारह अध्याय और हर

1:57अध्याय में वेदों और उपनिषदों का सार अरे

2:02भाई इसे आप वे दिया उपनिषद समझकर के जरिए

2:05मत यह मत सोचिए कि यह हमारी और आपकी समझ

2:09दूर है इसके हर अध्याय 4 श्लोक में आप

2:12अपने आपको अर्जुन समझ लीजिए क्योंकि

2:15अर्जुन की हर क्षण हर डर हर समस्या वैसे

2:20देखा जाए तो हमारी परेशानी और हर परेशानी

2:24का हल बता रहे हैं श्री कृष्ण

2:27प्ले लिस्ट को सिर्फ अर्जुन का सारथी मत

2:30मानिएगा उन्हें अपने जीवन का सारथी भी

2:33मानिएगा उनके कहे अनुसार अगर हम और आप

2:37चलेंगे तो मैं दावे के साथ कहता हूं कि हम

2:40सारी परेशानियों को आसानी से पार कर

2:43जाएंगे ज्ञान या धर्म ग्रंथ की बड़ी-बड़ी

2:47बातें मेरे साथ नहीं होगी दोस्तों यहां पर

2:50जीवन की प्रैक्टिकल सच्चाइयों और

2:52प्रैक्टिकल प्रॉब्लम की बात ही जाएंगे तो

2:54आइए मैं शैलेंद्र भारती आपको ले चलता हूं

2:58भगवत गीता के अठारह अध्यायों के सफर पर

3:08एक

3:09अध्याय एक अर्जुन विषाद योग पहला अध्याय

3:14में अर्जुन विषाद योग

3:18कि यह शुरुआत होती है

3:20धृतराष्ट्र के सवालों से

3:23कि वह जानना चाहते हैं कि युद्ध में क्या

3:26हो रहा है

3:28कि उनका पुत्र दुर्योधन और उनकी सेना क्या

3:31कर रही है और साथ ही में पांडु पुत्रों की

3:35सेना क्या कर रही है

3:37और उसके बाद दोनों सेनाओं के शूरवीरों का

3:40वर्णन और उसके बाद आता है अर्जुन का

3:42प्रशांत मतलब कि उनका दुख उनकी समस्या

3:46उनका धर्म संकट आइए सुनते हैं अर्जुन

3:51विषाद योग

3:54कि द्रितए

3:56राष्ट्रवाद

3:59धर्मक्षेत्रे

4:01कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सव व

4:06माकपा पांडवाश्चैव किमकुर्वत

4:11अदर संजय दत्त

4:15की दृष्टि संजय से पूछते हैं

4:18धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध करने के

4:21लिए एकत्र हुए उन मेरे और पांडु के पुत्र

4:24क्या कर रहे हैं

4:26की दृष्टि जानना चाहते हैं कि युद्ध स्थल

4:29पर आखिर हो क्या रहा है

4:33अपने मित्र राष्ट्र धीमे है देख नहीं सकते

4:36थे लेकिन आंखों से अमृत मन और मस्तिष्क से

4:41नहीं उन्हें पता था कि वह धर्म के साथ

4:45क्योंकि धर्म तो वहां होता है जहां

4:48श्रीकृष्ण अपने पुत्र मोह में उन्होंने

4:51शांति की जगह को चुना था लेकिन वह जानते

4:55थे कि युद्ध को इतना आसान नहीं होगा अपने

5:00जीवन में जब हम कुछ करते हैं तो हम भी समझ

5:03रहे हैं दोस्तों कि हमारे किए नतीजा

5:08और ऐसा ही राष्ट्र के साथ भी

5:12इसी और इसी आशंका में लिखते हैं

5:19कि संजय दत्त को

5:22बाऊजी

5:23दृष्ट्वा तु पांडवानीकं

5:26कम व्यूढं दुर्योधनस्तदा

5:31आचार्य मु संगम

5:35राजा झालुराई दो

5:38[संगीत]

5:39कि संजय आंखों देखा हाल बताते हुए उत्तर

5:42देते हैं हे राजन्

5:44दुर्योधन पांडवों की सेना के बीजों को देख

5:47रहे हैं और यह बात गुरु द्रोणाचार्य को

5:51जाकर कहते हैं

5:53कि संजय को दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई थी

5:56तो युद्ध से दूर होते हुए भी युद्ध को देख

5:59सकते थे वह तो देख रहे थे वही बता रहे थे

6:03इसमें वह अपनी तरफ से कुछ भी नहीं कह रहे

6:06थे सिर्फ आंखों देखा हाल बता रहे थे

6:11जैसे हम लोग रनिंग कमेंट्री सुनते हैं इसी

6:14तरह यह उन्हीं के दिव्य दृष्टि डिवाइन

6:18विजन का कमाल था कि हम गीत सुनने हैं

6:24कि पश्यैतां पांडुपुत्राणामाचार्य

6:26महतीं

6:30चमूम्

6:32बूढ़ा अमरुद अपतृण

6:36वशिष्ठ यौन धताणा

6:39[संगीत]

6:41में ही आचार्य दीपक पुत्र धृष्टद्युम्न

6:45आपका ही बुद्धिमान् शिष्य है पांडु

6:48पुत्रों की यह बड़ी भारी सेना की

6:50व्यावहारिकता रचना-दृष्टि हमने ही की

6:53व्यावहारिकता रचना का मतलब हुआ कि किस

6:56विशेष तरीके से सेना के युद्ध खड़े हैं एक

7:00ऐसा भी जिससे उस सेना के बीच घोषणा असंभव

7:04हो और अगर कोई उसमें घुसने में सफल भी हो

7:07जाता है तो कभी बाहर ना आ सके

7:10हेलो दोस्तों जब शत्रु या समस्या को हम

7:14देखते हैं तो वह हमें बहुत बड़ी और

7:16विक्रांत दिखाई देती है और मन में यह डर

7:20भी रहता है कि कुछ कर गुजर कि अगर हम

7:22इसमें कुछ भी गए तो क्या होगा क्या हम

7:25बाहर आ पाएंगे कि हम जीत पाएंगे ऐसी ही

7:29सोच से दुर्योधन भी गुजर रहा है

7:34178 शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा

7:38युधि

7:41योद्धाओं विराट

7:46अनधिकृत

7:50किताब का

7:52शीरा जस्वीर वीर्यवान पुरुष जातक उन्नति

7:57भोज्य

8:00शबद सरभंग व

8:03विधान उच्च विक्रांत उत्तमौजाश्च

8:08वीर्यवान् सौरभ व द्रौपदी ने यह शब्द रॉय

8:15व महारथ

8:17कि इन तीन श्लोकों में दुर्योधन पांडु

8:21पुत्रों की सेना के महान योद्धाओं का नाम

8:23ले रहा है जब भी युद्ध होता है तो आप अपने

8:28सामने खड़ी सेना उस सेना के युद्धों को

8:31जांच तौर पर रखते हैं वैसे ही दुर्योधन भी

8:34कर रहा है दुर्योधन द्रोणाचार्य करता है

8:37बड़े-बड़े धनुष वाले तथा युद्ध में भीष्म

8:41और अर्जुन के समान शूरवीर सत्य और विराट

8:44तथा महारथी राजा

8:47और तथा बलवान काशीराज उदित कुंतीभोज और

8:53मनुष्य श्रेष्ठ हास्य-व्य पराक्रमी योद्धा

8:55मंजू तथा बलवान

8:58पुत्र अभिमन्यु एवं द्रौपदी के पांचों

9:01पुत्र यह सभी महारथी इससे यह पता चलता है

9:05कि चाहे शत्रु हो या शत्रु के जैसी समस्या

9:09उसके बारे में सब कुछ जानना चाहिए हेलो

9:12दोस्तों समस्या के हर पहलू से हमें वापिस

9:15होना चाहिए समस्या के हर पार्ट इस गैंग के

9:18बारे में मालूम होना चाहिए जैसा के

9:21दुर्योधन भी कर रहे हैं

9:29झाल अस्माकं तु विशिष्टा

9:33यह तान्निबोध द्विजोत्तम

9:37नायक का मन

9:40अधीर हम तनवीर नीति

9:45कि दुर्योधन आगे कहता है हे

9:47ब्राह्मणश्रेष्ठ

9:49पांडवों की सेना के युद्धों को तो आपने

9:51देख लिया अब अपने पक्ष में भी जो प्रधान

9:54हैं उनको भी तो आप समझ लीजिए उस

9:58द्रोणाचार्य की जानकारी के लिए शत्रु की

10:00सेना के बाद दुर्योधन अपनी सेना के जो जो

10:03सेनापति हैं उनके बारे में बदल जाता है

10:06समस्या के बारे में सब कुछ जान लेने के

10:09बाद बारी आती है अपने पक्ष में सोचने की

10:13कि जाना होता है दोस्तों के आपके पास

10:16क्या-क्या स्ट्रांग प्वाइंट है आप किन

10:19बातों में मजबूत है जिससे आप उस समस्या पर

10:22विजय पाएंगे जैसे आपने समस्या के हर

10:26पहलुओं के बारे में सोचा उसी तरह से आपको

10:29स्वयं का भी आकलन कर देना चाहिए

10:37कि भवान भीष्मश्च कर्णश्च

10:41अनधा समितिंजय यह

10:44अश्वत्थामा

10:46विपणन

10:51अधिकारी आप द्रोणाचार्य पितामह तथा कर और

10:57संग्राम विजय कृपाचार्य तथा वैसे ही

11:00अश्वत्थामा और सोमदत्त पुत्र के बारे में

11:04दोस्तों जिस तरह से हम आज के जमाने में

11:08रिस्क एसेसमेंट करते हैं वैसे भी अपने

11:12शत्रु की सेना को देखते हुए दोनों सेनाओं

11:15के युद्ध की बातें करते हुए आगे होने वाले

11:18युद्ध के लिए तैयार हो रहे हैं को चुनौती

11:21को हर तरह से समझ कर ही उस पर विजय

11:24प्राप्त की जा सकती है चुनौती को इतने

11:27अच्छे से एग्जाम देना चाहिए जब हम उससे

11:29लड़ने जाएं तो कुछ नया न लगे कोई

11:32सरप्राइज्ड व्हाय युद्ध हो या चुनौती

11:35सरप्राइज़ आपको हरा सकता है

11:41कि अ ने यह वह शूरा मदर्थे व्यक्ति जीवित

11:48नाश वस्त्रहरण

11:51सर्वे युद्ध विशारद यह

11:55कि दुर्योधन गर्व के साथ कह सकता है कि

11:58मेरे लिए जीवन की आशा त्याग देने वालों की

12:01कमी नहीं इतना ही नहीं यह शूरवीर अनेक

12:05प्रकार के शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित है

12:07और सब के सब युद्ध में चतुर है दुर्योधन

12:11के एक इशारे पर उसकी सेना के शूरवीर लड़ने

12:15मरने को तैयार है उन्हीं को देख दुर्योधन

12:18खुश हो रहा है दुर्योधन के साथ युद्ध में

12:22लड़ने के लिए शूरवीर थे जो उसके लिए मरने

12:24को तैयार है आप जब अपने जीवन की चुनौतियों

12:28से लड़ते हैं तो आपके साथ कौन होता है

12:31आपके साथ होता है आपका हो न आपकी हिम्मत

12:34आपकी मेहनत आप के संगी और आप अपने

12:37रिश्तेदार जैसे शूरवीर दुर्योधन के लिए

12:40कुछ भी करने को तैयार है वैसे ही यह आपके

12:43साथ भी आपके लिए कुछ भी कर सकते हैं

12:49कि आप हरिया तम तदस्माकं बलं

12:53लंबी चश्मा भी रक्षितं पर यह उत्तम प्रमेह

12:59शाम बलम धीमा ही रखे तम

13:03कि दुर्योधन आगे कहता है कि भीष्म पितामह

13:06द्वारा रक्षित उनकी सेना सब प्रकार से अजय

13:11है और वही शत्रु की सेना भीम द्वारा

13:15रक्षित है दुर्योधन कहना चाहते हैं कि भीम

13:18की सेना को आसानी से जीत सकते हैं

13:20दुर्योधन यहां घमंड दिखा रहा है जो आपको

13:24बिल्कुल भी नहीं करना है दोस्तों कभी नहीं

13:27क्योंकि अगर दुर्योधन जानता कि वह दूसरी

13:30सेना को हर आदमी का या तो फिर युद्ध ही

13:33क्यों करता युद्ध को जीतने के लिए दूसरे

13:36को हराना पड़ता है अगर चुनौतियां समस्या

13:39को देखकर हमें लगता है कि हम जीत जाएंगे

13:42तो विश्वास या आत्मविश्वास तो हो सकता है

13:44लेकिन घमंड नहीं क्योंकि अगर घमंड हुआ था

13:48तो वह आपके हार्दिक की शुरुआत है

13:55हां हां यानि सूचक रॉय डुब ग्य था भ्रम

14:00अवस्थित

14:02दिशा मेवा भी रख संत भवन तस्वीर वैवाहिक

14:09कि दोनों सेनाओं के इस तरह के वर्णन से

14:11दुर्योधन अपनी इस बात पर पहुंचना चाहता था

14:15और वह यह कि हर किसी को अपनी अपने मोर्चों

14:18पर अपनी-अपनी जगह स्थित रहते हुए उन्हें

14:21संडे भीष्म पितामह की रक्षा करनी है कहने

14:25का मतलब होने वाले युद्ध में सबसे अधिक

14:28उसकी रक्षा करते हैं जो आपके लिए युद्ध के

14:31लिए सबसे अधिक अवश्य जैसे कि दुर्योधन की

14:36नियुक्ति पितामह भीष्म पितामह को मारने का

14:40मतलब था

14:42और उनके बच्चे रहने का मतलब कि आप नहीं

14:46सकते अपनी सबसे बहुमूल्य चीज को तक बचा के

14:50रखना चाहिए जब तक कि आप पर विजय प्राप्त न

14:54करें

14:59कि तस्य सञ्जनयन्हर्षं

15:01हम कुरुवृद्ध

15:05पितामह

15:06संभना दम विनत चाहिए शंख यदि भावप्रवण

15:14एक संयुक्त घोषणा होती है होने वाले युद्ध

15:18कौरवों में सबसे वृद्ध सबसे बड़े प्रतापी

15:21पितामह भीष्म ने उच्च स्वर में SIM है कि

15:24पहाड़ के समान घर जाकर यह शंख बजाया कि

15:28दुर्योधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न हो गया

15:31युद्ध जीतने के लिए अपने पक्ष में माहौल

15:35बनाना पड़ता है खुद को दिलासा भी देना

15:38पड़ता है कि हम युद्ध जीतने में सक्षम है

15:41ऐसा ही पितामह भीष्म ने किया और ऐसा ही

15:44हमें भी करना चाहिए

15:50इस तरह शंखाश्च भेर्यश्च

15:56अनधिकृत

15:59शहादत उदावत

16:03कि युद्ध भयंकर होते हैं

16:05है और यह इतिहास में आज तक की सबसे भयंकर

16:09युद्ध का आरंभ तथा भीष्म पितामह है कृषक

16:13के पश्चात नगाड़े तथा ढोल मृदंग और नरसि

16:17बजे एक साथ ही थे

16:21ना

16:23बहुत ही

16:26मनोरंजक नहीं होते दोस्तों इसलिए अगर

16:29युद्ध का फैसला ले लिया जाता है तो इसमें

16:32जो भी स्वीकार करना पड़ता है हर चुनौती के

16:38लेकर उन्हीं के आधार पर ही तय करनी पड़ती

16:43है

16:47झाल जाता है असुरक्षित

16:49यौन व्यक्ति महति स्यंदने स्थितौ ओं

16:55माधवन अध

17:02तो अब बारी थी पांडु पुत्रों की सेना के

17:06शंखनाद की सफेद घोड़ों से युक्त उत्तम रख

17:10में बैठे हुए श्रीकृष्ण और अर्जुन ने भी

17:12अपने-अपने अलौकिक शंख बजाए युद्ध में जब

17:16तैयारी होती है न तो दोनों तरफ से होती है

17:19हर पक्ष अपनी विजय की भाषा में खुद को

17:22अपनी सेना को भरोसा देता है आज के समय में

17:25हम खुद के लिए अगर शंख बजाने की उपमा के

17:28बारे में सोच है तो यह हो सकता है कि हम

17:31कुछ भी ऐसा कर सकते हैं जो हमें मोटिवेट

17:34या प्रोत्साहित करें

17:4125 राजन

17:43ऋषिकेश टुब देवदत्तं धनंजय पौंड्रं दध्मौ

17:49महाशंखं भीमकर्मा वृकोदर

17:55श्री कृष्ण कृष्ण का नाम

17:5850 अर्जुन देव और बयान

18:03अधिकतम से ने अपना पॉइंट नामक शंख बजाया

18:08अपने जीवन में इसी तरह से हम भी अपनी

18:12चुनौती में आगे बढ़ने के लिए अपने

18:14मोटिवेशन चुन सकते हैं कुछ लोगों के लिए

18:18संगीत ऐसा करता के लिए भगवान को याद करना

18:22कि युद्ध पिता का आशीर्वाद अपने स्वयं के

18:28लिए तैयार हो जाइए

18:36कि

18:37अनंतविजयं राजा

18:39कुंतीपुत्रो

18:43युधिष्ठिर और

18:45नखलऊ

18:47सदन

18:49अधिक भूषण मणिपुष्पक हूं

18:56कि पांडवों में

18:57सबसे बड़े भाई कुंती पुत्र राजा युधिष्ठिर

19:02ने अनंत विजय नाम

19:05और नकुल तथा सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक

19:11नामक शंख बजाएं

19:15हेलो दोस्तों

19:17मोटिवेशन तो सबको चाहिए आपने देखा सभी लोग

19:21अपने-अपने तरीके से युद्ध जीतने के लिए

19:24अपना प्रयास कर रहे थे

19:31हुआ था

19:34ए काश या परमेष्वास शिखंडी

19:38च महारथ

19:41रिश्ता दुनिया बिरान

19:48अधिकतर

19:49रुधिर विज्ञान

19:54अधिकारी पति स्व दृढ़ निश्चय महाबाहु

20:00संख्या अंधाधुध पृथक-पृथक

20:04कि हर शंख की अलग ध्वनि अपना एक अलग

20:08अस्तित्व युद्ध का हर योद्धा अपनी

20:11उपस्थिति दर्ज़ कर रहा है श्रेष्ठ अनुज

20:14वाले काशिराज और महारथी शिखंडी एवं

20:18धृष्टद्युम्न तथा राजा विराट और अजेय

20:20सात्यकि राजा द्रुपद एवं द्रौपदी के

20:23पांचों पुत्र और बड़ी वजह वाले

20:26सुभद्रापुत्र अभिमन्यु

20:28कि संजय दत्त राष्ट्र को बताते हैं कि

20:31राजन सब ने अपनी ओर से अलग-अलग शंख बजाया

20:35दोस्तों महाभारत का युद्ध ऐसा था जिसमें

20:39हर बड़े से बड़े युद्ध भाग ले रहा था ऐसे

20:42विरले मौके को कोई कैसे छोड़ सकता था

20:45हमारी लिए ध्यान देने की बात यह है कि

20:48सच्चा युद्ध तो वही है जो युद्ध के लिए

20:51तत्पर रहे युद्ध को आप माने या न माने

20:55लेकिन उसके लिए हमेशा तैयार

20:58इसलिए ऊपर योद्धा शंख बजाकर सबको अपने

21:03होने का अहसास करवा रहा है

21:09कि संघ सुविधार्थ

21:12राणा हृदयहीन व्यदारयत्

21:16न

21:18ध्रुव

21:21दुगुना अध्ययन

21:24कि युद्ध से पहले जैसे आप शत्रु को अपनी

21:27शक्ति दिखाकर डराने का प्रयास करते हैं

21:30वैसे ही यहां भी हो रहा है

21:33कि संजय कहते हैं कि इस भयानक शब्द ने हाथ

21:36आंसर पृथ्वी को भी गुंजाते हुए उधार

21:39राष्ट्रों के अर्थात आपके पक्ष वालों के

21:42हृदय विदीर्ण कर दिए जब हम कार भरते हैं

21:46और फ्राई देते हैं तो बड़े से बड़े शत्रु

21:49को भी डर लगता है यह कर ऐसी होनी चाहिए कि

21:53शत्रु सोचें कि वह किस से युद्ध करने जा

21:56रहा है आप चाहे इंटरव्यू के लिए जाएं किसी

21:59से मिलने जाएंगे आपका हो न आपकी प्रतिभा

22:03ऐसी होनी चाहिए कि सामने वाला आपके कौशल

22:05से प्रभावित हो जाए

22:11कि अर्जुन हुआ था अच्छा है जी हां था

22:17व्यवस्थितांदृष्ट्वा

22:18[संगीत]

22:20धार्तराष्ट्रान् कपित वजह

22:24प्रवृति कसम पति धर्म विरुद्ध संविदा

22:29पांडव वह

22:31कि ऋषि की क्षमता व कम वृद्ध महिला पति

22:38से ट्यूर ट्यूर

22:41मध्ए प्रथम स्थान अधत

22:47कि अर्जुन ने मोर्चा बांधकर डटे हुए

22:50धृतराष्ट्र-संबंधियों को देखते हैं फिर

22:53अपना धनुष उठाकर हृषीकेश श्रीकृष्ण से

22:56कहते हैं ही अच्छे मेरे रथ को दोनों

23:00सेनाओं के बीच में खड़ा कीजिए

23:03है अच्युत अर्थात अटल जो अपने स्थान से

23:06हटता नहीं जिस का नाश नहीं हो सकता

23:09श्रीकृष्ण का एक नाम अक्षत भी था और जो

23:13अपने साथी से दोनों सेनाओं के बीच में

23:16जाने को कह रहे हैं अर्जुन ने श्रीकृष्ण

23:19को इसलिए चुना था कि वह जानता था कि जब

23:22साक्षात भगवान उसके साथ हैं तो मतलब धर्म

23:26के साथ है जिसके साथ धर्म होता है वह कभी

23:30हार नहीं सकता

23:32झाल

23:36है या वेतन निरीक्षण शेयर हम

23:41युक्त सामान व्यवस्थित आम गहन

23:46अध्ययन एवं अशुभ इंजन सम उद्यमी

23:52कि आज के जीवन का यह सबसे बड़ा ज्ञान है

23:55दोस्तों युद्ध कोई भी हो सकता है किसी भी

23:59प्रकार का पर्सनल यह बिजनेस से जुड़ा हुआ

24:02लेकिन दोनों पक्षों के बीच में जाकर आप की

24:06अवस्था के बारे में जान सकते हैं

24:09मैं अर्जुन श्रीकृष्ण से कहते हैं कि

24:12कृष्ण जब तक मैं युद्ध क्षेत्र में डटे

24:14हुए युद्ध के अभिलाषी इन विपक्षी योद्धाओं

24:17को भली प्रकार देख नलों के इस युद्धरूपी

24:21व्यापार में मुझे किन किन के साथ युद्ध

24:24करना योग्य है तब तक इस रखो यहीं खड़ा

24:27रखें हमें दोस्तों हमें भी इसी तरह अपनी

24:32समस्या के बीच में खड़े हो उसे भलीभांति

24:35देखना और रखना चाहिए और तभी निर्णय लेना

24:39चाहिए

24:44यो यो तमाना वेबरेज हम यह 13 समागत

24:52धार क्रश लुधियाना लुधियाना

24:57पति स्व

25:01मैं अर्जुन दुर्योधन को दुर्ग विधि बता

25:03रहे हैं क्योंकि दुर्योधन के चलते हुए

25:07युध्द हुआ

25:08दुर्योधन का साथ देने जितने भी राजा हैं

25:11उन्हें अर्जुन युद्ध स्थल के बीच में खड़े

25:14होकर कि देखना चाहते

25:16है दोस्तों यह जरूरी नहीं कि आपका शत्रुओं

25:19सही हो सकता है उसने गलत तरीका अपना करके

25:23आपको युद्ध में सुलझाना चाहा हो जैसा कि

25:27महाभारत में भी हुआ युद्ध तो करना ही

25:30पड़ता है और वह तभी करना चाहिए जब आप अपने

25:33शत्रुओं को अच्छे से देख परख चुके हो जान

25:36चुके हैं इसलिए अर्जुन कृष्ण से दोनों

25:39सेनाओं के बीच में रख को ले जाने के लिए

25:42कहता है

25:46कि संजय अव्वल ध्वज

25:50एवं मातृ शिशु

25:56गुडाकेशेन भारत

25:58से ट्यूर ट्यूर मध्य

26:02यथावत वर्थ उत्तम

26:06भीष्म द्रोण प्रमुखता

26:10सर्वेषां च महीक्षिताम्

26:13वाचन

26:15अधीन समन्वय तांत्रिक गुरु नीति

26:20कि संजय अपना आंखों देखा हाल बताते हैं

26:24मेहनत राष्ट्र जैसा कि अर्जुन ने कहा था

26:28श्रीकृष्ण ने दोनों सेनाओं के बीच में

26:31भीष्म और द्रोणाचार्य के सामने तथा

26:33संपूर्ण राज्यों के सामने रथ को खड़ा करके

26:37इस प्रकार कहा कि हे पार्थ युद्ध के लिए

26:41जुटे हुए इन कर्मों को देख

26:44कि पार्थ अर्जुन का ही नाम है दोस्तों उस

26:47अर्जुन का नाम है जो शंका में बस गिरने ही

26:50वाला है पार्थ हम सब भी हो सकते हैं और

26:54अगर हम अपने आप को संकट में घिरा पाते हैं

26:56तो मदद करने के लिए कृष्ण भी दूर नहीं

27:00होते और न ही उनकी गीता दूर होती है

27:089th पश्चात शैतान पार्थ

27:12पितरों पिता महान

27:16अयन मत

27:20लुटयंस अक्षांश तथा

27:24में कुंती का एक नाम प्रथा भी था

27:27पृथापुत्र अर्थात कुंतीपुत्र अर्थ दोनों

27:32सेनाओं के मध्य में उपस्थित ताऊ चाचा

27:36दादा-परदादा गुरु मामा भाइयों पुत्रों को

27:40देख रहे हैं भारत को इसीलिए तो धर्म युद्ध

27:43कहां गया युद्ध जो धर्म के लिए किया गया

27:47और इस युद्ध का एक बड़ा परिवार दो हिस्सों

27:51में बंट गया था सगे संबंधी छप और दूसरी

27:57तरफ हर किसी को फैसला करना है कि वह युद्ध

28:01में किसका साथ देना चाहता हूं

28:09कि शुभ्रांसू है दृढ़ निश्चई व से ट्यूर

28:14ट्यूर

28:15तान समीक्षक मानते यह सर्व

28:21व्यवस्थित आम

28:23मैं इन सब सगे संबंधियों के साथ अर्जुन

28:26अपने मित्रों को ससुरों को सूर्य भाइयों

28:30को देख रहे हैं विचार कर रहे हैं पूरा

28:33जीवन पांडु पुत्रों धृतराष्ट्र पुत्रों के

28:35साथ बिता सकेंगे इस संबंधी एक ही दोनों

28:40पक्ष में अपने ही लोग हैं किंतु अब अपनों

28:44के ही दो पक्ष भिड़ गए एक पक्ष शत्रु है

28:49कि हर किसी से अर्जुन की लड़ाई नहीं थी

28:51लेकिन अब युद्ध में वह उसके शत्रु थे और

28:56उस उनके साथ लड़ना होगा

29:01मैं अर्जुन हुआ

29:05था कृपया

29:07पर्यवेक्षक टुअर विशेष दत्त रिदम प्रभावित

29:13दृष्टि एवं

29:15सहायक कृष्ण

29:17युक्त समसम उपस्थित थे

29:23और अपने करीबी एकदम अपने अर्जुन के सामने

29:26खड़े थे लेकिन शत्रु पक्ष में उन्हें

29:29उपस्थित संपूर्ण बंधुओं को देखकर वे कुंती

29:33पुत्र अर्जुन अत्यंत करुणा से युक्त होकर

29:36शो करते हुए श्रीकृष्ण से कह रहे हैं

29:40तो यहीं से शुरुआत होती है दोस्तों आरंभ

29:43होता है अर्जुन के विषाक्त का जिसके लिए

29:45संपूर्ण गीता की रचना हुई कृष्ण को

29:48मार्गदर्शन के लिए एक ऐसी रचना करनी पड़ी

29:51जो हमेशा हमेशा के लिए हर किसी को सही राह

29:55पर चलने के लिए प्रेरित करती रही है और

29:58आगे भी प्रेरित करती रहेगी

30:04को सीधे अंतिम आंकड़ा त्रिवेणी मौसम च

30:09परिशुष्यति

30:11विपथ उच्च शरीर में

30:15रोमहर्षक उच्च जाति

30:17[संगीत]

30:19कि युद्ध की बात करना आसान होता है युद्ध

30:22करना कठिन

30:24ऐसा ही अर्जुन के साथ हुआ ऐसा ही दोस्तों

30:29हम सब के साथ होता है

30:30कि ऐसी शंका का सलूशन भागवत गीता से

30:34श्रीकृष्ण के द्वारा हमें मिलता है दुखी

30:37अर्जुन कहते हैं एक कृष्ण युद्ध क्षेत्र

30:41में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इस वजन

30:44समुदाय अपनों को देख कर मेरे अंग शिथिल

30:48हुए जा रहे हैं जैसे अंगों में शक्ति ना

30:51हो और मुख्य सूखा जा रहा है है तथा मेरे

30:56शरीर में कंपन व रोमांच हो रहा है

30:59है न जाने कितनी ही बात ऐसा हम सब के साथ

31:02होता है कि जब युद्ध के समूह होते हैं

31:04तुझे शक्ति खत्म हो जाती है

31:07यह परीक्षा की घड़ी के समय पर भी ऐसी ही

31:10घबराहट होती है ना

31:18कि गांडीवं स्रंसते

31:21हस्तात्वक्चैव परिदह्यते

31:25नष्ट न व्यवस्था तुम ब्राह्मण तीन अध

31:33कि अर्जुन ने अपने दोस्त को बता रहे हैं

31:35उनका दुख दोस्तों हमारी दुविधाओं से अलग

31:39नहीं है चाहे हम परीक्षा दे रहे हो चाहे

31:43बिजनेस करने जा रहे हैं चाहे कोई मैच

31:46खेलने जा रहे हैं कितने ही ऐसे मौके आते

31:49हैं जब हम उनकी अवस्था में लगता है जैसे

31:53कि हम युद्ध के लायक ही नहीं हम कर ही

31:56नहीं पाएंगे अर्जुन का गांडीव धनुष और

32:01त्वचा भी बहुत जल तथा उनका मन भ्रमित हो

32:07रहा है इसलिए उठ खड़े रहने में भी समर्थ

32:10नहीं है

32:17कि

32:18निमित्तानि च पश्यामि

32:20विपरीतानि केशव

32:23न

32:26धार्मिक अथवा स्वयं आवे

32:31कि विश्व का सबसे बड़ा योद्धा अर्जुन हताश

32:35है

32:37कि युद्ध से पहले अगर आप खुद को कांपता

32:40हुआ पाते हैं देखते हैं इधर से आपका मुंह

32:43सूख रहा है तो आपको निश्चित ही लगता है कि

32:47आप हारने वाले हैं दुनिया खत्म सी होती

32:50दिखती है चारों तरफ अंधकार समय महसूस होता

32:53है

32:54है ऐसे ही समय में हमें एक मार्गदर्शक की

32:58जरूरत होती है इसीलिए अर्जुन कहते हैं

33:02कि

33:03मैं लक्षणों को भी विपरीत ही देख रहा हूं

33:07तथा युद्ध में जनसमुदाय को मारकर कल्याण

33:11भी नहीं

33:13कि

33:14मुझे क्या फायदा होगा

33:21है न अकाउंट से भी जाएंगे हम कृष्ण न च

33:25राज्यं सुखानि च

33:28को कैमरा उज्जैन दुग्ध

33:32कैंबो गैर जीविते नवा

33:37मैं अर्जुन बात को स्पष्ट रखते हैं

33:40कि डर मे सब्जेक्ट लगता है कि अर्जुन कहते

33:43हैं एक कृष्ण मैं न तो विजय चाहता हूं और

33:47न राज्य और ना ही सुखों को चाहता हूं

33:51कि हे गोविंद हमें ऐसे राज्य से क्या

33:54प्रयोजन है अथवा ऐसे भोगों से और जीवन से

33:57भी क्या नाम है इस विषय में शंका दरिया

34:02घबराहट में अर्जुन सब कुछ छोड़ने को त्याग

34:05देने को तैयार है धन दुनिया उन्हें कुछ भी

34:08नहीं चाहिए

34:10कि वह ऐसे भाई भी दौड़ डर गए हैं कि

34:13दुनिया की हर खुशी को छोड़कर इस समय बस इस

34:17युद्ध से बचना चाहते हैं

34:19की विधि लक्षणों को हमें भी पहचानना है

34:22ताकि ऐसी अवस्था में हम भी वह करें जो

34:26कृष्ण बताइए

34:32कि यह सामर्थ एक प्रीतम

34:36सूरज संभोग बाहर सुखानि च

34:409th इमेज व्यवस्थिता युद्ध यह प्राणायाम

34:44प्रत्याहार धारणा चर्च

34:48मैं अर्जुन कहते हैं हमें जिनके लिए राज्य

34:52भोग और सुख आदि अभीष्ट है

34:55कि वे यह सब धन और जीवन की लालसा को त्याग

34:57कर युद्ध में खड़े हैं

35:00आप सोचिए जीवन का हर युद्ध हर काम हम

35:05अपनों के लिए करते हैं हमारा सारा काम

35:08सारे फायदे सारी सुख-शांति भाग दौड़ सिर्फ

35:13और सिर्फ अपनों के लिए होती है और यहां पर

35:16हमें अपनों को ही करना पड़ रहा है इससे

35:19बड़ी क्या दुविधा होगी अब वही अपने आप को

35:23मारने के लिए खड़े और आपको भी उन्हें

35:25मानना पड़ेगा ऐसी दुनिया किस काम की

35:28तो यही रुझान अर्जुन के मन में है

35:39हां हां चार यह फिर तरह पुत्रा

35:43तथैव च पितामह

35:46ओ मां तू लहसुन

35:50अधिक संबंध न तथा

35:53[संगीत]

35:55कि अर्जुन के सामने खड़े हैं उनके गुरु

35:58जान तारु चाहे लड़के राधे मां में ससुर

36:03बहुत साले और भी कई सारे संबंधी लोग

36:07मैं अर्जुन आपने हर संबंधी को करीब से

36:10पहचान रहे हैं और पहचान के उन्हें बता भी

36:14रहे हैं

36:22कि हे तन्हन तुम इच्छा मिक्स न तो पी

36:27मधुसूदनन अभी त्रैलोक्य राजस्व तो हम यह

36:33कृषि

36:36कि अगर आप युद्ध करने का निर्णय लेते हैं

36:39तो क्या आप यह कह सकते हैं कि मैं इसे

36:42शत्रु को मारूंगा और उसे नहीं युद्ध में

36:46तो हर कोई एक सैनिक होता है और अगर वह

36:49शत्रु पक्ष से है तो आपने उसको मारना ही

36:53यही

36:55बता रहे हैं

36:58हां हे मधुसूदन

36:59मेरे मारने पर अथवा तीनों लोकों के राज्य

37:03के लिए भी मैं इन सबको मारना नहीं चाहता

37:05फिर पृथ्वी के लिए तो कहना ही क्या है

37:08देखा दोस्तों तीन लोकों का राज्य भी

37:12अर्जुन को नहीं चाहिए अगर उसके लिए उसे

37:15अपनों का वध करना पड़ता है

37:17है तू उसे भूल नहीं चाहिए

37:19हेलो दोस्तों जीवन में कई बार ऐसी घड़ी

37:22आती है जब हमको जो सबसे प्रिय हुआ था उसका

37:25त्याग करना पड़ता है क्योंकि हमें अपने

37:28देखिए और वरना पड़ता है और अगर हम ऐसा

37:30करते हैं तभी हमें देखे प्राप्ति होती है

37:35अब तक क्या अपनी सबसे प्यारी चीज को हम

37:37छोड़ सकते हैं

37:43कि निहत्य धार्तराष्ट्रान्न

37:45का

37:48रीतियां जनार्दन

37:51पापा मे वास विद 10 मांग तत्व तनाव तथा यह

37:57अ

37:59मैं अर्जुन आगे कहते हैं हे जनार्दन

38:03दृष्टि के पुत्रों को मारकर हमें क्या

38:06प्रसन्नता होगी इन उपायों को मारकर हमें

38:10तो पाप लगेगा ना शत्रु पक्ष में आता है

38:16तो अपने अपनों को मारकर अपनो को दुख देते

38:20केवल आप ही मिल सकता है तो यह पुत्रों के

38:25लालच का ही परिणाम था

38:27आप के भाई भाई आमने-सामने थे दोस्तों लागत

38:31से कभी किसी का भला नहीं होता महाभारत में

38:34भी नहीं होना एक पक्ष को चेतना था तो

38:38दूसरे पक्ष को मारना था

38:45कि टेस्ट अनुसार हवयं हम तुम

38:49धार्तराष्ट्रान् स्वभाव बांधा बुने स्वयं

38:53ही कथं अथवा सुखी न श्याम माधव

38:58[संगीत]

39:00कि क्या आपने परिवार को मारकर आपको सुख

39:02मिल सकता है इसी लिए महाभारत को धर्म

39:06युद्ध कहा जाता है ऐसा धर्मसंकट हो तो आप

39:10क्या करें और पूछते हैं

39:13अपने ही बांध और राष्ट्र के पुत्रों को

39:16मारने के लिए हम कि नहीं क्योंकि अपने

39:19कुटुंब को मारकर हम कैसे सुखी होंगे

39:23हेलो दोस्तों जब कभी आपके सामने ऐसी

39:25परिस्थिति आए जिसमें लालच की वजह से

39:28बंटवारा हो रहा हो या झगड़ा हो रहा हो तो

39:31ठंडे दिमाग से अर्जुन की शहादत के बारे

39:34में सोचिए काया और देखिए इतना करके दुनिया

39:38का सबसे बड़ा युद्ध करके किसको क्या हासिल

39:41हुआ

39:47कि यह यह कहते नंबर शांति लोगों पहुंचे

39:52तथा

39:53लक

39:56पधारू झाल

40:00कि प्रथम यज्ञ समाधि आप आर रहमान उभरते

40:06तुम

40:07लक्ष्य कृतम दूषणम

40:10प्रशद जावण

40:12[संगीत]

40:14कि आपका शत्रु किसी भी प्रकार के पाप को

40:17करने को तैयार है लेकिन आप समझते हैं कि

40:21जो गलत अनुचित है उन नहीं करना चाहिए इन

40:25दिशाओं में अर्जुन ने इसी दुविधा को बताया

40:29लोग से निश्चित रूप से उन लोगों के नाश से

40:33उत्पन्न दोष को और मित्रों से विरोध करने

40:36में पाप को

40:40नाश से उत्पन्न दोष को जानने वाले हम

40:44लोगों को इस पाप से नियुक्त क्यों नहीं

40:47विचार करना चाहिए दुश्मन गलत कर रहा है वह

40:51नहीं समझता लेकिन आप तो समझते हैं तो

40:55समझदार होने के नाते आपको युद्ध से

40:58नियुक्त सोचना चाहिए है लेकिन अगर युद्ध

41:01से हट गए तो उसे आपकी हार मानी जाएगी क्या

41:05उसके लिए तैयार होंगे दोस्तों

41:12कि कुलक्षए प्रणश्यंति

41:14कोलर हर माह सनातन

41:18धर्मी नमस्ते कुलम प्रथम

41:22धर्मों भी वक्त युद्ध

41:26है जहां परिवार खत्म हो जाता है वह कुछ

41:30नहीं बचता कुल का नाश होने का मतलब सब कुछ

41:34खत्म हो जाना होता है

41:36है ऐसी स्थिति में अर्जुन फंसे हुए हैं वह

41:40कहते हैं कुल के नाश से सनातन कुल धर्म

41:44नष्ट हो जाते हैं तथा अधर्म का नाश हो

41:47जाने पर संपूर्ण पुल में बाप भी बहुत फैल

41:50जाता है अर्जुन जो कहना चाहते हैं वह यह

41:54कि अगर परिवार नष्ट होता है तो धर्म नष्ट

41:58होता धर्म नष्ट होने से पूरे स्कूल

42:01संपूर्ण परिवार में पाप बड़े परिवार ही है

42:05जो हमें अपनी जड़ों से अपने गुणों से अपने

42:08आदर्शों से जोड़ते रखता है उसके खत्म होते

42:11ही समाज में चारों तरफ बढ़ने लगता है

42:15हेलो दोस्तों आप चाहे तो अपने चारों तरफ

42:18भी देख सकते हैं जहां परिवार का सम्मान

42:21नहीं वह किसी भी बात का सम्मान नहीं होता

42:23और समाज पतन की ओर ही जाता है

42:31कि अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यंति

42:35कोलर स्त्री यह

42:37में त्रिशूल दृष्टा वार्ष्णेय

42:41जायते वर्णसंकर रह

42:45अपने परिवार की भलाई उसकी स्त्रियों पर

42:48निर्भर करती है

42:50कि अगर कोई घर बनता है तो वह परिवार की

42:53महिला की वजह से बनता है जिस घर में महिला

42:56नहीं होती तो कहते हैं कि उस घर का कोई

43:00भविष्य ही नहीं और अगर यह स्त्रियां दूषित

43:03या करत हो जाएं तो उसका क्या असर होता है

43:06अर्जुन कहते हैं एक कृष्ण कृष्ण पाप के

43:12अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियां अत्यंत

43:15दूषित हो जाती हैं और स्त्रियों के दूषित

43:18हो जाने पर

43:20वर्णसंकर उत्पन्न होता है

43:24कि संकरो नरकायैव कुलघ्नानां

43:28कुलस्य च

43:32पतंजलि आरोग्य शाम

43:35लुप्त पिंडोदक क्रिया था

43:39कि वर्णशंकर का यहां पर मतलब है जहां वर्ण

43:43या समाज की मर्यादाओं को सम्मान न देते

43:46हुए अलग-अलग तरीके से अ गलत वर्णों के मेल

43:50से जब संतान की उत्पत्ति होती है तो सब

43:54कुछ खत्म कर देती है इसीलिए

43:57समाज के नियम बड़े सोच समझ कर बनाए गए

44:00होते हैं दोस्तों

44:02हैं और इतने हजारों बरसों की सोच और उस

44:05नियमों को बिना सोचे समझे नहीं तोड़ना

44:07चाहिए

44:08मैं अर्जुन इसी बात का वर्णन कर रहे हैं

44:10कि कृष्ण वर्ण संकर कुलघातियों को और उनको

44:15नरक में ले जाने के लिए ही तो होता है

44:17लिफ्ट हुई पिंड ओर जल की क्रिया वाले

44:20अर्थात श्राद्ध और तर्पण से वंचित इन के

44:23पिता लोग भी अधोगति को प्राप्त होते हैं

44:30कि दूसरे दैहिक लगना

44:35वर्णसंकर कार कह उत्साह जयंती जातिधर्म और

44:40कुलधर्म श्य

44:45कि अर्जुन ने कहा इन वर्णसंकर कारक

44:48दोस्तों से कुलघातियों के सनातन कुल धर्म

44:51और जाति धर्म नष्ट हो जाते हैं जहां

44:55वर्णसंकर होता है ना वह अधर्म का नाश

44:58निश्चित

44:59वर्णसंकर की वजह से जैसा कि अर्जुन ने

45:02बताया कि धर्म का नाश होता और जाति धर्म

45:06का नाश हो जाता

45:08कोई अपने धर्म का पालन करें अपने कर्तव्य

45:12का निर्वाह नहीं करेगा और मनमानी करके अगर

45:16कोई न माने तो फिर कैसे आ

45:21कि समाज तो नाम ही पाए और कानून का है

45:24जहां सब सम्मान से बिना किसी डर के एक साथ

45:29रह सके

45:32कि उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां

45:37जनार्दन

45:40नरखेड़ नितंब

45:43उठ भवत्य् अनुश्रवण

45:46[संगीत]

45:47कि हे जनार्दन

45:49हैं जिनका कुलधर्म नष्ट हो गया है ऐसे

45:53मनुष्यों का अनिश्चित काल तक नरक में वास

45:55होता है ऐसा हम सुनते

45:58महाभारत के समय उनकी मान्यता थी दोस्तों

46:02अगर किसी के पास हो जाता था माना जाता था

46:05कि अब यह हमेशा के लिए नर्क में ही

46:08इसीलिए की रक्षा करना उसके सम्मान को

46:11बचाना उसका नाम करना इतनी बड़ी बात मानी

46:14जाती थी जो

46:18धर्म का सम्मान नहीं करते वह सीधे

46:24पैसा भी मान सकते हैं जहां धर्म नहीं होता

46:27वह जगह अपने आप ही

46:30अपने चारों तरफ ऐसी कई जगह हैं

46:43हेलो हाउ बात महक पापम् कर तुम व्यवस्थित

46:48एवं

46:49अदृश्य लोभ के फंध तुम सहानुभूति जता ह ह

46:57मैं अर्जुन आगे स्वयं को दोष दे रहे हैं

47:00जी हां शोक हम लोग बुद्धिमान होकर भी महान

47:04पाप करने को तैयार हो गए हैं जो राज्य और

47:07सुख लोग से स्वजनों को मारने के लिए उद्यत

47:10हो गए

47:11हेलो दोस्तों दुर्योधन जैसा भी है उसने जो

47:14भी निर्णय लिया लेकिन अर्जुन और उसकी सेना

47:17तो समझदार है तो क्या ऐसा उनके लिए ठीक है

47:19बेवकूफ कप चाय मांस भी हो जाए लेकिन

47:23बुद्धिमान से बहुत कुछ की उम्मीद की जाती

47:25है तो क्या समझदार अगर युद्ध के लिए तैयार

47:27हो जाता है तो उसकी गलती की माफी मिलेगी

47:30अर्जुन को लगता है कि नहीं नहीं मिलेगी

47:38कि यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं

47:42शस्त्र शस्त्र अर्पण यह

47:46धार्तराष्ट्राणां यह

47:48निसंतन मेज़र मातरम भवेत्

47:54जी हां खेल बंद कर किसी अपने के बारे में

47:56सोचिए जो आपको बहुत पसंद है जो आपका अपना

48:00है जिसकी गोद में आप खेले हो जिसके साथ

48:04खेले हो चाहे वह आपसे बड़ा हो या छोटा हो

48:08तो क्या आप उसे मार पाएंगे पर उससे अच्छा

48:12तो आपको लगेगा कि उसके हाथों आप स्वयं मर

48:15जाए यही बात अर्जुन कहते हैं

48:19कि यदि मुझे शस्त्र रहित एवं सामना न करने

48:22वाले को शस्त्र हाथ में लिए हुए दृष्टि के

48:26पुत्र में मार डालें तो वह मरना भी मेरे

48:30लिए अधिक कल्याण कारक होगा

48:35कि संजय

48:37ओबामा 56 एवं उक्त मार्ग न संख्ए रथोपस्थ

48:42उपाविशत्

48:45विश्व राज्य श्रम चाप बम सूख संविधान अध

48:51[संगीत]

48:52कि संजय जो धृतराष्ट्र को इस महान युद्ध

48:56का वर्णन दे रहे हैं वह बताते हैं कि

49:00दृष्टि रण में शोलों से उद्विग्न मन वाले

49:03अर्जुन इस प्रकार कहकर सहित धनुष को त्याग

49:07कर रथ के पिछले भाग में बैठे हैं

49:12हेलो दोस्तों यह था पहला अध्याय भगवती

49:16झाला

49:17मैं अर्जुन विषाद योग जी हम इसमें अर्जुन

49:21के दुख के होने की उसके मन में शंका आने

49:24की

49:25है और यही बातें हमारे सामने साफ मुखर

49:29होकर जाती हैं इस पूरे अध्ययन

49:32है अब इसके बाद के अध्याय में श्री कृष्ण

49:35अर्जुन के रुख का शंका का परेशानियों का

49:38हर प्रश्नों का किस तरह भली भांति उत्तर

49:41देंगे उसे जाएंगे और सुनाइए

49:45हैं तो दोस्तों यह था भगवत गीता का प्रथम

49:48अध्याय अर्जुन विषाद योग

49:52है जिसे आप तक पहुंचाया है

49:54शैलेंद्र भारती ने बड़ी सुंदर साधारण और

49:59स्पष्ट शब्दों में प्रस्तुत करने का

50:01प्रयास किया गया है इस मुलाकात होगी

50:05तब तक के लिए आज्ञा दीजिए धन्यवाद जय श्री

50:09कृष्ण

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