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0:10तसवुर कीजिए एक ऐसी रात का जहां आसमान का
0:14रंग बदल चुका है। बादलों में आम गरज नहीं
0:17बल्कि कयामत की आहट है। एक ऐसी आफत जो
0:21जमीन ने अपनी पैदाइश से लेकर उस दिन तक
0:24कभी ना देखी थी। जमीन के सीने से पानी के
0:27उबलते हुए चश्मे फूट रहे हैं। और आसमान के
0:30दरवाजे इस तरह खोल दिए गए हैं जैसे कोई
0:33बेहिसब दरिया सीधा [संगीत] ऊपर से गिर रहा
0:36हो। चारों तरफ एक दहशत है। चीखें हैं।
0:41गुरूर और तकुर से भरे बदतरीन लोगों की
0:44आखिरी फरियादें हैं। जो चंद लम्हों में
0:47हमेशा के लिए पानी के नीचे दफन होने वाली
0:50हैं। लेकिन इस अजीम तूफान से पहले क्या
0:53हुआ था? यह आफत अचानक नहीं आई थी। यह
0:57नतीजा था सदियों की सरकशी का, सदियों के
1:00जुल्म का और एक सच्चे नबी की 950 साल लंबी
1:04सब्र आजमा दावत के इंकार का। एक ऐसी अजीम
1:07दास्तान जो सदियों से इंसानियत को
1:10झिंझोड़ती आई है। हजरत नूह अल सलाम और
1:13उनकी कौम पर आने वाले उस अजीम तूफान की
1:16दास्तान जिसने जमीन की पूरी तारीख को बदल
1:19कर रख दिया। हजरत आदम अल सलाम के बाद करीब
1:2210 सदियों तक इंसानियत तौहीद पर कायम रही।
1:26लोग एक अल्लाह की इबादत करते थे। आपस में
1:29सीधे रास्ते पर चलते थे। लेकिन जैसे-जैसे
1:33वक्त गुजरा इब्लीस ने इंसानों के दिलों
1:36में आहिस्ता-आहिस्ता वसवसे डालना शुरू
1:38किए। उस दौर में कुछ निहायत सालेह,
1:41परहेजगार और नेक लोग गुजरे थे। जिनके नाम
1:45थे वद, सुआ, याूद, यऊक और नस्र। जब यह नेक
1:51लोग दुनिया से रुखसत हो गए तो उनके चाहने
1:53वालों के दिलों में गहरा गम हुआ।
1:56इब्लीस ने एक बुजुर्ग की शक्ल में आकर
1:58उनसे कहा कि अगर तुम उनकी याद ताजा रखना
2:01चाहते हो और इबादत में दिल लगाना चाहते हो
2:04तो उनके मुजस्समे और तस्वीरें बनाकर अपनी
2:07इबादतगाहों में रख लो ताकि उन्हें देखकर
2:10तुम्हें उनकी नेकी याद आए। पहली नस्ल ने
2:13सिर्फ उन्हें यादगार के तौर पर रखा। लेकिन
2:16जब वह नस्ल गुजर गई और उनकी आने वाली
2:19औलादों ने उन मुजस्समों को देखा तो उन्हें
2:22असलियत का इल्म ना रहा। शैतान ने नई नस्ल
2:25के ज़हन में डाला कि तुम्हारे बाप दादा
2:28इन्हीं मुजस्समों के जरिए बारिश मांगते थे
2:30और मुश्किलात में मदद तलब करते थे। यहां
2:33से जमीन पर बुतपरस्ती का आगाज हुआ। तौहीद
2:37का नूर मध्यम पड़ गया और शर्क, जुल्म और
2:40नाइंसाफी ने मुआशरे को अपनी लपेट में ले
2:43लिया। जब जमीन पर जुल्म और शर्क हद से
2:46गुजर गया तो अल्लाह ताला ने अपनी रहमत से
2:49हजरत नूह अलह सलाम को नबी बनाकर भेजा।
2:53आपको शेख उल अंबिया यानी अंबिया के
2:56बुजुर्ग तरीन नबी कहा जाता है। हजरत नूह
3:00अलैहिस्सलाम ने अपनी कौम के दरमियान आकर
3:02ऐलान किया। ए मेरी कौम एक अल्लाह की इबादत
3:05करो उसके सिवा तुम्हारा कोई माबूद नहीं।
3:09मुझे डर है कि अगर तुमने इंकार किया तो
3:12तुम पर एक दर्दनाक दिन का अज़ाब आएगा।
3:16हजरत नूह अल सलाम ने दावत का काम कोई आम
3:19तरीके से नहीं किया। आपने अपनी कौम को दिन
3:22में बुलाया। रात के अंधेरे में समझाया। आम
3:25मजलिसों में खुलेआम दावत दी और अकेले में
3:29उन्हें तनहाई में ले जाकर प्यार से
3:31समझाया। आपने उन्हें जमीनो आसमान की
3:34निशानियां दिखाई। अल्लाह की रहमतों का
3:37एहसास दिलाया कि कैसे उसने आसमान से बारिश
3:40बरसाई, दरख्त उगाए और उन्हें औलाद और माल
3:43से नवाजा। लेकिन इसके बदले कौम ने क्या
3:46किया? जब भी हजरत नूह अल सलाम उन्हें
3:49अल्लाह की तरफ बुलाते। वो अपनी उंगलियां
3:52अपने कानों में ठोस लेते ताकि नबी की आवाज
3:55उन तक ना पहुंचे। वो अपने कपड़ों से अपने
3:58चेहरे ढांप लेते ताकि नबी का चेहरा ना देख
4:02सके। उनका तकुर और उनकी दुश्मनी इस कदर
4:05बढ़ चुकी थी कि वो बात सुनने तक को तैयार
4:08ना थे। कौम के सरदार और दौलतमंद लोग हजरत
4:12नूह अल सलाम का मजाक उड़ाने लगे। उन्होंने
4:14कहा तुम तो हमारी तरह ही एक आम इंसान हो।
4:17हम देखते हैं कि तुम्हारे पीछे चलने वाले
4:19लोग हमारे समाज के गरीब कमजोर और मजदूर
4:22तबके से हैं। हम उनके साथ कैसे बैठ सकते
4:25हैं? अगर तुम चाहते हो कि हम तुम्हारी बात
4:27सुने तो पहले इन गरीबों को अपनी महफिल से
4:32निकाल बाहर करो।
4:33हजरत नूह अल सलाम ने फरमाया
4:35मैं उन ईमान वालों को
4:38अपने पास से हरगिज़ नहीं निकाल सकता। इज्जत
4:42माल और दौलत से नहीं बल्कि ईमान और तकवा
4:45से होती है। अगर मैं उन्हें निकाल दूं तो
4:49अल्लाह की पकड़ से मुझे कौन बचा?
4:51यह सिलसिला चंद महीने या चंद साल नहीं
4:53चला। इस शख्स की बात कभी मत सुनना। यह
4:57जादूगर है और तुम्हें तुम्हारे बाप दादा
5:01के दीन से हटाना चाहता है।
5:03कौम के लोग हजरत नूह अल सलाम को पत्थरों
5:06से मारते यहां तक कि आप [हंसी] बेहोश हो
5:08जाते।
5:09लेकिन जब होश आता तो आपके लबों पर यही दुआ
5:12होती कि ऐ मेरे रब मेरी कौम को हिदायत दे
5:16क्योंकि यह नावाकिफ है। नूह अल सलाम ने
5:20950 साल तक सब्र के साथ यह जुल्म बर्दाश्त
5:23किया। मगर उन 950 सालों में सिर्फ चंद लोग
5:27ही ईमान लाए। कुछ रिवायत के मुताबिक 80 के
5:31करीब मर्द और औरतें। यहां तक कि उनकी अपनी
5:34बीवी और उनका एक बेटा जिसका नाम याम या
5:38कनान बताया जाता है वह भी कुफ्र और इंकार
5:41पर कायम रहे। सदियां गुजरने के बाद जब कौम
5:45की दुश्मनी इंतहा को पहुंच गई और आने वाली
5:48नस्लों से भी किसी खैर की उम्मीद बाकी ना
5:51रही तो अल्लाह ताला ने अपने नबी पर वही
5:55नाजिल फरमाई। ए नूह जो लोग ईमान ला चुके
5:59उनके सिवा अब तुम्हारी कौम में से कोई
6:02शख्स ईमान नहीं लाएगा। बस उनके आमाल पर
6:06गमगीन होना छोड़ दो। जब अल्लाह की तरफ से
6:10हिदायत के दरवाजे उनके अपने अमल की वजह से
6:12बंद हो गए। तब हजरत नूह अल सलाम ने वो
6:16अजीम तारीखी दुआ की। ऐ मेरे रब जमीन पर
6:21किसी काफिर का बसेरा बाकी ना छोड़। अगर तू
6:24उन्हें छोड़ देगा तो यह तेरे बंदों को
6:26गुमराह करेंगे और उनकी नस्ल से सिर्फ
6:29बदकार और सख्त काफिर ही पैदा होंगे। दुआ
6:33कबूल हुई अल्लाह ताला ने हजरत नूह अल सलाम
6:36को हुक्म दिया हमारी निगरानी में और हमारी
6:40वही के मुताबिक एक अजीम कश्ती सफीना तैयार
6:44करो और जालिमों के बारे में अब मुझसे कोई
6:47बात ना करना क्योंकि वो सब डूबा दिए
6:50जाएंगे। हजरत जिब्राइल अल सलाम ने आकर
6:54हजरत नूह अल सलाम को कश्ती बनाने की तालीम
6:57दी। नूह अल सलाम ने दरख्त लगाए, लकड़ियां
7:00काटी और रेगिस्तान के बीच में एक अजीमो
7:04शान कश्ती का ढांचा तैयार करना शुरू किया।
7:07यह एक ऐसी जगह थी जहां दूर-दूर तक कोई
7:10दरिया या समंदर नहीं था। कौम के लोग जब
7:14वहां से गुजरते तो हंसते और कहते
7:17कल तक तो नबी होने का दावा करते थे।
7:20[हंसी]
7:20आज बढ़ाई बन गए
7:24आज और कश्ती भी बना रहे हो तो सूखी जमीन
7:26और पहाड़ों के बीच [हंसी]
7:29क्या ये कश्ती रेत पर चलेगी
7:32हजरत नूह अल सलाम निहायत मुतमईन अंदाज में
7:35फरमाते अगर आज तुम हमारा मजाक उड़ाते हो
7:39तो अन करीब एक ऐसा वक्त आने वाला है जब हम
7:42तुम पर हंसेंगे जैसे तुम हम पर हंसते हो
7:45बहुत जल्द जान लोगे कि किसके ऊपर जिल्लत
7:48अमेज अज़ाब उतरता है। कश्ती मुकम्मल हो
7:51चुकी थी। यह तीन मंजिला एक अजीम किला नुमा
7:55जहाज था। एक मंजिल परिंदों के लिए, एक
7:58जानवरों के लिए और सबसे [संगीत] ऊपर की
8:00मंजिल इंसानों के लिए मखसूस थी। कश्ती को
8:04कीलों और तारकोल से इस तरह मजबूत जोड़ा
8:07गया था कि पानी की एक बूंद भी अंदर दाखिल
8:10ना हो सके। अज़ाब की अलामत यह तय की गई थी
8:13कि जब तन्नूर से पानी उबलने लगे तो समझ
8:16लेना कि फैसले की घड़ी आ चुकी है। तन्नूर
8:19वो जगह होती है जहां आग जलाई जाती है और
8:22रोटियां पकाई जाती हैं। एक दिन अचानक उसी
8:25जलती हुई आग के तन्नूर से आग के बजाय पानी
8:28के धारे फूट पड़े। यह कुदरत का इशारा था
8:31कि आम निजाम कायनात बदल चुका है।
8:35अल्लाह ताला का हुक्म हुआ ए नूह [संगीत]
8:38कश्ती में हर जानदार की जिं्स में से
8:41एक-एक जोड़ा [संगीत] नर और मादा सवार कर
8:44लो और अपने घर वालों को भी सिवाय उनके जिन
8:48पर पहले ही फैसला हो चुका है। और उन तमाम
8:51लोगों को जो ईमान ला चुके हैं। हजरत नूह
8:55अल सलाम ने हर किस्म के जानवर परिंदे और
8:58हशरातुल अर्श के जोड़ों को कश्ती में
9:00उतारा। फिर वह मुट्ठी भर मुसलमान जो
9:03सदियों से जुल्म सह रहे थे सर झुकाए
9:06अल्लाह का नाम लेते हुए उस कश्ती में सवार
9:09हो गए। बिस्मिल्लाह मजरेहा व मुरसाहा
9:13इन्ना रब्बी ल गफूरुर रहीम। अल्लाह ही के
9:17नाम से इसका चलना और इसका रुकना है। बेशक
9:20मेरा रब बड़ा बखशने वाला निहायत रहम करने
9:23वाला है। जैसे ही कश्ती का दरवाजा बंद हुआ
9:27आसमान पर काले स्या बादल छा गए। यह मामूली
9:30बादल नहीं थे बल्कि अज़ाब के धुएं जैसी
9:33तारीकी थी। आसमान से ऐसी मूसलाधार बारिश
9:37शुरू हुई जैसे दरिया उलट दिए गए हो। इधर
9:40जमीन पर एक अजीम जलजला आया और जमीन की तह
9:44से पहाड़ों के धारों से और खेत खलियानों
9:47से पानी के [संगीत] चश्मे फूट पड़े। जमीन
9:50का पानी ऊपर उठ रहा था और आसमान का पानी
9:54नीचे गिर रहा था। दोनों पानी आपस में इस
9:57तरह मिल गए जैसे पहले से मुकद्दर था। शहर
10:01डूबने लगे। मकानात बह गए। किले रेजा रेजा
10:06हो गए। लोग चीख रहे थे। अपने बच्चों को
10:09लेकर ऊंचाइयों की तरफ भाग रहे थे। जो
10:12सरदार कल तक गुरूर से चलते थे। आज भीगी
10:16हुई बिल्ली की तरह अपनी जान बख्शी की भीख
10:19मांग रहे थे। मगर उस दिन कोई पनाहगाह नहीं
10:23थी। पानी आहिस्ता-आहिस्ता नहीं बल्कि
10:26पहाड़ जैसी लहरों की सूरत में आगे बढ़ रहा
10:30था। कश्ती उन पहाड़ जैसी अजीम लहरों के
10:33दरमियान तैर रही थी। उसी कशमकश और तूफान
10:36के बीच हजरत नूह अल सलाम की निगाह अपने
10:39बेटे कनान पर पड़ी जो दूर एक पहाड़ी की
10:43तरफ भाग रहा था। एक बाप का दिल तड़प उठा।
10:47पैगंबर ही अपनी जगह मगर औलाद की मोहब्बत
10:50ने पुकार।
10:50ए मेरे प्यारे बेटे हमारे साथ सवार हो जा।
10:55काफिरों के साथ मत रह।
10:58लेकिन कनान का दिल तकुर और शर्क से अंधा
11:00हो चुका था। उसने कश्ती की तरफ देखे बगैर
11:04घमंड से जवाब दिया।
11:05मैं अभी किसी ऊंचे पहाड़ पर चढ़ जाऊंगा जो
11:08मुझे इस पानी से बचा लेगा।
11:11हजरत नूह अल सलाम ने फरियाद भरे अंदाज में
11:14आखिरी बार फरमाया
11:16आज अल्लाह के अज़ाब से बचाने वाला कोई नहीं
11:18है सिवाय उसके जिस पर अल्लाह ही रहम
11:21फरमाए।
11:22अभी यह गुफ्तगू चल ही रही थी कि दोनों के
11:25दरमियान एक पहाड़ जैसी लहर आकर हाय हो गई।
11:28कनान को उस अजीम धारे ने अपनी लपेट में ले
11:32लिया और वह देखते ही देखते गहरे पानियों
11:35में डूब कर हमेशा के लिए हलाक हो गया।
11:38हजरत नूह अल सलाम ने अपने रब से दुआ की ऐ
11:42मेरे रब मेरा बेटा तो मेरे अहल में से था
11:45और तेरा वादा सच्चा है कि तू मेरे घर
11:48वालों को बचाएगा। अल्लाह ताला ने फरमाया ऐ
11:51नूह वो तेरे अहल में से नहीं था क्योंकि
11:55उसका अमल नेक नहीं था। मुझसे ऐसी बात का
11:58सवाल ना करो जिसका तुम्हें पूरा इल्म ना
12:00हो। मैं तुम्हें नसीहत करता हूं कि तुम
12:04नादानों में से ना बनो। हजरत नूह अल सलाम
12:07ने फौरन तौबा की और फरमाया
12:09ऐ मेरे रब मैं तेरी पनाह मांगता हूं कि
12:13तुझसे ऐसी चीज का सवाल करूं जिसका मुझे
12:15इल्म नहीं।
12:16अगर तू मुझे ना बखशे और मुझ पर रहम ना करे
12:20तो मैं नुकसान उठाने वालों में से हो
12:22जाऊंगा।
12:23यह था इस्लाम का वह मिजाज जहां रिश्तेदारी
12:27नहीं बल्कि ईमान और आमाल ही नजात का जरिया
12:30बनते हैं। नबी का बेटा होने के बावजूद
12:33कुफ्र ने उसे अज़ाब से ना बचाया। पानी इतना
12:37बुलंद हुआ कि जमीन के सबसे ऊंचे पहाड़ भी
12:4040 हाथ करीब 20 से 30 मीटर पानी के नीचे
12:44डूब गए। जमीन पर मौजूद हर एक काफिर, हर एक
12:49सरकाश, हर एक बुतपरस्त खलाक हो चुका था।
12:53पूरी दुनिया में सिर्फ वही लोग जिंदा थे
12:56जो हजरत नूह अल ससलाम के साथ उस लकड़ी की
13:00कश्ती में सवार थे। महीनों तक कश्ती पानी
13:03[संगीत] के थपड़ों पर बहती रही। फिर जब
13:06अल्लाह का अज़ाब मुकम्मल हो गया और जमीन
13:09सरकाशी से पाक हो गई तो कुदरत का हुक्म
13:12जारी हुआ। ऐ जमीन अपना पानी निगल जा और ऐ
13:17आसमान थम जा। जमीन ने अपना पानी पी लिया।
13:22आसमान की बारिश बंद हो गई। तूफान ठहर गया
13:26और अज़ाब का फैसला पूरा हो चुका। वो अज़म
13:30कश्ती आहिस्ता-आहिस्ता जाकर जूदी पहाड़ की
13:33चोटी पर ठहर गई। हुकुम हुआ ऐ नूह हमारी
13:38तरफ से सलामती और बरकतों के साथ उतर जाओ।
13:41तुम पर भी और उन गिरोहों पर भी जो
13:44तुम्हारे साथ हैं। हजरत नूह अल सलाम और
13:48उनके बा ईमान साथी कश्ती से बाहर आए। जमीन
13:51बिल्कुल नए सिरे से वजूद में आई थी। हर
13:54तरफ सन्नाटा था। मगर यह सन्नाटा शर्क और
13:59जुल्म के खात्मे और तौहीद की फतेह का
14:02सन्नाटा था। हजरत नूह अल सलाम ने शुक्राने
14:05के सजदे किए। और एक नए मुआशरे की बुनियाद
14:08रखी। जहां सिर्फ और सिर्फ एक सच्चे खुदा
14:12की इबादत होती थी। इसीलिए हजरत नूह अल
14:15सलाम को आदम सानी यानी दूसरा आदम भी कहा
14:19जाता है। क्योंकि उनके बाद आने वाली तमाम
14:22इंसानी नस्लें उन्हीं के जरिए आगे बढ़ी।
14:26इस अजीम तारीखी वाक्य को सुनने के बाद हर
14:29एक शख्स को अपने गिरेबान में झांकना
14:31चाहिए। हजरत नूह अल सलाम की दास्तान हमें
14:34यह सबक देती है कि जब पूरी दुनिया
14:36तुम्हारे खिलाफ खड़ी हो जाए। जब हर रास्ता
14:39बंद नजर आए। जब लोग तुम्हारे दीन,
14:42तुम्हारे सजदों और तुम्हारी सच्चाई का
14:44मजाक उड़ाने लगे तो घबराना नहीं। हजरत नूह
14:48अल सलाम के पास कोई फौज नहीं थी। कोई
14:50हथियार नहीं थे। कोई माली दौलत नहीं थी।
14:53उनके पास सिर्फ एक चीज थी। अल्लाह की जात
14:57पर अटूट और पुख्ता यकीन। उन्होंने
15:00रेगिस्तान में कश्ती बनाई क्योंकि उनका
15:02यकीन कश्ती पर नहीं अल्लाह के हुक्म पर
15:05था। कश्ती तो सिर्फ लकड़ी के टुकड़े थी।
15:08असल हिफाजत करने वाला तो अर्श का मालिक
15:10था। आज हम और आप छोटी-छोटी परेशानियों पर
15:14टूट जाते हैं। माली तंगी आती है तो हिम्मत
15:17हार जाते हैं। बीमारी आती है तो शिकवा
15:20करने लगते हैं। दुनिया की तकलीफ आती है तो
15:23मायूस हो जाते हैं। मगर याद रखो जो जात
15:26हजरत नूह अल सलाम को पहाड़ जैसी दहशतनाक
15:30लहरों से बचा सकती है। जो जात आग उबलने
15:33वाले तन्नूर से पानी निकाल सकती है। जो
15:35जात सूखी जमीन पर कश्ती चला सकती है। क्या
15:39वह जात तुम्हारी छोटी सी मुश्किल को हल
15:41नहीं कर सकती? बेशक कर सकती है। शर्त
15:45सिर्फ यह है कि हमारा ईमान उस दर्जे का
15:48हो। अल्लाह पर से अपना भरोसा कभी मत
15:51छोड़ना। दुनिया चाहे कितनी [संगीत] ही
15:53बड़ी तूफान बनकर तुम्हारे सामने खड़ी हो
15:55जाए अगर तुम्हारा हाथ अल्लाह की रस्सी को
15:58[संगीत] थामे हुए है तो दुनिया की कोई
16:01ताकत तुम्हें डूबा नहीं सकती। और अगर
16:03अल्लाह का दामन छूट गया तो चाहे तुम कनान
16:06की तरह दुनिया के सबसे ऊंचे पहाड़ों पर भी
16:09चढ़ जाओ हलाकत से तुम्हें कोई बचा नहीं
16:12सकेगा। नजात दौलत में नहीं नजात ताकत में
16:16नहीं। नजात सिर्फ और सिर्फ अल्लाह के दीन,
16:19तौहीद और उसके रसूल की इतात में है। अपने
16:24रब की तरफ पलटो। उसी से लॉ लगाओ। और अपने
16:27दिल में यह यकीन पुख्ता कर लो के वकल
16:32अल्लाह फ हसब और जो शख्स अल्लाह पर भरोसा
16:37करता है अल्लाह उसके लिए काफी