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Hazrat Nuh (AS) Ka Toofan | Puri Kahani | Islamic Documentary #HazratNuh #NuhAS #DastaaneTasrif

Dastaan-e-Tasrif · 2,548 words · 12 min read

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0:10तसवुर कीजिए एक ऐसी रात का जहां आसमान का

0:14रंग बदल चुका है। बादलों में आम गरज नहीं

0:17बल्कि कयामत की आहट है। एक ऐसी आफत जो

0:21जमीन ने अपनी पैदाइश से लेकर उस दिन तक

0:24कभी ना देखी थी। जमीन के सीने से पानी के

0:27उबलते हुए चश्मे फूट रहे हैं। और आसमान के

0:30दरवाजे इस तरह खोल दिए गए हैं जैसे कोई

0:33बेहिसब दरिया सीधा [संगीत] ऊपर से गिर रहा

0:36हो। चारों तरफ एक दहशत है। चीखें हैं।

0:41गुरूर और तकुर से भरे बदतरीन लोगों की

0:44आखिरी फरियादें हैं। जो चंद लम्हों में

0:47हमेशा के लिए पानी के नीचे दफन होने वाली

0:50हैं। लेकिन इस अजीम तूफान से पहले क्या

0:53हुआ था? यह आफत अचानक नहीं आई थी। यह

0:57नतीजा था सदियों की सरकशी का, सदियों के

1:00जुल्म का और एक सच्चे नबी की 950 साल लंबी

1:04सब्र आजमा दावत के इंकार का। एक ऐसी अजीम

1:07दास्तान जो सदियों से इंसानियत को

1:10झिंझोड़ती आई है। हजरत नूह अल सलाम और

1:13उनकी कौम पर आने वाले उस अजीम तूफान की

1:16दास्तान जिसने जमीन की पूरी तारीख को बदल

1:19कर रख दिया। हजरत आदम अल सलाम के बाद करीब

1:2210 सदियों तक इंसानियत तौहीद पर कायम रही।

1:26लोग एक अल्लाह की इबादत करते थे। आपस में

1:29सीधे रास्ते पर चलते थे। लेकिन जैसे-जैसे

1:33वक्त गुजरा इब्लीस ने इंसानों के दिलों

1:36में आहिस्ता-आहिस्ता वसवसे डालना शुरू

1:38किए। उस दौर में कुछ निहायत सालेह,

1:41परहेजगार और नेक लोग गुजरे थे। जिनके नाम

1:45थे वद, सुआ, याूद, यऊक और नस्र। जब यह नेक

1:51लोग दुनिया से रुखसत हो गए तो उनके चाहने

1:53वालों के दिलों में गहरा गम हुआ।

1:56इब्लीस ने एक बुजुर्ग की शक्ल में आकर

1:58उनसे कहा कि अगर तुम उनकी याद ताजा रखना

2:01चाहते हो और इबादत में दिल लगाना चाहते हो

2:04तो उनके मुजस्समे और तस्वीरें बनाकर अपनी

2:07इबादतगाहों में रख लो ताकि उन्हें देखकर

2:10तुम्हें उनकी नेकी याद आए। पहली नस्ल ने

2:13सिर्फ उन्हें यादगार के तौर पर रखा। लेकिन

2:16जब वह नस्ल गुजर गई और उनकी आने वाली

2:19औलादों ने उन मुजस्समों को देखा तो उन्हें

2:22असलियत का इल्म ना रहा। शैतान ने नई नस्ल

2:25के ज़हन में डाला कि तुम्हारे बाप दादा

2:28इन्हीं मुजस्समों के जरिए बारिश मांगते थे

2:30और मुश्किलात में मदद तलब करते थे। यहां

2:33से जमीन पर बुतपरस्ती का आगाज हुआ। तौहीद

2:37का नूर मध्यम पड़ गया और शर्क, जुल्म और

2:40नाइंसाफी ने मुआशरे को अपनी लपेट में ले

2:43लिया। जब जमीन पर जुल्म और शर्क हद से

2:46गुजर गया तो अल्लाह ताला ने अपनी रहमत से

2:49हजरत नूह अलह सलाम को नबी बनाकर भेजा।

2:53आपको शेख उल अंबिया यानी अंबिया के

2:56बुजुर्ग तरीन नबी कहा जाता है। हजरत नूह

3:00अलैहिस्सलाम ने अपनी कौम के दरमियान आकर

3:02ऐलान किया। ए मेरी कौम एक अल्लाह की इबादत

3:05करो उसके सिवा तुम्हारा कोई माबूद नहीं।

3:09मुझे डर है कि अगर तुमने इंकार किया तो

3:12तुम पर एक दर्दनाक दिन का अज़ाब आएगा।

3:16हजरत नूह अल सलाम ने दावत का काम कोई आम

3:19तरीके से नहीं किया। आपने अपनी कौम को दिन

3:22में बुलाया। रात के अंधेरे में समझाया। आम

3:25मजलिसों में खुलेआम दावत दी और अकेले में

3:29उन्हें तनहाई में ले जाकर प्यार से

3:31समझाया। आपने उन्हें जमीनो आसमान की

3:34निशानियां दिखाई। अल्लाह की रहमतों का

3:37एहसास दिलाया कि कैसे उसने आसमान से बारिश

3:40बरसाई, दरख्त उगाए और उन्हें औलाद और माल

3:43से नवाजा। लेकिन इसके बदले कौम ने क्या

3:46किया? जब भी हजरत नूह अल सलाम उन्हें

3:49अल्लाह की तरफ बुलाते। वो अपनी उंगलियां

3:52अपने कानों में ठोस लेते ताकि नबी की आवाज

3:55उन तक ना पहुंचे। वो अपने कपड़ों से अपने

3:58चेहरे ढांप लेते ताकि नबी का चेहरा ना देख

4:02सके। उनका तकुर और उनकी दुश्मनी इस कदर

4:05बढ़ चुकी थी कि वो बात सुनने तक को तैयार

4:08ना थे। कौम के सरदार और दौलतमंद लोग हजरत

4:12नूह अल सलाम का मजाक उड़ाने लगे। उन्होंने

4:14कहा तुम तो हमारी तरह ही एक आम इंसान हो।

4:17हम देखते हैं कि तुम्हारे पीछे चलने वाले

4:19लोग हमारे समाज के गरीब कमजोर और मजदूर

4:22तबके से हैं। हम उनके साथ कैसे बैठ सकते

4:25हैं? अगर तुम चाहते हो कि हम तुम्हारी बात

4:27सुने तो पहले इन गरीबों को अपनी महफिल से

4:32निकाल बाहर करो।

4:33हजरत नूह अल सलाम ने फरमाया

4:35मैं उन ईमान वालों को

4:38अपने पास से हरगिज़ नहीं निकाल सकता। इज्जत

4:42माल और दौलत से नहीं बल्कि ईमान और तकवा

4:45से होती है। अगर मैं उन्हें निकाल दूं तो

4:49अल्लाह की पकड़ से मुझे कौन बचा?

4:51यह सिलसिला चंद महीने या चंद साल नहीं

4:53चला। इस शख्स की बात कभी मत सुनना। यह

4:57जादूगर है और तुम्हें तुम्हारे बाप दादा

5:01के दीन से हटाना चाहता है।

5:03कौम के लोग हजरत नूह अल सलाम को पत्थरों

5:06से मारते यहां तक कि आप [हंसी] बेहोश हो

5:08जाते।

5:09लेकिन जब होश आता तो आपके लबों पर यही दुआ

5:12होती कि ऐ मेरे रब मेरी कौम को हिदायत दे

5:16क्योंकि यह नावाकिफ है। नूह अल सलाम ने

5:20950 साल तक सब्र के साथ यह जुल्म बर्दाश्त

5:23किया। मगर उन 950 सालों में सिर्फ चंद लोग

5:27ही ईमान लाए। कुछ रिवायत के मुताबिक 80 के

5:31करीब मर्द और औरतें। यहां तक कि उनकी अपनी

5:34बीवी और उनका एक बेटा जिसका नाम याम या

5:38कनान बताया जाता है वह भी कुफ्र और इंकार

5:41पर कायम रहे। सदियां गुजरने के बाद जब कौम

5:45की दुश्मनी इंतहा को पहुंच गई और आने वाली

5:48नस्लों से भी किसी खैर की उम्मीद बाकी ना

5:51रही तो अल्लाह ताला ने अपने नबी पर वही

5:55नाजिल फरमाई। ए नूह जो लोग ईमान ला चुके

5:59उनके सिवा अब तुम्हारी कौम में से कोई

6:02शख्स ईमान नहीं लाएगा। बस उनके आमाल पर

6:06गमगीन होना छोड़ दो। जब अल्लाह की तरफ से

6:10हिदायत के दरवाजे उनके अपने अमल की वजह से

6:12बंद हो गए। तब हजरत नूह अल सलाम ने वो

6:16अजीम तारीखी दुआ की। ऐ मेरे रब जमीन पर

6:21किसी काफिर का बसेरा बाकी ना छोड़। अगर तू

6:24उन्हें छोड़ देगा तो यह तेरे बंदों को

6:26गुमराह करेंगे और उनकी नस्ल से सिर्फ

6:29बदकार और सख्त काफिर ही पैदा होंगे। दुआ

6:33कबूल हुई अल्लाह ताला ने हजरत नूह अल सलाम

6:36को हुक्म दिया हमारी निगरानी में और हमारी

6:40वही के मुताबिक एक अजीम कश्ती सफीना तैयार

6:44करो और जालिमों के बारे में अब मुझसे कोई

6:47बात ना करना क्योंकि वो सब डूबा दिए

6:50जाएंगे। हजरत जिब्राइल अल सलाम ने आकर

6:54हजरत नूह अल सलाम को कश्ती बनाने की तालीम

6:57दी। नूह अल सलाम ने दरख्त लगाए, लकड़ियां

7:00काटी और रेगिस्तान के बीच में एक अजीमो

7:04शान कश्ती का ढांचा तैयार करना शुरू किया।

7:07यह एक ऐसी जगह थी जहां दूर-दूर तक कोई

7:10दरिया या समंदर नहीं था। कौम के लोग जब

7:14वहां से गुजरते तो हंसते और कहते

7:17कल तक तो नबी होने का दावा करते थे।

7:20[हंसी]

7:20आज बढ़ाई बन गए

7:24आज और कश्ती भी बना रहे हो तो सूखी जमीन

7:26और पहाड़ों के बीच [हंसी]

7:29क्या ये कश्ती रेत पर चलेगी

7:32हजरत नूह अल सलाम निहायत मुतमईन अंदाज में

7:35फरमाते अगर आज तुम हमारा मजाक उड़ाते हो

7:39तो अन करीब एक ऐसा वक्त आने वाला है जब हम

7:42तुम पर हंसेंगे जैसे तुम हम पर हंसते हो

7:45बहुत जल्द जान लोगे कि किसके ऊपर जिल्लत

7:48अमेज अज़ाब उतरता है। कश्ती मुकम्मल हो

7:51चुकी थी। यह तीन मंजिला एक अजीम किला नुमा

7:55जहाज था। एक मंजिल परिंदों के लिए, एक

7:58जानवरों के लिए और सबसे [संगीत] ऊपर की

8:00मंजिल इंसानों के लिए मखसूस थी। कश्ती को

8:04कीलों और तारकोल से इस तरह मजबूत जोड़ा

8:07गया था कि पानी की एक बूंद भी अंदर दाखिल

8:10ना हो सके। अज़ाब की अलामत यह तय की गई थी

8:13कि जब तन्नूर से पानी उबलने लगे तो समझ

8:16लेना कि फैसले की घड़ी आ चुकी है। तन्नूर

8:19वो जगह होती है जहां आग जलाई जाती है और

8:22रोटियां पकाई जाती हैं। एक दिन अचानक उसी

8:25जलती हुई आग के तन्नूर से आग के बजाय पानी

8:28के धारे फूट पड़े। यह कुदरत का इशारा था

8:31कि आम निजाम कायनात बदल चुका है।

8:35अल्लाह ताला का हुक्म हुआ ए नूह [संगीत]

8:38कश्ती में हर जानदार की जिं्स में से

8:41एक-एक जोड़ा [संगीत] नर और मादा सवार कर

8:44लो और अपने घर वालों को भी सिवाय उनके जिन

8:48पर पहले ही फैसला हो चुका है। और उन तमाम

8:51लोगों को जो ईमान ला चुके हैं। हजरत नूह

8:55अल सलाम ने हर किस्म के जानवर परिंदे और

8:58हशरातुल अर्श के जोड़ों को कश्ती में

9:00उतारा। फिर वह मुट्ठी भर मुसलमान जो

9:03सदियों से जुल्म सह रहे थे सर झुकाए

9:06अल्लाह का नाम लेते हुए उस कश्ती में सवार

9:09हो गए। बिस्मिल्लाह मजरेहा व मुरसाहा

9:13इन्ना रब्बी ल गफूरुर रहीम। अल्लाह ही के

9:17नाम से इसका चलना और इसका रुकना है। बेशक

9:20मेरा रब बड़ा बखशने वाला निहायत रहम करने

9:23वाला है। जैसे ही कश्ती का दरवाजा बंद हुआ

9:27आसमान पर काले स्या बादल छा गए। यह मामूली

9:30बादल नहीं थे बल्कि अज़ाब के धुएं जैसी

9:33तारीकी थी। आसमान से ऐसी मूसलाधार बारिश

9:37शुरू हुई जैसे दरिया उलट दिए गए हो। इधर

9:40जमीन पर एक अजीम जलजला आया और जमीन की तह

9:44से पहाड़ों के धारों से और खेत खलियानों

9:47से पानी के [संगीत] चश्मे फूट पड़े। जमीन

9:50का पानी ऊपर उठ रहा था और आसमान का पानी

9:54नीचे गिर रहा था। दोनों पानी आपस में इस

9:57तरह मिल गए जैसे पहले से मुकद्दर था। शहर

10:01डूबने लगे। मकानात बह गए। किले रेजा रेजा

10:06हो गए। लोग चीख रहे थे। अपने बच्चों को

10:09लेकर ऊंचाइयों की तरफ भाग रहे थे। जो

10:12सरदार कल तक गुरूर से चलते थे। आज भीगी

10:16हुई बिल्ली की तरह अपनी जान बख्शी की भीख

10:19मांग रहे थे। मगर उस दिन कोई पनाहगाह नहीं

10:23थी। पानी आहिस्ता-आहिस्ता नहीं बल्कि

10:26पहाड़ जैसी लहरों की सूरत में आगे बढ़ रहा

10:30था। कश्ती उन पहाड़ जैसी अजीम लहरों के

10:33दरमियान तैर रही थी। उसी कशमकश और तूफान

10:36के बीच हजरत नूह अल सलाम की निगाह अपने

10:39बेटे कनान पर पड़ी जो दूर एक पहाड़ी की

10:43तरफ भाग रहा था। एक बाप का दिल तड़प उठा।

10:47पैगंबर ही अपनी जगह मगर औलाद की मोहब्बत

10:50ने पुकार।

10:50ए मेरे प्यारे बेटे हमारे साथ सवार हो जा।

10:55काफिरों के साथ मत रह।

10:58लेकिन कनान का दिल तकुर और शर्क से अंधा

11:00हो चुका था। उसने कश्ती की तरफ देखे बगैर

11:04घमंड से जवाब दिया।

11:05मैं अभी किसी ऊंचे पहाड़ पर चढ़ जाऊंगा जो

11:08मुझे इस पानी से बचा लेगा।

11:11हजरत नूह अल सलाम ने फरियाद भरे अंदाज में

11:14आखिरी बार फरमाया

11:16आज अल्लाह के अज़ाब से बचाने वाला कोई नहीं

11:18है सिवाय उसके जिस पर अल्लाह ही रहम

11:21फरमाए।

11:22अभी यह गुफ्तगू चल ही रही थी कि दोनों के

11:25दरमियान एक पहाड़ जैसी लहर आकर हाय हो गई।

11:28कनान को उस अजीम धारे ने अपनी लपेट में ले

11:32लिया और वह देखते ही देखते गहरे पानियों

11:35में डूब कर हमेशा के लिए हलाक हो गया।

11:38हजरत नूह अल सलाम ने अपने रब से दुआ की ऐ

11:42मेरे रब मेरा बेटा तो मेरे अहल में से था

11:45और तेरा वादा सच्चा है कि तू मेरे घर

11:48वालों को बचाएगा। अल्लाह ताला ने फरमाया ऐ

11:51नूह वो तेरे अहल में से नहीं था क्योंकि

11:55उसका अमल नेक नहीं था। मुझसे ऐसी बात का

11:58सवाल ना करो जिसका तुम्हें पूरा इल्म ना

12:00हो। मैं तुम्हें नसीहत करता हूं कि तुम

12:04नादानों में से ना बनो। हजरत नूह अल सलाम

12:07ने फौरन तौबा की और फरमाया

12:09ऐ मेरे रब मैं तेरी पनाह मांगता हूं कि

12:13तुझसे ऐसी चीज का सवाल करूं जिसका मुझे

12:15इल्म नहीं।

12:16अगर तू मुझे ना बखशे और मुझ पर रहम ना करे

12:20तो मैं नुकसान उठाने वालों में से हो

12:22जाऊंगा।

12:23यह था इस्लाम का वह मिजाज जहां रिश्तेदारी

12:27नहीं बल्कि ईमान और आमाल ही नजात का जरिया

12:30बनते हैं। नबी का बेटा होने के बावजूद

12:33कुफ्र ने उसे अज़ाब से ना बचाया। पानी इतना

12:37बुलंद हुआ कि जमीन के सबसे ऊंचे पहाड़ भी

12:4040 हाथ करीब 20 से 30 मीटर पानी के नीचे

12:44डूब गए। जमीन पर मौजूद हर एक काफिर, हर एक

12:49सरकाश, हर एक बुतपरस्त खलाक हो चुका था।

12:53पूरी दुनिया में सिर्फ वही लोग जिंदा थे

12:56जो हजरत नूह अल ससलाम के साथ उस लकड़ी की

13:00कश्ती में सवार थे। महीनों तक कश्ती पानी

13:03[संगीत] के थपड़ों पर बहती रही। फिर जब

13:06अल्लाह का अज़ाब मुकम्मल हो गया और जमीन

13:09सरकाशी से पाक हो गई तो कुदरत का हुक्म

13:12जारी हुआ। ऐ जमीन अपना पानी निगल जा और ऐ

13:17आसमान थम जा। जमीन ने अपना पानी पी लिया।

13:22आसमान की बारिश बंद हो गई। तूफान ठहर गया

13:26और अज़ाब का फैसला पूरा हो चुका। वो अज़म

13:30कश्ती आहिस्ता-आहिस्ता जाकर जूदी पहाड़ की

13:33चोटी पर ठहर गई। हुकुम हुआ ऐ नूह हमारी

13:38तरफ से सलामती और बरकतों के साथ उतर जाओ।

13:41तुम पर भी और उन गिरोहों पर भी जो

13:44तुम्हारे साथ हैं। हजरत नूह अल सलाम और

13:48उनके बा ईमान साथी कश्ती से बाहर आए। जमीन

13:51बिल्कुल नए सिरे से वजूद में आई थी। हर

13:54तरफ सन्नाटा था। मगर यह सन्नाटा शर्क और

13:59जुल्म के खात्मे और तौहीद की फतेह का

14:02सन्नाटा था। हजरत नूह अल सलाम ने शुक्राने

14:05के सजदे किए। और एक नए मुआशरे की बुनियाद

14:08रखी। जहां सिर्फ और सिर्फ एक सच्चे खुदा

14:12की इबादत होती थी। इसीलिए हजरत नूह अल

14:15सलाम को आदम सानी यानी दूसरा आदम भी कहा

14:19जाता है। क्योंकि उनके बाद आने वाली तमाम

14:22इंसानी नस्लें उन्हीं के जरिए आगे बढ़ी।

14:26इस अजीम तारीखी वाक्य को सुनने के बाद हर

14:29एक शख्स को अपने गिरेबान में झांकना

14:31चाहिए। हजरत नूह अल सलाम की दास्तान हमें

14:34यह सबक देती है कि जब पूरी दुनिया

14:36तुम्हारे खिलाफ खड़ी हो जाए। जब हर रास्ता

14:39बंद नजर आए। जब लोग तुम्हारे दीन,

14:42तुम्हारे सजदों और तुम्हारी सच्चाई का

14:44मजाक उड़ाने लगे तो घबराना नहीं। हजरत नूह

14:48अल सलाम के पास कोई फौज नहीं थी। कोई

14:50हथियार नहीं थे। कोई माली दौलत नहीं थी।

14:53उनके पास सिर्फ एक चीज थी। अल्लाह की जात

14:57पर अटूट और पुख्ता यकीन। उन्होंने

15:00रेगिस्तान में कश्ती बनाई क्योंकि उनका

15:02यकीन कश्ती पर नहीं अल्लाह के हुक्म पर

15:05था। कश्ती तो सिर्फ लकड़ी के टुकड़े थी।

15:08असल हिफाजत करने वाला तो अर्श का मालिक

15:10था। आज हम और आप छोटी-छोटी परेशानियों पर

15:14टूट जाते हैं। माली तंगी आती है तो हिम्मत

15:17हार जाते हैं। बीमारी आती है तो शिकवा

15:20करने लगते हैं। दुनिया की तकलीफ आती है तो

15:23मायूस हो जाते हैं। मगर याद रखो जो जात

15:26हजरत नूह अल सलाम को पहाड़ जैसी दहशतनाक

15:30लहरों से बचा सकती है। जो जात आग उबलने

15:33वाले तन्नूर से पानी निकाल सकती है। जो

15:35जात सूखी जमीन पर कश्ती चला सकती है। क्या

15:39वह जात तुम्हारी छोटी सी मुश्किल को हल

15:41नहीं कर सकती? बेशक कर सकती है। शर्त

15:45सिर्फ यह है कि हमारा ईमान उस दर्जे का

15:48हो। अल्लाह पर से अपना भरोसा कभी मत

15:51छोड़ना। दुनिया चाहे कितनी [संगीत] ही

15:53बड़ी तूफान बनकर तुम्हारे सामने खड़ी हो

15:55जाए अगर तुम्हारा हाथ अल्लाह की रस्सी को

15:58[संगीत] थामे हुए है तो दुनिया की कोई

16:01ताकत तुम्हें डूबा नहीं सकती। और अगर

16:03अल्लाह का दामन छूट गया तो चाहे तुम कनान

16:06की तरह दुनिया के सबसे ऊंचे पहाड़ों पर भी

16:09चढ़ जाओ हलाकत से तुम्हें कोई बचा नहीं

16:12सकेगा। नजात दौलत में नहीं नजात ताकत में

16:16नहीं। नजात सिर्फ और सिर्फ अल्लाह के दीन,

16:19तौहीद और उसके रसूल की इतात में है। अपने

16:24रब की तरफ पलटो। उसी से लॉ लगाओ। और अपने

16:27दिल में यह यकीन पुख्ता कर लो के वकल

16:32अल्लाह फ हसब और जो शख्स अल्लाह पर भरोसा

16:37करता है अल्लाह उसके लिए काफी

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