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Allah Se Dil Lagao | Duniya Aur Aakhirat Ki Kamyabi | Dr. Israr Ahmed Bayan

Truth Voice · 10,938 words · 50 min read

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| Dil aur mohabbat ka ta’aruf

0:00अशद

0:03मुद

0:05रसूल

0:12अल्लाह के साथ जितना गहरा ताल्लुक होगा

0:15उतना ही आप अल्लाह के लिए फाका झेल सकेंगे

0:19उतना ही आप अल्लाह के दीन के लिए कुर्बान

0:21दे सकेंगे इसको यूं समझिए कि इश्क मजा जो

0:25है दुनिया का इश्क उस पर इसको कयास कर

0:28लीजिए किसी को किसी मजनू को किसी लैला से

0:31जिस दर्जे का इश्क होगा उसी दर्जे की

0:33कुर्बानियां वो देगा उसी दर्जे की

0:36मुश्किलात झेलेगा उसी में हो सकता है कि

0:38वो जोशी का किस्सा है वो इंसान जो है अपनी

0:42जान को काम कर देगा इसलिए कि इश्क पर सारा

0:46दारो बदार है जिससे कलबी लगाव है उसके लिए

0:49आप मसाइब झेलेंगे जिससे मोहब्बत है उसके

0:52लिए तकलीफें बर्दाश्त करें हमारे यहां

0:54कितने हैं आप खुद अपने गरीबानों में

0:57झांकिए अपने सीने पर हाथ रखिए आपको औलाद

1:00से मोहब्बत है। उस औलाद के लिए आप क्या

1:02कुछ नहीं करते? कितने पापड़ नहीं बेचते?

1:04वरना एक आदमी को अपने दो वक्त की रोटी के

1:07लिए कितनी मेहनत की जरूरत है। वो सारी

1:10मेहनत मुशकत जो कर रहा है सुबह से लेकर

1:12शाम तक की कब्र तोड़ देने वाली मेहनत

1:14किसके लिए कर रहा है? औलाद के लिए कर रहा

1:15है। इसलिए कि औलाद से मोहब्बत और आपको ऐसे

1:19लोग मिल जाएंगे जो गोया कि कुल्लियतन अपने

1:22वजूद को औलाद की शख्सियत में गुम कर देते

1:24हैं। इसलिए कि उनका और हायर आइडियल जिंदगी

1:27में है ही नहीं।

1:29जीना मरना इन सलाद

1:33उनकी नमाज उनकी कुर्बानी उनका जीना उनका

1:36मरना उनकी भागदौड़ उनकी स जो सब की सब

1:38औलाद के लिए तो जिससे ताल्लुक खातिर होगा

1:42जिससे मोहब्बत होगी उसी के लिए आप

1:45कुर्बानी करेंगे उसी लिए आप मेहनत करेंगे

1:47अब जाहिर बात है कि दीन के लिए कुर्बानी

1:50दीन के लिए दीन के लिए ईसार दीन के लिए

1:54दीन के लिए दुनिया का नुकसान बर्दाश्त

1:56करना तभी मुमकिन होगा जब के अल्लाह से

1:59मोहब्बत। अल्लाह से आपका ताल्लुक मजबूती

2:02के साथ कायम। ये अल्लाह के साथ ताल्लुक को

2:05मजबूती से कायम रखने के लिए दो चीजें बताई

2:07गई। बल्कि पहले एक चीज समझ लीजिए वो है

2:09जिक्र। अल्लाह की याद। यह जिक्र जो है यह

2:14है कि जो आपका ताल्लुक अल्लाह से बढ़ाता

2:16है। इससे उसके साथ ताल्लुक जो है वो उस

2:20होता है। ताजा रहता है। अगर कहीं उसके ऊपर

2:23गर्दो गुबार आ जाए दुनिया की मशूफियात और

2:26मशूलियतों की वजह से दुनिया के सदमों की

2:29वजह से दुनिया की मुसीबतों की वजह से तो

2:32जब अल्लाह को आप याद करते हैं तो वो ऐसे

2:34है जैसे कि फिर आपने वो गर्दोगबार झटक

2:37दिया और आपके दिल के अंदर फिर अल्लाह की

2:39मोहब्बत जो है वो अस्सरे नो जागुजी हो गई।

2:42वो फिर उसके अंदर से चमक उठी। ये जिक्र है

2:46असल में कि जो बंदा मोमिन का सबसे बड़ा

2:49हथियार है। इसको सबसे ज्यादा कुत अता करने

2:53वाली चीज अल्लाह का जिक्र है। लेकिन जिक्र

2:56के बारे में अब चंद चीजें मैं अर्ज

2:58करूंगा। इससे पहले ये मजामीन कभी नहीं आए

3:00हैं इन महफिलों में। जरा तवज्जो से इसको

3:02सुनिए। हमारे यहां जिक्र के बारे में बड़े

3:05मुालते हैं। इसलिए कि सबसे पहला मालता तो

3:09यह है कि जिक्र और जरिया जिक्र इन दोनों

3:12चीजों को गमट कर दिया गया है।

3:14जिक्र और है जरिया जिक्र और जिक्र क्या

3:18है? इस्तजारुल्लाह बिल कल। जिक्र असल में

3:23है अल्लाह को दिल में मौजूद रखना। अल्लाह

3:25को दिल यहां उसकी याद या उसकी मोहब्बत या

3:29उसके साथ लगाव और तालुक को कायम। इस्तेदार

3:33कल अब जिस चीज को हम जिक्र कहते हैं वो

3:36जरिया जिक्र है। मैं बैठकर अगर कह रहा हूं

3:39सुभान अल्लाह सुभान अल्लाह सुभान [संगीत]

3:41अल्लाह सुभान अल्लाह। ये जरिया जिक्र है

3:43जिक्र नहीं है। अब अगर ये आप सुभान अल्लाह

3:46की तस्बी तो कर रहे हैं। लेकिन दिमाग आपका

3:49चक्कर लगा रहा है अपने कारोबार में। आपने

3:52कोई कोई प्रॉब्लम था दुकान से उठकर आए हैं

3:55और लेहन आपका उसी उसी प्रॉब्लम को हल करने

3:58में लगा हुआ है। तो चाहे तस्बी आपने पूरी

4:01कर ली तो जिक्र का ये जरिया तो आपने

4:04इख्तियार किया जिक्र आपको हासिल नहीं हुआ।

4:06इसी तरीके से नमाज़ क्या है? जरिया जिक्र

4:09है। [संगीत] सूर ताहा की बड़ी प्यारी आयत

4:12है वो। और वो इब्तदाई वहियों में से है जो

4:15बल्कि पहली वही जो हजरत मूसा अल सलाम पर

4:17हुई। उसमें अल्फाज़ आते हैं सलात जिक्री

4:22नमाज को कायम करो मेरी याद के लिए मकसूद

4:26क्या है जिक्र इस्तजार्लाह कल उसका एक

4:29जरिया ये नमाज़ है कि आप अपने धंधों में

4:32लगे हुए थे अजान की आवाज आई फौरन उठे वज़ू

4:35किया आप मस्जिद की तरफ चल पड़े वहां गए आप

4:38खड़े हुए नमाज़ में और आपने सूर फातिहा जो

4:41यूं समझिए के पूरे कुरान मजीद का लुबे

4:44लुबाब है उसका निचोड़ है उसका खुलासा है

4:47उसको आपने हर रकत के अंदर पढ़ा या सुना।

4:50अगर आप इमाम के साथ है इमाम खरात कर रहा

4:52है। आप सुन रहे हैं। अगर आप अलेधा पढ़ रहे

4:55हैं तो आप खुद पढ़ रहे हैं तो आपने पढ़ा

4:58या सुना और इसका नतीजा क्या निकला कि ताजा

5:01हो गया वो आपका ताल्लुक अल्लाह के साथ है।

5:04जो गर्दो गुबार आ गया था। ये चार घंटे 6

5:07घंटे आप दुकान पर बैठे रहे। सुबह 8:00 बजे

5:10आ गए। दिन के 1:00 बजे तक ना मालूम कितने

5:12ग्राहक आए। क्या-क्या गुफ्तगूं हुई। अब ये

5:15भी जो आपके शूर के ऊपर एक गर्दा पड़ गया।

5:18अल्लाह के साथ ताल्लुक के अंदर कुछ कमजोरी

5:20वाकई भी है। इसको ताजा करना। मुझे हफीज

5:23जालंधरी का ये शेर बहुत पसंद है। बड़ा

5:25प्यारा शेर ऐसा नक्शा खींचा है कि सरकशी

5:29ने दिए धुंधले नुकशे बंदई। आओ सजदे में

5:33गिरे। लौहे जमी ताजा करें। ये लोहे जमी पर

5:37हमारा लिखा हुआ है ना कि हम बंदे हैं

5:38अल्लाह के। हम आका नहीं है। हम अपने वजूद

5:42के मुख्तार और मालिक नहीं है कि जो चाहे

5:44करें। हम तो हमारा आका वो है हम उसके बंदे

5:47हैं। लेकिन होता क्या है? मैं तो यहां

5:49अर्ज कर रहा हूं कि खारजी असरात जो है कि

5:52आप कारोबार में लगे रहे। किसी और धंधे में

5:54लगे रहे। डॉक्टर है, मरीजों को देख रहा

5:57है। कोई बच्चा चिल्ला रहा है। कोई औरत जो

6:00है वो अपने बच्चे को चुप करा रही है।

6:01क्लनिक के अंदर एक तूफान मचा हुआ है। ये

6:04पांच घंटे जो इस कैफियत में गुजरे हैं और

6:06इससे जरा उस ताल्लुक में अल्लाह के अंदर

6:08कमी आई। अब आओ के उसको ताजा कर ले। यहां

6:12हफीज ने बल्कि दूसरी बात की तरफ तवज्जो

6:14दिलाई। खुद हमारे अंदर से जो उबाल उठता

6:17रहता है नफसानियत का और अपने तकब्बुर का

6:20और शैतान जो फूंके मारता रहता है हमारे

6:22दिल में उससे भी वो बंदगी का नक्श है वो

6:25मध्यम पड़ जाता है तो खारजी असरात हो या

6:28दाखली असरात हो उनसे अगर वो अहदे बंदगी जो

6:31है जो हमारी पेशानी पर नक्श था वो कुछ

6:34मध्यम पड़ गया तो आओ कि सजदे में गिरे

6:37ताकि हमारी जमीन जब जमीन पर टिके अल्लाह

6:40के सामने तो हमारा वो गर्दोगबार ऊपर से हट

6:42जाए और अल्लाह की बंदगी का वो नक्श ताजा

6:45हो जाए तो सरकशी ने कर दिए धुंधले नुकशे

6:48बंदगी आओ सजदे में गिरे नौहे जमी ताजा तो

6:53नमाज़ भी जिक्र का जरिया है आपने बात समझ

6:56ली अब अगर एक शख्स नमाज़ अदा कर रहा है

6:58फर्ज कीजिए कि उसने 17 रकातें जो है वो

7:00इशा की पढ़ ली पूरी 17 गिनकर चार पहली

7:04सुन्नतें भी फिर चार फर्ज भी बा जमात अदा

7:06किए फिर दो सुन्नतें नफल वितर फिर नफल सब

7:10कर लिए लेकिन दिमाग कमी किसी वादी में

7:13फीुल यही मून

7:15कहीं किसी ख्याल में कहीं किसी चक्कर में

7:17वो आपको अगर हुजूर कलब हासिल नहीं हुआ तो

7:21जिक्र हासिल नहीं हुआ इसके ये माने नहीं

7:24कि नमाज़ बेकार गई। ये है बिल्कुल मुनकरीन

7:26सुन्नत और मुनकरीन हदीस इस इंतहा तक बात

7:29को ले जाते हैं। आपके नमाज़ जा नहीं जाएगी।

7:32इसलिए कि आपने जो ये मुशकत झेली है इशा की

7:35नमाज़ है। इस वक्त तो आपका जिस्म थका हुआ

7:38था। जिस्म जो अंदर से तकाजा कर रहा था कि

7:41जाओ लेट जाओ आराम करो। या मुमकिन है कि यह

7:44तकाजा हो रहा हो कि आज फला ड्रामा आ रहा

7:45है टेलीविजन पे चलो बैठो उसको देखो उस

7:48वक्त अगर आप इन तमाम चीजों से मुंह मोड़

7:51कर आए मस्जिद में आपने हाजिरी दी 17 रकत

7:54आपने अदा की अल्लाह जालिम नहीं है कि आपकी

7:57इस मुशक्कत को वो अनरिवार्डेड रहने दे

8:00उसकी हुजरत मिलेगी उसका अजर मिलेगा उसका

8:02सवाब मिलेगा आपने फर्ज समझा तो आए ना

8:06अल्लाह ताला की तरफ के जनाब में आपने अपने

8:08ईमान का एक सबूत तो फराम किया ना कि मुझे

8:11मैंने समझा है कि ये नमाज़ फर्ज [संगीत]

8:13है। लिहाजा मैं यहां हाज़िर हुआ। इसलिए ये

8:15ना समझिए कि ये नमाज़ जाएगी। जाय नहीं

8:18जाएगी। फज़ अदा हो गया। उसका अजो सवाब आपको

8:21मिलेगा। लेकिन ये कि जो असल मकसद है वो

8:24हासिल नहीं होगा। वो जिक्र जो इसका असल

8:26मकसद था वो हासिल नहीं होगा। अगर हुजूर

8:29कलब नहीं है। अगर आपने ये महसूस नहीं किया

8:32जैसे कि हुजूर ने फरमाया सल्ला अल वसल्लम

8:35कि जब नमाज में सजदा के लिए जब पेशानी

8:38जमीन पर टिकाओ तो यूं महसूस करो कि गोया

8:40कि तुमने अपने रब के कदमों पे सर रख दिया।

8:43अब ये कैफियत अगर किसी को हासिल हो रही

8:45हो। जब वो खड़ा हो अल्लाह के हुजूर में तो

8:48ऐसे खड़ा हो कि जैसे वाकतन अल्लाह मुझे

8:51देख रहा है। कम से कम इस दर्जे का

8:53इस्तेदार हासिल हो जाए कि मैं अल्लाह के

8:55हुजूर में इस वक्त हाजिर हूं। जैसे हुजूर

8:57ने फरमाया सलास

| Duniya ki muhabbat ka nuqsaan

9:01जब नमाज पढ़ने खड़े हो तो यह समझ कर पढ़ो

9:04कि शायद ये जिंदगी की आखरी नमाज हो फिर

9:06शायद नमाज की नौबत ना आए। क्या पता किसके

9:08पास गारंटी है कि ईशा की नमाज पढ़कर आप

9:11निकले या फजर की नमाज़ पढ़कर आप मस्जिद से

9:13निकले और कोई तेज रफ्तार गाड़ी आपको रौती

9:15कुचलती हुई चली जाए और वापस जो है वो आपकी

9:18लाश पहुंचे घर। आप जिंदा साब ना पहुंच

9:20सके। तो हर नमाज से पहले अगर इंसान यह

9:22महसूस करे जैसे कि हुजूर ने फरमाया किस

9:24कदर ये प्रैक्टिकल एक साइकोलॉजिकल

9:27नफसियाती जो है तालीम है कि जब भी नमाज

9:30पढ़ने खड़े हो तो ये समझ कर पढ़ो कि शायद

9:32ये जिंदगी की आखरी नमाज़ है और ऐन मुमकिन

9:35है कि इसके बाद नमाज़ का वक्त ना आए। तो ये

9:37कैफियत आप सोचिए कि अगर हासिल हो नमाज़ में

9:40तो फिर वो नमाज़ क्या होगी? वो नमाज़ वो

9:42होगी जिसे हुजूर ने फरमाया के असलात

9:46मेराजु मोमिनीन ये नमाज़ अहले ईमान के हक

9:49में मेराज के दर्जे में इसमें हम कलाम

9:52होते हैं आप अल्लाह से जैसे कि हुजूर हम

9:54कलाम हुए मेराज अल्लाह ताला के साथ तो ये

9:57नमाज का जरिया अब मैं एक बात कह रहा हूं

10:00तीसरे नंबर पर ये सुभान अल्लाह सुभान

10:03अल्लाह सुभान अल्लाह ये भी जिक्र का जरिया

10:06[संगीत] नमाज पढ़ते हैं आप ये भी जिक्र का

10:08जरिया है अलबत्ता एक चीज वो है

10:12के जो मुजस्सम जिक्र है जिक्र का जरिया

10:15नहीं जिक्र मुजस्सम जिक्र कुरान मजीद ने अ

10:18जिक्र का लफज़ किसके लिए इस्तेमाल किया

10:20इल्म के पूछे ये आयत आपने बार सुनी होगी

10:24के इन

10:27हाफ हमने ही इस अ जिक्र को नाज़िल किया है

10:31दी रिमेंबेंस इज़ कुरान कुरान है ये जो अ

10:35जिक्र है सरापा जिक्र है हमतन जिक्र

10:39लिहाजा जिक्र जो है अब मैंने

10:41जहां से आम तौर पर जिक्र का इतलाक होता था

10:44उससे मैं रिवर्स ऑर्डर में लेकर आया कि ये

10:46तो मालूम है कि सुभान अल्लाह सुभान अल्लाह

10:48की तस्बीह करना ये जिक्र है लेकिन नमाज के

10:51बारे में शायद ये सामने ना हो कि ये जिक्र

10:54का जाम तरीन जरिया है और उससे आगे ये

10:57चैनों से ओझल हो चुकी है कि कुल जिक्र

11:00हमतन जिक्र मुजसम जिक्र असरता जिक्र वो

11:04कुरान मजीद है अब इस आयत में आप देखिए वो

11:07उस ऑर्डर में बात आई उतल

11:10किताब सबसे पहले जो सबसे अहम हिस्सा है

11:14जिक्र का उससे यहां बात शुरू की गई। कुरान

11:17की तिलावत से बड़ा जिक्र और कोई नहीं।

11:20कुरान की तिलावत दुआ के बारे में फरमाया

11:22गया है दुआ इबा दुआ इबादा दुआ जो है वो

11:27इबादत का जोहर है निचोड़ है लेकिन हुजूर ने

11:30फरमाया कि जिस शख्स को कुरान मजीद की

11:34तिलावत ने दुआ से रोके रखा उस शख्स को

11:38अल्लाह ताला दुआ करने वालों से बहुत

11:40ज्यादा अता फरमाया यानी उसे दुआ नहीं

11:43बल्कि वो कुरान मजीद ही की तिलावत में लगा

11:45हुआ है दुआ की तरफ तवज्जो नहीं हुई अब जो

11:48मांगने वाले हैं दुआ दुआ करने वाले हैं जो

11:50कुछ अल्लाह ताला उन्हें अता फरमाएगा उनसे

11:52कहीं बढ़कर उन्हें देगा कि जो मशगूल रहे

11:55तिलावत कुरान तो सबसे बड़ा जिक्र कुरान है

11:58जो मुजस्सम जिक्र है जिसके लिए बतरे आलम

12:02ये लफज़ आया है अ जिक्र ये गोया कि प्रॉपर

12:05नाउन है उसके लिए अिक्र इनिक्रास

12:16ऐ नबी ये जिक्र हमने आपकी तरफ इसलिए नाजिल

12:19किया कि जो चीज हमने लोगों के लिए उतारी

12:21है उसको आप उन पर वाज़ करें। इसकी तबहीन

12:24फरमाए इसकी तौहीन फरमाएं। अपने कॉल से

12:27अपने अमल से इसकी वजाहत करें। वहां भी लफज़

12:30अ जिक्र आया कुरान के लिए और ये मुतद आयात

12:32और भी लेकिन अब वक्त नहीं है कि मैं उन

12:34सबको कोट करूं। तो अब जिक्र को यूं समझिए।

12:37आज इस मौजू पर पूरे तौर पर इसका इहााता

12:40करके उठिए। एक बात तो हमें यहां से मालूम

12:43हो गई कि विक्रुल्लाह अकबर यकीनन अल्लाह

12:46का जिक्र सबसे बड़ी श है। बहुत बड़ी शय

12:49नहीं अकबर है अफल तसील सबसे बड़ी श इस राह

12:53में सब्र के लिए इस राह में इस्तकामत के

12:56लिए इस राह में पामर्दी के लिए अल्लाह के

12:59दीन के लिए ईसार और कुर्बानी करे इंसान और

13:02दिल पशुदा ना हो बल्कि और खुशी हो और उसके

13:06अंदर जो है उसका उसके दिल की कली खिलती

13:09चली जाए कि अल्लाह की राह में ये तकलीफ भी

13:11आई ज़हे नसीब कि अल्लाह ने हमें इस काबिल

13:14समझा कि हमें अपनी राह में इस तकलीफ के

13:16लिए मुंतखब कर लिया अल्लाह की राह में

13:19मुझे ये जला कटा फिकरा भी सुनना पड़ा ज़ह

13:22नसीब के अल्लाह ताला ने हमें इस खाब समझा

13:25कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलह वसल्लम को अगर

13:27जले कुछ कटे कटी बात सुननी पड़ी तो हमें भी

13:30उसका कोई अ उसका कोई हिस्सा हमें भी नसीब

13:33तो बजाय इसके किसे दिल पशब्दुर्दा हो दिल

13:36की खिले वो है वला जिक्रुल्लाह अकबर इसमें

13:40सबसे बड़ी चीज कि जिससे इंसान को मदद

13:42मिलेगी वो अल्लाह का जिक्र लेकिन अल्लाह

13:45के जिक्र के बारे में जो बातें मैंने अ

13:47नंबर एक ये कि जिक्र अलेदा है जरिया जिक्र

13:50अधा है जिक्र है इस्लाह फ़ कल उसके लिए जो

13:54जरा इ्तियार किए जाएंगे अब उनमें जब मैं

13:57ऊपर से चलूंगा नजूली तरतीब सबसे ऊपर क्या

14:01है तिलावत कुरान उत

14:05कुरान अ जिक्र है लिहाजा उसकी तिलावत सबसे

14:09बड़ा जरिया जिक्र होगा सबसे अहम सबसे

14:12मुकद्दम सबसे पहला जरिया जिक्र तिलावत पाक

14:15उत

14:16किताब नंबर दो पर है नमाज़। नमाज़ जो है

14:20उसके बारे में मैं ये अर्ज कर दूं कि ये

14:22जामे तरीन जरिया जिक्र है। मुकद्दम तरीन

14:26वो है कुरान की तिलावत। अहम तरीन है कुरान

14:30की तिलावत। लेकिन जामे तरीन ये है। वो किस

14:33लिए कह रहा हूं? इसमें देखिए चार चीजें

14:36जमा कर दी गई हैं। नंबर एक इसमें जिक्र

14:40कौली भी है, जिक्र अमली भी है। आप पढ़ भी

14:44रहे हैं सूर फातिहा जबान से भी कह रहे हैं

14:47सुभान रब्ब अज़म। सुबह आप जबान से भी कह

14:50रहे हैं अल्लाहू अकबर और रुकू में भी जा

14:52रहे हैं। अल्लाहू अकबर कह के जब आप गए

14:55रुकू में तो आपने अपने वजूद से भी जिक्र

14:58किया। अपने वजूद से भी गोया कि जाहिर किया

15:01कि आप अल्लाह की बाई के कायल हैं कि आप

15:03उसके सामने रूह में आ गए। फिर आपके में

15:06गिरे हैं तो गोया कि आपने अपने पूरे वजूद

15:08से जाहिर किया कि आपके ज़हन में आपके कल्ब

15:11और अल्लाह की अजमत का नक्श इतना गहरा है

15:14कि आपने अपनी पेशानी से कदम मालूम ये हुआ

15:17कि ये जिक्र कौली भी है और जिक्र अमली भी

15:20शामिल है। जैसे साइंस की तालीम होती है

15:23क्लास रूम में लेक्चर होते हैं और फिर

15:24जाकर लेबोरेटरी पे एक्सपेरिमेंटेशन होती

15:27है। ये दोनों चीजें जब जमा हो जाती है तब

15:30वो बात रास हो जाती है। जो जिक्र औली और

15:33जिक्र अमली और नंबर दो जिक्र औली पे भी।

15:36अब यह मैं अब एक इलादा खुद इजाद करके आपके

15:39सामने रख रहा हूं। एक है एक्टिव जिक्र और

15:43एक है पैसिव जिक्र। एक्टिव जिक्र क्या है?

15:46जिसमें खिताब होता है अल्लाह के साथ।

15:48जिसमें कि अल्लामा इकबाल ने मीनिंग ऑफ

15:50प्रेयर। ये इन पर इनका एक लेक्चर है। वो

15:53जो उनके सात लेक्चर्स हैं तबाहशुदा।

15:55रिकंस्ट्रक्शन ऑफ़ थॉट इन इस्लाम। उसमें एक

15:57मीनिंग ऑफ़ प्रेयर इन इस्लाम। इस्लाम में

16:00दुआ और नमाज का मकाम क्या है? उसका मफूम

16:03क्या है? बड़ी प्यारी बात एक ये कही है कि

16:06इंसान जब दुआ करता है अल्लाह से तो इसमें

16:09वो अनाए सगीर अनाए कबीर के बिल्कुल सामने

16:13आ जाती है। एक तो ये है कि आप जुमला

16:16खबरिया की शक्ल में अल्लाहू अकबर। अल्लाहू

16:19अकबर अल्लाहू अकबर। आपने 34 मर्तबा कहा।

16:21अल्लाह सबसे बड़ा है। अल्लाह सबसे बड़ा

16:23है। अल्लाह सबसे बड़ा है। ये गायब के सीने

16:26में बात हो रही है। इसमें खिताब नहीं है।

16:29इसलिए मैं इसको कहता हूं पैसिव जिक्र और

16:32एक एक्टिव जिक्र है जिसमें आप अल्लाह से

16:34हम कलाम होते हैं। इकन

16:38सिरात मुस्तकीम। ये क्या है? इसमें आप

16:41अल्लाह से हम कलाम। यहां आपकी वो अनाए सगी

16:45डिफाइनाइट ईगो वो बिल्कुल इनफाइनाइट ईगो

16:48के सामने आकर उससे खिताब कर रही है। तो

16:51अफलाक से आता है नालों का जवाब आखिर उठते

16:54हैं हिजाब आखिर करते हैं खिताब आखिर तो ये

16:57जो खिताब वाला अंदाज है नमाज में आपको ये

17:00भी मिलेगा सूर फातिहा का अहम तरीन हिस्सा

17:03यही है शुरू में जो है गायबाना अंदाज में

17:06आप कहते हैं अल्हम्दुलिल्लाह रब आलमीन अर

17:08रहमान रहीम मालिक यमद्दीन ये गायबाना

17:11अंदाज है ये जुमला खबरिया है लेकिन यहां

17:14इकन

17:16अब यहां खिताब हो गया अब आप अल्लाह से बरा

17:19हम कलाम है तो नमाज में मैंने अ किया कि

17:23जिक्र कौली और जिक्र अली जमा हो गए और

17:26जिक्र कौली में ये भी कि खिताब वाला जिक्र

17:30जिसमें अल्लाह से हम कलाम हो और एक ये कि

17:32गायबाना अंदाज में अल्लाह की तस्बीर

17:35अल्लाह की दहलील अल्लाह की तकबीर आप हर

17:38मर्तबा जब उठ रहे हैं अल्लाहू अकबर अब ये

17:41क्या है ये भी जिक्र है तो मालूम हुआ कि

17:44जिक्र का अहम तरीन मुकद्दम तरीन जरिया

17:47तिलावत प्राप्त जिक्र का जामेरी जरिया

17:51नमाज़ उत

17:54सला इन सलात तनशा

17:58मुकर यकीनन नमाज़ रोकती है फशा से और मुन

18:02से अब यहां पे थोड़ी सी बात करूंगा इस वक्त

18:04मेरी आज की गुफ्तगू के इतबार से ये बात

18:06जिमनी होगी इसलिए के काफी दूर तक पहुंचना

18:09है हमें ये आम तौर पर लोगों के ज़हन में

18:11रहता है कि साहब ये नमाज़ हम पढ़ते हैं

18:13लेकिन नमाज के साथ लोग 420 भी करते हैं

18:16नमाज भी पढ़ते हैं झूठ भी बोलते हैं नमाज

18:18भी पढ़ते हैं ब्लैक मार्केटिंग भी करते

18:20हैं। नमाज़ भी पढ़ते हैं। ये भी करते हैं।

18:21ये है हमारे माशरा माशरे का और नौजवान

18:25नस्ल में जो इबा और जो बगावत पैदा हुई है

18:28दीन से। मैं बरबला ये कहता हूं कि ये उन

18:31मजहबी लोगों का रद्दे अमल भी है जिन्हें

18:34वो अपनी आंखों से देखते हैं। कि हमारे

18:36अब्बा जान नमाज में तो बड़े पक्के हैं

18:38लेकिन उतने ही पक्के जो है वो दुकान पर

18:40झूठ बोलने में भी। जाहिर बात है कि बेटे

18:42से तो छुपी हुई बात नहीं। आप किसी से छुपा

18:45लेंगे। आपकी बीवी से तो आपकी कमजोरियां जो

18:47है वो छुपी हुई नहीं है। आपके घर वालों से

18:49आपकी औलाद से तो छुपी हुई नहीं है कि नमाज

18:52में भी पढ़े पक्के हैं, झूठ बोलने भी

18:53पक्के जाहिर बात है कि उसका तो उसकी तबीयत

18:56नौजवान जो है उसका मामला ये होता है कि वो

19:00इन चीजों पर गौर करता है। चाहे अगर

19:02सहादतमंद है आपके सामने बोलता नहीं लेकिन

19:04आप देख तो रहा है। उसका एक असर कबूल करता

19:06है। और वो समझता है कि नमाज में का फायदा

19:08क्या है इसका? अगर नज के साथ ये भी है अगर

19:11नमाज के साथ संग दिली भी है एक गरीब आदमी

19:14को देखकर आपका दिल नहीं पसीजा नौजवान जो

19:18है इसका भी तासुर कबूल करता है के हमारे

19:20अब्बा जान के पास कितनी कुछ दौलत है और

19:23इसने अपने एक दुकान के मुलाजिम के साथ

19:24क्या शुरू किया इसने उसकी बीवी बीमार थी

19:27उसे कुछ कर जरूरत थी और अब्बा जान ने किस

19:30तरीके से डांट दिया धुतकार दिया ये नौजवान

19:32जो ज़हन है ये इन चीजों को देखता है और

19:34उनसे इम्रेशन लेता उससे तासुर लेता है तो

19:37ये मसला हमारे यहां के जिंदा मसलों में से

19:39कि क्या वजह है कि हमारी नमाज़ें जो है बेस

19:41क्यों हो गई? कुरान दावे से कह रहा है कि

19:44नमाज़ तो फस और बेहयाई के मुंह से रोकती

19:47है। जबकि ऐसे लोग हमें नजर आते हैं माशरे

19:49के अंदर कि नमाज में हो सकता है। मैंने

19:51मैसेज दिए हैं बाज औकात जब मैं अपने

19:54एमबीबीएस से फारग होकर ताजा गया था।

19:56मंडूरी जो अब सवाल कहलाता है। मैं वहां दो

20:00अशखास को देखा। एक वहां हाजी ब्लैकिया के

20:05नाम से मशहूर था।

20:06उसकी यह दाढ़ी थी लंबी और ना सिर्फ यह कि

20:10नमाज में 100% बल्कि वो खासा आसूदा हाल

20:14खाता पीता आदमी था। उसके पास डिपो थे और

20:17डिपो ही में ब्लैक होती थी। तो वो अजान भी

20:20खुद जाकर देता था। पांच वक्त की अजान वो

20:23शख्स देता था। यानी जहां तक इबादत का

20:25ताल्लुक है कि एक साहब साहवाल के बैठे हुए

20:27सर हिला रहे हैं। तो वो उनके ज़हन में वो

20:29साहब आ गए होंगे। लेकिन बहरहाल मैं किसी

20:31मुन शख्स को नहीं। मैं तो एक मिसाल के तौर

20:33पर आपसे कह रहा हूं कि ये हमारे माशरे के

20:35अंदर वो हाजी ब्लैकिया जो है वो नौजवान

20:38नस्ल पर अपने इस दीन का क्या असर कायम कर

20:41रहा है और इसके साथ ही बिल्कुल पैरेलल एक

20:43हाजी रिश्वत थे वहां वो इनकम टैक्स के

20:47अंदर वो इंस्पेक्टर थे उनकी भी दाढ़ी बहुत

20:50अवील और नमाजी बहुत के लेकिन वो खूब

20:53रिश्वत लेते थे खुद भी और रिश्वतें

20:55दिलवाते थे मरीजों को भी जाके जब वो किसी

20:58पार्टी का गला दबाते थे तो अपने लिए भी

21:00कुछ लेते थे और अल्लाह को नहीं भूलते थे।

21:02अल्लाह के घर के लिए भी चंदे ले लेते थे।

21:04ये है हमारे यहां की वो दीनदारी कि जिसकी

21:07वजह से वाकया ये है कि नौजवान नस्ल में

21:09अगर दीन से दूरी हुई है तो उसके कुछ असबाब

21:12है। बा सबाई हम आब्द ये हमारे अपने करतूत

21:16है कि जिसकी वजह से नौजवान नस्ल में बगावत

21:18पैदा हुई। वो क्यों है? वो इसी वजह से है

21:21कि ये नमाज़ रह गई रस्म अज़ान। रूहे बिलाली

21:25ना रही। पूरी जिंदगी के साथ इसकी कोई

21:28कोऑर्डिनेशन नहीं है। इसकी कोई मुताबिकत

21:31नहीं है। जिंदगी में जो कुछ उमंगे हैं,

21:33इरादे हैं, जो वैल्यूस है, वैल्यूस इन

21:36लाइफ उसका इस्तमास के साथ कोई ताल्लुक

21:38नहीं रहा। ये एक अपेंडिक्स है। ये एक जमी

21:41की हैसियत से इंसान की जिंदगी के अंदर अदा

21:43जुड़ी हुई शय है। इसका उसके असल सीरत से

21:45असल किरदार से। ये वजह है कि ये नमाज़ वो

21:49नमाज़ नहीं है। हमारा ये हज 3030 लाख अफराद

21:52हज कर रहे हो। लेकिन ये कि कोई दुनिया में

21:55उसका असर हमारे यहां से अगर 1 लाख अफराद

21:58हज करके आए तो कोई एक फीस दयानतदारी माशरे

| Allah se mohabbat ka Qurani tareeqa

22:02में हर साल अगर बढ़े उस 30 या 1 लाख आप

22:05अफराद के हज करने से तो आज 25 साल 40 साल

22:1040वा शुरू हो चुका है। 40% तो हमारे यहां

22:13दयानतदारी बढ़ती है और बदयानती घटती लेकिन

22:16नहीं मालूम होता है कि वह जो कुछ है वो सब

22:20है। नमाजों, रोजाओ, कुर्बानियों, हज ये सब

22:24बाकी है। तू बाकी नहीं है। वो बीच में जो

22:27रूह है वो निकल चुकी है। अब ये रिचुअल्स

22:29की शक्लें इख्तियार कर चुके हैं ये आमाल।

22:31ये वजह है वरना वाकया ये है कि बंदा मोमिन

22:34के लिए सबसे बड़ी तबार वो ये नमाज़ [संगीत]

22:38अल्लाह के साथ ताल्लुक कायम करने वाली

22:40सबसे बड़ी चीज नमाज़ उतम अच्छा जिक्र की बात

22:43कर रहा था मुकद्दम तरीन अहम तरीन जिक्र

22:46तिलावत नंबर दो नमाज़ नंबर तीन वो जो हुजूर

22:52सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से जो मसनून

22:56दुआएं देखिए ये है नंबर तीन पर अकार

22:59मसनूना और अदिया मस सुना इनमें ये है कि

23:03कोई एडिशनल टाइम आपको नहीं लगता। आप अगर

23:06कार में बैठ रहे हैं सवारी पर सवार होने

23:09की दुआ है। उतर रहे हैं इसकी दुआ है। सुबह

23:13सुबह उठे हैं दुआ है। आप बैतुल खला में

23:16दाखिल हो रहे हैं। दुआ है। [संगीत] बैतुल

23:18खला से बाहर निकले हैं। दुआ है। आप फिर अब

23:21उजू करने बैठे हैं। उजू के बाद फारग हुए।

23:24मस्जिद के लिए निकले घर से दुआ है। मस्जिद

23:27में दाखिल हुए दुआ है। मस्जिद में तो

23:29रहेंगे तो वो तो है ही नमाज। वो तो सराफा

23:31जिक्र है। वापस आएंगे फिर दुआ है। घर में

23:34दाखिल होंगे फिर दुआ है। [संगीत] बाजार के

23:37लिए निकलेंगे दुआ है। वापस आएंगे दुआ है।

23:39सफर पर जाएंगे दुआ है। वापस आएंगे दुआ है।

23:42यहां तक के आखरी बात अर्ज कर देता हूं। के

23:45आप ताल्लुक शौक करते हैं तो भी दुआ कोई

23:50अमल जिंदगी का ऐसा नहीं है जिसके लिए मसून

23:52दुआ आईना देखते हैं तो दुआ है कपड़े बदलते

23:55हैं तो दुआ है ये दुआ जब इंसान याद करके

23:58मांगता है तो इससे दो तीर एक तीर में दो

24:02शिकार होते हैं क्या कि एक तरफ तो दुआ में

24:05आप किससे खिताब कर रहे हैं अल्लाह से और

24:08दूसरा ये कि अल्फाज़ कौन से इस्तेमाल किए

24:10जो मनकूल है रसूल्लाह से सल्लल्लाहु अलैहि

24:13वसल्लम तो गोया के दो निस्बत कायम हो गई

24:17नमाज़ आप आपने अगर खाना खाया अलम्दुलिल्लाह

24:21सका

24:23किसका शुक्र अल्लाह का और किसके अल्फाज़

24:26हैं ये जो आप इस वक्त अदा कर रहे हैं

24:28मोहम्मद रसूल्लाह के तो गोया के ला इलाहा

24:31इल्लल्लाह और मोहम्मद रसूल्लाह दोनों

24:34निस्बतें जो हमारी है वो ताजा हो गई इस

24:36दुआ मसूरा से जो नंबर तीन में इसको रखिए

24:40पंजाब में वो बड़ा प्यारा जुमला है इसके

24:42लिए कि दुनिया का कोई कोई भी काम आप कर

24:45रहे हैं तो हथकार वल दिल यार वल दिल

24:49अल्लाह के साथ लगा रहे और हाथ कामों में

24:52मशगूल रहे। इकबाल ने हजरत फातिमा ज़हरा रज़

24:55अल्लाह ताला अन्हा के लिए जो अशार कहे हैं

24:57उसमें बड़े प्यारे अल्फाज़ आए हैं के आसिया

25:01गर्दा लब कुर सरा कि हजरत फातिमा रज़

25:05अल्लाह ताला अन्हा जब चक्की पीसती थी तो

25:09कुरान मजीद पढ़ती जाती थी। इसलिए कि चक्की

25:11पीसने में तो सिर्फ हाथ ही लगता है ना।

25:13मैंने खुद देखा है अपने एक बुजुर्ग मेरी

25:16रिश्ते में वो दादी बनती थी। मैंने यह

25:17नक्शा देखा है अपने बचपन में कि वो बैठी

25:21है और चक्की पीस रही है। और साथ ही ये है

25:23कि वो कुरान शरीफ पढ़ रही है। मालूम ये

25:26हुआ कि जाहिर बात है कि ये मुशकत जिस्मानी

25:28हो रही है ना उस वक्त आपका ज़हन फारिक है।

25:31उस वक्त आपकी जुबान फारग है। अगर उस वक्त

25:34आप तिलावत कुरान कर रहे हैं। तो गोया कि

25:36आपका कोई एडिशनल टाइम नहीं लगा। वो हाथ जो

25:39है चक्की पीसने में मशरूफ थे। लेकिन आपने

25:42ये जिक्र इलाही की नेमत जो है इजाफी तौर

25:44पर हासिल की। तो तीसरे नंबर पर नंबर एक

25:47कुरान तिलावत कुरान नंबर दो इकामत सलात

25:51नंबर तीन अजकार मसनूना और अदिया मासूरा वो

25:56जो जिक्र हुजूर ने बताया नमाज़ के बाद है

25:58ये 33 बार सुभान अल्लाह 33 बार

26:00अल्हम्दुलिल्लाह 34 बार अल्लाहू अकबर ये

26:02हुज़ूर का बताया तो जाहिर बात है हुज़ूर के

26:05बताए हुए अज़कार उनकी बहुत बड़ी कद्रो कीमत

26:08है बड़ी अहमियत है और वो दुआएं कि जो हुजूर

26:11से मनकूल है ये है और चौथे नंबर पर हमारे

26:15जो ये सलासिल है ये चिश्ती सिलसिला है ये

26:18कादिरिया सिलसिला है इन्होंने अपने अपने

26:21जमाने में लोगों की ज़हनियतों को सामने

26:24रखकर ये जो अकार जो उन्होंने मुद्बन किए

26:27कि ये सिलसिला जिक्र है चिश्तिया का ये

26:30जिक्र खफी है ये जिक्र जली है ये ये चौथे

26:33नंबर पर लाइए इसलिए कि वो लोग बहुत माहिर

26:37थे नफसियात के और उन्होंने अपने ज़माने में

26:39अगर मुफीद समझ कर वो तरीके मुदवन किए हैं

26:42तो ठीक है मुझे उनसे इलाफ नहीं लेकिन खुदा

26:46के लिए उन्हें चौथे नंबर पर रखिए। अगर

26:48उसको नंबर एक पर ले आए और असल जिक्र आपने

26:51उसी को समझा और तीनों मंजिलें जो है कूद

26:53के क्रॉस कर गए तो ये असल में रिवर्स हो

26:55जाएगा सारा रेशियो प्रोपोशन का मामला गलत

26:58हो जाएगा। नंबर एक पर कुरान, नंबर दो पर

27:01नमाज, नंबर तीन पर अकार मसनूना और अदिया

27:05मासूरा और नंबर चार पर अकारात वो कि जो

27:09मुख्तलिफ सिलसिलों में जो तसवुफ के या

27:11जिक्र के जो तरीके हैं उनमें जो भी तजवीज

27:13किए जाए अगर ये तरतीब रहेगी तो इंशा्लाह

27:17ताला उसकी तमाम बरकात जो है सही तौर पर

27:20बहरहाल यहां इस पूरी आयत का जो नतीजा

27:23निकला वो क्या है जो शख्स अल्लाह के दीन

27:26के लिए जिद्दोजहद में मेहनत में कशमकश में

27:29मुब्तला हो उसको जान लेना चाहिए कि इसमें

27:33सब्र और सबात के लिए असल चीज क्या है?

27:35अल्लाह के साथ ताल्लुक। अल्लाह के ताल्लुक

27:38के लिए क्या चीज है? अल्लाह का जिक्र।

27:40अल्लाह के जिक्र के लिए ये चार चीजें हैं।

27:42तिलावत कुरान इकामत सलात अदिया मासूरा

27:46असारे मस्तूना और जो इसके अलावा जिक्र आप

27:49किसी सिलसिले में मुसलिक हैं। तो जो आपके

27:51मुर्शिद ने आपके जो भी जिनसे आपने सिलसिला

27:54ताल्लुक कायम किया है जो जिक्र वो बता। अब

27:56आइए अगली आयत वजा

27:59किताब इलास

28:01इज़

28:04और मत झगड़ो अहले किताब से मगर बहुत ही

28:10उम्दा तरीके से उस तरीके से जो सबसे उम्दा

28:13हो इसलिए कि यहां भी अहसन है जैसे वहां

28:15अकबर है वुल्लाह अकबर अफल तफसील यहां भी

28:19अहसन जो आया है ये सुपरलेटिव डिग्री सबसे

28:22आला तरीके पर उनसे झगड़ो अभी मैं बताऊंगा

28:25ूंगा कि मुजादले का मतलब क्या है? इज़

28:30सिवाय उनके जो उनमें से जालिम हो जो जुल्म

28:34करें, तादी करें, दस्तरा करें। अब यहां

28:38बात समझ लीजिए तावील खास जो है उसके एतबार

28:43से ये हुकुम हो रहा है मुसलमानों को अहले

28:45किताब के में। इसलिए कि हुजूर सल्लल्लाहु

28:49अलह वसल्लम और सबा इकराम जब इस दीन की

28:52कशमकश में मु्तला थे दावत दे रहे थे। और

28:55उधर से रद्दे अमल हो रहा था। मुसीबत थी,

28:58मुश्किलात थी। तो अरब में दो तबके थे। एक

29:02वो उ मुशरिकन जो किसी नबी के नाम लेवा

29:06नहीं। कोई उनके पास किताब नहीं, कोई शरीयत

29:09नहीं। अगरचे हजरत इब्राहिम का नाम वो लेते

29:12थे। लेकिन वो भी जद्दे अमजद की हैसियत से

29:14कि हम उनकी नस्ल से। वो भी रसूल के होने

29:17की हैसियत से नहीं बल्कि एक नस्ली ताल्लुक

29:19तो उनका था हजरत इब्राहिम की औलाद से।

29:22दूसरा तबका था यह अहले किताब नसारा और

29:25यहूद यह कौन थे यह गोया के साबका मुसलमान

29:29उम्मत थी इसलिए कि ये तो किताबों के मानने

29:32वाले रसूलों के मानने वाले शरीयत के मानने

29:34वाले तो ये दो तबके हुए कि जो उस वक्त थे

29:37कि जिनसे नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि

29:39वसल्लम और सहाबा इकराम को साबका पेश आए।

29:42अब इनमें से जहां तक मुशरिकन का ताल्लुक

29:45है जाहिर बात है कि वो तो दलालम बईदा वाली

29:48बात है। बहुत दूर निकल गए। मुशरिक है

29:50बुतों को पूज रहे हैं। उनके यहां तो कोई

29:53भी खैर मौजूद है ही नहीं। लेकिन जहां तक

29:56इनले किताब का ताल्लुक है अगर अखलाकी तौर

29:59पर आपने उसकी सफाई की उनकी तरफ से एक और

30:02कोई हमला हो गया तो ये बहसो नजा जो है ये

30:04जिदाल है। अब इसमें जाहिर बात है कि जब आप

30:08दीन के गलबे की जिद्दोजहद कर रहे हैं तो

30:10आप ये नहीं कह सकते कि भाई किसी से कुछ ना

30:13कहो। किसी से मत उलझो। उलझना तो पड़ेगा।

30:16दीन गालिब कैसे होगा? इसलिए कि जो भी

30:18बाततिल के परश्तार हैं वो तो रास्ता रोक

30:20के खड़े हैं। वो तो ना यह चाहते हैं कि

30:23दीन का पैगाम आम हो। ना यह चाहते हैं कि

30:25कोई दीन की तरह पेशक करे। तो उलझना तो

30:28पड़ेगा। तसादुम तो होगा। वो तो नागुजीर

30:30है। ये जो बाज बड़े नेक तबाह लोग होते हैं

30:33कि साहब बस आप अपना काम कीजिए। किसी से

30:35उलझिए नहीं। मैं उनकी नेकी को तो दाद देता

30:38हूं। लेकिन ये मैं समझता हूं कि उनके

30:39सामने तसवुर ही नहीं है। इसलिए कि उनके

30:42सामने अगर वह हरकी तसवुर हो तो हरकी तसवुर

30:45में तो उलझना पड़ेगा। जो आपका रास्ता रोक

30:47कर खड़ा हो गया उसे आप हटाएंगे नहीं तो

30:49रास्ते कैसे चलेगा तो ठीक है आप अगर

30:51स्टेटस को वो मेंटेन करना चाहते हैं जैसे

30:53भी रहे मुशरा वैसे रहे तब तो आप किसी से

30:56ना उलझिए लेकिन ये कि अगर आपको इस माशरे

30:59को किसी रुख पर लेकर जाना है अगर आपको

31:02यहां अल्लाह के दीन को गालिब करना है तो

31:04जो भी रास्ते में आ रहा है उससे आपको

31:06दस्तो गरीबान होना पड़ेगा इसमें ये है कि

31:09वो नेकी जो है नेकी का एक तसवुर वो है वही

31:12कि जो उस स्टैटिक कासेप्ट ऑफ रिलजन के साथ

31:15जो है उसकी मुताबिकत है अपनी जाती जिंदगी

31:18में नमाज रोजा कर लो अल्लाह अल्लाह खैर से

31:20अल्लाह तब तो ये कि ना किसी से उलझना ना

31:22किसी के साथ बहस नजा वो अपने धंधे में लगा

31:25रहे तुम अपने धंधे में लगे रहो लेकिन अगर

31:27दीन की जिद्दोजहद करनी है तो आपको उनकी

31:30बातों का जवाब देना पड़ेगा वो लोग आवाम को

31:33बरगलाएंगे आपको उनके मुगालते रफा करने

31:36पड़ेंगे और किसी वक्त ऐसा भी हो सकता है

31:39कि आपको उन पर भी जवाबी हमला करना पड़ेगा

31:41कुरान मजीद में आपको नजर आ जाएगा बनी

31:44इसराइल से जो खिताब हुआ है सूर सूरह बकरा

31:46में पांचव रुकू से ले 15 रुकू तक उन पर

31:49कुरान मजीद ने उनकी जो गलतियां थी उनकी जो

31:52खामियां थी उनकी तारीख के जो अहम वाकयात

31:55थे कि जिनसे कि उन्होंने अल्लाह और उसके

31:57रसूल के रास्ते से जो इंराफ किया था उन

32:00सबका खोल कर पर्दा चाट किया गया और एक

32:02बड़ी मुफसल करारदाद फर्द जुर्म जो है उनके

32:05ऊपर आयद की गई तो ये सारा काम करना पड़ता

32:08है लेकिन ये कि अहले किताब के साथ एक

32:12एतियाद की जरूरत है कि एक तो मुशरिकन

32:15उनका मामला ये है कि वो बहुत दूर निकल गए

32:18हैं अपनी दलालत और गुमराही में लेकिन ये

32:20बहरहाल किसी ना किसी दर्जे में जबानी

32:22कलामी अल्लाह रसूल आखरत किताब शरीयत नबूवत

32:26वही फरिश्ते इन सबको मानते हैं लिहाजा

32:28इनके साथ बहुत नरम रवैया इहाद वला तजा

32:33किताब इल्ला बिलती यासन और मत झगड़ो मत

32:37मुजाद करो अहले किताब से मगर उस दौर से कि

32:40जो बहुत ही आला हो अब आप गौर कीजिए कि ये

32:44ये तो ताबील खास से बात वाज़ हो गई। अब

32:46ताबील आम पर आइए जो उसूल है तफसीर का अल

32:50एतबार उम लफ़ज़ ला खुसूस सबब असल एतबार जो

32:55है अल्फाज़ की उमूमियत का किया जाएगा ना कि

32:58एक खास पसमंजर का जिनमें वो आयात नाज़िल

33:00हो। अब इसको जनरलाइज कीजिए तो वो बात क्या

33:03बनेगी? फर्ज कीजिए कि आज हम पाकिस्तान में

33:06इस्लाम के गलबे की जिद्दोजहद करते हैं।

33:09मुखालफ़त होगी कि नहीं होगी? कम्युनिस्ट भी

33:12मुखालफ़त करेंगे। मुलदीन भी करेंगे।

33:15सेकुलरिज्म के कालीन भी करेंगे। जो यह

33:19कौमियतों का नजरिया तलाश कर जो उसकी

33:22बुनियाद पर गाड़ी चला रहे हैं वो भी

33:24करेंगे। ये सब करेंगे कि नहीं करेंगे?

33:26आपको एक चौमुखी जंग लड़नी पड़ेगी। अगर

33:29गालिब नहीं करना इस्लाम को तो घरों में

33:30बैठ के किसी से उलझने की जरूरत नहीं।

33:33लेकिन ये है कि अगर आपको इस्लाम को गालिब

33:36करना है तो तो उलझना पड़ेगा। अब इस उलझने

33:40में एक हमारे यहां वो तबकात है कि जिनका

33:43कुछ ना कुछ मजहब के साथ ताल्लुक है। उनकी

33:45कुछ ना कुछ मजहब के साथ जो है उनकी

33:48कमिटमेंट है। वो नमाज रोजा करते हैं। वो

33:51कुछ ना कुछ दीन का के लिए मेहनत है।

33:53भागदौड़ है। अगरचे आपसे इख्तलाफ है। आपसी

33:58आपके तरीकेकार से इलाफ है। मिसाल के तौर

34:00पर जमात इस्लामी है काम कर रही है।

34:02तब्लीगी जमात है वो अपने तरीके पर काम कर

34:04रही है। जमात इस्लामी का तरीका और है।

34:06तब्लीगी जमात का तरीका और है। जमीत उलमा

34:09इस्लाम है वो अपने तरीके पर काम कर रही है

34:11वो ना तब्लीगी जमात का तरीका है ना जमात

34:12इस्लामी का तरीका है हमने एक तजीम कायम की

34:15तजीम इस्लामी हमारे सामने एक और तरीकेकार

34:17है तो ये तो हो सकता है कि आपके तरीके से

34:20इलाफ करते हो लेकिन बहरहाल उनका दीन के

34:23साथ कोई लगाव है वो भी इस मैदान में है

34:26उनकी भी कमिटमेंट है वो अपने तजिए के

34:28मुताबिक अपनी तशकीस के मुताबिक अपनी तजवीज

34:32के मुताबिक काम कर रहे हैं लिहाजा अब आप

34:34अगर खिताब में सबको एक लाठी से हाक देंगे

34:38तो दर हकीकत आप अपने मकसद को नुकसान

34:40पहुंचाओ। जो भी दीन के मैदान में है, जो

34:43भी दीन का कोई काम कर रहा है, उसके साथ

34:46बड़े अदब के साथ, एहतराम के साथ पेश आओ।

34:49उनका इकराम करो। ये मैं लफज़ जो है तब्लीगी

34:52भाइयों वाला इस्तेमाल कर रहा हूं। उनकी

34:53इज्जत करो कि वो भी दीन के काम में लगे।

34:56अगरचे ठीक है। आपका नुक्त नज़र कुछ और है।

34:58उनका नुक्त नज़र कुछ है। एक इलेक्शन के

35:01रास्ते से जाना चाहता है। एक समझता है कि

35:03इस रास्ते से वक्त के रिया के सिवा कुछ

35:05हासिल नहीं होगा। लिहाजा उसने कोई और

35:07रास्ता तजवीस किया है। एक वो है कि जो

35:09सिर्फ लोगों को नेकी की तकीन करके वो यह

35:12समझता है कि जब नेकी आएगी बदी खुद ब खुद

35:14चली जाएगी। लोगों को खामखा जो है उसके ऊपर

35:17तनकीद की ज़बार मत खोलो। बल्कि ये कि फ़ज़ाइल

35:20की तनकीन के जरिए से लोगों को नेकी के

35:22रास्ते पर ले आओ। एक का ख्याल है नहीं

35:24कुरान में तो जहां भी आया है अम्र बिल

35:26मारूफ के साथ तन उनका साथ जुड़ा हुआ आया

35:28है ये तो एक गाड़ी के दो पहहिए हैं तो ये

35:31इख्तलाफात एक जगह है लेकिन आप ये नहीं कह

35:33सकते कि वो इस्लाम का काम नहीं करते

35:36लिहाजा उनके साथ मामला करते हुए बात ये

35:38होगी वला तजा अहल किताब इल्ला बिलसन हमें

35:43यहां से रहनुमाई लेनी होगी कि अगरचे

35:46मुखालन उस वक्त मुशरिकन भी थे और अहले

35:49किताब भी थे और अहले किताब की मुखालफ़त के

35:52बारे कुरान ने कहा कि ये सबसे ज्यादा शदीद

35:55है बुगज़ में। यहूद के उलमा से बढ़कर दुश्मन

35:58कोई नहीं था मोहम्मद रसूल्लाह सल्ला

36:00वसल्लम का। हालांकि वो खूब जानते थे यार

36:03कमा याना ऐसे पहचानते हैं मोहम्मद को जैसे

36:06अपनी औलाद को पहचानते हैं। लेकिन इसके

36:08बावजूद क्योंकि उनका एक माजी है। वो

36:11रसूलों के नाम लेवा है। उनके यहां किताब

36:14है, तरात है। उनके यहां उलमा है। उनके

36:17यहां मजहबी अदालतें हैं। लिहाजा उनको

36:20बिल्कुल मुशरिकन के एट पार रख देना

36:23दुरुस्त नहीं होगा। वला तजाबसन।

36:28अब इससे हमें क्या लेनी होगी रहनुमाई कि

36:30अगर हम अपनी समझ के मुताबिक अपने फहम के

36:33मुताबिक अपने तजिए के मुताबिक अपनी तशकीस

36:36के मुताबिक अपनी तजवीज के मुताबिक दीन का

36:38कोई काम कर रहे हो तो जो भी दीन के लिए

36:41किसी ना किसी दर्जे में एक्टिविटी कोई काम

36:44कर रहे हैं कोई तवाना असर कर रहे हैं उनके

36:46साथ ये मौका इख्तियार करना होगा कहीं ना

36:49कहीं तो लाजिमन आएगी बात इ्तलाफ की इसलिए

36:52की जाहिर बात है कि हम कहेंगे भाई हम जो

36:53रास्ता बता रहे हैं हमने इसलिए इख्तियार

36:56किया की सही रास्ता इसको समझाना हमें कहना

36:58पड़ेगा कि इंतखाब के अंदर ये इंतखाबाबत

37:01में हिस्सा लेने से मुल्क के अंदर मुल्क

37:03के अंदर एक इत्मीनान की फिजा पैदा हो जाना

37:05ये अपनी जगह पर है जो हम चाहते हैं कि

37:08होना चाहिए कि मुख्तलिफ हिस्सों के लोगों

37:10के अंदर ये इत्मीनान हो कि हमें हमारे

37:12मामलात हमारे हाथ में है। ये नहीं है कि

37:15कोई एक सुबह सब पर हुकूमत कर रहा हो।

37:17इसलिए कि फौज की हुकूमत है तो गोया कि

37:19पंजाब की हुकूमत है। बाकी सिंध औरचिस्तान

37:22गोया कि महकूमी के अंदर जिंदगी बसर कर रहे

37:24हैं। यह एहसास बड़ा खौफनाक है। [संगीत]

37:26लिहाजा इलेक्शन का होना इस एहसास को खत्म

37:29करने के लिए तो जरूरी है। अलबत्ता इस्लाम

37:32इलेक्शन के रास्ते से ना कतन आना मुहाल

37:36मुतलक नामुमकिन उसके लिए तो इंकलाबी

37:39रास्ता इ्तियार करना पड़ेगा। अब अगर ये

37:41बात मैं जोर देकर ना कहूं तो मेरी इस्ला

37:44के ऊपर कौन तवज्जो करेगा? कौन आएगा मेरे

37:47इस रास्ते पर? कौन मेरा दस्तो बाजू बनेगा?

37:49कौन मेरा साथ देगा? तो मुझे यह बात तो

37:51कहनी पड़ेगी। लेकिन ये है कि उसमें वो

37:54तमाम एहतियातें मलहूद रहे कि बहाल वो भी

37:57जो कुछ कर रहे हैं दीन के लिए कर रहे हैं।

37:59अपनी समझ के मुताबिक दीन ही की खिदमत है।

| Zikr, dua aur taqwa

38:02उनके सामने भी यही है। चाहे वो जमीत उलमा

38:04हो, जमीयत चाहे तबगी जमात हो, जमात

38:06इस्लामी हो। तो हमें यहां से ये दूसरी

38:09हिदायत है कि जो अज़ करनी है वला तजा

38:12किताबसन

38:14इज़म

38:16ये जरा मुश्किलात कुरान में से ये मकाम

38:20सिवाय उनके जो उनमें से जुल्म पर सरकशी पर

38:24तदी पर और हक तफी के ऊपर कमर कस अब ये

38:28इस्तना किससे है ये दो नतीजे इसके निकल

38:32सकते हैं एक इल्लाह ने दूसरे इल्ला को

38:35कैंसिल कर दिया तो इसका मतलब मतलब ये हुआ

38:37कि उनसे झगड़ो ही ना हो उसके मुंह ही ना

38:39लगो और एक ये हो सकता है कि इस इल्लाह ने

38:43सिर्फ आसन की नफी की है गोया के उनके साथ

38:47झगड़ो तो उन्हें तुर्की बतुर्की जवाब भी

38:50दे सकते हो इसलिए कि जिन लोगों के बारे

38:52में ये यकीन हो जाए कि ये ना सुनना चाहते

38:55हैं ना मानना चाहते हैं ना कोई माकूल बात

38:57सुनने के लिए तैयार इन्होंने मुखालफत पर

39:00कमर कस ली इन्होंने फतनाबाजी शुरू कर दी

39:02है रास्ता रोकने के लिए तो जाहिर बात है

39:05कि अगर उनके साथ भी अगर आपने वो मामला

39:08इ्तियार किया तो वो गोया कि अपनी मंजिल को

39:10आप खोटा करें। उनका जवाब देना पड़ता। किसी

39:13को सख्ती का जवाब सख्ती के साथ देना।

39:16लेकिन इसमें भी बड़ी एतियात की जरूरत

39:17होगी। ये दोनों मफूम इसमें मौजूद है।

39:21अच्छा अब जो बात ये तो हुई मनफी बात मुस्त

39:24बात क्या है? ये अंदाज इख्तियार करो।

39:28आमना

39:32ये कहो उनसे कि हम ईमान रखते हैं उस चीज

39:34पर भी कि जो हमारी तरफ नाजिल की गई और उस

39:37पर भी जो तुम्हारी तरफ नाजिल की गई

39:39क्योंकि अहले किताब का जिक्र है। हम तो

39:41तरात पर भी यकीन रखते हैं। हम इंजील पर भी

39:44यकीन रखते हैं। अगरचे जो तरात तुम्हारे

39:46पास है उसमें तहरीफ हो गई। लेकिन इसकी

39:49तस्दीक कुरान करता है कि तरौरात अल्लाह की

39:51किताब थी जो अल्लाह ने मूसा अल सलाम को

39:53अता फरमाई। जो इंजील आज तुम पेश कर रहे

39:56हो। अगरचे मिनो उसको हम नहीं मानते लेकिन

39:58यह बात हम मानते हैं कि वो इंजील यकीनन

40:02अल्लाह की किताब थी कि जो अल्लाह ने हजरत

40:04मूसा ईसा अल सलाम को अता फरमाई

40:07आमना उनसे

40:11कहो हम तो ईमान रखते हैं हमारे अंदर तो

40:13कोई तासुब नहीं कोई असबियत नहीं कोई गिरोह

40:16बंदी नहीं हम तो ईमान रखते हैं उस पर भी

40:19कि जो वही हमारी तरफ किया जा रहा है कुरान

40:21और ईमान रखते हैं उन किताबों पर भी जो

40:23तुम्हारी तरफ नाजिल किए गए व इला ना इला

40:26हुकुम वाहिद और हमारा और तुम्हारा इलाह एक

40:29है। ऐसा नहीं है कि वो कोई दो इला हो। हम

40:32तो तौहीद के मानने वाले हैं। तुम्हारा

40:34पैदा करने वाला भी वही जो हमारा पैदा करने

40:36वाला है। मूसा का भेजने वाला भी वही जो

40:39मोहम्मद का भेजने वाला है। अला नबीना

40:42सलातो सलाम। तो हम तो उस इलाहे वाहिद को

40:45मानते हैं। वनहु मुस्लिम

40:48और हमने तो अपने आप को उसके सुपुर्द कर

40:51दिया। उसके सामने सर झुका दिया है। हमने

40:55अपने आप को उसके हवाले कर दिया। उस इलाहे

40:57वाहिद के हवाले कर दिया। जो हमारा भी इला

40:59तुम्हारा भी इला। हमारा भी माबूद तुम्हारा

41:01भी माबूद। हमारा भी खालिदिक तुम्हारा भी

41:03खालिद। जो मोहम्मद का भेजने वाला भी और

41:06ईसा और मूसा का भेजने वाला भी। सल्लल्लाहु

41:08अलैहि वसल्लम अलैहि सलातो व्सलाम। लिहाजा

41:11ये अंदाज जब आएगा तो इसमें इससे क्या

41:13नतीजा निकलता है? कि एक अंदाज ये होता है

41:16बस हम ही ठीक हैं। बाकी सब कोई उनकी कोई

41:20बुनियाद नहीं। कोई हकीकत नहीं। आपको जहां

41:23पर भी जो हक़ नज़र आए उसको तस्लीम कीजिए।

41:26जहां खैर नज़र आए उसको मानिए। ताकि लोगों

41:29पर ये असर कायम हो कि इनके अंदर तल्ली

41:32नहीं है, तकब्बुर नहीं है। ये बस हम दीगरे

41:36नहीं ये अंदाज उनका नहीं है कि हम ही हम

41:38और कोई ना हो। बल्कि ये हक़ जहां भी पाया

41:40जाता है उसको मानते हैं। सही बात जब सामने

41:43रखी जाए फौरन तस्लीम करते। हकीकत जब आए

41:46लपक कर कबूल करते हैं। जैसे कि हुजूर ने

41:48फरमाया अलिकत

41:50मोमिन

41:52है हिकमत और दानाई की बात तो मोमिन की

41:55गोया कि गुमशुदा मता है कि वो सबसे बढ़कर

41:59हकदार है। उसका जहां भी पाए सच्ची बात

42:01जहां मिलेगी वो हमारी जागीर है। हकीकत

42:04जहां है वो हमारी विरासत है। दानाई जहां

42:07से भी मिले वो हमारी गुमशुदा मात है। ये

42:10अंदाज होना चाहिए कि ये हक के मानने वाले

42:13हैं। यह किसी जमाती असबियत में मु्तला

42:16नहीं हो गए कि अपने बुजुर्ग तो बहुत बड़े

42:20और दूसरों के बुजुर्ग चाहे उनके अंदर

42:22कितने ही कमालात हो उनको कोई हैसियत देने

42:24को तैयार नहीं मैंने ताजा मिसाक में जो एक

42:27तवील मज़मून लिखा था तजीम इस्लामी में

42:30शामिल हुए हैं नौजवान उलमा में से एक अहम

42:33शख्सियत मौलाना सैयद रहमान अलवी तो उनके

42:36हवाले से मैंने जो मिसाक में लिखा है

42:38मजमून उसमें यही बात वाजे की हमारे यहां

42:41दी हके और दीनी जमातें जो जो है इस तरह के

42:44वाटर टाइट कंपार्टमेंट्स में मुनकसिम हो

42:47गए कि अगर कोई देवबंदी है तो जाहिर बात है

42:50कि देवबंदी उलमा से उसने पढ़ा। देवबंदी

42:53उलमा की सोबत उसने उठाई। उनकी अजमत का

42:56नक्श उस पर कायम हुआ। अब वो उनहीं देवबंदी

42:59जरा को पढ़ते हैं। देवबंदी किताबें जो है

43:02उन्हीं को पढ़ेंगे। तफसीर पढ़ेंगे तो

43:05देवबंदी उलमा की पढ़ेंगे। लिहाजा उनका

43:08पूरा वो ज़हनी जो है वो इनहसार हो जाता है

43:11एक हके के अंदर। दूसरे हके में कोई अजमत

43:14है तो उन्हें नजर ही नहीं आएगी। वहां अगर

43:16कोई इल्म की बुलंदी है तो वो उससे वाकिफ

43:18ही नहीं। कोई ऊंची शख्सियत गुजरी है

43:20उन्हें पता ही नहीं। अब वो बरेलवी है, कोई

43:23खैराबादी है, कोई बदायूनी है, कोई फरंगी

43:27बहली है, कोई अहले हदीस हैं। अब ये

43:29मुख्तलिफ तबकात हमारे यहां जमात इस्लामी

43:31वाले हैं तो उनके अपने जराद है, उनके अपने

43:33अखबारात हैं। उनके अपने रसायल हैं। वो

43:36उन्हीं को पढ़ेंगे। उन्हीं की आंखों से

43:38देखेंगे। उन्हीं के कानों से सुनेंगे।

43:40उनको जो अजमत अपने हके के लोगों में नजर

43:42आएगी दूसरों में नजर ही नहीं आएगी। अब

43:44इसका जो है इसको जब तक आप तोड़ेंगे नहीं

43:47दीन का गलबा नहीं हो सकता। अगर ये कि अपने

43:50ही हुस्न का दीवाना बना फिरता हूं और अपने

43:53ही बुजुर्गों का परवाना बना फिरता हूं तो

43:55उनके बुजुर्ग वो हैं। आपके बुजुर्ग ये है

43:57आपके और उनके दरमियान कदरे मुस्तक कहां से

43:59आए? तो इस बात की जरूरत है कि मुख्तलिफ

44:02हलकों के लोग जमा हो। यहां पर आकर ताकि

44:05मुख्तलिफ लोगों के जो बाजी है उनसे

44:08वाकिफियत पैदा हो। उनके हर हके की जो अजीम

44:10शख्सियत गुजरी है उनसे तारुफ हो जब उनकी

44:14अजमत का भी नक्श आएगा तो दिल के अंदर जो

44:16तंगी पैदा हो गई है उसमें कुशादगी पैदा

44:18होगी इंशा्लाह अजीज [संगीत] तो ये चीज भी

44:21हमारे दीन की इकामत की जद्दोजहद में बहुत

44:24है कि अपने सीनों को कुशादा करें निगाहों

44:27को खोलें कानों को खोलें सिर्फ ये नहीं कि

44:29बस किसी एक ही घड़े की मछली और किसी एक ही

44:31कुएं के मेंढक बने हुए हैं बल्कि चाहिए कि

44:34दूसरे लोगों को देखें उनके किताबों का

44:36मुताला करें उनके जो बुजुर्ग है उनके भी

44:39हालात जिंदगी जो है उनका मुशादा करें तो

44:42इस तरीके से दिलों के अंदर भी कुशादगी

44:44होगी और करीब आएंगे ये आयत इस एतबार से

44:47इकामत दीन की जदोजहद में निहायत अहम

44:50हिदायत नंबर दो हुई वजा कि बिलसन

44:55इल्ला बिलसन इज़

44:59वूल आना बिल

45:03वहि

45:06मुस्लिम आगे ये तीसरी आयत जो है यहां से

45:09छोड़ दीजिए। अब आगे आइए।

45:13तीसरी हिदायत अब आ रही है सूरबूत की अभी

45:16आयात है 55 से और 60 तक या इबाज़

45:23इन वास फल

45:28न्स मौत

45:32वज़ना

45:35जन्नत

45:38खीहालीन

45:41अल सब रब

45:45[संगीत]

45:51सम अलीम इसके साथ ही आयत नंबर 64 भी पढ़

45:54ले वमा हयात दुनिया

46:04ये पूरी जो मैंने आयात आपको पढ़कर सुनाई

46:08इनका अहम तरीन मजमून है ईमान बिल आखिर

46:13असल में मोटिवेशन जो अमलन मिलती है इंसान

46:17को और इस राह में कुर्बानी के लिए जो

46:20उसमें आमादगी पैदा होती है इस दुनिया का

46:24नुकसान गवारा करने के लिए इंसान आमादा

46:28होता है वो होता है ईमान बिल आखिरा की

46:32जितना यकीन गहरा होगा कि आखिरत हक है और

46:36असल जिंदगी वो है उतना ही आपका वैल्यू

46:39स्ट्रक्चर जो है बदलना शुरू हो जाएगा।

46:42इसलिए कि कौन इंसान है जो खैर नहीं चाहता,

46:45नफा नहीं चाहता, भलाई नहीं चाहता, बेहतरी

46:48नहीं चाहता। ये सब खैर, भलाई, नफा उसी के

46:51लिए तो भागदौड़ हो रही है। अब फर्क क्या

46:54है? रुख मुयन हो रहा है। अगर आखिरत ज़हन

46:57में नहीं है तो सारी खैर, दुनिया की खैर,

46:59सारी भलाई, दुनिया की भलाई, सारा नफा,

47:01दुनिया का नफा। सारी कामयाबी, दुनिया की

47:04कामयाबी। और अगर आखिरत पर यकीन हो गया

47:07जैसा कि होना चाहिए। देखिए आखिरत के यकीन

47:09के भी बहुत से दर्जे हैं। एक तो ये कि हम

47:12जुबान से मानते हैं जी हां उठना है। बाबा

47:15मौत है। जी उठना है। आखिरत है। लेकिन आपके

47:19ज़हन में रेशियो प्रोपोशन कायम नहीं हुआ कि

47:22आखिरत किसे कहते हैं? दुनिया किसे कहते

47:24हैं? इनके दरमियान मुनासबत क्या है?

47:26निस्बत क्या है? आखिरत की जिंदगी अबदी

47:30जिंदगी। ये फानी जिंदगी। कोई निस्बत कायम

47:33होगी? जिन लोगों ने मैथमेटिक्स पढ़ा है वो

47:36फाइनाइट और इनफाइनाइट में कोई निस्बत कायम

47:39कर सकते हैं। एक चीज इनफाइनाइट लामहदूद

47:44और एक चीज फाइनाइट। 80 बरस भी जी लोगे तो

47:48आखिर एक दिन तो मौत का दिन आएगा कि यहां

47:50से जाना होगा। और 80 की गारंटी किसके पास

47:52है? किसके पास गारंटी है कि कल सुबह का

47:55सूरज जो होता हुआ अपनी इन आंखों से देख

47:57सके। मालूम हुआ कि दुनिया की यह जिंदगी

48:00इतनी आरसी, इतनी नापायदार, इतनी फानी,

48:04इतनी नाकाबिल एतमाद कि एक दिन का भी यकीन

48:08नहीं। वो बड़ा प्यारा मिश्रा है कि सामान

48:10100 बरस का है और पल की खबर नहीं। इसको

48:13यकीन है। लेकिन हमारी सारी भागदौड़ जो है

48:16वो रही है दुनिया के लिए। इसलिए कि दुनिया

48:17पर पूरा यकीन कायम है। दुनिया तो नकद है।

48:20आंखों के सामने। अब अगर ये चीज ज़हन में

48:23कायम हो जाए कि वो अबदी जिंदगी हमेशा की

48:26जिंदगी बल्कि अभी इस आयत का तर्जुमा कर

48:28लीजिए जो आखिर में पढ़ी है। वमा हयात

48:32दुनिया इल्

48:40ये इस दुनिया की जिंदगी तो सिवाय खेल और

48:43तमाशे के कुछ है ही नहीं।

48:46हकीकत में तो आखिरत का घर वह है असल

48:50जिंदगी काश कि इन्हें मालूम होता। अब आप

48:54गौर कीजिए इंसान के अमल पर सबसे ज्यादा

48:56असर अंदाज होने वाला अकीदा आखिरत है। इससे

49:00सारा नक्शा बदल जाता है। असल जिंदगी वो

49:03जिंदगी है। तो ये जिंदगी जो है ये तो खेल

49:06तमाशा है। एक शख्स को आपको मालूम है एक

49:09ड्रामे के अंदर बादशाह का रोल मिल गया। एक

49:12सिनेमा आप पिक्चर देख रहे हैं। उसमें कोई

49:14शख्स जो है वो सिकंदर आजम बना बैठा है या

49:17कोई और बादशाह बना बैठा है। आपको मालूम है

49:19कुछ नहीं है। ये तीन घंटे का खेल है। उसके

49:22बाद कुछ भी नहीं है। सब कपड़े वपड़े उतर

49:24जाएंगे और वहां जाकर जब ये अपना कपड़ा

49:26उतार देगा तो वही फला इबने फला रह जाएंगे।

49:28अल्लाह अल्लाह खैर। कोई फकीर उसके अंदर

49:31फकीर का रोल प्ले कर रहा है। वो फकीर तो

49:34नहीं है। वो भी एक एक्टर है। यह भी एक

49:36एक्टर है। तो दुनिया की यह जिंदगी आप 30

49:39बरस की शुमार कर लें। वह 3 घंटे का एक खेल

49:41है। यह 30 बरस का एक खेल। 30 बरस इसलिए कह

49:44रहा हूं कि पहले 20 बरस तो वैसे निकाल

49:47दीजिए कि वह भी शूर के नहीं होते। और 50

49:50बरस के बाद से आपकी ढलवान शुरू हो जाती

49:52है। 70 80 पर पहुंचने के बाद तो आदमी फिर

49:55हो जाता है।

49:57खल कि जितना बूढ़ा हुआ उतना ही बच्चा हो

50:00गया। मालूम उसके दरमियान में कितनी है? 30

50:0340 बरस की एक एवरेज है जो आपकी फल जिंदगी

50:07है जिसमें कि आप कुछ बनाते हैं, मेहनत

50:09करते हैं, भागदौड़ करते हैं। किसी ने

50:12कारखाना बनाया तो इसी में बनाया, किसी ने

50:14कारोबार जमाया तो इसी में जमाया। कोई

50:16प्रोफेशन में शाइन कर रहा है तो वो भी यही

50:18वक्त वक्त है। अब सवाल ये है कि ये वक्त

50:21है मेरे पास कुल। और वो जिंदगी अब अभी

50:24जिंदगी है तो अब इसका बेशतर और बेहतर उसके

50:27लिए इन्वेस्ट करूंगा कि नहीं करूंगा? यह

50:30बिल्कुल मंतकी बात है। दो और दो चार की

50:31तरह की अगर आखिरत का यकीन नहीं है या ये

50:36कि आखिरत का यह यकीन तो है कि आखिरत होगी

50:39लेकिन दिल में आपने चोर पैदा कर लिए कि

50:41फला हस्ती के दामन से बंधे हुए हम तो निकल

50:44जाएंगे। हमें पकड़ने वाला कोई नहीं है।

50:46हमने फला के हाथ में हाथ दे रखा है। वो

50:48हमें ले जाएगा। या वहां किसी की सिफारिश

50:51काम कर जाएगा। या वहां पर हम तो बखशे बखश

50:54आए हैं।

50:57हम तो अल्लाह के बेटों के मानिदे बड़े

50:59चहीते हैं। आग हमें छू ही नहीं सकती। अगर

51:03छुएगी बिल फज़ तो चंद दिन ल तस नारदात

51:07अब ये खुद अपनी जगह एक मुस्तकिल मौजू है

51:09मेरी मुकम्मल तकरीर का कि अकीदा आखिरत से

51:12इनराफ की छह शक्लें हैं कि बजाहिर एक शख्स

51:16कहता है कि मैं आखिरत का मानने वाला हूं।

51:17हकीकत में मानने वाला नहीं हूं। इसलिए कि

51:20उसने उसको किसी चीज से जब दे दिए। ज़ीरो से

51:22ज़ब दे दी तो ज़ीरो से तो जो बड़े से बड़ा अद

51:25है ज़ब खाएगा तो ज़ीरो हो जाएगा। तो अकीदा

51:28आखिरत को अकीदा शफात के साथ जोड़ दिया ज़ीरो

51:30हो गया। अकीदा आखिरत के साथ नो अबना वबाहु

51:35हम जो कुछ भी है लेकिन तेरे महबूब की

51:37उम्मत में है। वो आखिरत तो जीरो हो गई।

51:39फिर क्या उसका फ़िक्र रहेगा? क्या उसकी

51:42आपको कोई फिक्र दामन गिर होगी कि उसके लिए

51:45कुछ बनाना है कुछ उसके लिए सामान करना है

51:48आखिरत के लिए कोई तोशा आखिरत फराम करना है

51:50कोई जरूरत ही नहीं इसलिए कि हम जो कुछ भी

51:52है तेरे महबूब की उम्मत में है लिहाजा

51:54जन्नत तो हमारा पैदाइशियत है वहां तो

51:56हमारी रिजर्वेशन मौजूद है लिहाजा कोई खौफ

51:59नहीं अब ये शक्ल जहां होगी वो अकीदा आखिरत

52:03बिल्कुल मादूम होकर रह उसका आपके अमल पर

52:07कोई असर नहीं लेकिन ये छह है उससे मराहिल

52:10जिसको मैं इसमें तफसील से बयान नहीं कर

52:12सकता। इस वक्त जो मुझे बताना है वो ये है

52:15कि प्रैक्टिकल मोटिवेशन इसार और कुर्बानी

52:19अभी मैं आ रहा था। मेरे साथ एक साथी थे।

52:21हमारी तजीम इस्लामी शिकागो के अहम कारकुन

52:24है। वो आए हुए हैं तीन महीने के लिए यहां

52:26पाकिस्तान और मेरे साथ सफर पर आए हैं।

52:28उन्होंने अपनी एक ऑब्जरवेशन मेरे सामने

52:31बयान की कि मैं ये देखता हूं कि दीन के

52:34लिए जो लोग काम करते हैं लेकिन अगर उन्हें

52:37कोई नुकसान हो जाता है या कोई तकलीफ होती

52:39है तो बजाय इस पर कि उस पर उनके चेहरे पर

52:42बशा पैदा हो। पशुदगी आ जाती है। हालांकि

52:46बशासत पैदा होनी चाहिए। यह मैंने कहा कि

52:49आपकी ऑब्जरवेशन जो है यह बहुत सही है।

52:52बहुत दुरुस्त है। उसका सबब क्या है? सबब

52:55यह है कि हम किसी वजह से आमतौर पर हमारे

52:58यहां दीन का काम जो हो रहा है वो कोई

53:00कम्युनिटी वर्क के तौर पर हो रहा है। कोई

| Amal aur zindagi ka paigham

53:03एक कौमी जिद्दोजहद है। जैसे पाकिस्तान की

53:05तहरीक की कौमी जिद्दोजहद थी। लेकिन हमने

53:08उसमें नारा इस्लाम का लगाया। पाकिस्तान का

53:10मतलब क्या है? ला इलाहा इल्लल्लाह। इसी

53:12तरीके से हमारे यहां बहुत से लोग बजा दीन

53:14का काम कर रहे होते हैं। लेकिन उनकी असल

53:17मोटिवेशन जो है वो आखिरत की नहीं होती।

53:20आखिरत का यकीन उनका जज्बा मुहर्रिका का

53:22नहीं होता। आखिरत में जिस दर्जे का पुख्ता

53:25ईमान होना चाहिए वो हासिल नहीं है। वरना

53:28तो यह कि यहां का घाटा होकर घोटा देखकर

53:30इंसान को खुशी होनी चाहिए कि यहां जो मुझे

53:33डेबिट हो रहा है वहां क्रेडिट [संगीत] हो

53:35रहा है। यहां जो नुकसान हो रहा है वहां

53:37मेरी आबत बन रही है। ये यकीन अगर होगा तो

53:40अगर कोई तकलीफ आई तो बजाय पशब्दुर्दगी के

53:43इस्तबशार पैदा होगा। ये सूर तौबा में लफज़

53:46इस्तेमाल हुआ फस्त

53:50तो खुशियां मनाओ तुम पर तो बशा तारी होनी

53:54चाहिए जैसे हजरत खुबैब का लफज़ आया था कि

53:57जब उन्हें सूली दी जा रही थी तो जब पहला

53:59नेजा जो है उनके कलेजे में चुभो गया तो

54:02उनकी जुबान से कहा निकले फस्त रबिल काबा

54:05काबे के रब की कसम मैं कामयाब हो गया ये

54:08अगर बशा की कैफियत नहीं है तो उसका सबब

54:11क्या है कि मालूम होता है कि आखिरत पर

54:13हमारा यकीन उतना पुख्ता

54:15वरना अल्लाह के वादे

54:18रहान जन्नत वो जन्नत के जिसके नेमते वो है

54:22कि जिनका हम इस दुनिया में तसवुर तक नहीं

54:24कर सकते अगर उसके वादे पर यकीन है इसीलिए

54:27सूर अनकबूत के पहले रुकू में आया था आप

54:30मैंने पूरी तफसील से बयान किया था कि ये

54:33ना समझना कि तुम्हारे साथ जो हम वादे किए

54:35कर रहे हैं मन का

54:40समना

54:42आनु बिल वज़ना

54:51ये सारा [संगीत] किस लिए कि यकीन रखो

54:53तुम्हारी ये मेहनत अकार नहीं तुम्हारा ये

54:56इसार तुम्हारी ये कुर्बानी तुम्हारी ये

54:58मशक्कत ये अनरिडेड नहींंगी तुम्हारा वो

55:02परवरदिगार देख रहा है ऐ बिलाल जो तुम पर

55:04बीत रही है तुम्हारा रब देख रहा है ऐ

55:07ख्वाबाब जो कुछ तुम पर इस वक्त गुजर रही

55:09है तुम अपने रब की निगाहों में हो इन

55:12हम सब कुछ सुन रहे ए बिलाल इस हाल में कि

55:16तुम्हारे सीने के ऊपर भारी सिर रखी हुई है

55:18और ऊपर से सूरज आग बरसा रहा है। नीचे से

55:20जमीन तवे की तरह जल रही है। इस वक्त भी

55:23तुम्हारी जुबान से जो लफज़ निकल रहा है

55:24अहदुन अहद अहद अहद अल्लाह सुन रहा है कि

55:28मेरा एक बंदा है जो इस मशक्कत के अंदर भी

55:30मेरी तौहीद का नारा लगा रहा है। तो ये

55:33चीजें यूं ही नहीं चली जाएंगी। इसका भरपूर

55:36सिला तुम्हें मिलेगा। भरपूर बदला मिलेगा।

55:39जब तुम हमारे हुजूर में हाजिर होगे

55:40खिलातों से नवाजे जाओगे। अगर ये यकीन पैदा

55:44हो जाए तो फिर बड़ी से बड़ी कुर्बानी बहुत

55:47सहल दुआएं। बड़ी से बड़ी तकलीफ आएगी। तबीयत

55:50में खुशी होगी कि अल्लाह ने जैसा कि मैंने

55:52पहले कहा था ज़हे नसीब कि अल्लाह ने हमें

55:55इस काबिल समझा कि हमारी हड्डी अपने रास्ते

55:58में तुड़वाई। हमें ये मुसीबत अपनी राह में

56:01पहुंचाई। ये अल्लाह ताला की तरफ से गोया

56:03कि शरफे कुबूल हो जाने का का एक सबूत है

56:06कि अल्लाह ताला ने हमें हमें कुबूल फरमा

56:08लिया है। ये अंदाज़ होगा कब? जबकि आखिरत का

56:12यकीन तो फरमाया वमा हाल हयात दुनिया इला

56:16लह व

56:19ये दुनिया की जिंदगी तो सिवाय खेल कूद के

56:22कुछ नहीं जैसे ड्रामा होता है तीन घंटे का

56:25ये 30 बरस का ड्रामा है किसी को हमने

56:28झोपड़ी में पैदा कर दिया है किसी को किसी

56:31को गोल्डन स्पून के साथ पैदा कर दिया है

56:34सिल्वर स्पून नहीं गोल्डन स्पून लेकिन ये

56:36कि ये भी जब आंख खुली गुल की तो मौसम था

56:40खिता का [संगीत] जरा सी देर है इधर आंख

56:43खुली वो 60 करोड़ तकसीम हुए हो या 60 अरब

56:46तकसीम हुए हो और बहरहाल जो दुनिया से गया

56:49उसके लिए तो एक पैसा भी नहीं है ये बात

56:52अच्छी तरह समझ लीजिए कि चाहे कोई वरे के

56:54घर पैदा हो गया कोई झोपड़ी में पैदा हो

56:56गया ये इस दुनिया की जिंदगी ही का है ना

56:58एक रोल हो सकता है कि जो यहां किसी झोपड़ी

57:03के अंदर अपनी जिंदगी के दिन गुजार रहा है

57:06और किसी चटाई पर बैठा हुआ है वो वहां उन

57:09आलीशान महल का वारिस बने जैसा कि यहां आ

57:12रहा है जन्नत

57:18वो जन्नत के वो उनको झरोके मिलेंगे वो

57:20बालाखाने मिलेंगे जिनके दामन में नदियां

57:22बहती हो जैसे कि सूर सफ में हम पढ़ा है व

57:25मसा

57:27जन्नत जन्नत अद में बड़े पाकीजा घराने

57:31हमने उनके लिए तैयार जो यहां झोपड़ी में

57:33बैठा हुआ है आखिर क्या मोइनुद्दीन अजमेरी

57:36ने सारी उम्र चटाई पर निकला दी क्या

57:39मोहम्मद रसूल्लाह सल्ला वसल्लम ने सारी

57:41उम्र चटाई नहीं वो वाकया इला जब हुआ था

57:45उसका आपने सुना होगा ये एक वाकया कि जब एक

57:49महीने के लिए हुजूर ने अवाजे मुतहरात से

57:51जरा ताल्लुक अपना मुंत कर लिया था

57:56सूर अहजाब में उसका मुफसल जिक्र मौजूद है

58:00तो हजरत उमर हुजूर एक बालाखाने पर तनहा

58:03अदा थे क्योंकि अवाज से लालकी कर ली थी

58:07हजरत उमर हाजिर हुए नीचे कोई थे सब सहाबी

58:10बैठे हुए दरवाजे पर उनसे कहा कि इतला

58:12दीजिए कि उमर हाजरी की इजाजत चाहता है।

58:16हुजूर को इतला हुई। हुजूर ने इजाजत दे दी।

58:18आए जब हजरत उमर दाखिल हुए हैं उस बालाखाने

58:22में तो हुजूर उठकर बैठ गए। आपने उस वक्त

58:26कुर्ता उतारा हुआ था। यानी आपका जिस्म जो

58:30है वो बस तहबंद था। बाकी जिस्म के ऊपर

58:33कपड़ा नहीं था। और आप एक चटाई पर उस वक्त

58:36इसात फरमा रहे थे जब उठकर बैठे तो हजरत

58:39उमर ने देखा कि कमर के ऊपर उस चटाई के

58:41निशान पड़ गए। जैसे कि आप का अक्सर आपका

58:44मुशादा हुआ। आंखों में आंसू आ गए हजरत उमर

58:46के। हुजूर ने पूछा उमर क्यों रो रहे हो?

58:49उन्होंने अ किया कि हुजूर कैसर किसरा के

58:51लिए दुनिया में क्या-क्या सामान क्या नाजो

58:55क्या उनके लिए आसाइशें हैं और आपके लिए ये

58:59चटाई है ये खरी चटाई और उसकी जिसकी बदियां

59:02पड़ गई है आपकी कब्र पर तो हुजूर ने

59:04फरमाया कि उमर क्या तुम इस पर राजी नहीं

59:07हो कि ये सब कुछ अपना दुनिया में ले जाए

59:08और अल्लाह ताला हमें आखिरत में अता फरमाए

59:11यही बात हुजूर ने एक मर्तबा फरमाई मा

59:14दुनिया इनमास

59:18क्या पता रखा मुझे तुम्हारी इस दुनिया से

59:21क्या सरोकार मेरी मिसाल तो उस सवार की सी

59:25है जो थोड़ी देर के लिए किसी दरख्त के साए

59:28में बैठता है सस्ताने [संगीत] के लिए फिर

59:31वो अपनी मंजिल लेता है वो दरख्त उसका घर

59:33नहीं उसका मंजिल नहीं उसका मकाम नहीं

59:35थोड़ी देर ठहरता है बस इतना ही ताल्लुक

59:38मुझे उस दुनिया से इसीलिए आपने फरमाया है

59:41कु दुनिया का गरीब सील दुनिया में ऐसे रहो

59:45जैसे राह चलते मुसाफिर हो या अजनबी हो ये

59:48महसूस हो कि ये यहां का वासी नहीं है। ये

59:51यहां की सोच सोच ही नहीं रहा। यहां फैलने

59:54फूलने फलने की फिक्र ही नहीं कर रहा। ये

59:57कहीं और इसका दिल टिका हुआ है। कहीं और

59:59अटका हुआ है। ये अगर आपके वजूद से इसका

1:00:02ज़हूर ना हो रहा हो तो इसके मानी ये है कि

1:00:05ईमान बिल आखिरा जैसे कि उसका हक है वो

1:00:08आपके दिल में नहीं है। आपके वजूद में

1:00:11सरायत नहीं। तो ये आयत नोट कीजिए। वमा

1:00:15हयात दुनिया इला

1:00:18अलबत्ता इसमें एक आयत और भी आती है कुरान

1:00:20मजीद में वमा

1:00:23हयात दुनिया इला मता गुरूफ

1:00:27ये दुनिया जो है ये सिवाय धोखे की टट्टी

1:00:30और धोखे के सामान के और कुछ नहीं इसके बरख

1:00:33एक हदीस आती है बजाहिर तदाद है लेकिन उसको

1:00:36रिॉल्व कीजिए और वो बात इसी मरहले पर समझ

1:00:40लेनी चाहिए हुजूर ने फरमाया अ दुनिया मजुल

1:00:43आखिरा दुनिया आखिरत की खेती है यहां बोगे

1:00:46तो वहां काटोगे। इसका मतलब ये दुनिया की

1:00:49बड़ी अहमियत है। यहां कुरान कह रहा है कि

1:00:52दुनिया सिवाय धोखे के सामान के और कुछ

1:00:53नहीं। इन दोनों को कैसे रिकंसाइल करेंगे?

1:00:57अगर ये दुनिया तुम्हें आखिरत से गाफिल कर

1:01:00दे तो ये धोखे की टट्टी है। फिर तो ये

1:01:02धोखे का सामान है। लेकिन आखिरत को मकसूद

1:01:06बनाकर दुनिया में मेहनत करोगे। तो यही

1:01:08आखिरत की खेती है कि यहां बोओगे तो वहां

1:01:11काटोगे। अगर यहां कुछ बोया नहीं तो काटोगे

1:01:14क्या वहां जाकर? इस एतबार से बंदा मोमिन

1:01:17को अपनी जिंदगी का एक एक लम्हा बहुत कीमती

1:01:19नजर आता है। इसलिए कि इस एक लम्हे में उसे

1:01:23वो काम करना है जिसका नतीजा उस अदीबदी

1:01:26जिंदगी में निकलेगा जिसको कभी खत्म नहीं

1:01:28होना। इस एतबार से हमारा हर मोमेंट हर

1:01:31लम्हा अमर है। इसलिए कि पोटेंशियल नतीजे

1:01:35के एतबार से ये अमर है। ये खत्म होने वाला

1:01:39नहीं है। इसलिए कि इसके नताज उस ज़िंदगी

1:01:41में निकलेंगे कि जिसके लिए कोई इंतहा

1:01:43नहीं। लिहाजा इस एतबार से देखिए तो दुनिया

1:01:46का एक एक लम्हा निहायत कीमती उस एतबार से

1:01:50देखिए कि अगर दुनिया में मशगूल होकर आखिरत

1:01:53को भूल गए या दुनिया तुम्हारा मतलूब मकसूद

1:01:57बन गई तो फिर ये धोखे की डंडे के सिवा कुछ

1:01:59नहीं हयात दुनिया

1:02:02इन दोनों चीजों को रखिए फरमाया हयात

1:02:06दुनियामून

1:02:13और असल जिंदगी तो आखिरत की जिंदगी है। काश

1:02:16के इन्हें मालूम होता। अब आइए ऊपर वाली

1:02:19आयात।

1:02:21इसमें खासतौर पर हिजरत का हुकुम दिया जा

1:02:25रहा है।

1:02:28और बल्कि हुकुम ना कहिए। हिजरत का इशारा

1:02:30किया जा रहा है। रहनुमाई दी जा रही है। ये

1:02:33हिजरत जो है जिसका यहां जिक्र हो रहा है।

1:02:35ये हिजरत हबशा है। ये हुजूर की सीरत का जो

1:02:39मक्की दौर है उसका ये इब्तदाई मरहला फिर

1:02:42समझ लीजिए। आपने तीन साल दावत दी जो के

1:02:47खुफिया दावत तो नहीं थी। कोई अंडर ग्राउंड

1:02:50मूवमेंट नहीं थी। लेकिन ये कि बरमला ऐलान

1:02:53के साथ भी नहीं थी। फ्रॉम पर्सन टू पर्सन

1:02:56पर्सनल कांटेक्ट से दावत बढ़ रही है।

1:02:59तीसरे साल में वो आयत नाजिल हुई कि फस तमर

1:03:04अब डंके की चोट कहो मोहम्मद जिसका कि

1:03:06तुम्हें हुक्म हुआ है। तो आपने पहली

1:03:08मर्तबा को सफा पर खड़े होकर आपने वाहा का

1:03:12नारा लगाया। लोगों को जमा किया और फिर

1:03:14अपनी दावत पेश

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