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यमराज ने बताया आख़िर वह कौन सा दान है जो स्वर्ग दिलाता है | गरुड पुराण का दान

CM Vastu Puran · 5,202 words · 24 min read

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0:00हे यमराज मैंने भूखों को भोजन खिलाया, गौ

0:03[संगीत] दान किया और अनेक पुण्य कर्म किए।

0:07फिर भी मुझे नरक में क्यों डाला जा रहा

0:09है? तूने अनेक पुण्य कर्म किए। परंतु तूने

0:12यह एक दान नहीं किया। इसी कारण तुझे नरक

0:16में डाला जा रहा है।

0:18[गला साफ़ करने की आवाज़] क्या आप जानते

0:19हैं कि मृत्यु के बाद यमराज के दरबार में

0:22आपके किस दान का सबसे बड़ा मोल होता है?

0:24आप जीवन भर चाहे अपना पूरा खजाना लुटा दें

0:27या सोने के सैकड़ों भव्य मंदिर बनवा लें।

0:30लेकिन एक दान ऐसा है जिसके बिना स्वर्ग के

0:33द्वार कभी नहीं खुलते। आखिर वह कौन सा

0:35गुप्त दान है जो करोड़ों स्वर्ण मुद्राओं

0:38से भी बड़ा है और जिसे स्वयं भगवान ने

0:40सबसे महान बताया है। आइए आज जानते हैं दान

0:43और पुण्य के उस सबसे बड़े और रोंगटे खड़े

0:46कर देने वाले रहस्य को जो आपके जीवन को

0:49देखने का नजरिया हमेशा के लिए बदल देगा।

0:52एक बार यमलोक में कुछ ऐसा हुआ जिसने सब

0:55कुछ हिला कर रख दिया। मृत्युलोक और देवलोक

0:58के बीच बसा यमलोक जहां ना कभी दिन का

1:01उजाला होता है और ना ही रात का घोर

1:03अंधकार। वहां केवल प्राणियों के कर्मों की

1:06गूंज सुनाई देती है। धर्मराज यमराज का

1:09विशाल और भव्य दरबार लगा हुआ था। चारों ओर

1:12एक गहरी खौफनाक लेकिन एकदम शांत आभा फैली

1:16हुई थी। इस दरबार में कभी किसी के साथ

1:18अन्याय नहीं होता। लेकिन आज यमलोक के

1:22विशाल द्वार पर दो आत्माएं एक साथ आकर

1:24खड़ी हुई। जिनके कर्मों के हिसाब ने खुद

1:27चित्रगुप्त को भी गहरे सोच में डाल दिया

1:29था। उनमें से एक आत्मा के चेहरे पर राजसी

1:32तेज और घमंड साफ झलक रहा था। यह आर्यावर्त

1:36के सबसे महान और अत्यंत अमीर राजा देवव्रत

1:40की आत्मा थी। वहीं दूसरी आत्मा बिल्कुल

1:42सिकुड़ी हुई, डरी हुई और अत्यंत शांत थी।

1:46यह एक गरीब, बेसहारा और अनजान से गांव की

1:49आत्मा थी। दरबार में भारी सन्नाटा पसरा

1:53था। तभी चित्रगुप्त ने अपने महान कर्म

1:55ग्रंथ के पन्ने पलटे और भारी मन से यमराज

1:58की ओर देखा। चित्रगुप्त बोले हे धर्मराज

2:02आज कर्मों के तराजू पर एक अत्यंत विचित्र

2:05स्थिति उत्पन्न हो गई है। पृथ्वी लोक से

2:07यह दो आत्माएं एक ही पल में अपने प्राण

2:10त्याग कर यहां यमलोक पहुंची हैं। परंतु

2:13इनके कर्मों का लेखाजोखा मेरे मस्तिष्क को

2:16भी उलझन में डाल रहा है। समझ नहीं आ रहा

2:18कि न्याय का कांटा किस दिशा में झुकेगा।

2:21यमराज बोले हे चित्रगुप्त

2:24धर्म के कांटे पर कोई भी स्थिति विचित्र

2:27नहीं होती। कर्मों की गति अत्यंत सूक्ष्म

2:31और पारदर्शी है। प्राणी मृत्यु लोक में जो

2:35बीज बोता है उसे यहां वही फसल काटनी पड़ती

2:39है। [गला साफ़ करने की आवाज़] तुम तनिक भी

2:41संकोच ना करो और विस्तार से बताओ कि इन

2:44दोनों प्राणियों के जीवन का क्या सार है।

2:47चित्रगुप्त बोले महाराज मेरे दाहिनी ओर जो

2:51आत्मा अत्यंत गर्व से खड़ी है वह पृथ्वी

2:54के सबसे धनी राजा देवव्रत की है। इन्होंने

2:57अपने पूरे जीवन में दान की नदियां बहा दी

2:59हैं। इन्होंने 100 से अधिक भव्य मंदिरों

3:02का निर्माण करवाया है। अपनी गौशाला से

3:0410,000 कामधेनु समान गायों का दान किया है

3:08और हर पूर्णिमा के दिन अपने राज्य के

3:10ब्राह्मणों और निर्धनों को स्वर्ण

3:13मुद्राएं बांटी हैं। इनका नाम पूरी पृथ्वी

3:16पर दानवीर और धर्म रक्षक के रूप में

3:19गूंजता है। यमराज बोले और यह दूसरी आत्मा

3:23जो भय से कांप रही है इसका क्या परिचय है?

3:26चित्रगुप्त बोले यह माधव है प्रभु एक

3:29अत्यंत दरिद्र और अभागा इंसान इसके पास

3:32जीवन में कभी दो वक्त का भरपेट भोजन नहीं

3:35रहा। इसने अपना पूरा जीवन केवल दूसरों के

3:38खेतों में मिट्टी खोदकर बिताया और अंत में

3:41एक शापित और भयानक जंगल में भूख और प्यास

3:44से तड़प कर इसकी मृत्यु हो गई। महाराज

3:48इसने अपने पूरे जीवन में कभी किसी को एक

3:50तांबे का सिक्का या अन्न का एक दाना भी

3:53दान नहीं किया क्योंकि इसके पास अपना पेट

3:56भरने को ही कुछ नहीं था। चित्रगुप्त की यह

3:58बातें सुनकर राजा देवव्रत की आत्मा गर्व

4:00से और चौड़ी हो गई। उसे पूरा विश्वास था

4:03कि अब उसे यमराज पूरे सम्मान के साथ

4:05स्वर्ग के सबसे सुंदर भवन में भेजेंगे और

4:07अप्सराएं उसका स्वागत करेंगी। वहीं दूसरी

4:10ओर गरीब माधव अपना सिर झुकाए खड़ा था। उसे

4:14पता था कि उसने जीवन में कोई पुण्य नहीं

4:16किया है। इसलिए वह चुपचाप अपने नर्क के

4:18दंड की प्रतीक्षा कर रहा था। यमराज ने

4:21दोनों की ओर बहुत ही गहरी और शांत दृष्टि

4:24से देखा। यमराज बोले न्याय का समय आ गया

4:27है। [गला साफ़ करने की आवाज़]

4:29चित्रगुप्त मेरी आज्ञा ध्यान से सुनो। इस

4:32महान दानवीर राजा देवव्रत को तुरंत रौरव

4:35नरक की सबसे भयानक और सुलगती हुई आग में

4:37धकेल दिया जाए और इस दरिद्र माधव को पूरे

4:40सम्मान के साथ स्वर्ग के नंदन वन में ले

4:43जाया जाए। यमराज का यह फैसला सुनते ही

4:45जैसे पूरे यमलोक में बिजली गिर गई।

4:47चित्रगुप्त भी एक पल के लिए स्तब्ध रह गए

4:50और उनके हाथों से ग्रंथ छूटते-छूटते बचा।

4:53राजा देवव्रत की आत्मा तो क्रोध, आश्चर्य

4:56और भयंकर अपमान से तिलमिला उठी। वह अपने

4:59सामने खड़े साक्षात मृत्यु के देवता को

5:01भूलकर जोर से चीख पड़ा। राजा देवव्रत

5:05बोले, रुकिए धर्मराज, यह कैसा अंधेर है?

5:08यह कैसा न्याय कर रहे हैं आप? क्या यमलोक

5:10के तराजू में जंग लग गया है? मैंने अपना

5:13पूरा खजाना लोगों पर लुटा दिया। मेरे

5:16बनवाए भव्य मंदिरों में आज भी आपके

5:18देवताओं की पूजा होती है। मेरे द्वारा

5:20बांटे गए सोने से हजारों गरीबों के घर

5:23चलते हैं। अकाल के समय मैंने अपने अन्न

5:26भंडार खोल दिए थे। मैंने जीवन भर केवल

5:29धर्म का मार्ग चुना और आप मुझे नरक भेज

5:31रहे हैं और इस भिखारी को इस अभागे को

5:34स्वर्ग जिसने जीवन में एक चींटी को शक्कर

5:37तक नहीं डाली यह घोर अन्याय है। मैं आपके

5:40इस फैसले को कदापि नहीं मानता।

5:42यमराज बोले शांत हो जाओ देवव्रत तुम इस

5:46समय यमलोक में खड़े हो। अपने महल के दरबार

5:49में नहीं। तुम्हारा अहंकार तुम्हारी चिता

5:52की आग के साथ ही जल जाना चाहिए था। परंतु

5:55यह तुम्हारी आत्मा से लिपट कर यहां मेरे

5:58सामने तक आ गया है और यही अहंकार तुम्हारे

6:02नर्क का मुख्य द्वार है।

6:04राजा देवव्रत बोले कैसा अहंकार धर्मराज?

6:07क्या मैंने दान नहीं किया? क्या मेरे धन

6:10से भूखों का पेट नहीं भरा? आप मेरे इतने

6:13बड़े-बड़े पुण्यों को ऐसे कैसे झुकला सकते

6:15हैं?

6:16यमराज बोले तुमने दान नहीं किया देवव्रत।

6:20तुमने केवल अपनी महानता का व्यापार किया

6:23है। तुमने वे भव्य मंदिर इसलिए बनवाए ताकि

6:27आने वाली पीढ़ियां भगवान से ज्यादा

6:30तुम्हारा नाम याद रखें। तुमने स्वर्ण

6:32मुद्राएं इसलिए बांटी ताकि गरीब लोग

6:35तुम्हारे सामने हाथ फैलाकर सिर झुकाए और

6:39तुम्हारी जय जयकार करें। तुमने अकाल में

6:42अन्न बांटकर लोगों की भूख नहीं मिटाई

6:46बल्कि उन पर एहसान किया ताकि वे तुम्हारे

6:49गुलाम बन जाए। सुनो देवव्रत जिस दान के

6:53पीछे दान देने वाले का मैं खड़ा हो जाए वो

6:57दान पुण्य नहीं घोर पाप बन जाता है।

7:02तुम्हारे हर सिक्के पर तुम्हारे हर अन्न

7:04के दाने पर तुम्हारा घमंड छाया हुआ था।

7:09तुमने लोगों की गरीबी दूर नहीं की। तुमने

7:12उनकी मजबूरी खरीद कर अपना रुतबा बढ़ाया।

7:16तुम्हारा दान सात्विक नहीं बल्कि घोर

7:19तामसिक था और तामसिक कर्म सीधे रौरव नरक

7:23की आग की ओर ही ले जाते हैं। राजा देवव्रत

7:26बोले तो क्या मेरा किया गया सब कुछ व्यर्थ

7:29हो गया? और इस भिखारी ने ऐसा क्या महान

7:31कार्य कर दिया? इसने तो जीवन भर कोई दान

7:34नहीं किया। इसे आपने स्वर्ग का अधिकारी

7:37कैसे मान लिया? राजा के इस तीखे प्रश्न पर

7:39यमराज ने माधव की ओर देखा। माधव अभी भी

7:42बिल्कुल चुप था। उसकी आंखों में आंसू थे

7:45और वह हाथ जोड़े बस ईश्वर का नाम जप रहा

7:48था। यमराज ने फिर चित्रगुप्त के ग्रंथ की

7:50ओर देखा। परंतु अचानक यमराज के शांत माथे

7:54पर भी चिंता की लकीरें उभर आई। यमराज

7:56बोले, चित्रगुप्त यह बात सत्य है कि माधव

8:00ने जीवन भर कोई लौकिक दान नहीं किया।

8:04परंतु मृत्यु से ठीक पहले उस भयानक और

8:08शापित जंगल में इसके द्वारा किया गया एक

8:12कर्म इतना महान था कि उसने इसके पिछले 100

8:16जन्मों के सारे पाप धो दिए हैं। इसके कर्म

8:20पुस्तिका का वह पन्ना स्वर्ण अक्षरों से

8:23क्यों चमक रहा है? चित्रगुप्त बोले महाराज

8:27यही तो सबसे बड़ा रहस्य है। मेरे खाते में

8:29उस अंतिम क्षण का कोई भी दृश्य स्पष्ट

8:32नहीं है। माधव जब उस भयानक जंगल में था तब

8:35वहां एक मायावी और दिव्य अंधकार छा गया

8:38था। मुझे केवल इतना ज्ञात है कि इसने अपनी

8:41मृत्यु से ठीक पहले कुछ ऐसा त्याग किया है

8:44जो इस पूरे ब्रह्मांड के सबसे बड़े

8:46पुण्यों में से एक है। पर वह कृत क्या था?

8:50इसने ऐसा क्या दान किया? यह रहस्य इस

8:53ग्रंथ की दृष्टि से भी छिपा हुआ है। पन्ने

8:56पर केवल एक असीम रोशनी है जिसे मेरी आंखें

8:59भी नहीं पढ़ पा रही हैं।

9:00यमराज बोले यदि कर्मों के ग्रंथ में वह

9:03क्षण स्पष्ट नहीं है तो इसका अर्थ है कि

9:07माधव के उस दान में स्वयं परमपिता नारायण

9:10की कोई गहरी माया छिपी हुई है। इसने जो भी

9:14दिया है वह बिना किसी स्वार्थ बिना किसी

9:17को जताए और बिना किसी फल की आशा के दिया

9:21है। गुप्त दान ही सबसे श्रेष्ठ होता है।

9:24परंतु यमलोक के नियम के अनुसार जब तक पूरा

9:28सत्य सामने ना आ जाए, न्याय की प्रक्रिया

9:31पूर्ण नहीं मानी जाती। हमें यह जानना ही

9:34होगा कि एक भूखे इंसान ने ऐसा क्या दान कर

9:38दिया जो अमूल्य हो गया। इतना कहकर यमराज

9:41अपने काले और विशाल आसन से उठ खड़े हुए।

9:44पूरे यमलोक में उनके भारी कदमों की गूंज

9:47सुनाई देने लगी। उन्होंने अपने सबसे

9:49भरोसेमंद और श्रेष्ठ दूत कालदूत का आवाहन

9:52किया। यमराज बोले

9:54कालदूत तुरंत मेरे समक्ष प्रस्तुत हो।

9:58कालदूत बोले [गला साफ़ करने की आवाज़]

10:00आज्ञा करें धर्मराज आपका यह सेवक उपस्थित

10:04है।

10:04यमराज बोले कालदूत मैं तुम्हें एक अत्यंत

10:08ही महत्वपूर्ण कार्य सौंप रहा हूं।

10:11तुम्हें इसी क्षण पृथ्वी लोक पर जाना है।

10:15तुम्हें एक साधारण मनुष्य का रूप धारण कर

10:18उस शापित जंगल और उस गांव में जाना है

10:22जहां से यह माधव आया है। तुम्हें यह पता

10:25लगाना है कि अपनी मृत्यु से ठीक पहले जब

10:29यह भूख और प्यास से बुरी तरह तड़प रहा था।

10:32तब इसने ऐसा कौन सा दान किया जिसने राजा

10:36देवव्रत के स्वर्ण कलशों को भी मिट्टी कर

10:39दिया। कालदूत बोले परंतु प्रभु जब

10:43चित्रगुप्त जी की दिव्य दृष्टि भी उस

10:45रहस्य को नहीं देख पाई तो मैं एक साधारण

10:49रूप में उसे कैसे खोजूंगा? यमराज बोले

10:51क्योंकि सत्य कभी छिपता नहीं है कालदूत वो

10:55उस जंगल की हवाओं में उन पेड़ों की जड़ों

10:59में और वहां की मिट्टी में कहीं ना कहीं

11:02दर्ज होगा। जाओ माधव के अंतिम पलों की

11:06यात्रा को फिर से जियो। उस गांव के रहस्य

11:09को सुलझाओ और पता लगाओ कि असली दान क्या

11:13होता है। जब तक तुम सत्य लेकर नहीं लौटोगे

11:17राजा देवव्रत और माधव इसी दरबार में

11:21तुम्हारे लौटने की प्रतीक्षा करेंगे।

11:24तुरंत प्रस्थान करो। कालदूत बोले जो आज्ञा

11:28धर्मराज यमराज का आदेश मिलते ही कालदूत ने

11:31उन्हें प्रणाम किया और एक ही झटके में वह

11:33यमलोक के अंधेरे को चीरता हुआ पृथ्वी की

11:36ओर निकल पड़ा। दरबार में राजा देवव्रत

11:39जमीन पर गिरकर अपने अहंकार पर रो रहा था

11:42और माधव अभी भी अपनी आंखें बंद किए शांत

11:44खड़ा था। पृथ्वी पर अब एक बहुत बड़ा रहस्य

11:47खुलने वाला था। उस शापित जंगल में ऐसा

11:50क्या छिपा था? माधव ने मरते हुए किसे अपना

11:53सब कुछ दे दिया था। यह सब कालदूत के लिए

11:56एक बहुत बड़ी परीक्षा बनने वाली थी जिसकी

11:59शुरुआत पृथ्वी के उस रहस्यमई गांव से होने

12:01वाली थी। पृथ्वी लोक पर रात का अंधकार

12:04पूरी तरह छा चुका था। घने काले बादलों के

12:07बीच से झांकता हुआ चंद्रमा भी अपनी रोशनी

12:10धरती तक पहुंचाने में संघर्ष कर रहा था।

12:12कालदूत ने एक साधारण सन्यासी का रूप धारण

12:15किया और उसी अनजान से गांव में अपने कदम

12:17रखे जहां माधव का जन्म हुआ था। गांव में

12:21प्रवेश करते ही कालदूत को एक अजीब सी

12:23वीरानी और खौफ का एहसास हुआ। हवा में एक

12:26उदासी घुली हुई थी। कच्चे मकानों के

12:29दरवाजे अंदर से मजबूती से बंद थे। मानो

12:32वहां के लोग किसी अनजाने डर के साए में जी

12:34रहे हो। कालदूत चलते-चलते गांव के

12:37बीचोंबीच स्थित एक पुराने पीपल के पेड़ के

12:40पास पहुंचे। वहां एक अत्यंत वृद्ध आदमी

12:43जिसके चेहरे पर जीवन भर के दुख की लकीरें

12:46थी। एक छोटी सी आग जलाकर ताप रहा था।

12:49कालदूत उस वृद्ध के पास जाकर रुके। कालदूत

12:52बोले, हे तात प्रणाम। मैं एक दूर देश का

12:55यात्री हूं। रास्ता भटक कर इस गांव में आ

12:58पहुंचा हूं। क्या रात बिताने के लिए यहां

13:01कोई सुरक्षित स्थान और पेट की आग बुझाने

13:04के लिए थोड़ा अन्न मिल सकता है?

13:06[गला साफ़ करने की आवाज़]

13:06वृद्ध ग्रामीण बोले

13:10सन्यासी महाराज आप गलत समय पर गलत जगह आ

13:13गए हैं। यह [गला साफ़ करने की आवाज़]

13:14चंदनपुर गांव है जिस पर अब देवताओं की

13:17कृपा नहीं बल्कि एक भारी श्राप की छाया

13:20है। यहां के लोग खुद भूख और प्यास से मर

13:24रहे हैं। वे आपको क्या अन्न देंगे? आप

13:27चाहें तो सामने मंदिर के टूटे हुए चबूतरे

13:30पर सो सकते हैं। परंतु मेरी एक बात याद

13:34रखिएगा। रात के समय उस उत्तरी दिशा वाले

13:37जंगल की तरफ भूलकर भी मत जाना। वह श्रापित

13:41वन है। जो भी वहां जाता है कभी लौट कर

13:45नहीं आता। कालदूत बोले, श्रापित वन तात

13:49मैंने तो अपनी यात्रा में सुना था कि इस

13:51गांव में माधव नाम का एक अत्यंत सीधा और

13:54ईश्वर का परम भक्त रहता था।

13:57मैं उसी की खोज में यहां आया हूं। क्या आप

14:00मुझे माधव के बारे में कुछ बता सकते हैं?

14:02माधव उस अभागे का नाम मत लीजिए महाराज।

14:07मेरा ही सगा भतीजा था वो। इस पूरे गांव

14:10में बल्कि मैं तो कहूंगा इस पूरी धरती पर

14:13उससे ज्यादा पवित्र आत्मा किसी की नहीं

14:16थी।

14:18लेकिन विधाता ने उसके भाग्य में केवल दुख

14:21ही दुख लिखा था। बचपन में ही माता-पिता का

14:24साया उठ गया था। वह दूसरों के खेतों में

14:28दिन रात जानवरों की तरह काम करता। लेकिन

14:31उसे मजदूरी में केवल इतना अनाज मिलता कि

14:33वह बस एक वक्त खाकर जिंदा रह सके। कभी-कभी

14:38तो वह कुएं का पानी पीकर ही कई-कई दिन

14:40गुजार देता था। [गला साफ़ करने की आवाज़]

14:42पर महाराज मजाल है कि उस लड़के ने अपनी

14:46इतनी भयंकर भूख में कभी किसी के खेत से एक

14:49फल भी चुराया हो। वह हमेशा कहता था कि

14:53चोरी का अन्न शरीर तो पाल सकता है। पर

14:56इंसान की आत्मा को मार देता है। कालदूत

14:58बोले यदि वह इतना ही सच्चा और धर्म के

15:01मार्ग पर चलने वाला था तो फिर उसकी मृत्यु

15:04उस श्रापित जंगल में कैसे हुई? वो वहां

15:08क्यों गया था? वृद्ध ग्रामीण बोले क्योंकि

15:11यह गांव और हम सब अत्यंत स्वार्थी हो गए

15:14थे। महाराज पिछले महीने यहां भयंकर सूखा

15:18पड़ा। खेतों में गहरी दरारें आ गई। हमने

15:21अपनेपने घरों के बचे हुए अनाज छिपा लिए।

15:25माधव के पास तो पहले से ही कुछ नहीं था।

15:28वह पांच दिन तक भूख से तड़पता रहा। वह

15:32गांव के हर दरवाजे पर गया। उसने हाथ जोड़े

15:36लेकिन किसी ने उसे एक मुट्ठी अनाज नहीं

15:38दिया।

15:40भूख से उसकी आंखें अंदर धंस गई थी। शरीर

15:43कांपने लगा था। जब उसे लगा कि वह भूख की

15:47पीड़ा से पागल हो जाएगा तो वह अपने प्राण

15:50बचाने के लिए जंगली कंदमूल खोजने उस

15:53उत्तरी जंगल की ओर निकल गया। हमने उसे

15:57बहुत रोका क्योंकि वह जंगल मायावी और

16:00राक्षसी शक्तियों का गढ़ है। लेकिन भूख का

16:03दर्द मौत के डर से भी बहुत बड़ा होता है।

16:06महाराज

16:08वह गया और फिर कभी लौट कर नहीं आया।

16:13हमने डर के मारे वहां जाकर उसका अंतिम

16:16संस्कार तक नहीं किया। कालदूत बोले

16:19मनुष्य का स्वार्थ ही उसका सबसे बड़ा

16:22शत्रु है तात

16:24माधव ने भूख से प्राण त्यागे पर अंत तक

16:28अपने धर्म को नहीं छोड़ा।

16:30मैं उसी श्रापित जंगल में जाऊंगा और माधव

16:34की आत्मा की शांति के लिए उसके शरीर के

16:37अवशेषों को अग्नि दूंगा। नहीं महाराज ऐसी

16:40भयानक भूल मत कीजिएगा। वह जंगल जीवित

16:43इंसानों को कच्चा निगल जाता है। वहां की

16:47हवाओं में मायावी राक्षस बसते हैं जो

16:50इंसान के मन का डर और लालच बहुत जल्दी पढ़

16:53लेते हैं। आप वहां से जीवित नहीं लौटेंगे।

16:57कालदूत बोले जो जन्म और मृत्यु के चक्र से

17:00परे हो उसे भला कौन सा मायावी राक्षस डरा

17:04सकता है ताथ आप निश्चिंत रहें। मेरा कोई

17:07अहित नहीं होगा। इतना कहकर कालदूत ने उस

17:10वृद्ध ग्रामीण को प्रणाम किया और बिना एक

17:12पल गवाए उस भयानक और श्रापित जंगल की ओर

17:15चल पड़े। जैसे-जैसे कालदूत जंगल के करीब

17:18पहुंच रहे थे, हवा का तापमान तेजी से

17:21गिरने लगा। चारों ओर एक घना, सफेद और

17:24रहस्यमई कोहरा छा गया। पेड़ों की सूखी

17:27शाखाएं ऐसे लग रही थी जैसे कंकालों के हाथ

17:29हो जो आसमान को खुरच रहे हो। जमीन पर सूखे

17:33पत्तों के कुचलने की आवाज के अलावा वहां

17:35कोई दूसरी ध्वनि नहीं थी। जंगल में प्रवेश

17:38करते ही कालदूत को एहसास हुआ कि यहां की

17:41मिट्टी में एक भारी दम घोटू और अत्यंत

17:44नकारात्मक माया फैली हुई है।

17:47अचानक कालदूत के कानों में अजीब सी आवाजें

17:50गूंजने लगी। कोई उनके कानों में फुसफुसा

17:52रहा था। कोई रो रहा था तो कोई हंस रहा था।

17:56ऐसा लग रहा था जैसे जंगल उन पर हावी होने

17:59की कोशिश कर रहा हो। तभी कोहरे के बीच से

18:02एक विशाल और भयानक आकृति उभर कर सामने आई।

18:05उसकी आंखें दहकते हुए अंगारों जैसी थी और

18:08उसका पूरा शरीर काले धुएं और परछाइयों से

18:11बना था। वो उस जंगल का मायावी राक्षस था

18:14जो इंसानों के अंदर के लालच और भूख को

18:16खींच कर अपनी शक्ति बढ़ाता था। मायावी

18:19राक्षस बोले [हंसी]

18:22एक और मूर्ख इंसान अपनी जान गवाने इस

18:25श्रापित वन में चला आया। क्या तू भी उसी

18:28भूखे भिखारी माधव की तरह यहां कुछ ढूंढने

18:32आया है?

18:33हम [गला साफ़ करने की आवाज़] लौट जा

18:34सन्यासी वरना मैं तेरी देह का सारा खून पी

18:38जाऊंगा और तेरी हड्डियां इसी मिट्टी में

18:42सला दूंगा। कालदूत बोले मैं यहां ना कुछ

18:46पाने आया हूं और ना ही मुझे अपने प्राणों

18:49का कोई मोह है।

18:52मैं तो उस परम सत्य को खोजने आया हूं जिसे

18:55तुम जैसे मायावी अंधकार ने छिपा रखा है।

18:59मुझे बता उस रात माधव के साथ यहां क्या

19:03हुआ था?

19:03मायावी राक्षस बोले माधव

19:06[नाक से की जाने वाली आवाज़]

19:07उस मूर्ख अभागी की बात कर रहा है तू? वह

19:11जब यहां आया था तो भूख से उसके प्राण सूख

19:14रहे थे। वह ठीक से खड़ा भी नहीं हो पा रहा

19:17था। मैंने उसकी परीक्षा ली थी। मैंने अपनी

19:21माया से उसके सामने 56 प्रकार के

19:24स्वादिष्ट व्यंजनों का ढेर लगा दिया था।

19:27मैंने उससे कहा कि मुझे अपना ईश्वर और

19:30अपना धर्म बेच दे। मेरे सामने घुटने टेक

19:34कर मेरी पूजा कर तो यह सारा भोजन उसका हो

19:37जाएगा।

19:39लेकिन वह मूर्ख वह इंसान नहीं कोई जिद्दी

19:42पत्थर था। उसने मेरी माया को पहचान लिया

19:46और उस दिव्य भोजन को लात मार दी। उसने कहा

19:50कि वह भूखा मर जाना स्वीकार करेगा लेकिन

19:53किसी आसुरी शक्ति के आगे हाथ नहीं

19:56फैलाएगा।

19:56कालदूत बोले माधव ने सत्य ही कहा था। वह

20:01शरीर से कमजोर अवश्य था। परंतु उसकी आत्मा

20:05तुमसे कई गुना अधिक बलवान थी।

20:09और उसके बाद क्या हुआ?

20:10मायावी राक्षस बोले उसके बाद वह और घने

20:14जंगल में चला गया। लेकिन वो यहां से जीवित

20:17वापस नहीं गया सन्यासी।

20:20उस रात इस जंगल में कुछ ऐसा हुआ था। कुछ

20:24ऐसा भयानक और दिव्य जिसने मेरी भी आंखें

20:27चौंधिया दी थी।

20:29मैंने दूर से देखा कि वह पुराने बरगद के

20:33पास बेसुध होकर गिरा पड़ा था और तभी वहां

20:36कोई और आया था। कोई ऐसा जिसके तेज और

20:40प्रकाश के सामने मेरी मायावी शक्तियां भी

20:43भस्म होने लगी थी।

20:45[नाक से की जाने वाली आवाज़] मैं डर के

20:46मारे वहां से भाग गया। मुझे नहीं पता वहां

20:49क्या हुआ। पर जो भी हुआ उसने उस भिखारी को

20:53इस जंगल से भी महान बना दिया। अब मेरे

20:56सवालों का अंत हुआ। तू भी मरने के लिए

20:59तैयार हो जा।

21:01यह कहते ही उस भयानक राक्षस ने अपना विशाल

21:04मायावी हाथ कालदूत को कुचलने के लिए उनकी

21:07ओर बढ़ाया। लेकिन वो यह नहीं जानता था कि

21:09उसके सामने कोई साधारण सन्यासी नहीं बल्कि

21:12स्वयं यमराज के सबसे शक्तिशाली दूत खड़े

21:15हैं। कालदूत बोले, तुम्हारी माया मुझ पर

21:18काम नहीं करेगी। मूर्ख मैं यमलोक का दूत

21:21हूं और यहां न्याय के लिए सत्य की खोज में

21:24आया हूं। मेरे मार्ग से हट जाओ। कालदूत ने

21:27अपनी आंखें बंद की और यमराज का ध्यान

21:29किया। उनके शरीर से एक प्रचंड और तीव्र

21:32नीली रोशनी निकली जो मृत्यु के अटल सत्य

21:35का प्रतीक थी। उस दिव्य प्रकाश की किरणें

21:37पड़ते ही वह मायावी राक्षस चीखता और

21:40तड़पता हुआ धुएं में बदल गया और जंगल की

21:42काली हवा में सदा के लिए विलीन हो गया।

21:45जंगल का मायाजाल कुछ पल के लिए टूट गया और

21:48कोहरा छटने लगा। कालदूत अब तेजी से जंगल

21:51के बीचों-बीच उस पुराने और विशाल बरगद के

21:54पेड़ की ओर बढ़े जिसके बारे में वृद्ध

21:56ग्रामीण और उस राक्षस ने बताया था। वहां

21:59पहुंचकर कालदूत के कदम अचानक ठिटक गए।

22:02पेड़ के नीचे की जमीन एक अलग ही सुनहरी

22:05चमक से रोशन थी। वहां माधव का मृत शरीर

22:08नहीं था बल्कि वहां की मिट्टी पर एक बहुत

22:10ही अजीब सी आकृति बनी हुई थी। मानो वहां

22:13कोई बहुत बड़ा कृत हुआ हो। पास ही में एक

22:16आधा खाया हुआ सूखा जंगली फल पड़ा था जिस

22:19पर खून के कुछ सूखे हुए छींटे थे। कालदूत

22:23ने घुटनों के बल बैठकर अत्यंत सम्मान के

22:26साथ उस सूखी हुई मिट्टी को अपने हाथों में

22:28उठाया। कालदूत ने जैसे ही उस बरगद के पेड़

22:31के नीचे की पवित्र मिट्टी को अपने माथे से

22:33लगाया, उनकी बंद आंखों के सामने उस

22:36रहस्यमई रात का वह दृश्य सजीव हो उठा।

22:40कालदूत समय की धारा में पीछे चले गए थे और

22:43अब वह अपनी आंखों से वह सब देख रहे थे

22:45जिसने यमलोक के न्याय को भी अचंभे में डाल

22:48दिया था। दृश्य में चारों ओर भयंकर अंधकार

22:51और तूफानी हवाएं चल रही थी। माधव उस

22:54पुराने बरगद के पेड़ के नीचे आधा बेहोश

22:56पड़ा था। उसकी पसलियां उसके शरीर से बाहर

22:59झांक रही थी। होठ सूख कर फट चुके थे और

23:02आंखों की रोशनी भूख के कारण लगभग जा चुकी

23:04थी। वो अपने अंतिम सांसे गिन रहा था। तभी

23:08उसकी कांपती हुई उंगलियों से जमीन पर पड़ा

23:11एक छोटा सा सूखा हुआ जंगली फल टकराया। वो

23:14उस जंगल का आखिरी फल था। जीवन की अंतिम

23:18उम्मीद पाकर माधव के शरीर में जैसे एक पल

23:20के लिए प्राण लौट आए। उसने कांपते हुए

23:23हाथों से उस फल को उठाया। वो उसे अपने

23:26मुंह के करीब ले ही जा रहा था कि तभी हवा

23:28में एक अत्यंत डरावनी और दर्द भरी चीख

23:31गूंज उठी।

23:33माधव ने अपनी भारी पलकें उठाकर देखा। उसके

23:36सामने कोहरे को चीरता हुआ एक अत्यंत भयानक

23:39और विभत्स प्राणी खड़ा था। वो कोई इंसान

23:42नहीं लग रहा था। उसका शरीर घावों से भरा

23:45था जिससे लगातार काला खून बह रहा था। उसके

23:49शरीर से एक असहनीय दुर्गंध आ रही थी और वह

23:52दर्द के मारे जमीन पर घिसट रहा था। वो

23:55प्राणी देखने में इतना भयानक था कि कोई भी

23:57साधारण इंसान उसे देखकर ही प्राण त्याग

23:59देता।

24:01लेकिन उस डरावने जीव की आंखें उन आंखों

24:04में एक ऐसी तड़प थी, एक ऐसी भयंकर भूख थी

24:08जो माधव की अपनी भूख से कहीं ज्यादा गहरी

24:10लग रही थी। वो जीव धीरे-धीरे रेंगता हुआ

24:13माधव के पैरों के पास आ गिरा। अज्ञात जीव

24:16बोले, भोजन

24:19पानी

24:21मुझ पर दया करो मनुष्य। मेरे शरीर की

24:24एक-एक नस भूख से टूट रही है। मेरी आत्मा

24:27इस शरीर को छोड़ने से पहले भोजन के एक

24:30दाने के लिए तड़प रही है। मैं कई युगों से

24:33भूखा हूं। मुझे कुछ खाने को दे दो। वरना

24:38मेरी आत्मा कभी शांत नहीं होगी। मुझे इस

24:41असीम पीड़ा से मुक्त कर दो। कालदूत यह सब

24:44अपनी दिव्य दृष्टि से देख रहे थे और उनके

24:46रोंगटे खड़े हो गए थे। माधव खुद मृत्यु के

24:49मुहाने पर था। उसके हाथ में वह एक छोटा सा

24:52फल उसके अपने जीवन की आखिरी उम्मीद था। वह

24:55बहुत डरा हुआ था। उसे लग रहा था कि यह

24:58भयानक जीव उसे मार कर खा जाएगा। लेकिन तभी

25:01माधव ने अपनी आंखें बंद की और उसके मन का

25:04सारा डर शांत हो गया। उसने अपने हाथों में

25:07उस छोटे से फल को देखा और फिर उस तड़पते

25:10हुए डरावने जीव की आंखों में देखा। माधव

25:13के भीतर की करुणा ने उसके शरीर की सारी

25:15भूख को हमेशा के लिए मिटा दिया। माधव बोले

25:18हे अज्ञात प्राणी मैं नहीं जानता तुम कौन

25:21हो। तुम इंसान हो या कोई श्रापित प्रेत।

25:25लेकिन मैं तुम्हारे भीतर के इस असहनीय

25:28पीड़ा को समझ सकता हूं। क्योंकि इसी पीड़ा

25:31से मैं भी गुजर रहा हूं। मेरे पास तुम्हें

25:34देने के लिए कोई छप्पन भोग नहीं है। केवल

25:38यह एक सूखा फल है। शायद इसे खाने से मेरे

25:42शरीर के प्राण कुछ और पलटिक जाए। लेकिन

25:45तुम्हारा दुख मुझसे कहीं अधिक बड़ा है।

25:49यदि मेरे इस छोटे से फल से तुम्हारे प्राण

25:52बच सके और तुम्हें शांति मिल सके तो मुझे

25:55यह मृत्यु सहर्ष स्वीकार है।

25:59[गहरी सांस लेने की आवाज़] लो इसे ग्रहण

26:01करो और अपनी पीड़ा शांत करो। यह कहते हुए

26:05माधव ने अपने जीवन की आखिरी उम्मीद वो

26:08इकलौता फल उस भयानक जीव के कांपते हुए

26:10हाथों में रख दिया। जैसे ही उस जीव ने वह

26:13फल खाया, माधव के शरीर की बची खुची ऊर्जा

26:16भी समाप्त हो गई और वह एक हल्की सी

26:18मुस्कान के साथ उस बरगद की जड़ों पर गिर

26:21पड़ा। उसने अपने प्राण त्याग दिए। लेकिन

26:24माधव की आंखें बंद होते ही वहां का दृश्य

26:26पूरी तरह बदल गया। कालदूत ने देखा कि उस

26:29भयानक और विभत्स जीव के शरीर से तेज दिव्य

26:32प्रकाश फूटने लगा। उसके घाव भर गए।

26:35[संगीत] उसकी विकरालता एक अद्भुत सुंदरता

26:37में बदल गई। वह कोई साधारण जीव या प्रेत

26:40नहीं था। उस भयानक मायावी खोल के भीतर से

26:44शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए साक्षात

26:47भगवान श्री हरि विष्णु प्रकट हुए। उनकी

26:50आभा से पूरा श्रापित जंगल सोने की तरह

26:52चमकने लगा था। भगवान विष्णु ने अपनी करुणा

26:55भरी दृष्टि से माधव के मृत शरीर को देखा

26:58और उसे अपने हाथों से उठाया। भगवान विष्णु

27:01बोले हे माधव तुमने आज सिद्ध कर दिया कि

27:06निस्वार्थ करुणा ही इस ब्रह्मांड का सबसे

27:09बड़ा धर्म है। जब इंसान के पास सब कुछ हो

27:13और वह उसमें से कुछ दान करे तो वह केवल एक

27:16कर्म है। लेकिन जब इंसान के पास कुछ भी ना

27:19हो वह स्वयं मृत्यु की गोद में हो और फिर

27:23भी वह अपना सर्वस्व किसी अनजान की पीड़ा

27:27हरने के लिए सौंप दे। तो वह महादान बन

27:31जाता है। तुमने अपने प्राणों का मोह

27:34छोड़कर मुझे जो यह एक सूखा फल खिलाया है,

27:39उसने मेरे तीनों लोकों की क्षुधा शांत कर

27:42दी है। तुम्हारी यह भेंट मुझे किसी

27:45चक्रवर्ती सम्राट के स्वर्ण कलशों से भी

27:48अधिक प्रिय है। तुमने सिद्ध कर दिया कि

27:52भगवान केवल भाव के भूखे हैं। आज से

27:56तुम्हारी यह पवित्र आत्मा जन्म और मृत्यु

27:59के चक्र से मुक्त होकर मेरे बैकुंठ में

28:03हमेशा के लिए निवास करेगी। यह दृश्य देखते

28:05ही कालदूत की आंखें आंसुओं से भर गई। उनका

28:08शरीर भाव विभोर होकर कांपने लगा। कालदूत

28:12ने तुरंत उस पवित्र मिट्टी को नमन किया और

28:14पृथ्वी लोक से वापस यमलोक की ओर ओर चले।

28:18यमलोक के दरबार में अभी भी राजा देवव्रत

28:20और चित्रगुप्त कालदूत की प्रतीक्षा कर रहे

28:22थे। कालदूत ने जैसे ही दरबार में कदम रखा

28:26उनके चेहरे पर एक असीम शांति और तेज था।

28:29उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर यमराज को

28:31प्रणाम किया। कालदूत बोले हे धर्मराज मुझे

28:35मेरे प्रश्नों का उत्तर मिल गया। सत्य

28:39सचमुच उस भयानक जंगल की मिट्टी में छिपा

28:41हुआ था। चित्रगुप्त जी का ग्रंथ इसलिए उस

28:45कृत्य को नहीं देख पाया क्योंकि वहां

28:47स्वयं पालनहार नारायण अपनी माया के साथ

28:50मौजूद थे। इसके बाद कालदूत ने विस्तार से

28:52वह सब कुछ बताया जो उन्होंने अपनी दिव्य

28:55दृष्टि से देखा था। कैसे एक भूखे माधव ने

28:58अपना आखिरी निवाला एक भयानक और डरावने जीव

29:01को दे दिया और कैसे उस जीव के रूप में

29:04स्वयं नारायण ने वह दान स्वीकार किया।

29:06कालदूत की बातें सुनकर पूरे यमलोक में

29:09सन्नाटा छा गया। चित्रगुप्त ने सम्मान से

29:12अपना सिर झुका लिया। राजा देवव्रत जो अब

29:15तक अपने अहंकार में फन का खड़ा था उसके

29:18पैरों तले से जमीन खिसक गई। वो घुटनों के

29:21बल जमीन पर गिर पड़ा और फूट-फूट कर रोने

29:24लगा। यमराज बोले सुन लिया तुमने देवव्रत।

29:28अब तुम्हें समझ आया कि यमलोक का न्याय कभी

29:32अंधा नहीं होता।

29:35[गहरी सांस लेने की आवाज़][अचानक ज़ोर से सांस लेने की आवाज़]

29:35तुमने अपना अतिरिक्त धन दान किया। जो

29:38तुम्हारे किसी काम का नहीं था और तुमने वो

29:41भी इसलिए दान किया ताकि लोग तुम्हें महान

29:45कहें।

29:46लेकिन उस गरीब माधव ने अपना जीवन दान कर

29:49दिया। वह भी एक ऐसे भयानक जीव को जिसे

29:53देखकर तुम शायद घृणा से अपनी आंखें फेर

29:57लेते। राजा देवव्रत बोले मुझे क्षमा कर दे

30:00धर्मराज।

30:02मेरे ज्ञान के नेत्र आज खुल गए हैं। मेरा

30:05दान केवल मेरे अहंकार का एक प्रदर्शन था।

30:09माधव का त्याग ही असली धर्म है। मैं अपने

30:12कर्मों का दंड भोगने के लिए तैयार हूं।

30:15यमराज बोले देवव्रत इस पूरे ब्रह्मांड का

30:20सबसे बड़ा सत्य यही है। जो वस्तु तुम्हारी

30:24जरूरत की नहीं है उसे देना दान नहीं बल्कि

30:28मोह से मुक्ति मात्र है। असली दान वो है

30:32जब तुम उस चीज को किसी जरूरतमंद को सौंप

30:35दो। जिसकी तुम्हें खुद सबसे अधिक आवश्यकता

30:39हो। जब तुम किसी को कुछ देते समय यह भूल

30:43जाओ कि तुम देने वाले हो और लेने वाले को

30:46भगवान का रूप समझकर कृतज्ञ हो जाओ तब वह

30:50दान सीधा ईश्वर तक पहुंचता है। माधव के उस

30:54सूखे फल ने उसे बैकुंठ का अधिकारी बना

30:57दिया और तुम्हारे करोड़ों स्वर्ण मुद्राएं

31:01तुम्हारे ही पैरों की बीड़ियां बन गई। जाओ

31:04देवव्रत नरक की अग्नि में अपने इस मैं और

31:08अहंकार को भस्म करो ताकि अगले जन्म में

31:12तुम माधव जैसी निर्मल आत्मा पा सको। यमराज

31:16का आदेश मिलते ही यमदूत राजा देवव्रत को

31:18वहां से ले गए और इधर यमराज और कालदूत ने

31:22माधव की आत्मा की ओर हाथ जोड़कर उसे अंतिम

31:25प्रणाम किया और वह आत्मा एक दिव्य प्रकाश

31:28में बदलकर हमेशा के लिए देवलोक की ओर

31:30प्रस्थान कर गई। दोस्तों इस प्राचीन कथा

31:34का सार यही है कि ईश्वर को हमारे धन,

31:36संपत्ति या दिखावे से कोई प्रसन्नता नहीं

31:39मिलती। ईश्वर केवल हमारे भीतर छुपे उस

31:42निस्वार्थ भाव को देखते हैं। अगर आप किसी

31:45को कुछ दे रहे हैं तो उसे इस तरह दें कि

31:48आपके दूसरे हाथ को भी खबर ना हो। अहंकार

31:51से भरा हुआ सोने का दान मिट्टी के समान है

31:54और करुणा से भरा हुआ एक रोटी का टुकड़ा

31:57साक्षात अमृत के समान है। जीवन में कभी भी

32:01किसी मजबूर या तड़पते हुए जीव को देखकर

32:03अपनी आंखें मत फेरना। क्योंकि क्या पता

32:06किस रूप में स्वयं ईश्वर आपकी परीक्षा ले

32:08रहे हो। अगर आपको यह पौराणिक और ज्ञान से

32:11भरी कथा हृदय से अच्छी लगी हो और आपको

32:14जीवन का कोई नया सत्य जानने को मिला हो तो

32:16कृपया इस वीडियो को अपने परिवार और

32:18दोस्तों के साथ शेयर अवश्य करें। आपके एक

32:21शेयर से यह ज्ञान किसी और के जीवन में भी

32:24रोशनी ला सकता है। और हां, कमेंट्स में जय

32:28श्री कृष्ण या जय नारायण लिखकर अपनी

32:30हाजिरी जरूर लगाएं और हमें बताएं कि आपको

32:33माधव का यह बलिदान कैसा लगा। धन्यवाद।

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