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DAY-9 | LIVE Upanishad Gyanamrit | Janjgir, Chhattisgarh | Raseshwari Devi Ji

Raseshwari Devi Ji · 11,436 words · 52 min read

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0:25[संगीत]

0:38श्री कृष्ण कृष्ण [गाना गाने की आवाज़]

0:40गोविंद

0:42हरे मुरारी

0:46हे नाथ [गाना गाने की आवाज़]

0:49नारायण

0:51वासुदेवा [गाना गाने की आवाज़]

0:55श्री कृष्ण [संगीत] गोविंद

0:58हरे मुरारी

1:01हे नाथ [गाना गाने की आवाज़][संगीत]

1:03नारायण

1:05वासुदेवा

1:08श्री कृष्ण कृष्ण गोविंद

1:10[गाना गाने की आवाज़]

1:11हरे मुरारी

1:14हे नाथ नारायण

1:18वासुदेवा [गाना गाने की आवाज़]

1:21श्री कृष्ण गोविंद [संगीत]

1:24हरे [गाना गाने की आवाज़]

1:26मुरारी

1:27हे नाथ [संगीत] नारायण

1:31[गाना गाने की आवाज़] वासुदेवा

1:34श्री कृष्ण गोविंद

1:37हरे

1:38[गाना गाने की आवाज़]

1:39मुरारी

1:40हे नाथ नारायण

1:44वासुदेवा [गाना गाने की आवाज़]

1:46[संगीत]

1:47श्री कृष्ण गोविंद

1:50हरे [गाना गाने की आवाज़] मुरारी

1:53[संगीत] हे नाथ नारायण

1:57वासुदेवा

1:59श्री कृष्ण [गाना गाने की आवाज़] गोविंद

2:03[संगीत] हरे मुरारी

2:06हे नाथ

2:08नारायण

2:10वासुदेवा [गाना गाने की आवाज़]

2:12श्री कृष्ण गोविंद

2:16हरे [गाना गाने की आवाज़] मुरारी

2:19हे नाथ नारायण

2:22[संगीत][गाना गाने की आवाज़] वासुदेवा

2:25हे नाथ नारायण [गाना गाने की आवाज़]

2:29वासुदेवा

2:31हे नाथ नारायण [गाना गाने की आवाज़]

2:35वासुदेवा

2:37[संगीत]

2:38हे नाथ नारायण

2:41वासुदेवा [गाना गाने की आवाज़]

2:44हे नाथ नारायण

2:47[गाना गाने की आवाज़] वासुदेवा

2:50हे नाथ नारायण

2:54वासुदेवा [गाना गाने की आवाज़]

2:56हे नाथ नारायण

3:00वासुदेवा

3:02हे [संगीत] नाथ नारायण

3:05[गाना गाने की आवाज़]

3:06वासुदेवा

3:08[संगीत]

3:09हे नाथ [गाना गाने की आवाज़] नारायण

3:12वासुदेवा

3:15श्री कृष्ण गोविंद [गाना गाने की आवाज़]

3:18हरे मुरारी

3:21हे नाथ नारायण

3:25[गाना गाने की आवाज़] वासुदेवा

3:27श्री कृष्ण [संगीत] गोविंद

3:29[गाना गाने की आवाज़]

3:31हरे मुरारी

3:34हे नाथ [गाना गाने की आवाज़]

3:35नारायण

3:37वासुदेवा

3:40हे सृष्टि [संगीत][गाना गाने की आवाज़]

3:41सारे

3:43यही पुकारे

3:46हे सृष्टि सारे [गाना गाने की आवाज़]

3:49यही पुकारे

3:52हे नाथ [संगीत]

3:54नारायण

3:56वासुदेवा

3:59ये श्रेष्ठ [संगीत]

4:00सारे [गाना गाने की आवाज़]

4:02यही पुकारे

4:04[संगीत] हे नाथ [गाना गाने की आवाज़]

4:06नारायण

4:08वासुदेवा

4:11है [गाना गाने की आवाज़] सृष्टि सारे

4:14यही पुकारे [गाना गाने की आवाज़]

4:17हे नाथ नारायण

4:21वासुदेव [गाना गाने की आवाज़]

4:23ये सृष्टि [संगीत]

4:25सारी

4:27यही पुकारे [गाना गाने की आवाज़]

4:29हे नाथ नारायण

4:33वास वासुदेव

4:35श्री कृष्ण गोविंद

4:38हरे [गाना गाने की आवाज़] मुरारी

4:42हे नाथ नारायण

4:45[गाना गाने की आवाज़] वासुदेवा

4:48श्री कृष्ण गोविंद

4:51हरे [संगीत][गाना गाने की आवाज़]

4:52मुरारी

4:54हे नाथ नारायण

4:58वासुदेवा [गाना गाने की आवाज़]

4:59[संगीत]

5:00श्री कृष्ण गोविंद

5:03हरे मुरारी

5:06हे नाथ नारायण

5:10वासुदेवा

5:12श्री कृष्ण [संगीत][गाना गाने की आवाज़]

5:14गोविंद

5:15हरे मुरारी

5:18हे नाथ [गाना गाने की आवाज़][संगीत]

5:20नारायण

5:22वासुदेवा

5:24तुम ही [गाना गाने की आवाज़] हो माता

5:27पिता हमारे

5:30तुम ही हमारे माता [गाना गाने की आवाज़]

5:33पिता हमारे

5:36हे नाथ [संगीत][गाना गाने की आवाज़]

5:38नारायण

5:40वासुदेव

5:43तुम [संगीत] ही हो माता

5:44[गाना गाने की आवाज़]

5:46पिता हमारे

5:49हे नाथ नारायण

5:52[गाना गाने की आवाज़] वासुदेव

5:54[संगीत]

5:55तुम ही हमाता

5:58पिता [गाना गाने की आवाज़] हमारे

6:01है नाथ नारायण

6:04वासुदेव [गाना गाने की आवाज़]

6:06[संगीत]

6:07तुम ही हो माता पिता [गाना गाने की आवाज़]

6:11हमारे

6:13हे [संगीत] नाथ नारायण

6:16वासुदेवा

6:19श्री कृष्ण गोविंद [संगीत]

6:22हरे मुरारी

6:24हे नाथ [गाना गाने की आवाज़]

6:26नारायण

6:28वासुदेवा

6:30[संगीत]

6:30श्री कृष्ण गोविंद

6:34हरे [गाना गाने की आवाज़]

6:35मुरारी [संगीत]

6:36हे नाथ नारायण

6:40वासुदेवा

6:42श्री कृष्ण [गाना गाने की आवाज़] गोविंद

6:45[संगीत] हरे मुरारी

6:48हे नाथ [गाना गाने की आवाज़] नारायण

6:51वासुदेवा

6:54श्री कृष्ण गोविंद हरे [संगीत]

6:57मुरारी

6:59हे नाथ [गाना गाने की आवाज़] नारायण

7:01[संगीत]

7:03वासुदेवा

7:05हे नाथ [संगीत] नारायण

7:07[गाना गाने की आवाज़]

7:08वासुदेवा

7:10हे नाथ नारायण

7:14वासुदेवा

7:16हे नाथ नारायण

7:19वासुदेवा [संगीत][गाना गाने की आवाज़]

7:21हे नाथ नारायण [संगीत]

7:25वासुदेवा

7:27हे नाथ नारायण

7:30वासुदेव, [गाना गाने की आवाज़][संगीत]

7:33हे नाथ नारायण

7:36वासुदेवा, [गाना गाने की आवाज़]

7:38हे नाथ नारायण

7:42वासुदेवा,

7:43[संगीत]

7:44हे नाथ नारायण [गाना गाने की आवाज़]

7:47वासुदेवा,

7:49श्री कृष्ण [संगीत] गोविंद हरे मुरारी

7:55हे नाथ [गाना गाने की आवाज़][संगीत] नारा

7:56नारायण

7:58वासुदेवा

8:00श्री [संगीत] कृष्ण गोविंद हरे मुरारी

8:05[संगीत] हे नाथ नारायण

8:08वासुदेवा [गाना गाने की आवाज़]

8:10श्री कृष्ण गोविंद हरे

8:13[गाना गाने की आवाज़]

8:14मुरारी

8:16हे नाथ नारायण

8:19[गाना गाने की आवाज़] वासुदेवा [संगीत]

8:21श्री कृष्ण गोविंद [गाना गाने की आवाज़]

8:23हरे मुरारी

8:26हे नाथ [संगीत] नारायण

8:29वासुदेवा

8:38राधे राधे श्री राधे श्री राधे श्री राधे

8:42अलबेली सरकार की

8:45जय

8:46श्रीमद् सद्गुरु सरकार की

8:49जय

8:51उपनिषद ज्ञानमृत के नवम दिवस पर आप सभी

8:56साधक जन का हृदय पूर्वक स्वागत है, नमन

9:00है। सबसे पहले उन सभी साधक जन को हार्दिक

9:06बधाई जो प्रतिदिन समय से पूर्व और समय पर

9:12उपस्थित हो जाते हैं। प्रवचन श्रवण हेतु।

9:18अब तक की इस

9:21अब तक की इस ज्ञान यात्रा में हमने अनेक

9:25महत्वपूर्ण विषय को समझा। सबसे पहले मानव

9:29देह के महत्व को जाना। क्या यह मनुष्य

9:33जीवन देव दुर्लभ है? और अन्य शरीर की

9:38अव्याख्या भगवत प्राप्ति के लिए इतना

9:42महत्वपूर्ण है। फिर हमने

9:46अपने जीवन के वास्तविक लक्ष्य को समझा। वह

9:51क्या है? उसे कैसे जाना जाए और कैसे

9:55प्राप्त किया जाए।

9:59इसके बाद हम लोग

10:03संसार के स्वरूप को समझा। इन विषय को

10:07समझते समझते हमारे भीतर भी एक नया

10:11दृष्टिकोण विकसित होने लगता है। भ्रम के

10:15स्थान पर स्पष्टता, आसक्ति के स्थान पर

10:19वैराग्य और संसार के साथसाथ प्रभु के

10:23प्रति बढ़ता हुआ आकर्षण।

10:28यह संभव हुआ क्योंकि हमारे गुरुदेव

10:33समन्यचार्य जगतगुरु उत्तम श्री कृपालु जी

10:37महाराज जी ने वेद शास्त्र का अद्भुत

10:40दार्शनिक समन्य प्रस्तुत किया और पूजनीय

10:44देवी जी के

10:47देवी जी ने उसी सिद्धांत को इतने सरल और

10:51सहज रूप में हमारे सामने रखा कि हम उसे

10:56अपने जीवन में धारण कर सके।

11:04श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी

11:09[गाना गाने की आवाज़]

11:11हे नाथ नारायण

11:14वासुदेवा

11:16श्री कृष्ण गोविन्द [संगीत]

11:19हरे मुरारी

11:22हे नाथ नारायण

11:24[गाना गाने की आवाज़][संगीत]

11:25वासुदेवा

11:27श्री कृष्ण [गाना गाने की आवाज़] गोविंद

11:30[संगीत] हरे जय मुरारी

11:33हे नाथ [गाना गाने की आवाज़] नारायण

11:36वासुदेव

11:38श्री कृष्ण [संगीत] गोविंद हरे मुरारी

11:44हे नाथ [गाना गाने की आवाज़] नारायण

11:47वासुदेवा [संगीत]

11:49अचुतम [गाना गाने की आवाज़] केशवम कृष्ण

11:52दामोदरम [संगीत]

11:54राम नारायणम

11:57जानकी वल्लभम

12:00अचुतम

12:01केशवम कृष्ण दामोदरम

12:05[गाना गाने की आवाज़] राम नारायणम

12:07[संगीत] जानकी वल्लभम अचुतम केशवम [संगीत]

12:13कृष्ण

12:14[गाना गाने की आवाज़]

12:14दामोदरम

12:16राम नारायणम [संगीत]

12:18जानकी [गाना गाने की आवाज़]

12:20वल्लभम

12:21अचुतम केशवम कृष्ण दामोदरम

12:25[संगीत][गाना गाने की आवाज़]

12:27राम नारायणम

12:30जानकी [संगीत] वल्लभ [गाना गाने की आवाज़]

12:33श्री कृष्ण गोविंद हरे

12:35[संगीत][गाना गाने की आवाज़]

12:36मुरारी

12:38हे नाथ नारायण

12:41[संगीत] वासुदेवा

12:44श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी [संगीत]

12:49हे नाथ नारायण [गाना गाने की आवाज़]

12:52वासुदेवा

12:54[संगीत]

12:54श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हरे हे नाथ

13:01नारायण

13:03वासुदेवा

13:05श्री कृष्ण गोविंद [संगीत] हरे मुरारी

13:10हे नाथ नारायण

13:12[गाना गाने की आवाज़][संगीत]

13:14वासुदेवा

13:16हे नाथ नारायण

13:19वासुदेवा [गाना गाने की आवाज़]

13:20[संगीत]

13:21हे नाथ नारायण

13:24वासुदेवा [संगीत]

13:26हे नाथ [गाना गाने की आवाज़] नारायण

13:28नारायण वासुदेवा [संगीत]

13:32हे नाथ नारायण

13:34[गाना गाने की आवाज़][संगीत] वासुदेवा

13:37हे नाथ नारायण

13:40वासुदेवा

13:42हे नाथ [गाना गाने की आवाज़] नारायण

13:46वासुदेव

13:48हे नाथ [संगीत][गाना गाने की आवाज़]

13:49नारायण

13:51वासुदेवा

13:53हे नाथ नारायण

13:56[संगीत][गाना गाने की आवाज़] वासुदेवा

13:58श्री कृष्ण गोविंद हरे

14:01[गाना गाने की आवाज़]

14:02मुरारी

14:03हे नाथ [संगीत] नारायण

14:07वासुदेवा

14:09श्री कृष्ण गोविंद

14:11[संगीत][गाना गाने की आवाज़] हरे मुरारी

14:14हे नाथ नारायण

14:17वासुदेवा [गाना गाने की आवाज़]

14:19राधे [संगीत] कृष्ण राधे कृष्ण राधे कृष्ण

14:22राधे राधे कृष्ण राधे कृष्ण राधे राधे

14:27कृष्ण कृष्ण कृष्ण राधे कृष्ण राधे कृष्ण

14:30[संगीत] राधे [गाना गाने की आवाज़] राधे

14:32कृष्ण कृष्ण राधे कृष्ण राधे कृष्ण राधे

14:35[गाना गाने की आवाज़] राधे कृष्ण कृष्ण

14:37राधे कृष्ण राधे [संगीत] कृष्ण राधे राधे

14:41कृष्ण कृष्ण राधे कृष्ण राधे कृष्ण

14:44[संगीत]

14:44राधे राधे कृष्ण कृष्ण राधे कृष्ण राधे

14:48कृष्ण [संगीत] राधे राधे कृष्ण कृष्ण राधे

14:52कृष्ण राधे कृष्ण राधे राधे कृष्ण कृष्ण

14:55[संगीत]

14:55राधे कृष्ण राधे राधे कृष्ण राधे राधे

14:59कृष्ण कृष्ण राधे कृष्ण राधे कृष्ण राधे

15:03राधे [संगीत] कृष्ण कृष्ण

15:04राधे कृष्ण राधे कृष्ण राधे राधे [संगीत]

15:07कृष्ण कृष्ण राधे कृष्ण राधे कृष्ण राधे

15:11राधे कृष्ण [संगीत] कृष्ण

15:13राधे कृष्ण राधे कृष्ण राधे राधे

15:16[गाना गाने की आवाज़] कृष्ण [संगीत] कृष्ण

15:17राधे कृष्ण राधे कृष्ण राधे राधे कृष्ण

15:21कृष्ण [संगीत]

15:22राधे कृष्ण राधे कृष्ण राधे राधे कृष्ण

15:25कृष्ण राधे राधे कृष्ण राधे कृष्ण [संगीत]

15:28राधे राधे कृष्ण कृष्ण राधे कृष्ण राधे

15:32कृष्ण राधे राधे

15:33[संगीत][गाना गाने की आवाज़] कृष्ण राधे

15:35कृष्ण राधे कृष्ण राधे राधे कृष्ण कृष्ण

15:39राधे कृष्ण राधे [संगीत] कृष्ण

15:45[संगीत]

15:46श्रीमद् पद वाक्य प्रमाण

15:50पवार

15:52[गाना गाने की आवाज़][संगीत]

15:55वेद

15:56[गाना गाने की आवाज़]

15:56मार्ग [संगीत]

15:57प्रतिष्ठापनाचार्य

16:00[गाना गाने की आवाज़]

16:04निखिल दर्शन [संगीत]

16:06समन्वयचार्य

16:10[संगीत]

16:12सनातन वैदिक धर्म प्रतिष्ठावन

16:19[संगीत][घंटी की आवाज़] सत

16:19[गाना गाने की आवाज़] संप्रदाय

16:23परमाचार [बड़बड़ाने की आवाज़]

16:27भक्ति योग रसावतार

16:32[संगीत][गाना गाने की आवाज़]

16:34भगवत अनंत श्री विभूषित

16:37[गाना गाने की आवाज़]

16:39जगत गुरु एकज

16:44स्वामी श्री कृपालु [गाना गाने की आवाज़]

16:46जी महाराज [संगीत]

17:27उपनिषद ज्ञान अमृत के नवम दिवस पर आप सभी

17:31का स्वागत है। अभिनंदन है। देवी जी हमारे

17:36बीच मंचासीन है। अब मैं यहां उपस्थित

17:40आदरणीय अतिथि गणों से निवेदन करती हूं कि

17:43एक-एक करके मंच पर पधारे और पूजनीय देवी

17:47जी का श्रद्धा सुमन अर्पित करें। सबसे

17:51प्रथम श्रीमती शेषराज हरवंश विधायक

17:55पामगढ़।

18:07शेष राज हरिवंश विधायक पामगढ़

18:24चंद्रशेखर देवांगन जी प्रांत कारवा

18:28छत्तीसगढ़ आरएसएस प्रांत कारवा छत्तीसगढ़

18:35चंद्रशेखर देवांगन और उनके धर्मपत््री

18:39आरएसएस प्रांत कारवा छत्तीसगढ़

18:49श्री उदयन बेहार जी एडिशनल एसपी जांजगीर

18:53चांपा और श्रीमती ओजेशाह बेहार जी मंच पर

18:58आए और देवी [संगीत] जी को श्रद्धा सुमन

19:00अर्पित करें।

19:05श्री आरसी आरसी पांडे जी एवं श्रीमती

19:09पुष्पा देवी पांडे फाउंडर ज्ञान भारती

19:13स्कूल उत्कर्ष एंड ज्ञान भारती बीएड कॉलेज

19:17[संगीत] मंच पर आए और देवी जी

19:20[गाना गाने की आवाज़] को श्रद्धा सुमन

19:21अर्पित करें।

19:51[संगीत]

19:59जिनके वचनों में जगतगुरु श्री कृपालु जी

20:03महाराज के तत्व ज्ञान और जिनके भावों में

20:08उनकी करुणा झलकती है। ऐसी पूजनीय देवी जी

20:13के श्री चरणों में सभी उपस्थित जिज्ञासु

20:18जनों की ओर से [संगीत] मैं अनुरोध करती

20:21हूं कि वह हमें उपनिषद ज्ञान

20:26धार ज्ञान धारा का प्रवाह करें और हम सब

20:31लोगों को तृप्त करें। राधे राधे [संगीत]

20:35हम्म

21:40कल्याण नाम

21:43निधानम [गाना गाने की आवाज़]

21:47कलिमल मथनम

21:50पावनम

21:55पावना

22:00पाथेयम [गाना गाने की आवाज़]

22:02य मुुक्षो

22:05सपद परिपद प्राप्तय

22:10प्रस्थितस्य

22:15विश्रामस्थम [गाना गाने की आवाज़]

22:21कविवर वचसा

22:24जीवनम

22:28सज्जना

22:33बीजम धर्म धुमस प्रभवत

22:38भवता

22:42भूत

22:45[संगीत]

22:46राम

22:47नाम

22:53गुरुरा

22:58धना

23:01द

23:05गुरु परम दतम [गाना गाने की आवाज़]

23:11गुरु

23:14परतरम

23:17नास्त

23:19[गाना गाने की आवाज़]

23:22कृपा

23:26गुरवे

23:29नमः

23:38जिज्ञासु जीवात्माओं

23:41दैनिक नियमानुसार पहले थोड़ी देर भगवन नाम

23:45संकीर्तन कर लीजिए। पश्चात आप सबकी सेवा

23:50की जाएगी।

24:16ओम

24:54कृपा करो

24:57बरसाने वाली [गाना गाने की आवाज़]

25:03तेरी कृपा [गाना गाने की आवाज़] का भरोसा

25:07संभारी

25:11कृपा करो बरसाने

25:17[संगीत]

25:19तेरी कृपा का भरोसा हारी

25:23[गाना गाने की आवाज़]

25:27कृपा कर बरसाने [गाना गाने की आवाज़] वाली

25:35तेरी कृपा कृपा [संगीत] का

25:37[गाना गाने की आवाज़] भरोसा

25:39भारी

25:42कृपा करो बरसाने वाली

25:48[गाना गाने की आवाज़]

25:50तेरी कृपा [संगीत]

25:52का भरोसा

25:54भारी

25:58कृपा करो [गाना गाने की आवाज़] बरसाने

26:02वारी

26:06तेरी कृपा का भरोसा

26:10भारी

26:13कृपा कर बरसाने

26:17वाली [गाना गाने की आवाज़][संगीत]

26:21तेरी कृपा का [गाना गाने की आवाज़]

26:23भरोसा

26:25भारी

26:29कृपा करो बरसाने

26:33वारी

26:36तेरी [संगीत]

26:37कृपा का भरोसा

26:40भारी

26:44कृपा [गाना गाने की आवाज़] कर बरसाने

26:48[संगीत] वाली

26:51तेरी कृपा का भरोसा [गाना गाने की आवाज़]

26:56भारी

26:59कृपा कर बरसाने वाली

27:07तेरी कृपा का भरोसा [गाना गाने की आवाज़]

27:10[संगीत]

27:14कृपा [गाना गाने की आवाज़] करो बरसाने

27:18वाली

27:20[संगीत]

27:22तेरी कृपा का [गाना गाने की आवाज़]

27:24भरोसा

27:26[संगीत]

27:30कृपा कर बरसाने वाली

27:33[गाना गाने की आवाज़]

27:37तेरी कृपा का [गाना गाने की आवाज़] भरोसा

27:41[संगीत]

27:45कृपा [गाना गाने की आवाज़] करो बरसाने

27:48वाली

27:52तेरी कृपा का भरोसा

27:56भारी

28:16तेरा [संगीत]

28:17तन है कृपा का प्यारी।

28:24तेरा [गाना गाने की आवाज़]

28:25मन है कृपा [संगीत] का प्यारी।

28:31मेरा तन [संगीत] है कृपा का

28:34[गाना गाने की आवाज़]

28:35प्यारी

28:38[संगीत]

28:38तेरा मन है कृपा [गाना गाने की आवाज़] का

28:43प्यारी

28:46तेरा तन है कृपा का [संगीत] प्यारी।

28:54तेरा मन है [संगीत] कृपा का प्यारी

29:01[संगीत] तेरा तन है कृपा

29:04[गाना गाने की आवाज़]

29:04का प्यारी

29:09तेरा [गाना गाने की आवाज़]

29:10मन है [संगीत] कृपा का प्यारी

29:16कृपा कर बरसाने [गाना गाने की आवाज़] वाली

29:24तेरी कृपा का भरोसा [गाना गाने की आवाज़]

29:28भारी

29:31कृपा [संगीत]

29:32करो बरसाने वाली [गाना गाने की आवाज़]

29:36[संगीत]

29:39कृपा का भरोसा

29:42[गाना गाने की आवाज़][संगीत]

29:43भारी

29:46कृपा कर

29:52[संगीत]

29:59[संगीत]

30:11[संगीत]

30:15हो या ना हो अधिकारी

30:22सब [संगीत]

30:23पर कृपा कर प्यारी

30:29[संगीत]

30:30हो या ना [गाना गाने की आवाज़] हो अधिकारी

30:36[संगीत]

30:37सब पर कृपा करे प्यारी

30:45कोई हो या ना हो अधिकारी

30:52सब

30:53पर कृपा करे प्यारी [गाना गाने की आवाज़]

30:59हो या [संगीत] ना हो अधिकारी

31:07सब पर कृपा [संगीत]

31:10करे प्यारी

31:14सब [गाना गाने की आवाज़] पर कृपा करे

31:18प्यारी

31:19[संगीत]

31:22सब पर कृपा करे प्यारी

31:26[गाना गाने की आवाज़]

31:27[संगीत]

31:29सब पर कृपा करे प्यारी

31:36सब पर [गाना गाने की आवाज़]

31:38कृपा करे प्यारी

31:44कृपा [संगीत] कर बरसाने

31:48वाली

31:51[संगीत]

31:51तेरी कृपा का भरोसा [गाना गाने की आवाज़]

31:55भारी [संगीत]

31:58कृपा करो बरसाने [संगीत]

32:02वाली

32:06कृपा का भरोसा

32:13कृपा कर [संगीत]

32:15बरसाने वाली

32:20तेरी कृपा का भरोसा [संगीत]

32:24भारी

32:27कृपा कर बरसाने वाली

32:34[संगीत] तेरी कृपा का भरोसा

32:42कृपा करो बरसाने

32:45मारी

32:48[संगीत][गाना गाने की आवाज़]

32:48तेरी कृपा का भरोसा

32:52भारी [संगीत]

32:55कृपा कर बरसाने [गाना गाने की आवाज़]

32:59भारी

33:02तेरी कृपा का [गाना गाने की आवाज़] भरोसा

33:06हारी

33:09कृपा [संगीत]

33:10कर [गाना गाने की आवाज़] बरसाने

33:13वाली

33:16[गाना गाने की आवाज़]

33:16तेरी [संगीत]

33:17कृपा का भरोसा

33:20भारी

33:23कृपा करो बरसाने

33:25[गाना गाने की आवाज़][संगीत]

33:27वाली

33:30तेरी [संगीत]

33:31कृपा का भरोसा

33:37तेरी [संगीत][गाना गाने की आवाज़] कृपा का

33:39भरोसा भारी

33:43तेरी [गाना गाने की आवाज़][संगीत] कृपा का

33:46भरोसा हारी

33:50तू तो कृपा ही कृपा करे

33:55[संगीत]

33:57तू तो कृपा [गाना गाने की आवाज़] ही कृपा

34:00करे [संगीत] प्यारे

34:04तेरी कृपा का [संगीत] भरोसा

34:08[गाना गाने की आवाज़]

34:10तेरी कृपा

34:12[संगीत]

34:13भरोसा हारी

34:18कृपा [संगीत]

34:25कृपा [गाना गाने की आवाज़][संगीत]

34:32तू तो कृपा ही कृपा कर प्यारी

34:38[संगीत] तू तो कृपा ही कृपा मेरे प्यारे

34:45तेरी कृपा का भरोसा भारी

34:50[संगीत]

34:51तेरी कृपा का [गाना गाने की आवाज़] भरोसा

34:54भारी [संगीत]

34:57कृपा करो

35:00[संगीत] कृपा करो बरसाने

35:04वारी

35:06[संगीत]

35:08कृपा का भरोसा साई [गाना गाने की आवाज़]

35:13कृपा [संगीत] कर बरसा

35:15[गाना गाने की आवाज़]

35:16निहारी

35:20तेरी कृपा [संगीत]

35:21का भरोसाई

35:26[संगीत] तेरी कृपा का

35:28[गाना गाने की आवाज़] भरोसा

35:32[संगीत] तेरी कृपा का भरोसा

35:38तेरी तेरी कृपा [संगीत] की है

35:41[गाना गाने की आवाज़] बलिहारी।

35:45तेरी कृपा की है बलिहारी। [संगीत]

35:51तेरी कृपा की है बलिहारी। [संगीत]

35:57तेरी कृपा की है बलिहारी।

36:02[संगीत]

36:05बोलिए वृंदावन बिहारी लाल

36:08[गाना गाने की आवाज़] की

36:09जय।

36:10श्रीमद् सतगुरु सरकार की

36:13जय।

37:05अब आप लोग एकाग्रित होकर बैठे।

37:14उतष् जागृत

37:17प्राप्त वबत

37:21कठोपनिषद

37:24एक तीन 14

37:29उपनिषद के इस मंत्र की व्याख्या करते हुए

37:34अब तक आप लोगों को यह बताया गया

37:39इस जगत का प्रत्येक एक प्राणी

37:45एक उद्देश्य को लेकर ही निरंतर अविछिन्न

37:49रूप से

37:51दौड़ रहा है।

37:56उसकी कोई वस्तु खो गई

38:01और अनादि काल से उसी एक वस्तु के लिए

38:06निरंतर

38:09प्रयत्नशील है। वो पाना चाहता है उस वस्तु

38:12को और निरंतर प्रयत्न कर रहा है।

38:16उस एक वस्तु का नाम है

38:22सुख,

38:24आनंद,

38:26शांति, हैप्पीनेस, पीस।

38:31यह एक आनंद के ही सिनोनिम्स है।

38:34पर्यायवाची शब्द है।

38:38प्रत्येक जीवात्मा

38:40चाहे वह छोटी से छोटी चींटी हो, चाहे हम

38:44मनुष्य हो, चाहे देवता हो, चाहे सरस्वती,

38:48बृहस्पति हो, कोई भी हो।

38:55हैं आनंद

39:01अभी तक मिला नहीं

39:03इसीलिए तो प्रयत्नशील है

39:10आनंद की परिभाषा

39:14शास्त्रों द्वारा ज्ञात हुई

39:19पता चला यो भूमा त सुखम भूम सुखम

39:25आनंद उसको कहते हैं जो

39:29अनंत मात्रा का हो।

39:33दूसरा

39:37जो निरंतर बढ़ता जाए

39:41सीमित ना हो।

39:44तीसरा हमेशा के लिए हो परमानेंट

39:48टेंपरेरी ना हो। यह सब आनंद की परिभाषा के

39:53अंतर्गत पॉइंट्स आते हैं। उसी को आनंद

39:57कहते हैं। जो कभी घटे ना जो सदा के लिए

40:01रहे जिसके मिल जाने पर कभी दुख ना मिले

40:07उसको आनंद कहते हैं। असीम अपरिमेय।

40:14अब पता लगाया गया कि हम कैसा आनंद चाहते

40:18हैं।

40:22तो पता चला कि जीवात्मा भी सीमित आनंद

40:27नहीं चाहता।

40:29अंदर से आवाज यही आती है। मुझे सुख मिले

40:33तो सदा के लिए मिले।

40:37हमेशा के लिए मुझे सुख मिले तो कभी घटे ना

40:41सदा बढ़ता रहे।

40:44मुझे सुख मिले तो हमेशा के लिए मिले।

40:50थोड़ा सुख थोड़ा दुख थोड़ा सुख थोड़ा दुख यानी

40:55सुख दुख मिश्रित क्या हम चाहते हैं नहीं

41:00दुख नहीं चाहिए केवल सुख मिले

41:06तो

41:08ये सीमित

41:12सुख तो हम चाहते नहीं असीम सुख चाहते हैं

41:17टेंपरेरी सुख सुख हम चाहते नहीं परमानेंट

41:20चाहते हैं। तो सीधी सीधी बात है कि

41:24परमानेंट असीम तो केवल भगवान है।

41:31तो इसका मतलब एक प्रकार से

41:35हम जो सुख चाहते हैं वो भगवान ही है।

41:40हम अनंत मात्रा का चाहते हैं

41:44तो अनंत मात्रा के परिपूर्ण तो भगवान

41:49इसलिए भगवान का नाम भी वही है सच्चिदानंद

41:56भगवान की को ही तो आनंद कहते हैं। आनंद ही

41:59भगवान भगवान ही आनंद और यह जीवात्मा

42:03निरंतर आनंद चाहती है। अर्थात वो भगवान को

42:08ही चाहती है। एक प्रकार से इसलिए

42:14भगवत प्राप्ति होने पर ही यह जीवात्मा

42:18परिपूर्ण हो पाएगा। आनंदमय हो पाएगा।

42:22क्योंकि असीम परमानेंट

42:27आनंद तो भगवान को पाकर ही मिलेगा।

42:35भगवान मिलेंगे कैसे?

42:40यदि हमारा प्रयास अनंत आनंद को पाने का है

42:44और क्योंकि हम आत्मा यह आत्मा भगवान का

42:48अंश है

42:50तो जैसा भगवान का स्वभाव वैसा अंश का

42:54स्वभाव भगवान सच्चिदानंद यह आत्मा भी

42:58नित्य चैतन्य और आनंद चाहती है

43:03तो कैसे मिलेगा वो आनंद इसका पता लगाया

43:06गया तो पता चला कि

43:10भगवान तो

43:13हमारी इंद्रिय मन बुद्धि से अग्राह है।

43:17भगवान को हमारी प्राकृत इंद्रिय मन बुद्धि

43:20नहीं जान सकती। भगवान तो उनकी कृपा से ही

43:24मिलते हैं। किसी सौभाग्यशाली जीव पर भगवान

43:28जब कृपा कर देते हैं तो वो कृपा प्राप्त

43:33जीवात्मा भगवान को जान लेता है, देख लेता

43:36है कृत कृत हो जाता है।

43:42तो यह भगवत कृपा क्या तुलसी सुर मीरा नानक

43:46इनहीं पर हुई? क्या हम पर नहीं हो सकती?

43:50बिल्कुल हो सकती है।

43:53ध्यान रखिए भगवत कृपा कोई आकस्मिकी घटना

43:57नहीं है। कि एक्सीडेंटली किसी पर हो जाती

44:01है। जिस पर भगवान का दिल आया उस पर कर दिए

44:04भगवान कृपा। ऐसा नहीं

44:09तुलसी सूर मीरा नानक उन्होंने भी वही शर्त

44:13पूरी की

44:15जो शर्त कृपा पाने की है

44:19और वो शर्त है भगवत शरणागति

44:25भगवत कृपा पाने के लिए हमें भगवत शरणागति

44:29करनी पड़ेगी। शरणागति का अर्थ भी आप लोगों

44:33को बतलाया गया। शरणागति का मतलब होता है

44:37समर्पण। समर्पण किसको करना है?

44:41मन आत स्वम बुद्धि निवेश

44:46मन एवं बुद्धि दोनों का समर्पण हो।

44:53अर्थात जिस मन से हम योजनाएं बनाते हैं,

44:58संकल्प विकल्प करते हैं और जिस बुद्धि से

45:02हम निश्चय लेते हैं, डिसीजन लेते हैं,

45:07शरणागति का जब प्रसंग आता है तब चाहे

45:14भगवान बता रहे हो गीता में सर्वधर्मान

45:18परित्यज मामकम शरणम ब्रज तो वहां भगवान

45:24अर्जुन से यही कहते हैं कि अर्जुन

45:27अपने मन के विचार बंद करो। अर्थात

45:33तुम जो संकल्प विकल्प कर रहे हो

45:37तुम जो अपनी बुद्धि से डिसीजन ले रहे हो

45:41और कर्तापन पाले हुए हो। तुम्हें कर्तित

45:45अभिमान है। मैं करता हूं मैं करता हूं।

45:49तो जब तक कर्तापन रखोगे तो शरणागति नहीं

45:54मानी जाएगी। तब तुम जैसा कर्म करोगे वैसा

45:58फल प्राप्त होगा।

46:01लेकिन जब

46:03तुम अपने कर्तापन को त्याग कर अपने मन को

46:07मेरे मन से जोड़ दोगे। अपनी बुद्धि को

46:10मेरी बुद्धि से जोड़ दोगे। अर्थात

46:17अपने विचार बंद करो। अपना डिसीजन लेना बंद

46:21करो। मैं जो कहता हूं वो करो।

46:27तुम सोचना बंद कर दो।

46:30उदाहरण के तौर पर आप लोगों को बताया गया

46:32था। जैसे हम डॉक्टर के शरणागत होते हैं।

46:36जैसे हम टीचर के शरणागत होते हैं, तो

46:39डॉक्टर जैसा बताता है, वैसा करते हैं।

46:43अपनी बुद्धि का प्रयोग नहीं करते।

46:47इलाज हो जाता है। इसी को शरणागति कहते

46:51हैं।

46:53लेकिन जिस मन को हमें

46:57भगवान के समर्पित करना है, यह मन तो अनादि

47:02काल से

47:05संसार में आसक्त है। इसीलिए संसार विषय पर

47:12प्रकाश डाला गया और आपको बताया गया

47:17कि दो प्रकार का संसार होता है। एक बाहर

47:21का संसार और एक भीतर का संसार। बाहर का

47:26संसार, यह पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश का

47:30संसार यह भगवान ने बनाया है। यह सत्य है।

47:37यह भगवान की अपनी शक्ति,

47:41विद्या माया का प्रभाव है।

47:45लेकिन एक संसार हमारा मन बनाता है।

47:52मन में जो विचार उठते हैं जो आइडियाज बनते

47:56हैं, जो इमेजिनेशन, जो कल्पनाएं, जो

48:00योजनाएं, जो संकल्प आदि बनाते हैं हम।

48:05तो यह जो अंतःकरण में

48:09हमारे आइडियाज उठते हैं,

48:12यह

48:15आइडियाज

48:16मिथ्या है।

48:20हमारी कल्पनाएं

48:22यह सत्य नहीं, भगवान का बनाया हुआ संसार

48:26सत्य, हमारा बनाया हुआ संसार मिथ्या।

48:31और यह भी आपको बताया गया कि हम जो संसार

48:35बनाते हैं यह भीतर का संसार

48:39यह तीन गुणों का है। सत्वगुण, रजोगुण और

48:43तमोगुण।

48:44त्रिगुणात्मिका

48:46माया

48:48का प्रभाव है हमारे अंतःकरण पर।

48:54अविद्या माया इसको कहते हैं।

48:57तो हम सब लोग जितने भी कार्य कर रहे हैं

49:01इन तीन गुणों के आीन रहकर कर रहे हैं।

49:07इसीलिए

49:11जब हम संसार में उस अनंत सुख की खोज करने

49:16जाते हैं।

49:18अब इस संसार में वह अनंत सुख तो है नहीं।

49:24तो जो संग मिला

49:28जो दिखाई दिया

49:30वहीं पर हम

49:33वो सुख मांग रहे हैं।

49:39लेकिन सुख तो नहीं मिलता।

49:43है नहीं तो मिलता भी नहीं।

49:46परंतु एक घटना घट जाती है। स्त्री पति

49:50पुत्र आदि जब इनसे हम सुख की डिमांड करते

49:55हैं एक दूसरे से सुख तो नहीं मिलता। चाहे

49:59कोई वस्तु हो चाहे कोई व्यक्ति हो।

50:03लेकिन एक घटना घट जाती है। वह घटना है

50:07हमारी ममता हो जाती है।

50:13मोह

50:16और जब यह ममता हो जाती है, जब यह आसक्ति

50:19हो जाती है, तो यह मोह इतना गहरा हो जाता

50:23है, यह बंधन इतना अटूट हो जाता है, इतना

50:28गहरा

50:31मोह का बंधन कि इसमें हम बहते चले जाते

50:35है, बहते चले जाते हैं। यह इतना गहरा गर्त

50:39बन जाता है। इससे बाहर निकलना

50:43अत्यंत कठिन है।

50:46दुष्कर

50:48मैं तो कहूंगी असंभव है।

50:53ये ममता की डोर

50:55हमसे काटे ना कटेगी। यह आसक्ति हम सोचे हम

51:01छुड़ा लेंगे अपने बल से।

51:05नहीं हो सकता।

51:07बहुत कठिन बहुत कठिन

51:13इसीलिए

51:17शास्त्रों में बताया गया कि

51:21कोई भी जीव अपने आप

51:25ना मोह से छुटकारा पा सकता है ना अपने आप

51:32मन को भगवान में लगाकर उनसे प्यार कर सकता

51:35है।

51:39अपने आप संसार से वैराग्य नहीं हो सकता।

51:44अपने आप ईश्वर में अनुराग नहीं हो सकता।

51:51यह शास्त्रीय तरीके से समझ लीजिए और गवारी

51:55भाषा में मोह से छुट्टी अपने आप नहीं मिल

51:58सकती। भगवान से प्यार अपने आप नहीं हो

52:01सकता।

52:03तो क्या करें?

52:06कहां जाए, किससे पूछे, कौन बताएं?

52:10घबराने की जरूरत नहीं है। भगवान हमारी इस

52:14दुर्गति को दुरावस्था को जानते हैं।

52:19इसीलिए

52:21भगवान उसका उपाय करते हैं।

52:26हम सबके लिए उपाय है। तो भगवान ने उपाय

52:31किया।

52:37मानस रोग कछुक में गाए है सबके लखी बिरलनी

52:43पाए तुलसीदास जी ने भी यही बात कही

52:50हम सबके अंदर मानस रोग है मन के रोग

52:56और जब तक यह मन के रोग होंगे

53:01तो रोगी का जब तक इलाज इलाज नहीं होगा तो

53:05बीमारी छूटेगी नहीं। बीमारी छूटेगी नहीं

53:08तो बात कैसे बनेगी? स्वस्थ कैसे होंगे? तो

53:12तुलसीदास जी कहते हैं

53:16सब जानते हैं यह मानसिक रोगों को मन के

53:19विकारों को सब जानते हैं।

53:24लेकिन हम लोगों के साथ समस्या यह है।

53:32ये बड़ी जटिल समस्या है। समस्या यह है कि

53:36हमें अपने रोग दिखाई नहीं पड़ते।

53:42लेकिन

53:44आश्चर्य है कि दूसरे के रोग दिखते हैं।

53:50मुझ में यह कमी है यह दिखाई नहीं पड़ता।

53:53लेकिन हम कहते रहते हैं उसको देखो उसमें

53:56यह गड़बड़ी है। वो गड़बड़ी है। ऐसा है

53:59वैसा है। समझ में नहीं आता। इतनी बार कहा

54:03जाता है कैसा विचित्र है वो। हमें दूसरों

54:08के रोग दिखाई पड़ते हैं।

54:12लेकिन अपने रोग नहीं दिखते। यही तो जटिलता

54:16है। यदि हमें अपने रोग दिखाई पड़ जाए तो

54:22फिर हम उसका इलाज ना करें।

54:25जब अपने रोग दिखाई ही नहीं पड़ रहे तो फिर

54:30इलाज की सोचेंगे कैसे? आप ही बताइए।

54:35तो है सबके

54:38सब में वही रोग है सब में

54:43लेकिन लखी लखी माने देखना बिरल नहीं पाए

54:47बहुत कम

54:49यह रोग है इसको मानते

54:54पहली बात तो हम मानते ही नहीं कि रोग है

54:58यह गड़बड़ी है काम क्रोध लोभ मोह यह रोग

55:02है यही नहीं मानते

55:08तो हम लोगों के अंदर जो यह आसक्ति है, यह

55:12जो ममता है, यह जो मानस रोग है,

55:18यह रोग है, यह तो हमें दिखाई ही नहीं

55:21पड़ते। तो इसका इलाज ही नहीं हो पाता।

55:24इसीलिए मैंने आपसे कहा कि हम अपने बल से

55:30इसका इलाज कर ही नहीं पाएंगे। कभी भी नहीं

55:34हो सकता।

55:40इसीलिए इलाज बताया गया

55:44कि देखो तुम अपने साधन से

55:51उद्यम करके कोई कुछ पा सकते हो।

55:55उद्यम करके तुम पा सकते हो। प्रारब्ध में

55:59मिलना है पा सकते हो। जबरदस्ती चोरी करके

56:03पा सकते हो। छल कपट करके पा सकते हो। बल

56:08पूर्वक पा सकते हो। बहुत सारे उपाय हैं

56:13पाने के। एक ही चीज ऐसी है जिसको ना उद्यम

56:19से पाया जा सकता है, ना बल पूर्वक पाया जा

56:23सकता है, ना प्रारब्ध से पाया जा सकता है,

56:26ना छल कपट से पाया जा सकता है।

56:31और वह सामान क्या है? वह है गुरु।

56:37सगुरु।

56:41सतगुरु ऐसा तत्व है जो इन सब साधनों से

56:47मिलेगा नहीं।

56:50तुलसीदास जी कह रहे हैं

56:54अब मोहि भाव भरोस [गाना गाने की आवाज़]

57:00हनुमंता

57:02बिनु हरि कृपा

57:05मिलह नहीं [गाना गाने की आवाज़] संता

57:11पहली बात

57:13जब हरि की अनुकंपा होगी

57:17हरि की कृपा होगी तब तुमको तुम्हारे जीवन

57:22में संत मिलेंगे

57:27कैसे संत तो आगे कहते हैं संत विशुद्ध

57:33मिलह पुन तेह [गाना गाने की आवाज़]

57:37राम कृपा कर चित वही जेह

57:42जब राघव की किसी सौभाग्यशाली जीव पर

57:46दृष्टि पड़ जाएगी कि बहुत भटक चुका अघा

57:52गया बेचारा

57:55अब इस पर कृपा करनी चाहिए तो फिर हरि

57:59अनुकंपा करके विशुद्ध संत से मिलाते हैं।

58:04राधेधे राधे राधे

58:11यहां ये सब नहीं चलेगा।

58:18संत विशुद्ध मिलह पुनि ते राम कृपा करी

58:24चित वही जे

58:27विशुद्ध संत

58:30विशुद्ध संत से मतलब है ऐसा संत

58:36जो आपको

58:38भगवत प्राप्ति कराएगा।

58:42ऐसा संत जो यह आसक्ति छुड़ाएगा।

58:49ऐसा संत जो आपका इलाज करेगा।

58:56यह जो आसक्ति यह जो ममता अपने आप नहीं

58:59छूटती

59:01जो विशुद्ध संत होते हैं भगवत प्राप्त संत

59:05वही हमारी ममता छुड़ाने की ताकत रखते हैं।

59:10हमारी संसारी आसक्ति छुड़ाने की ताकत रखते

59:14हैं। और ईश्वर के प्रति प्रेम बढ़ाने की

59:19शक्ति रखते हैं। इसीलिए

59:23बिना भगवान की कृपा के आपको विशुद्ध संत

59:28नहीं मिल सकते। जब भगवान कृपा करते हैं तब

59:32विशुद्ध संत मिलते हैं।

59:37यह विशुद्ध संत में ताकत है।

59:42देखिए हम लोग

59:45संसार में रहते हैं। संत यह नहीं कहता कि

59:49संसार में रहना बुरा है। कभी नहीं कहता।

59:55यह मृत्यु लोक मिला है प्रारब्ध के अनुसार

59:59तो इसी संसार में रहना पड़ेगा और कहां

1:00:02जाएंगे कर्म बंधन से युक्त है

1:00:07तो यह संसार तो रहेगा

1:00:12और इसी संसार में हमको रहना भी है

1:00:17लेकिन

1:00:21हम संसार में रहे संसार को अपने में ना

1:00:26रखें।

1:00:29नहीं समझे आप लोग।

1:00:33नाव देखी है ना? नाव में

1:00:37बैठते हैं।

1:00:40और भी लोग आपके साथ बैठे हैं नाव में तो

1:00:44नाव पानी के ऊपर रहती है।

1:00:48तो जब नाव पानी के ऊपर तैरती है तो वह

1:00:52आपको पार करती है। और यदि नाव के अंदर

1:00:57पानी आ जाए तो

1:00:59आप भी डूबे जितने थे सब डूब गए।

1:01:04बस यही तो मैं कह रही हूं।

1:01:08हमको संसार मिला है। हमें इसी संसार में

1:01:12रहना है। लेकिन जैसे नाव पानी के ऊपर

1:01:18रहती।

1:01:21नाव में पानी नहीं चला जाए। ऐसे ही हम

1:01:24संसार में रहे। लेकिन संसार हम में ना आ

1:01:28जाए। यानी ममता यह आसक्ति।

1:01:33तो गुरु में वह ताकत है कि संसार हम में

1:01:38ना आए। हम संसार में रहे ऐसा विरक्त बनाकर

1:01:42वह रखते हैं। यह ताकत हम में नहीं उनमें।

1:01:48इसलिए कृपालु जी महाराज उन्होंने

1:01:52एक पंक्ति लिखी है

1:01:56कि गुरु में वह ताकत है रहत ना रह संसार।

1:02:02वो जीव इसी संसार में रहता है। लेकिन

1:02:06संसार में रहकर भी संसार वाला होकर नहीं

1:02:09रहता। वो व्यवहार करता है। अनासक्त भाव से

1:02:14रहता है। तो

1:02:18यह शक्ति

1:02:20एकमात्र

1:02:22गुरु में होती है। कैसे गुरु में? जो

1:02:26विशुद्ध संत है।

1:02:31इसलिए कबीर ने कहा

1:02:39कबीर कहते हैं

1:02:44कबीर ये मन काग था

1:02:48चुन चुन खाता मांस

1:02:52गुरु महिमा का वर्णन कर रहे हैं कबीर कबीर

1:02:56ये मन काग था चुन चुन खाता का मास

1:03:02अब ये

1:03:05हंसा भया

1:03:07अब मन हसा भया

1:03:12चुग चुग मोती खात

1:03:18जब

1:03:22मुझे सद्गुरु नहीं मिले थे तो मेरी यह

1:03:26अवस्था थी कि मैं कौवे के समान

1:03:32विष्ठा के पीछे दौड़ता था। विषयों के पीछे

1:03:36विष्ठा रूपी विषयों के पीछे दौड़ता भागता

1:03:40था।

1:03:42कामी क्रोधी लोभी के समान

1:03:45लेकिन जब से गुरु की दृष्टि पड़ गई और जब

1:03:50से गुरु ने अपने हाथों में मुझे ले लिया,

1:03:53अब मैं काग नहीं रहा। गुरु ने तो मुझे हंस

1:03:57बना दिया

1:03:59और ऐसा हंस बनाया

1:04:02कि इसी संसार में रहते हुए जब पहले मैं

1:04:06मांस खाता था अब इसी संसार में रह के मोती

1:04:12चुग लेता हूं।

1:04:14ऐसी कौन-कौन सी वस्तु है जिससे मेरा

1:04:17कल्याण होगा? बस उसको ले लेता हूं।

1:04:23तो इस प्रकार से

1:04:26एकमात्र

1:04:29गुरु ऐसी पर्सनालिटी सद्गुरु ऐसे

1:04:33व्यक्तित्व है

1:04:37जो हमारी संसारी आसक्ति छुड़ाएंगे

1:04:42और जो ईश्वर में अनुराग कराएंगे।

1:04:48इसीलिए गुरु महिमा के विषय में बताया गया

1:04:56कि गुरु तत्व के समान तत्व कुछ नहीं। उससे

1:05:01आगे कोई तत्व नहीं।

1:05:06नास्त तत्वम गुरु समम नास्त तत्वम गुरु

1:05:11समम

1:05:12गुरु तत्व के समान कोई तत्व नहीं।

1:05:19श्रीमद् भागवत कहती है

1:05:23आचार्य माम विजानी

1:05:27नाव मन्यत करित

1:05:33अर्थात

1:05:35श्री कृष्ण कह रहे हैं

1:05:38आचार्य को

1:05:41ना तो मुझसे बड़ा मानो ना मुझसे छोटा मानो

1:05:48ना मेरे बराबर मानो

1:05:51तो क्या माने

1:05:54आचार्य माम

1:05:57मैं ही आचार्य रूप में तुम्हारे सामने

1:06:01खड़ा हूं यह मानो

1:06:06अर्थात कहने का तात्पर्य श्रीमद् भागवतम

1:06:10में श्रीमद् भागवत कहती है कि

1:06:14भगवान और गुरु में कोई भेद नहीं।

1:06:19यह दोनों अभिन्न तत्व है। क्यों? क्योंकि

1:06:22भगवान कहते हैं देखो यह मेरा लॉ है। यह

1:06:26मेरा कानून है कि मैं

1:06:30किसी को भी डायरेक्ट नहीं मिलता।

1:06:38विशुद्ध संत के द्वारा ही मिलता हूं।

1:06:41इसीलिए शास्त्रों में बार-बार बताया गया।

1:06:46भगवान कहते हैं

1:06:50मैं ही स्वयं अपने

1:06:53जनों को इस जगत में भेजता हूं। जीव के

1:06:57कल्याणार्थ

1:06:59जीवो के उद्धार के लिए।

1:07:06हो जाए और मुझको प्राप्त कर ले

1:07:12क्योंकि संत जो होता है वह हमारी दशा को

1:07:17भलीभांति समझता है।

1:07:20इसलिए वह हमारे लेवल में आ जाता है। हमारे

1:07:23लेवल में हमारे स्तर में आकर हमारी हर चीज

1:07:27को समझता है

1:07:30और फिर

1:07:33हमारा कल्याण करता है।

1:07:36इसीलिए

1:07:38भगवान कहते हैं अनुप्रजा नित्यम पू तंग

1:07:44रेणु भी मैं इतना ऋणी हूं उस संत के प्रति

1:07:48मैं बार-बार संत जब कहती हूं तो यह आपको

1:07:52ध्यान रखना है कि मैं विशुद्ध संत की बात

1:07:56कर रही हूं। भगवत प्राप्त संत

1:08:00ये आप ध्यान रखेंगे।

1:08:03तो अनुप्रजा में हम नित्यम

1:08:07तंग रेणु भी

1:08:11भगवान कहते हैं मैं तो इतना ऋणी हूं

1:08:16कि मैं उसके पीछे पीछे चलता हूं

1:08:21कि उसकी चरण धूल उड़े और मुझ पर पड़ जाए।

1:08:26इतने ऋणी है भगवान अपने निज जन के

1:08:32क्योंकि

1:08:35भगवान को सर्वाधिक प्रिय है कि जीव को

1:08:40उनकी ओर उन्मुख कर देना

1:08:44ताकि जीव जो अनादि काल से भटक रहा है वह

1:08:48मेरी संतान है। मेरा अपना बच्चा है। भटक

1:08:53गया है बेचारा। वह अपने घर आ जाए। अपने घर

1:08:57लौट जाए। अपने माता-पिता को पा ले।

1:09:03तो

1:09:05भगवान बड़े प्रसन्न होते हैं। इसीलिए

1:09:08भगवान कहते हैं कि वो आचार्य मेरा ही

1:09:12स्वरूप है। तुम उसके शरणागत हो जाओ।

1:09:20भ्रमते भ्रमित यदि साधु वैद्य पाए

1:09:26तार उपदेश मंत्र पिशाची पलाए

1:09:32चैतन्य महाप्रभु जी ने कहा

1:09:37भटकते भटकते भटकते भटकते कभी हरि कृपा से

1:09:42तुमको तुम्हारे जीवन में संत मिल जाए

1:09:46संत कैसे साधु वैद्य पाए वो संत वैद्य है

1:09:54और उस वैद्य से यदि तुम्हारा इलाज हो गया

1:09:58तो क्या होगा

1:10:02यह त्रिगुणात्मिका माया ये त्रिगुण

1:10:05त्रिकर्म त्रिदोष पंच क्लेश पंचकोष ये आदि

1:10:09व्याधि ये दुख ये क्लेश सब मिट जाएंगे

1:10:17जो वैद्य होता है ना

1:10:21उसका क्या स्वभाव होता है जब वैद्य या

1:10:25डॉक्टर आपके घर आता है तो यह नहीं देखता

1:10:29कि आपका ड्राइंग रूम कितना सजा हुआ है।

1:10:34वो यह नहीं देखता कि आपका बेडरूम कैसा है।

1:10:39पर्दे कैसे लगे हुए हैं। कितनी सजावट है।

1:10:42इससे डॉक्टर को कोई मतलब नहीं।

1:10:45डॉक्टर केवल रोगी से मतलब रखता है

1:10:51और रोगी को देख के यह जानना चाहता है कि

1:10:55रोगी ने क्या कुपथ किया है जिसके कारण यह

1:10:59रोग हुआ कोई लल्लो चप्पो नहीं

1:11:05वो तो जानना चाहता है इसीलिए वो बार-बार

1:11:08कुरेद कुरेद के पूछता

1:11:11क्या गड़बड़ी की थी क्या किया था जिससे से

1:11:14यह हुआ।

1:11:17तो यह जो बार-बार बार-बार कुरेत कुरेद के

1:11:20पूछ रहा है ऐसा नहीं है कि वो रोगी का

1:11:23अपमान करना चाहता है। वो अपमान करना नहीं

1:11:27चाहता।

1:11:29वास्तव में यदि वैद्य या डॉक्टर पूछेगा

1:11:34नहीं रोगी से तो फिर सही सही चिकित्सा

1:11:38कैसे होगी?

1:11:41इसलिए बहिरंग बातों से डॉक्टर को कोई मतलब

1:11:45नहीं। उसको तो रोगी से मतलब है। ऐसे ही

1:11:49सद्गुरु

1:11:52वो वैद्य है।

1:11:54उसको जीवात्मा से मतलब है। उसके इलाज से

1:11:58मतलब है।

1:12:00इसलिए

1:12:02वैद्य के जैसे वचन पर हम चलते हैं। उसके

1:12:06एडवाइस पर अपनी बुद्धि नहीं लगाते। ऐसे ही

1:12:10संत के जो वचन है वही है

1:12:18तेज किरण

1:12:20वो तेज बाण जो आपके उर में जाकर भेदती है

1:12:25आपका इलाज करती है इसीलिए गुरु के वाक्यों

1:12:29पर

1:12:31विश्वास करना है वो जैसा कहते हैं वो वेद

1:12:36वाक्य है उसका पालन करना

1:12:41मुख्यतस्तु महत कृप

1:12:45नारद जी ने अपने नारद भक्ति दर्शन में कहा

1:12:50यदि जीव के जीवन में मुख्य रूप से कोई

1:12:55अनुकंपा हुई है तो वो अनुकंपा है भगवान की

1:12:59कि उसको जीवन में वास्तविक संत मिल गए।

1:13:03वास्तविक संत की कृपा क्योंकि

1:13:07केवल तुम अपने साधन के बल से

1:13:13माया को पार नहीं कर सकते।

1:13:16माया को जीतने के लिए

1:13:20तुम्हें संत की परमावश्यकता है।

1:13:25इसलिए यदि कोई पूछता है ना कि हमें गुरु

1:13:29की

1:13:30आवश्यकता क्यों है? मैं कहती हूं कि गुरु

1:13:34की आवश्यकता की बात मत कीजिए। हमें गुरु

1:13:38की आवश्यकता नहीं अनिवार्यता है।

1:13:43आवश्यकता तो छोटी चीज है। अनिवार्यता है।

1:13:49सतर सतरति सलोकति

1:13:53नारद भक्ति दर्शन

1:13:56इतनी सुंदर बात नारद जी ने बतलाई।

1:14:00आप उदाहरण से समझेंगे।

1:14:03नारद जी कहते हैं कि देखो हम जीवों की

1:14:06क्या दशा है।

1:14:10मैं उदाहरण से आपको समझाती हूं।

1:14:14मुझे यह बताइए कि एक स्त्री

1:14:18एक मां एक मां का बेटा मर गया।

1:14:25अपने पुत्र के देहांत में वह मां रो रही

1:14:29है चीख चीख कर और उसका जो दुख है उसको कोई

1:14:34जगत में

1:14:36उसकी पूर्ति नहीं कर सकता।

1:14:40यहां तक कि

1:14:43अनेक बच्चे उस मां की गोद में समर्पित कर

1:14:47दीजिए तो भी क्या उस मां का दुख चला

1:14:51जाएगा? मुझे बताइए

1:14:55नहीं जा सकता।

1:14:57तो यह क्या है? यह संसार का दुख मोह।

1:15:05तो हजारों मांओं के बच्चों को भी उस मां

1:15:09को दे देंगे तो उस मां के दुख को हम दूर

1:15:12नहीं कर सकते। हम में वह कैपेसिटी नहीं

1:15:16है, योग्यता नहीं है।

1:15:19लेकिन नारद जी कह रहे हैं

1:15:22सतरति सतरति सलोक

1:15:31ज्ञान और भक्ति

1:15:34ज्ञान से मतलब शास्त्रों का ज्ञान

1:15:38तत्वज्ञान

1:15:39और भक्ति

1:15:42इन दोनों में इतनी ताकत है, इतनी शक्ति है

1:15:51कि उसी मां के दुख को दुख का निदान कर

1:15:55सकती है।

1:16:00लेकिन ध्यान दीजिए

1:16:03यह ज्ञान और यह भक्ति इसमें शक्ति है। ऐसी

1:16:08शक्ति

1:16:12जो दुख को दूर कर सकती है। लेकिन वही

1:16:16ज्ञान और भक्ति यदि अधूरी होगी और उसको हम

1:16:21उस मां को कहेंगे तो दूर नहीं होगी।

1:16:25लेकिन एक गुरु एक सतगुरु एक वास्तविक संत

1:16:29भगवत प्राप्त संत जब वही ज्ञान देता है

1:16:36वह भक्ति का प्रकाश करता है

1:16:41तो उस मां का दुख

1:16:45चला जाता है

1:16:48और इसका उदाहरण है

1:16:52जब बाली मारा गया

1:16:55और तारा बैठ के रो रही थी

1:16:59अज्ञानता के कारण तो प्रभु राम ने तारा से

1:17:04कहा क्यों रो रही हो

1:17:07तो वो कहती है मेरे पति मर गए

1:17:11तब प्रभु राम ने क्या किया था?

1:17:16कह लगी तुम रोवा क्यों रो रही हो? तो

1:17:20प्रभु राम ने क्या किया था? ज्ञान दिया

1:17:22था। लेकिन देने वाला कौन है? समर्थ।

1:17:26तो प्रभु राम ने ज्ञान दिया। यदि तू बाली

1:17:30को शरीर मानती है तो पड़ा है। रोती क्यों

1:17:36है? प्यार कर ले। जी ले।

1:17:41और यदि तू

1:17:44यह मानती है कि बाली

1:17:47मेरा हो गया, मेरे चरणों में आ गया और यह

1:17:50शरीर तो मिट्टी है।

1:17:54तो इस मिट्टी के लिए मैं क्यों रो रही

1:17:56हूं?

1:17:58तो फिर रोना बंद कर। देखिए आप और मैं यह

1:18:03ज्ञान किसी को दे, किसी के घर में मृत्यु

1:18:06हो तो यह स्वीकार्य नहीं होगा।

1:18:11लेकिन भगवान या भगवान के सदृश्य गुरु

1:18:15जब वो यह ज्ञान देते हैं तो भेद देता है उ

1:18:19में जाकर वो ज्ञान का प्रकाश हो जाता है

1:18:24वही तारा जो रो रही थी बाली के लिए वही

1:18:29तारा प्रभु राम से कहती है मुझे भक्ति का

1:18:32दान दीजिए और उसने भक्ति मांगी

1:18:36ये कमाल सतरती सतरती

1:18:40लोक

1:18:42यही गुरु अपने ज्ञान और भक्ति के द्वारा

1:18:47स्वयं तो तरा ही हुआ है। वो लोक को तार

1:18:51देता है।

1:18:54तो यह कमाल है।

1:18:58कस्तरति कस्तरति माया

1:19:03इस माया से पार कौन कर सकता है?

1:19:11कौन पार जा सकता है इस माया के?

1:19:17तो नारद जी का यह भक्ति सूत्र है। वह पूछ

1:19:20रहे हैं कौन माया के पार जा सकता है? कौन

1:19:24माया के पार जा सकता है? तो उत्तर में वो

1:19:28कहते हैं

1:19:31कि जो महापुरुष की महानुभावम

1:19:35सेवम महानुभाव सेवम जो महापुरुष की सेवा

1:19:41करता है जो महापुरुष के बताए

1:19:48बताए आज्ञाओं पर उनके नक्शे कदम पर चलता

1:19:52है

1:19:54अस्तु

1:19:58गुरु तत्व के विषय में यह बतलाया गया कि

1:20:01देखो गुरु कैसा होना चाहिए इसको पहले

1:20:06समझो।

1:20:11हम लोगों ने अपने जीवन में अनाधिकार

1:20:14चेष्टा की। वह अनाधिकार चेष्टा यह थी कि

1:20:19हमने कभी किसी को

1:20:23अपने से ऊपर माना ही नहीं। अपने से ऊपर

1:20:27अथॉरिटी माना ही नहीं। अहंकार के कारण हम

1:20:31झुके ही नहीं। हमने स्वयं को ही गुरु

1:20:34माना।

1:20:37ये अनाधिकार चेष्टा हुई।

1:20:42लेकिन श्री कृष्ण कहते हैं अर्जुन से त

1:20:46प्रणिपाते परिवया

1:20:50उपदेशते

1:20:52ते ज्ञानम ज्ञानस तत्वदर्श

1:20:57अर्जुन

1:21:00यदि तुम ईश्वरीय ज्ञान को पाना चाहते हो

1:21:04और अपना कल्याण चाहते हो तो तुम्हें तीन

1:21:08चीजें करनी होंगी।

1:21:12सबसे पहले

1:21:17अपने से उत्तम ज्ञान वाले को तुम्हें

1:21:22जितना ज्ञान है उससे ऊपर ज्ञान वाला जो है

1:21:27जिसको तुम अथॉरिटी मानो जिसके सामने तुम

1:21:31झुक जाओ ईश्वरीय ज्ञान वाला

1:21:39प्रणिपात हो जाओ

1:21:42त प्रणिपात

1:21:48एक होता है पात एक होता है निपात एक होता

1:21:52है प्रणिपात

1:21:54कृष्ण कह रहे हैं प्रणिपातेन

1:22:01किसी वास्तविक संत के प्रणिपात हो जाओ

1:22:09पात का अर्थ होता है

1:22:13अपने आप को झुकाना लेकिन मन को नहीं

1:22:16झुकाना केवल शरीर से दंडवत करना

1:22:21मन को अपने पास रखना

1:22:24जो हम लोग रोज करते

1:22:27मंदिरों में जाते हैं तीर्थों में जाते

1:22:30हैं दंडवत प्रणाम करते हैं सबको प्रणाम कर

1:22:33रहे

1:22:35ये है पाथ

1:22:37तो पात से बात नहीं बनेगी।

1:22:42दूसरा होता है निपात।

1:22:47कृष्ण कह रहे हैं निपात से भी बात नहीं

1:22:51बनेगी। निपात का मतलब होता है

1:22:56भगवान या गुरु के चरणों में स्वयं को

1:23:00समर्पित करना

1:23:02मन और बुद्धि से।

1:23:05लेकिन अपनी कुछ कामनाएं रखना, अपनी

1:23:08इच्छाएं रखना, इच्छाओं से युक्त होकर

1:23:12समर्पण यह है निपात।

1:23:16लेकिन श्री कृष्ण कह रहे हैं प्रणिपात।

1:23:20अर्जुन

1:23:23बिना कोई कामना बनाए

1:23:28अपने इष्ट की इच्छा में ही अपनी इच्छा

1:23:32रखकर अपने आप को समर्पित कर देना वो है

1:23:36प्रणिपात

1:23:39तो प्रणिपातेन

1:23:42परि प्रश्न

1:23:47जिज्ञासु भाव से प्रश्न करो करो अपने गुरु

1:23:51से

1:23:55देखिए

1:23:57अपने गुरु से अवश्य प्रश्न करो यदि

1:24:00जिज्ञासा है उनको टेस्ट लेने की दृष्टिकोण

1:24:05से प्रश्न मत करना देख इनमें कितनी नॉलेज

1:24:09है ना

1:24:12यदि आप में कोई जिज्ञासा है

1:24:17अवश्य पूछिए

1:24:20पूछना चाहिए क्योंकि जब तक आपका कंफ्यूजन

1:24:25नहीं जाएगा तो फिर आप ईश्वरीय मार्ग में

1:24:28आगे बढ़ नहीं पाएंगे। वो कन्फ्यूजन आपको

1:24:32अटकाए रखेगा।

1:24:35इसलिए निर्भ्रांत होना है।

1:24:39इसलिए श्री कृष्ण ने कहा परि प्रश्न

1:24:42प्रश्न करो। बहुत से लोग ऐसे हैं जो यह

1:24:45कहते हैं अजी हमें तत्वज्ञान से क्या मतलब

1:24:48है? अपन तो भैया राधेधे करते हैं। राम राम

1:24:52करते हैं। खूब कीर्तन करते हैं। कीर्तन

1:24:54में बड़ा आनंद आता है। हमको तो कीर्तन

1:24:57अच्छा लगता है। ऐसा नहीं।

1:25:01कीर्तन के साथ साथ

1:25:05तत्व ज्ञान परमावश्यक है। यह तो फाउंडेशन

1:25:10है, नीव है जिस पर आप भक्ति का महल तैयार

1:25:14करेंगे।

1:25:17यह जो आप सुन रहे हैं अभी यह तत्व ज्ञान

1:25:22यह ज्ञान की बात

1:25:25यह बहुत जरूरी है।

1:25:29इसके लिए लापरवाही नहीं करना। गौरांग

1:25:32महाप्रभु ने कहा चैतन्य महाप्रभु ने

1:25:35सिद्धांत बलिया चित्ते

1:25:38नाक और आलोस

1:25:41तत्वज्ञान को जानने में आलस मत करो

1:25:48जो प्रश्न उठता है पूछो अपने गुरु से सारे

1:25:53कंफ्यूजन मिटाओ अब कंफ्यूजन मिट गया

1:25:57निर्भ्रांत हो गए तो उसके बाद तीसरी बात

1:26:01कह रहे हैं श्री कृष्ण तद्व प्रणिपातेन

1:26:06परिष्न

1:26:07सेवया

1:26:09सेवा करो

1:26:11गुरु की सेवा करो क्योंकि यह जो जीव है हम

1:26:17जीव

1:26:20हमारा स्वरूप ही है। हम भगवान के नित्य

1:26:24दास हैं। यह आत्मा परमात्मा की दास है।

1:26:28हमारा काम ही है सेवा करना। तो यह जो आनंद

1:26:32प्राप्ति का हमारा लक्ष्य है अनंत सुख

1:26:36पाने का

1:26:38यह

1:26:40सेवा से ही पूर्ण होगा।

1:26:44अब श्री कृष्ण तो हमारे सामने है नहीं कि

1:26:48उनकी सेवा करें। इसीलिए शास्त्र कहते हैं

1:26:52आचार्यम माम जो भगवान के सदृश्य गुरु हैं

1:26:57वो चलते फिरते भगवान है तुम्हारे सामने

1:27:01सद्गुरु उनकी सेवा करो जितनी सेवा वासना

1:27:07आपकी बढ़ती जाएगी जितनी सेवा वासना आप

1:27:11बढ़ाएंगे अपनी जितना गुरु की आज्ञाओं का

1:27:14पालन करेंगे उनकी सेवा करेंगे उतनी जल्दी

1:27:18जल्दी जल्दी हमारा यह अंतःकरण पवित्र

1:27:22होगा, शुद्ध होगा।

1:27:25यह शास्त्र कह रहे हैं।

1:27:28श्री कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं।

1:27:32प्रणिपातेन परिवया

1:27:38तस्मात गुरु प्रपत जिज्ञासु श्रेय उत्तम श

1:27:44परतम

1:27:45ब्रह्मपश्रयम

1:27:48भागवत

1:27:51देखो केवल थ्योरी की नॉलेज रखने वाला कोई

1:27:55गुरु तुमको मिलता है जिसको शास्त्रों का

1:27:59भरपूर ज्ञान हो बढ़िया प्रवचन भी दे सकता

1:28:02हो बड़ी-बड़ी बातें सुना सकता हो लेकिन

1:28:07कोई अनुभवात्मक

1:28:10ज्ञान नहीं यानी रियलाइजेशन नहीं है भगवान

1:28:12का उसने भगवान को देखा या अनुभव नहीं किया

1:28:17तो ऐसा थ्योरिटिकल मैन ऐसा शाब्दिक ज्ञानी

1:28:22भले ही वेदों का शास्त्रों का ज्ञाता हो

1:28:27तुम्हारे किसी काम का नहीं।

1:28:31केवल शाब्दिक ज्ञान रखने वाला

1:28:38पुरुष

1:28:40आपको भगवत प्राप्ति नहीं करा सकता। आपकी

1:28:44संसार से विरक्ति या ममता नहीं छुड़ा

1:28:48सकता।

1:28:50इसीलिए भागवत में बताया गया जो गुरु होता

1:28:55है उसमें दोनों बातें होनी चाहिए। उसे

1:28:59शास्त्रों का संपूर्ण ज्ञान हो और उस

1:29:04ज्ञान को अपने साधक के भीतर

1:29:09धारण कराने की क्षमता रखता हो।

1:29:13जो ज्ञान वह दे रहा है वह उसके भीतर जाए

1:29:17और वह साधक अपने जीवन में प्रैक्टिकली

1:29:20उसको एग्जीक्यूट करें। उसको उपयोग में

1:29:23लाए। इतनी

1:29:26क्षमता, इतनी ताकत होनी चाहिए उस गुरु

1:29:29में।

1:29:34तो शाब्दिक ज्ञानी जिसको पूर्ण ज्ञान हो।

1:29:41प्लस

1:29:43अनुभवात्मक

1:29:44थिटिकल प्लस प्रैक्टिकल प्रैक्टिकल का

1:29:48मतलब होता है ज्ञात प्रविष्ट दृष्ट गीता

1:29:52कहती है जिसने भगवान को जाना

1:29:56देखा अनुभव किया

1:30:01ऐसा संत जिसको शास्त्रों का सम्यक ज्ञान

1:30:06हो प्लस जिसने

1:30:08संत जिस संत ने भगवान को पाया हो। ऐसा यदि

1:30:13आपको अपने जीवन में मिल जाए तभी आपके

1:30:18कल्याण की बात बन सकती है।

1:30:23और फिर आगे बताया गया कि जब जीवन में आपको

1:30:28ऐसे सद्गुरु मिल जाए

1:30:35उनके प्रति भावना कैसी रखनी है? तो बताया

1:30:40गया यस देवे परा भक्ति यथा देव तथा गुरव

1:30:48उसको अपने इष्ट के समान मानो।

1:30:52जैसी भक्ति तुम अपने इष्ट की करते हो ऐसी

1:30:57ही उपासना

1:30:59अपने गुरु की करो।

1:31:07तस्मिन

1:31:08भदा भाव नारद भक्ति दर्शन

1:31:13वही बात जो भागवत कह रही है आचार्य माम

1:31:16विजानियन

1:31:19भगवान और गुरु में कोई अंतर नहीं है।

1:31:26भगवान कहते हैं जब कोई जीव मेरी प्राप्ति

1:31:30कर लेता है

1:31:32तो मैं उसको अपनी सारी शक्ति दे देता हूं।

1:31:37अपित पापा विज मृत्यु शोको विजो पिपासा

1:31:42सत्य काम सत्य संकल्प

1:31:48ये सारी शक्तियां आठ गुण होते हैं भगवान

1:31:52में वो आठों के आठों भगवान

1:31:56भगवत प्राप्त जीव को दे देते हैं। उस संत

1:32:00को केवल एक शक्ति ऐसी है जो भगवान संत को

1:32:06नहीं देते अपने लिए रखते हैं।

1:32:10उसका नाम है जगत व्यापार वर्ज।

1:32:14सृष्टि करने का अधिकार।

1:32:18सृष्टि करने का अधिकार किसी संत को नहीं

1:32:21दिया।

1:32:22वह भगवान ने अपने लिए रखा है। और संत भी

1:32:27कहते हैं कि भाई यह सृष्टि वृष्टि

1:32:30ब्रह्मांडों की रचना उसको प्रकट करना यह

1:32:32घपड़ सपड़ काम हम लेते भी नहीं। ये आप ही

1:32:36कीजिए।

1:32:38लेकिन बाकी जितनी शक्ति भगवान के पास है

1:32:42अणिमा गरिमा लगिमा आदि चमत्कार संबंधित

1:32:46जितनी शक्तियां है वो सारी शक्तियां

1:32:51भगवान

1:32:53संत को दे देते हैं। इसीलिए वह कहते हैं

1:32:57कि

1:32:59मुझ में और उसमें कोई भेद नहीं।

1:33:03यही बात वेदव्यास जी ने श्रीमद् भागवत में

1:33:07कही। बहुत सुंदर भयं द्वितीया

1:33:12विनिवेश

1:33:14तस्या

1:33:15दीप

1:33:17तस विपर्ययो

1:33:19स्मृति तनयातो

1:33:23बुजेतम

1:33:26भक्तम

1:33:29गुरु देवतात्मा

1:33:32क्योंकि भगवान और गुरु में कोई भेद नहीं

1:33:36इसलिए इसलिए वेदव्यास कह रहे हैं कि अपने

1:33:40गुरु को

1:33:44तुम अपनी आत्मा से भी अधिक मानो।

1:33:49तुम्हें सबसे प्रिय है अपनी आत्मा। कोई

1:33:52मरना नहीं चाहता। जैसे तुम अपनी आत्मा से

1:33:56प्यार करते हो। अपनी आत्मा से भी अधिक

1:33:59प्रेम करो, उपासना करो, आराधना करो अपने

1:34:04गुरु की। यह भागवत कह रहे

1:34:10तो वास्तविक संत करते क्या है?

1:34:15जानते हैं

1:34:18जैसे

1:34:20एक कन्या

1:34:2316 साल की कन्या उसको उनके माता पिता

1:34:27पढ़ाते हैं, लिखाते हैं, योग्य बनाते हैं,

1:34:31कलावती, गुणवती बनाते हैं। फिर जब वह

1:34:35योग्य हो जाती है

1:34:38तो फिर एक

1:34:41युवक आता है। वह उस कन्या को देखता है।

1:34:46फिर इंटरव्यू लेता है। फिर ओके करता है और

1:34:51ब्याह के ले जाता है।

1:34:54अब बताइए सारी मेहनत

1:35:00माता-पिता ने की?

1:35:02उस बच्चे के पीछे

1:35:05इतनी तपस्या

1:35:07खुद नहीं खाया उसे खिलाया

1:35:11खुद जैसे भी रहे पढ़ाने लिखाने के लिए

1:35:14इतना खर्चा किया उसको योग्य बनाया तो सारी

1:35:18मेहनत तो माता-पिता की थी।

1:35:22युवक आए और ब्याह के ले गए।

1:35:25ठीक इसी प्रकार

1:35:30हम जीवात्मा के प्रति सारी मेहनत

1:35:34गुरु करता है।

1:35:39हमारे दोषों को दूर करना।

1:35:43जीवन में कभी कुसस्कार आ रहे हैं तो उन

1:35:46कुसस्कारों से लड़ना उपस्थित होकर

1:35:50अप्रत्यक्ष रूप में

1:35:54हमें साधना की विधि बतलाना

1:35:59हमारी रक्षा करना हमारा निरीक्षण करना

1:36:04जैसे जैसे हमारा अंतकरण शुद्ध हो रहा है

1:36:07देखते रहना और कृपा करते रहना ये सारा

1:36:12सारा काम गुरु करता रहता है। हमें तैयार

1:36:16करता रहता है। हमें बनाता रहता है। किस

1:36:19लिए बना रहा है वो?

1:36:22देखिए

1:36:23भगवान तो किसी साधन से नहीं मिलते। भगवान

1:36:27तो गुरु कृपा से ही मिलेंगे।

1:36:32किसी साधन से नहीं। लेकिन फिर भी गुरु

1:36:37हमें जो यह साधना करवाता है

1:36:40और स्वयं जपे

1:36:44हमको भी जपावे वो खुद भी करता है साधना और

1:36:49हमें भी कराता है क्यों इसीलिए कराता है

1:36:53वो साधना ताकि वो माया तत्व जीव तत्व

1:36:58कृष्ण तत्व ये सारे तत्वों का ज्ञान हो

1:37:02प्लस उस तत्व से मिलने की व्याकुलता हो

1:37:06जाए

1:37:11प्यास बने,

1:37:13लगन बढ़े, इसके लिए वो संत लगा रहता है।

1:37:21अपने आप तो हमारी लगन बनेगी नहीं। अपने आप

1:37:24तो व्याकुलता होगी नहीं। तो वो व्याकुलता

1:37:27हमारी बढ़ाने के लिए, हमारी लालसा बढ़ाने

1:37:31के लिए दिन रात हमसे साधना करवाता है।

1:37:36प्रीति जगे।

1:37:39तो यह सारा काम गुरु करता है।

1:37:45भगवान तो बने बने के साथी हैं। वो तो कहते

1:37:50हैं निर्मल मन जन सो मोहि पावा। अब ये

1:37:53निर्मल मन कहां से लाए? मन तो इतना गंदा

1:37:56है तो गुरु इसकी सफाई करता है। हमारे मन

1:38:02को निर्मल करता है। और जब मन निर्मल हो

1:38:06जाता है तो यह आत्मा रूपी कन्या गुणवती

1:38:09कुलवती हो गई। कलावती हो गई। तैयार हो गई

1:38:13है आत्मा। तो अब ठाट से

1:38:17भगवान आते हैं और वरण करके ले जाते हैं।

1:38:23गुरु तो है [गाना गाने की आवाज़]

1:38:26माता सम

1:38:29गोविंद [गाना गाने की आवाज़]

1:38:32राधे

1:38:35शिशु मन मल धोवे [गाना गाने की आवाज़]

1:38:40विमल

1:38:42बना दे

1:38:45गुरु माता [गाना गाने की आवाज़]

1:38:48शिशु मन

1:38:50गोविंद

1:38:53[संगीत] राधे [गाना गाने की आवाज़]

1:38:56विमल

1:38:58बना के [गाना गाने की आवाज़] हरि

1:39:01गोद

1:39:03बिठा दे राधे राधे [गाना गाने की आवाज़]

1:39:09गोविंद

1:39:12गोविंद [गाना गाने की आवाज़]

1:39:14राधे

1:39:17राधे राधे [गाना गाने की आवाज़]

1:39:20गोविंद

1:39:23गोविंद

1:39:25राधे [गाना गाने की आवाज़]

1:39:33गिरति अज्ञानम इति गुरु घृणा ज्ञानम इति

1:39:37गुरु

1:39:40गुरु हमारे

1:39:43अज्ञानता को दूर करता है

1:39:47गति ज्ञानम गुरु हमें ज्ञान देता है अब आप

1:39:50प्रश्न करेंगे

1:39:53जब गुरु ने कृपा करके

1:39:58हमें ज्ञान दे दिया ध्यान दीजिएगा

1:40:03तो अज्ञान तो अपने आप चला गया

1:40:07तो ये अलग से कहने की क्या जरूरत है

1:40:12गिरति अज्ञानमित गुरु घृणा ज्ञानमित गुरु

1:40:16दोनों बात की जरूरत नहीं है एक ही बात कही

1:40:19है घृणा ज्ञानमित गुरु

1:40:23अर्थात गुरु वो है जो ज्ञान दे और जब वो

1:40:27ज्ञान दे देगा तो अज्ञान अपने आप चला

1:40:30जाएगा।

1:40:33जी नहीं ऐसा नहीं है।

1:40:38ऐसा कैसे नहीं है? भाई जब गुरु ज्ञान

1:40:41देंगे तो हमारा हृदय प्रकाश युक्त हो

1:40:44जाएगा। तो फिर अज्ञान तो अपने आप चला गया

1:40:47ना।

1:40:49देखिए इसको समझिए।

1:40:54यह जो हमारा अंतःकरण है अंतःकरण मतलब मन,

1:41:00बुद्धि, अहंकार चारों को मिला के ये

1:41:03चतुष्टय को कहते हैं अंतःकरण। तो यह जो

1:41:07हमारा अंतःकरण है यह एक जन्म का मैला नहीं

1:41:12है। अपवित्र नहीं है।

1:41:18अनंत जन्मों का

1:41:23अनंत जन्मों का मैला है।

1:41:27अनंत जन्मों की अज्ञानता है इसके भीतर।

1:41:32तो यह अज्ञानता जो है

1:41:36यह इतनी जल्दी तो जाएगी नहीं।

1:41:41अब यह अज्ञानता जब तक जाएगी नहीं तो ज्ञान

1:41:46दे कैसे? और अंतःकरण में

1:41:51एक ही चीज रह सकती है। जब तक अज्ञानता है

1:41:55गुरु ज्ञान दे नहीं सकता।

1:41:59यदि मन दो होता एक अज्ञान वाला और एक खाली

1:42:03तो गुरु ज्ञान दे देता। मन एक ही है और

1:42:07उसमें अज्ञान भरा है। वह भी कितना भरा है?

1:42:10अनंत जन्मों का। वो तुरंत छूट नहीं सकता।

1:42:16तो इसीलिए और अपने आप से यह अज्ञान जाएगा

1:42:20नहीं। मैंने प्रारंभ में ही बता दिया

1:42:21आपको।

1:42:24हम कितनी भी ताकत लगा ले यह ममता ये

1:42:26आसक्ति ये अज्ञानता जाएगी नहीं

1:42:30तो इसीलिए भगवान इसीलिए गुरु क्या करता है

1:42:36गुरु पहले हमारी अज्ञानता को निकालता है

1:42:44इसलिए वह हमें साधना की विधि बतलाता है

1:42:47हमारे साथ रहता है

1:42:52सत्संग प्रदान करता है शास्त्रों का ज्ञान

1:42:56प्रदान करता है हमारी हमें वास्तविकता से

1:43:01बोध कराकर संसार की वास्तविकता से बोध

1:43:04कराकर हमारी आसक्ति छुड़ाता है। ईश्वर में

1:43:08धीरे-धीरे अनुराग बढ़ाने में हमारा सहायक

1:43:12बनता है। यह सारे काम गुरु करता है। और

1:43:15जैसे जैसे हमारा ईश्वर के प्रति अनुराग

1:43:19बढ़ता जाता है। हमारे अंतःकरण में वो कृपा

1:43:23करता जाता है और अंतःकरण धीरे-धीरे पवित्र

1:43:27होने लगता है।

1:43:29तो यह काम गुरु करता जाता है। धीरे-धीरे

1:43:34अज्ञानता छूटती जाती है।

1:43:38और जब पूर्ण रूपण अज्ञानता चली जाती है।

1:43:44जब पात्र तैयार हो गया। अब अब गुरु ज्ञान

1:43:49देता है। उसके पहले कोई गुरु मैले अंतःकरण

1:43:56में वो दिव्य ज्ञान नहीं दे सकता। वो

1:43:59टिकेगा ही नहीं।

1:44:03जब तक पात्र ही नहीं बना वो दिव्य ज्ञान

1:44:06कैसे देगा?

1:44:08और जानते हैं हम लोगों की यह जो अज्ञानता

1:44:11है ना यह अज्ञानता अपने आप छूटेगी नहीं।

1:44:15और यह अज्ञानता है। पता है कहां तक चली

1:44:18जाती?

1:44:20हमारी यह अज्ञानता यहां तक होती है कि यदि

1:44:25कोई रामोपासक है तो वह कृष्ण के बारे में

1:44:29सुनना नहीं चाहता।

1:44:31यदि कोई कृष्ण उपासक है तो वो राम के बारे

1:44:35में सुनना नहीं चाहता। यह हमारी अज्ञानता

1:44:38है। हमें इतनी भी नॉलेज नहीं है कि राम और

1:44:42कृष्ण एक है। यह कौन बताएगा? यह अज्ञानता

1:44:46कौन दूर करेगा?

1:44:50और ऐसा नहीं है कि हम जैसे साधारण जीवों

1:44:53को यह अज्ञानता है। चैतन्य महाप्रभु जी के

1:44:57समय में

1:45:00एक प्रकांड विद्वान पंडित हुए। प्रकाशानंद

1:45:07उनकी बात आपको बताऊं। बिल्कुल हमारी तरह

1:45:11बात करते हैं। उनकी बात ये है

1:45:17यस्ते मणिकर्णिका मलसर स्वीघिका दीर्घिका

1:45:25रत्नम तारकक्षरम

1:45:30तमते

1:45:32शंभू स्वयं यच्छति

1:45:35प्रकाशानंद

1:45:38चैतन्य महाप्रभु को एक पत्र लिखते हैं।

1:45:43मूढ़ो

1:45:45मरीचिका सु पशु

1:45:49ए मूढ़

1:45:51यानी हे मूर्ख

1:45:53चैतन्य महाप्रभु को लिख रहे हैं

1:45:55प्रकाशानंद हे मूर्ख

1:45:59तू जानता नहीं यह मणिकर्णिका का घाट है

1:46:02काशी का

1:46:05जहां पर शंभू स्वयं रहते हैं और तारक

1:46:09मंत्र देते हैं

1:46:12और एक तू मरीचिका पशुवत

1:46:17जानवर के समान इधर उधर इधर उधर घूमता

1:46:21फिरता रहता है वृंदावन में क्या करता है

1:46:26इधर आ शंकर के पास और उनसे तारक मंत्र ले

1:46:34देखिए शब्दों का प्रयोग प्रकाशानंद जी के

1:46:37शब्दों का प्रयोग

1:46:40मूर्ख पशु

1:46:46और चैतन्य महाप्रभु जी

1:46:54धर्मभ

1:46:56मणिकर्णिका भगवत

1:46:59पादाभ

1:47:02भागीरथी

1:47:05महाप्रभु जी

1:47:09पत्र का जवाब देते हैं।

1:47:13आप जो कुछ कह रहे हैं मणिकर्णिका

1:47:17और काशी के बारे में वह बिल्कुल ठीक है।

1:47:20लेकिन हे सखे

1:47:23मेरी बात सुनो। वो मूर्ख कह रहे हैं, पशु

1:47:26कह रहे हैं। और चैतन्य महाप्रभु लिख रहे

1:47:29हैं सखे

1:47:32हे सखे

1:47:34मुझे यह बताओ कि जिस मणिका के बारे में आप

1:47:38बात कर रहे हैं वो मणिकर्णिका बनी कैसे?

1:47:45शास्त्र कहते हैं कि श्री कृष्ण के पसीने

1:47:48से यह मणिकर्णिका बनी। यह सरोवर

1:47:52मणिकर्णिका

1:47:56और जिस गंगा जी के बारे में आप बात कर रहे

1:47:59हैं भागीरथी वह गंगा और कोई नहीं हमारे ही

1:48:05श्री कृष्ण के चरण के नक से प्रकट हुई है।

1:48:11यह शास्त्र कहते हैं।

1:48:14और जो शंभू दिन रात तारक मंत्र देते हैं

1:48:19वो शंभू स्वयं जो तारक मंत्र दे रहे हैं

1:48:23वो क्या दे रहे हैं राम नाम कृष्ण नाम

1:48:29तो उन्हीं का तो नाम दे रहे हैं।

1:48:33कोई इससे अलग तो कुछ नहीं दे रहे।

1:48:38वही शंभू कृष्ण का दर्शन करने के लिए

1:48:44गोकुल की गलियों में डोल रहे और फिर

1:48:49स्त्री रूप धारण करके महारास का रस पाया।

1:48:54जब वही शंकर राम और कृष्ण की उपासना

1:48:59आराधना करते हैं तो आप ही आकर कृष्ण की

1:49:02आराधना कर लीजिए। इसमें क्या फर्क पड़ता

1:49:06है?

1:49:08तब प्रकाशानंद जी ने उनकी आंखें खुली कि

1:49:12शंकर और कृष्ण में कोई भेद नहीं। राम और

1:49:16कृष्ण में कोई भेद नहीं। मैं ये कैसी

1:49:18बातें कर रहा हूं? तब आए और उनके चरणों

1:49:21में गिर पड़े। तो ये अज्ञानता हम लोगों की

1:49:25जो होती है ना जो हम जान नहीं पाते और ऐसा

1:49:28भेदभाव करते हैं। इस अज्ञानता को वास्तविक

1:49:33संत के अतिरिक्त और कौन मिटाएगा? कौन

1:49:35बताएगा? कौन मार्गदर्शन करेगा?

1:49:41तो यह जो अज्ञानता है यह अज्ञानता जाएगी

1:49:47जब और जब यह पात्र खाली होगा तब गुरु

1:49:52ज्ञान देगा इसीलिए दोनों बातें कही गई

1:49:57गिरति अज्ञानम इति गुरु गुरु पहला काम

1:50:01करता है अज्ञान को दूर करता है घृणा

1:50:04ज्ञानम इति गुरु जो ज्ञान को फिर देता है

1:50:08वह गुरु

1:50:10यह है गुरु शब्द की सही व्याख्या।

1:50:16तो इस प्रकार से

1:50:19आज आपने

1:50:22गुरु तत्व के विषय में समझा

1:50:27कि गुरु वास्तव में हमारे जीवन में क्यों

1:50:31अनिवार्य है। जैसे एक अंत में बताऊंगी।

1:50:35जैसे एक पक्षी

1:50:40अभी वह पक्षी बना नहीं।

1:50:44अंडे में है।

1:50:47अंडा फूटता है।

1:50:50वो बच्चा बाहर आता है। तो उसकी मां क्या

1:50:54करती है?

1:50:59जब वह बच्चा बाहर आता है तो मां

1:51:03उसको धक्का देती है। उसके पर खुले नहीं

1:51:07होते। जुड़े होते हैं तो मां धक्का देती

1:51:11है। धक्का देने पर धीरे-धीरे वह पर खोलता

1:51:15है। फिर और धक्का देती है तो वह अपने आप

1:51:18को संभालता है। फिर वो डगमगाता है। फिर

1:51:22डगमगाता है। फिर धक्का देती है। फिर वह

1:51:25खड़ा होता है। तो यह जो धक्का दे रही है

1:51:29उसकी मां अपने बच्चे को

1:51:33यदि यह धक्का ना दे तो वह बच्चा मर जाए।

1:51:39तो जैसे उस बच्चे को उस धक्के की

1:51:43अनिवार्यता है। वो अपने आप खड़ा नहीं हो

1:51:47सकता। अपने आप अपने पर फैला नहीं सकता।

1:51:51ऐसे ही जब हम ईश्वरीय मार्ग में चलते हैं,

1:51:54हम अपने आप कैसे आगे बढ़ेंगे? यह जो धक्का

1:51:59दिया जाता है यह धक्का अनिवार्य है हमारे

1:52:02लिए और यह धक्का और कोई नहीं गुरु ही दे

1:52:05सकता है। तो गुरु के धक्के से

1:52:10उनके धक्के से हम ईश्वरीय मार्ग में आगे

1:52:12बढ़ते हैं। उन्हीं के धक्के से यह ममता

1:52:16छूटती है। उन्हीं के धक्के से ईश्वर में

1:52:19अनुराग होता है।

1:52:22यदि यह धक्का ना मिले तो हम जैसे विषय हम

1:52:26कभी ईश्वरीय मार्ग में चले ही ना। अरे

1:52:30मैंने जो आपको उस दिन बताया था ना कि आप

1:52:33यह जो आते भी है ना प्रवचन सुनने धक्का

1:52:38वरना हमारा मन

1:52:42हमारा मन तो ऐसा है छोड़ो जी कौन जाए?

1:52:46छोड़ो जी। उस दिन तो गए थे। अब रोज रोज

1:52:49जाकर क्या करना है?

1:52:55यह जो आप रोज आ जाते हैं वरना

1:53:00आज के समय में मैं आप सब की बात कर रही

1:53:05हूं जो रेगुलर आ रहे हैं। आज के समय में

1:53:09ऐसे व्यस्त समय में कोई

1:53:13समय निकाल के रोज ज्ञान चर्चा सुनने आए

1:53:17बहुत बड़ी बात है। बहुत बड़ी बात है।

1:53:22मुझे तो इतना आश्चर्य लग रहा है जाजगीर के

1:53:27लिए और ऑनलाइन में जो जो लोग सुन रहे हैं

1:53:30उनके मैसेजेस आते हैं तो कहते हैं कि

1:53:34हम लोग देख रहे हैं इतने लोग आते हैं

1:53:37सुनने के लिए और बिल्कुल दचित होकर सुनते

1:53:40हैं। कोई एक आवाज नहीं होती। सब एक तक

1:53:44आपको देखते रहते हैं।

1:53:50खैर यह मेरा कमाल नहीं है। इसको मेरा कमाल

1:53:53मत समझिए। यह तो

1:53:57मेरे गुरुदेव का जो सिद्धांत है ना उसका

1:54:00कमाल।

1:54:06जो कुछ भी मैं आपके समक्ष बोल रही हूं।

1:54:10इसमें मेरा अपना कुछ भी नहीं।

1:54:14मैं तो मैंने तो

1:54:19इंग्लिश में एमए किया है। यही छत्तीसगढ़

1:54:22से मेरा जन्म स्थान छत्तीसगढ़ है।

1:54:30संस्कृत मेरा कभी विषय नहीं रहा।

1:54:34मैं इंग्लिश मीडियम में पढ़ती थी। इंग्लिश

1:54:38में ही एमए किया। साइंस भी ली थी। मेरा

1:54:41बीएससी मैथ्स था। उसके बाद फिर एमए किया।

1:54:46तो संस्कृत की पढ़ाई भी गुरुदेव ने ही

1:54:48कराई।

1:54:51उनकी कृपा से ही संस्कृत बोलनी आई

1:54:57और जो कुछ भी मैं आपके समक्ष यह सिद्धांत

1:55:00बोल रही हूं।

1:55:05इसका भी ज्ञान उन्होंने ही कराया।

1:55:11इसीलिए

1:55:14आप जो आश्चर्यचकित होते हैं,

1:55:19जो मेरे समक्ष झुक जाते हैं, हाथ जोड़ते

1:55:23हैं, वंदन करते हैं, आपका वो सारा वंदन

1:55:27मैं गुरुदेव के चरणों में समर्पित कर देती

1:55:30हूं।

1:55:33क्योंकि जो सामान क्योंकि आप तो जो ज्ञान

1:55:37मैं आपको दे रही हूं उसके समक्ष अपना सिर

1:55:40झुकाते हैं तो वह ज्ञान तो उनका है तो फिर

1:55:45उसका श्रेय मैं कैसे ले सकती हूं।

1:55:49तो इसीलिए मैं उन्हीं के चरणों में आपकी

1:55:52प्रार्थना वंदना सब समर्पित करती हूं। मैं

1:55:56तो एक इंस्ट्रूमेंट हूं।

1:55:59केवल एक माध्यम साधन हां इतना

1:56:05अपने आप को गौरवान्वित महसूस करती हूं कि

1:56:11कम से कम उन्होंने

1:56:14मुझे इस लायक तो समझा

1:56:18और अपनी कृपा करके

1:56:22मुझे इतनी बड़ी सेवा प्रदान की कि आज मैं

1:56:28विश्व भर में उनकी वाणी का प्रचार प्रसार

1:56:32कर रही हूं।

1:56:40तो यह भी जो मैं आपके समक्ष बोल रही हूं

1:56:43यह गुरु कृपा है।

1:56:46कोई बिना कृपा के

1:56:50वेद वाणी, उपनिषदों की वाणी, शास्त्र आदि

1:56:54बोल नहीं सकता। रट के बोल भी ले तो वह

1:56:59आपके हृदय को छू नहीं सकता। यदि आज आप सुन

1:57:03रहे हैं आपके हृदय को छूता है तो वह उनकी

1:57:08कृपा है। गुरुवर की कृपा है।

1:57:12और मैं तो कहूंगी वही धक्का मार मार के

1:57:15आपको ले आते हैं तो आप दौड़ दौड़ के आते

1:57:17हैं यहां और उपस्थित हो जाते हैं।

1:57:21तो इस प्रकार से

1:57:23यह जो कुछ भी ज्ञान मैं आपको दे रही हूं

1:57:29इसको कहते हैं शास्त्रों का शाब्दिक

1:57:32ज्ञान।

1:57:34लेकिन मात्र शाब्दिक ज्ञान से

1:57:39ईश्वर प्राप्ति नहीं होती।

1:57:43शाब्दिक ज्ञान के साथ अनुभवात्मक ज्ञान

1:57:46होना भी परमावश्यक है।

1:57:50और अनुभवात्मक होने के लिए

1:57:57गुरु के सानिध्य में या गुरु द्वारा

1:58:01प्रदत्त

1:58:03जो

1:58:04साधना पद्धति है

1:58:09यदि उसको जीव करता है अपने जीवन में

1:58:14क्योंकि गुरु तत्व कोई शरीर नहीं

1:58:18वो वो तो प्रकाश है जो सदा विद्यमान रहता

1:58:23है।

1:58:25यदि अनुयाई है तो उनके अंतःकरण में

1:58:30गुरु बैठे हैं।

1:58:32अपने शरणागत के प्रत्येक

1:58:36कर्म का हिसाब किताब रख रहे हैं। रखना

1:58:40पड़ेगा क्योंकि पिछले संस्कार देख पाते

1:58:44हैं और उसके वर्तमान के कर्म के अनुसार

1:58:48आगे का हिसाब किताब करना है उनको उसकी

1:58:51साधना उनको नोट करनी है। तदुसार कृपा करनी

1:58:56है, फल देना है तो वह भीतर बैठ के नोट

1:58:59करते रहते हैं।

1:59:04तो इसीलिए गुरु कोई शरीर या प्रत्यक्ष रूप

1:59:07से उपस्थित हो तभी काम बनेगा। ऐसा नहीं।

1:59:11वह अपने जीवों के अपने अनुयायियों के भीतर

1:59:15बैठे हैं। वह रचनाओं में

1:59:20शब्द ब्रह्म बन के बैठे हैं।

1:59:24आज तुलसीदास आज मीरा

1:59:28हमारे मध्य नहीं।

1:59:30लेकिन देखिए उनकी रचनाओं को सूरदास जी के

1:59:33पदों को जब आप गाते हैं तो इतने छूते हैं

1:59:36कि कभी कभी आपके नेत्रों से अश्रु

1:59:40बह जाते हैं। तो यह

1:59:45जो भगवत प्राप्त संत हैं उनका यह कमाल

1:59:49होता है। उनकी वाणी का कमाल होता है।

1:59:53तो गुरु और सद्गुरु में फर्क है। इसको याद

1:59:58रखिए। संत तो तमाम है जगत में

2:00:03लेकिन सब गुरु है। जितने संत है वो गुरु

2:00:07है। गुरु का मतलब होता है

2:00:11ताकत वाला

2:00:14श्रेष्ठ।

2:00:17लेकिन सद्गुरु का मतलब होता है जिस गुरु

2:00:21के आप शरणागत हो जाए।

2:00:26सद्गुरु का अर्थ होता है वह विशुद्ध संत

2:00:29जिसने भगवत प्राप्ति की है और आप उसके

2:00:33शरणागत होंगे और वह एक दिन आपको भगवत

2:00:37प्राप्ति करा के छोड़ेंगे। वो होते हैं

2:00:40सद्गुरु।

2:00:44ऐसे सद्गुरु वो अपने अनुयायियों को

2:00:48प्रक्रिया बतलाते हैं कि कैसे भगवत

2:00:51प्राप्ति करनी है। वह साधना का ज्ञान

2:00:54करवाते हैं।

2:00:57तो गुरु कई प्रकार के होते हैं। कर्म योगी

2:01:00गुरु ज्ञान योगी गुरु भक्ति योगी गुरु तो

2:01:04वह जिस जिस स्तर के होते हैं गुरु वह अपने

2:01:08अनुयायियों को उसी स्तर अनुसार ज्ञान देते

2:01:11हैं।

2:01:12इस प्रकार से यदि आप कृपालु जी महाराज की

2:01:18चर्चा करें तो कृपालु जी महाराज भक्ति

2:01:22योगी संत हैं। भक्ति योग रसावतार

2:01:26भक्ति योगी अवतारी पुरुष हैं। इसलिए

2:01:30उन्होंने भक्ति योग का प्रचार प्रसार किया

2:01:34और जीवो को भक्ति योग के द्वारा श्री राधा

2:01:39कृष्ण

2:01:41की युगल उपासना बतलाई। तो राधा कृष्ण की

2:01:45युगल उपासना किस प्रकार से जीव को

2:01:51करनी है। कैसे उसका मन भगवान में लगे

2:01:55जिससे कि उसके अंतःकरण

2:02:00में बदलाव आए, पवित्रता हो, शुद्ध हो।

2:02:05इसके लिए उन्होंने उपाय बतलाए।

2:02:09तो कल अभी तो आप लोग यह सुन रहे हैं

2:02:15शाब्दिक ज्ञान रोज आते हैं। संध्या के समय

2:02:19सुनते हैं। यह तो परमावक है ही। लेकिन इसी

2:02:22के साथ साथ कल से मैं प्रैक्टिकल जो

2:02:26कृपालु जी महाराज ने साधना पद्धति बतलाई

2:02:30है रूप ध्यान साधना जिससे आपको सुविधा हो

2:02:36जाएगी अपने इष्ट राधा कृष्ण

2:02:41का ध्यान कैसे करें और कीर्तन तो आप लोग

2:02:45करते हैं भजन सुनते हैं लेकिन फिर भी आपका

2:02:48मन नहीं लगता तो मन कैसे लगाया जाए भगवान

2:02:53में जब हम कीर्तन में बैठते हैं तो मन भाग

2:02:57जाता है तो क्या कारण है? मन क्यों भागता

2:03:01है? और हम यदि कीर्तन करने बैठे, साधना

2:03:05करने बैठे तो ऐसा क्या उपाय करें मन पर कि

2:03:10मन भागे ना

2:03:13तो यह सब बातें जानना बहुत आवश्यक है। तभी

2:03:17आप सही सही साधना कर पाएंगे। क्योंकि

2:03:20हमारे गुरुदेव उन्होंने केवल कोरी बहिरंग

2:03:24साधना पर कभी बल नहीं दिया कि आप मुंह से

2:03:28गाते रहे मन आपका इधरउधर विचरण करता रहे

2:03:32संसार बढ़िया चलता रहे जय हो जय हो करते

2:03:36रहे और लोग भी जानते रहे कि आप अच्छे

2:03:39मंदिर जाते अच्छे भक्त हैं। ये पाखंड

2:03:43प्रपंच आडंबर से गुरुदेव को कोई लेना देना

2:03:47नहीं।

2:03:48गुरुदेव चाहते हैं कि यह मानव देह जिस

2:03:53उद्देश्य से मिला है वह सफल हो। इसी

2:03:59जन्म में यह मनुष्य

2:04:03अपने लक्ष्य परमानंद प्राप्ति इसको पूर्ण

2:04:08कर ले। उसी की पद्धति उसी की प्रक्रिया

2:04:11बतलाते हैं। तो इसीलिए

2:04:15और थ्योरी की नॉलेज कल्याणकारी नहीं

2:04:18थ्योरी की नॉलेज प्रैक्टिकल बने। यह

2:04:21आवश्यक तो प्रैक्टिकल साधना मैं सुबह

2:04:24कराऊंगी। तो आप सबसे निवेदन है मेरा कि

2:04:27सुबह 7:30 बजे आप लोग ठीक समय पर

2:04:32यहां उपस्थित हो जाइएगा। 7:30 से लेकर 9

2:04:36बजे तक डेढ़ घंटा आपको यहां साधना कराई

2:04:39जाएगी। तो आज आपने गुरु तत्व के विषय में

2:04:42जाना।

2:04:44कल

2:04:46वास्तविक विशुद्ध संत

2:04:49भगवत प्राप्त संत कोई है। यह हम कैसे

2:04:53जानेंगे?

2:04:56ऐसा तो नहीं कि कहीं हम किसी पाखंडी के

2:04:59चक्कर में पड़ जाए और उससे हम विशुद्ध संत

2:05:02सोचते

2:05:04उसी के बताए मार्ग पर चले और देखा कि जीवन

2:05:08में धोखा हो गया। तो कोई वास्तविक संत है

2:05:13इसका प्रमाण क्या है? कोई वास्तविक संत

2:05:17है। उसने भगवत प्राप्ति की है। इसके लक्षण

2:05:22क्या है?

2:05:25और हमें वह सावधानियां भी बतला दीजिए कि

2:05:29कौन-कौन सी बातों को ध्यान में रखना

2:05:32चाहिए। जिससे हम किसी पाखंडी ढोंगी के

2:05:35चक्कर में ना पड़े।

2:05:38तो यह सारी बातें बहुत इंपॉर्टेंट है

2:05:44ताकि हम उन लक्षणों को ले उन सावधानियों

2:05:47को लेके जब किसी संत के समक्ष जाएंगे

2:05:53तो हमें हमारे जीवन में धोखा नहीं होगा।

2:05:57देखिए जानना और पहचानना दोनों में अंतर

2:06:00है।

2:06:02बुद्धि से अक्ल से आप किसी संत को जान

2:06:06नहीं सकते क्योंकि संत और भगवान एक है।

2:06:10लेकिन

2:06:12पहचान सकते हैं। क्योंकि पहचान लक्षणों से

2:06:17होती है।

2:06:19तो हमारे शास्त्रों में क्या लक्षण बताए

2:06:22गए हैं? प्लस बहिरंग लक्षण भी कुछ होते

2:06:25हैं। तो बहिरंग लक्षण और शास्त्रों में जो

2:06:29लक्षण बताए गए हैं उन सब पर विचार किया

2:06:32जाएगा और आपको डिटेल में बताया जाएगा

2:06:36लेकिन आज नहीं कल बोलिए वृंदावन बिहारी

2:06:41लाल [गाना गाने की आवाज़] की

2:06:42जय

2:06:43श्रीमत सतगुरु सरकार की

2:06:46जय

2:06:55ऑफलाइन क्विज विनर्स अंकित तिवारी भारती

2:06:59राठौड़ विजय कुमार

2:07:03कटकवर जलेश्व जलेश्वरी चंद्रा अरुण शावा

2:07:11ऑनलाइन क्विज विनर्स अर्पिता बहरा

2:07:14भुवनेश्वर सोनिया जैन कोलकाता

2:07:18सुधांशु प्रसाद डाल्टनगंज सुनीता हरितवाल

2:07:22उदयपुर

2:07:24वी सुनीता बर श्वेता जोशी हरिद्वार आकाश

2:07:30तिवारी झारखंड अब आप पांच मिनट कीर्तन कर

2:07:34लीजिए फिर आरती होगी फिर आप प्रस्थान

2:07:37करेंगे

2:08:00भजो गिरधर [संगीत][गाना गाने की आवाज़]

2:08:03गोविंद

2:08:05गोपाला

2:08:07भजो गिरधर [गाना गाने की आवाज़]

2:08:09गोविंद [संगीत]

2:08:12गोपाला

2:08:14भजो गिरधर [गाना गाने की आवाज़][संगीत]

2:08:16गोविंद

2:08:18गोपाला

2:08:20भजो गिरधर

2:08:23गोविंद

2:08:24[संगीत] गोपाला

2:08:27भजो गिरिधर [गाना गाने की आवाज़]

2:08:29गोविंद

2:08:31गोपाला

2:08:34भजो गिरधर

2:08:36गोविंद

2:08:38गोपाला [संगीत]

2:08:40भजो गिरिधर

2:08:43गोविंद [गाना गाने की आवाज़]

2:08:45गोपाल

2:08:47भजो गिरधर [संगीत]

2:08:49गोविंद

2:08:51गोपाला [संगीत]

2:08:54भजो गिरिधर [गाना गाने की आवाज़]

2:08:56गोविंद

2:08:58गोपाला

2:09:00[संगीत]

2:09:00भजो गिरधर [गाना गाने की आवाज़]

2:09:02गोविंद

2:09:04गोपाला

2:09:06भजो [गाना गाने की आवाज़] गिरिधर

2:09:09गोविंद [संगीत]

2:09:11गोपाला

2:09:13भजो गिरधर

2:09:15गोविंद

2:09:17गोपाला [संगीत][गाना गाने की आवाज़]

2:09:20भजो गिरधर गोविंद

2:09:24गोपाला

2:09:25[गाना गाने की आवाज़]

2:09:26भजो गिरधर [संगीत] गोविंद

2:09:30गोपाला [गाना गाने की आवाज़]

2:09:32भजो गिरिधर गोविंद

2:09:37गोपाला [संगीत]

2:09:39भजो गिरिधर

2:09:41गोविंद

2:09:43गोपाला [गाना गाने की आवाज़]

2:09:44[संगीत]

2:09:45भजो गोपाला

2:09:48भजो गोपाला [गाना गाने की आवाज़]

2:09:51भजो गोपाला

2:09:55भजो [संगीत]

2:09:55गोपाला

2:09:57[गाना गाने की आवाज़]

2:09:58भजो गिरिधर गोविंद

2:10:02गोपाला [संगीत]

2:10:04भजो गिरिधर

2:10:06गोविंद

2:10:08गोपाला [संगीत]

2:10:11भजो मुरली मनो मनोहर

2:10:15नंदलाला [संगीत]

2:10:18मुरली मनोहर

2:10:21नंदलाला

2:10:23[संगीत] भजो मुरली [गाना गाने की आवाज़]

2:10:25मनोहर

2:10:28नंदलाला [संगीत]

2:10:30भजो मुरली मनोहर [गाना गाने की आवाज़]

2:10:34नंदलाला [संगीत]

2:10:36भजो गिरिधर [गाना गाने की आवाज़] गोविंद

2:10:40गोपाला [संगीत]

2:10:45गोविंद

2:10:46[संगीत] गोपाला

2:10:48इधर गाइए

2:10:52एक दो तीन भजो गिरधर [गाना गाने की आवाज़]

2:11:00भजो गिरधर [गाना गाने की आवाज़][संगीत]

2:11:06आप लोग भजो गिरिधर [गाना गाने की आवाज़]

2:11:12और एक बार

2:11:19भजो गिरधर

2:11:21गोविंद

2:11:23गोपाला [गाना गाने की आवाज़]

2:11:25भजो [संगीत] गिरधर

2:11:28गोविंद

2:11:30गोपाला

2:11:31[संगीत]

2:11:32एक दो तीन भजो

2:11:41भजो गिरिधर

2:11:43गोविंद

2:11:47भजो मुरली [गाना गाने की आवाज़]

2:11:49मनोहर

2:11:51नंदलाला

2:11:53[संगीत] भजो मुरली मनोहर

2:11:56[गाना गाने की आवाज़]

2:11:57नंदलाला

2:11:59[संगीत] भजो मुरली मनोहर

2:12:04नंदलाला

2:12:06भजो [संगीत]

2:12:07मुरली मनोहर

2:12:10नंदलाला

2:12:13एक दो तीन भजो

2:12:17[संगीत]

2:12:21भजो गिरधर [गाना गाने की आवाज़]

2:12:23गोविंद [संगीत]

2:12:25गोपाला

2:12:28भजो गिरधर

2:12:30गोविंद

2:12:32गोपाला

2:12:34भजो [संगीत] गिरधर हरि गोविंद

2:12:38गोपाला

2:12:40[संगीत] भजो गिरधर

2:12:42गोविंद

2:12:44गोपाला [गाना गाने की आवाज़]

2:12:46भजो मुरली [संगीत]

2:12:48मनोहर

2:12:50नंदलाला [गाना गाने की आवाज़]

2:12:52भजो [संगीत] मुरली मनोहर

2:12:56नंदलाला

2:12:58भजो मुरली मनोहर [संगीत]

2:13:02नंदलाला लाल

2:13:05मुरली मनोहर

2:13:08नंदलाला [संगीत]

2:13:10तो भजो राधे [गाना गाने की आवाज़]

2:13:12गोविंद

2:13:14गोविंद [संगीत]

2:13:15राधे

2:13:17राधे गोविंद

2:13:19गोविंद राधे

2:13:22राधे गोविंद [गाना गाने की आवाज़][संगीत]

2:13:25गोविंद राधे

2:13:28राधे [गाना गाने की आवाज़]

2:13:29गोविंद [संगीत]

2:13:30गोविंद राधे मैं बोलूंगी राधे गोविंद आप

2:13:35सब बोलेंगे गोविंद राधे

2:13:40राधे गोविंद [गाना गाने की आवाज़]

2:13:42[संगीत]

2:13:43गोविंद राधे

2:13:46राधे [गाना गाने की आवाज़] गोविंद गोविंद

2:13:50राधे

2:13:51राधे गोविंद गोविंद [संगीत]

2:13:55राधे

2:13:57राधे गोविंद गोविंद राधे [संगीत]

2:14:02राधे गोविंद [गाना गाने की आवाज़]

2:14:05गोविंद राधे [संगीत]

2:14:08राधे गोविंद गोविंद

2:14:12[संगीत][गाना गाने की आवाज़] राधे

2:14:13राधे गोविंद गोविंद राधे

2:14:18[संगीत][गाना गाने की आवाज़]

2:14:19राधे गोविंद

2:14:22गोविंद राधे

2:14:24भजो राधे [गाना गाने की आवाज़]

2:14:26गोविंद [संगीत]

2:14:27गोविंद राधे

2:14:30राधे राधे गोविंद गोविंद [संगीत]

2:14:34राधे

2:14:35भजो राधे [गाना गाने की आवाज़]

2:14:37गोविंद गोविंद [संगीत] राधे

2:14:41राधे गोविंद गोविंद राधे

2:14:46राधे गोविंद गोविंद राधे [संगीत]

2:14:52राधे गोविंद [गाना गाने की आवाज़]

2:14:55गोविंद राधे

2:14:57राधे गोविंद

2:15:00गोविंद [संगीत] राधे

2:15:03राधे गोविंद गोविंद [गाना गाने की आवाज़]

2:15:07राधे

2:15:08भजो राधे गोविंद [संगीत]

2:15:11गोविंद राधे राधे गोविंद

2:15:16[गाना गाने की आवाज़][संगीत]

2:15:16गोविंद राधे

2:15:19राधे गोविंद [गाना गाने की आवाज़] गोविंद

2:15:21राधे राधे गोविंद [संगीत] गोविंद राधे

2:15:24राधे गोविंद गोविंद राधे राधे गोविंद

2:15:28गोविंद राधे [संगीत] राधे राधे गोविंद

2:15:31गोविंद राधे राधे गोविंद गोविंद राधे राधे

2:15:35गोविंद गोविंद राधे राधे गोविंद गोविंद

2:15:38[संगीत]

2:15:39राधे राधे गोविंद गोविंद राधे राधे गोविंद

2:15:43गोविंद राधे राधे गोविंद गोविंद राधे

2:15:46[संगीत]

2:15:47राधे गोविंद गोविंद राधे राधे गोविंद

2:15:50गोविंद राधे राधे [संगीत] गोविंद गोविंद

2:15:53राधे राधे गोविंद गोविंद राधे राधे गोविंद

2:15:59गोविंद [गाना गाने की आवाज़] गोविंद राधे

2:16:01राधे [संगीत]

2:16:02गोविंद गोविंद राधे राधे गोविंद गोविंद

2:16:10राधे [संगीत]

2:16:11राधे गोविंद गोविंद राधे राधे गोविंद

2:16:14गोविंद राधे राधे राधे राधे राधे राधे

2:16:18राधे [संगीत] राधे राधे राधे राधे राधे

2:16:22राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे

2:16:26राधे राधे [संगीत] राधे राधे राधे राधे

2:16:29राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे

2:16:33राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे

2:16:37राधे [संगीत] राधे राधे राधे राधे राधे

2:16:40राधे राधे राधे राधे राधे [संगीत] राधे

2:16:43राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे

2:16:47[गाना गाने की आवाज़] राधे राधे राधे राधे

2:16:49राधे [संगीत] राधे राधे राधे गोविंद

2:16:53गोविंद राधे राधे गोविंद गोविंद राधे राधे

2:16:59[संगीत]

2:16:59बोलिए वृंदावन

2:17:01बिहारी [गाना गाने की आवाज़] लाल की

2:17:04जय [संगीत]

2:17:05श्रीमद् सतगुरु सरकार

2:17:07[गाना गाने की आवाज़] की

2:17:08जय

2:17:10अब आप लोग खड़े हो जाइए आरती कर लीजिए

2:17:30आरती प्रीतम [गाना गाने की आवाज़][संगीत]

2:17:32प्यारे की जीवन

2:17:36रखवारी [संगीत] की आरती प्रीतम प्यारे की

2:17:43जीवन

2:17:45रखवारी की नर मोहरे [संगीत]

2:17:50[गाना गाने की आवाज़] नर खनक

2:17:53जनक पुरन मन दुल जन

2:17:58[संगीत][गाना गाने की आवाज़] प्यारी की

2:18:01बनवारी

2:18:02रखवारी [संगीत]

2:18:04की एक सिर मोर मुकुट राजे एक सिर

2:18:10[संगीत][गाना गाने की आवाज़] चुनर छवि

2:18:13दो सिर तिछे [संगीत]

2:18:18संज [गाना गाने की आवाज़]

2:18:20लाडलीला

2:18:22बाल डाल पार दुनि

2:18:28की [संगीत] जीवन

2:18:30नथवारी

2:18:32की आरती प्रीतम [संगीत] प्यारी की जीवन

2:18:39नथवारी [संगीत] की आरती प्रीतम प्यारी की

2:18:46जीवन [संगीत]

2:18:52श्रीमद् सतगुरु सरकार की

2:18:55जय

2:18:56श्रीमत युगल सरकार की

2:18:58[गाना गाने की आवाज़]

2:18:58जय

2:18:59जय जय श्री राधे

2:19:03जय जय श्री राधे

2:19:07जय जय [संगीत] श्री राधे

2:19:34राधे राधे राधे जो लोग कल प्रातः में होने

2:19:40वाला रूप ध्यान मेडिटेशन साधना में भाग

2:19:44लेना चाहते हैं वे लोग कृपया स्टॉल की ओर

2:19:47प्रस्थान करें और अपना नाम रजिस्टर करवा

2:19:51लें। राधेधे जो लोग कल सुबह होने वाला रूप

2:19:57ध्यान मेडिटेशन

2:19:59साधना में भाग लेना चाहते हैं वे लोग

2:20:02कृपया स्टॉल में जाकर अपना नाम रजिस्टर

2:20:05करवा दें।

2:20:07उपनिषद ज्ञान अमृत क्विज में पार्टिसिपेट

2:20:10करने के लिए एलईडी में प्रोजेक्ट हुआ हुआ

2:20:14क्यूआर कोड को स्कैन करें।

2:20:20ब्रज गोपिका सेवा मिशन द्वारा पब्लिश

2:20:25आध्यात्मिक पुस्तकें स्टॉल में अवेलेबल है

2:20:29और यहां जो संकीर्तन का आप लाभ लेते हैं

2:20:35उस सुमधुर संकीर्तन को स्वयं करने के लिए

2:20:40जो पुस्तिका अवेलेबल है आप उसको पुस्तक

2:20:44स्टॉल से ले सकते हैं। राधे राधे

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