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Moradabad: History, Muslim Heritage & The Brass City of India | Full Documentary

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0:00एक ऐसा शहर जो पीतल से दुनिया में पहचाना

0:04गया। सुनिए

0:07हिंदुस्तान के शुमाल में एक ऐसा शहर आबाद

0:11है जिसकी गलियों में सदियों की तारीख सांस

0:15लेती है। जहां मसाजिद के मीनार, कदीम

0:20बाजारों की रौनक, कारीगरों के हाथों की

0:23मेहनत और पीतल की चमकती हुई कारीगरी मिलकर

0:28एक मुनफरीद दास्तान बनाते हैं। यह शहर

0:33सिर्फ एक शहर नहीं बल्कि मुगल दौर की

0:37यादगार इस्लामी तहजीब का एक अहम मरकज और

0:42दुनिया भर में अपनी दस्तकारी के लिए मशहूर

0:46मुरादाबाद है। जिसे आज दुनिया ब्रास सिटी

0:51यानी पीतल की नगरी के नाम से जानती है।

0:56लेकिन सवाल यह है आखिर मुरादाबाद वजूद में

1:00कैसे आया? इस शहर की बुनियाद किसने रखी?

1:04इसका नाम मुरादाबाद क्यों रखा गया? यहां

1:07की मुस्लिम तहजीब ने इस शहर की शनाख्त पर

1:11क्या असर डाला? और पीतल के चंद टुकड़ों से

1:15शुरू होने वाली यह कारीगरी आखिर दुनिया के

1:18बड़े बाजारों तक कैसे पहुंची? आइए आज

1:22एमटीपीडिया के साथ चलते हैं मुरादाबाद के

1:26सफर पर। एक ऐसे शहर का सफर जहां तारीख

1:32सिर्फ किताबों में नहीं बल्कि आज भी

1:36गलियों में जिंदा है। मुरादाबाद

1:40उत्तर प्रदेश के मगरबी हिस्से में वाक है।

1:43यह शहर रामगंगा दरिया के किनारे आबाद है

1:47और नई दिल्ली से तकरीबन 167 कि.मी. दूर

1:51है। सदियों पहले यह इलाका आज की मुरादाबाद

1:56जैसा नहीं था। यहां बस्तियां थी, रास्ते

2:00थे, दरिया था और इस ख्ते से गुजरने वाली

2:04वो शाहराएं थी जो शुमाली हिंदुस्तान के

2:07मुख्तलिफ इलाकों को आपस में मिलाती थी।

2:11मुगल सल्तनत के दौर में इस इलाके की

2:14अहमियत बढ़ने लगी। और फिर 17वीं सदी में

2:18तारीख ने यहां एक नया बाप खोला।

2:221624 के आसपास मुगल बादशाह शाहजहां के दौर

2:26में रुस्तम खान जो संभल के गवर्नर थे इस

2:30इलाके पर काबिज हुए। इब्तदा में इस जगह को

2:36रुस्तम नगर कहा गया। लेकिन सिर्फ एक साल

2:40बाद 1625 में इसका नाम बदलकर मुरादाबाद रख

2:46दिया गया। यह नाम मुगल शहजादे

2:51मुराद बख्श के नाम पर रखा गया था और यूं

2:57एक नई शनाख्त में जन्म लिया। मुरादाबाद की

3:01तारीख मुगल सल्तनत से गहरा ताल्लुक रखती

3:04है। शहर के कयाम के साथ यहां इंतजामी और

3:08तजारती सरगर्मियां बढ़ने लगी और रफ्तार

3:11रफ्ता आबादी में इजाफा होने लगा।

3:15रुस्तम खान ने शहर में एक अहम मस्जिद भी

3:18तामीर करवाई जिसे आज जामिया मस्जिद

3:21मुरादाबाद के नाम से जाना जाता है। मसाजिद

3:25सिर्फ इबादतगाही नहीं होती। तारीख में यह

3:29इल्म, सकाफत, समाजी ताल्लुकात और शहरी

3:33जिंदगी के अहम मराकिज़ भी रही है।

3:35मुरादाबाद में भी इस्लामी तहजीब ने शहर की

3:40जुबान, लिबास,

3:43खाने

3:44फन्ने तामीर और रोजमर्रा जिंदगी पर अपना

3:49असर छोड़ा।

3:51वक्त गुजरता गया और मुरादाबाद सिर्फ एक

3:55इंतजामी मरकज नहीं रहा।

3:58यहां बाजार फैलने लगे। कारीगर आने लगे।

4:03ताजिर आबाद होने लगे। और मुख्तलिफ सकाफतें

4:08एक दूसरे के करीब आने लगे।

4:11यही वो अमल था जिसने मुरादाबाद को एक

4:15जिंदा और मुतहरिक शहर बना दिया। अगर हम

4:19मुरादाबाद की तहजीबी शनाख्त को देखें तो

4:22यहां हिंदू और मुस्लिम दोनों सकाफतों के

4:25असरात नजर आते हैं। शहर के तारीख विरसे

4:29में मसाजिद, कदीम इमारतें, बाजार और

4:33मुख्तलिफ मजहबी और सकाफती रिवायत एक साथ

4:36दिखाई देती हैं। यहां ईद की रौनक भी है और

4:41दूसरी मजहबी और सकाफती तकरीबात भी।

4:44यही वजह है कि मुरादाबाद की सकाफत किसी एक

4:48रंग तक महदूद नहीं। यह शहर सदियों से

4:52मुख्तलिफ बरादरियों, कारीगरों, ताजिरों,

4:55उलमा और फनकारों के दरमियान एक मुश्तका

4:59शहरी जिंदगी की मिसाल रहा है। और शायद इसी

5:02तहजीबी इंतजाज ने मुरादाबाद के फुनून को

5:06भी इतना मुनफिद बनाया। लेकिन मुरादाबाद की

5:10सबसे बड़ी पहचान क्या है? इस सवाल का जवाब

5:14है पीतल। जी हां, पीतल। ऐसा पीतल जिसे

5:20कारीगर अपने हाथों से एक आम धात से फन का

5:24शाहकार बना देते हैं। कभी एक खूबसूरत

5:27चिराग, कभी एक सजावटी बर्तन, कभी नक्शो

5:31निगार से मुजयन प्लेट और कभी ऐसी नफीस

5:35आराइशी चीज जिसे देखकर यकीन नहीं आता कि

5:39यह सब इंसानी हाथों से बनाया गया है। इसी

5:42वजह से मुरादाबाद को ब्रास सिटी और मकामी

5:46तौर पर पीतल नगरी कहा जाता है। जरा तसवुर

5:51कीजिए। एक छोटी सी वर्कशॉप, चारों तरफ धात

5:56के टुकड़े, हथौड़े की आवाज, मशीनों की

6:00गूंज और दरमियान में एक कारीगर।

6:04उसके हाथ में एक आम सा पीतल का टुकड़ा है।

6:08लेकिन वो जानता है कि इस धात के अंदर एक

6:12खूबसूरत फनपारा छुपा हुआ है। वो उसे काटता

6:16है, मोड़ता है, इस पर नक्श बनाता है और

6:21बार-बार उसे संवारता है। घंटों की मेहनत

6:25के बाद वही धात एक खूबसूरत शाहकार बन जाती

6:29है। यही मुरादाबाद की असल ताकत है। सिर्फ

6:34मशीन नहीं बल्कि इंसानी हुनर। मुरादाबाद

6:38की पीतल की मसनुआ दुनिया के मुख्तलिफ

6:41मालिक तक बरामद होती रही हैं। जिनमें

6:44अमेरिका, बर्तनानिया, कनाडा, जर्मनी और

6:48मशरिक वस्ता के मालिक शामिल हैं।

6:51मुरादाबाद की दस्तकारी सिर्फ खूबसूरती का

6:54नाम नहीं यह लाखों नहीं तो दसों हजार

6:59लोगों की रोजी से जुड़ी हुई एक बड़ी मुआशी

7:02सरगर्मी भी रही है। एक तरफ कारीगर दूसरी

7:06तरफ छोटी वर्कशॉप्स फिर बड़े ताजिर पैकिंग

7:11ट्रांसपोर्ट और आखिर में बैनुल अकवामी

7:14खरीदार यानी एक पीतल की चीज एक लंबा सफर

7:19तय करती है। मुरादाबाद के एक छोटे से

7:22कारखाने से शुरू होकर दुनिया के बड़े

7:25शहरों के बाजारों तक और यही वजह है कि

7:28मुरादाबाद सिर्फ एक तारीखी शहर नहीं बल्कि

7:32एक अहम सनती और तिजारती मरकज भी बन गया।

7:36जिला इंतजामिया के मुताबिक मुरादाबाद की

7:39दस्तकारी की सनत हिंदुस्तान की मजमुई

7:42हैंडीक्राफ्ट एक्सपोर्ट्स में 40% से

7:45ज्यादा हिस्सा रखती है। यह आदाद इस शहर की

7:48सनती अहमियत का अंदाजा लगाने के लिए काफी

7:51हैं। लेकिन हिंदुस्तान की तारीख में एक

7:55ऐसा साल भी आया जिसने पूरे बर्रेस सगीर को

8:00हिला कर रख दिया। 1857

8:05बर्तानवी इ्तेदार के खिलाफ बगावत का एक

8:08बड़ा दौर

8:09हंगामे से अलग

8:10मुरादाबाद भी इस हंगामाखेज दौर से अलग

8:14नहीं था। उस जमाने में

8:17शुमाली हिंदुस्तान के बहुत से इलाकों की

8:19तरह यह ख्ा भी सियासी और समाजी तब्दीलियों

8:24की जद में था। फिर बर्तानवी इख्तेदार

8:28मजबूत हुआ और हिंदुस्तान की सियासी तारीख

8:32एक नए दौर में दाखिल हो गई। मुरादाबाद ने

8:36भी

8:36बहुत सुंदर

8:37इस नए दौर में

8:38इस्लाम

8:38अपनी सनदी और तजारती शिनाख्त को मजीद

8:42मजबूत किया और वक्त के साथ ये शहर रेल

8:48सड़क तजारत और सनत के जरिए बड़े शहरों से

8:53जुड़ता चला गया। आज अगर मुरादाबाद की

8:57अहमियत को समझना हो तो सिर्फ उसकी सनत को

9:00देखना काफी नहीं। इसका ज्योग्राफिया और

9:03मुवासलाती निजाम भी इंतहाई अहम है।

9:07मुरादाबाद रेलवे के एक अहम जंक्शन के तौर

9:11पर शुमाली हिंदुस्तान के मुख्तलिफ हिस्सों

9:13को आपस में मिलाता है। यहां नॉर्दर्न

9:17रेलवे का डिवीजनल हेडक्वार्टर भी मौजूद

9:19है। रेलगाड़ियां मुसाफिरों को एक शहर से

9:23दूसरे शहर ले जाती हैं। लेकिन इन रेल की

9:26पटरियों के साथ सामान भी सफर करता है। और

9:30इन सामान में मुरादाबाद की मशहूर दस्तकारी

9:33भी शामिल है। यूं रेल का यह शहर सिर्फ

9:37लोगों को नहीं बल्कि मुरादाबाद के हुनर को

9:40भी दुनिया से जोड़ता है। और अगर आप समझते

9:44हैं कि मुरादाबाद सिर्फ पीतल के लिए मशहूर

9:47है तो आप अभी इस शहर को मुकम्मल तौर पर

9:51नहीं जानते क्योंकि मुरादाबाद का एक और

9:55तारुफ है उसका खाना। मुरादाबादी बिरयानी,

10:01खुशबू, मसाले और जायके का ऐसा इम्तजाज

10:06जिसे इस शहर की शनाख्त का हिस्सा समझा

10:08जाता है। इसके अलावा मटन करी, मुरादाबादी

10:13दाल और दीगर मकामी खाने इस शहर की गजाई

10:17सकाफत को नुमाया करते हैं। यानी मुरादाबाद

10:21में फन सिर्फ धात पर नहीं खाने की प्लेट

10:25पर भी नजर आता है। आज का मुरादाबाद

10:2917वीं सदी के मुरादाबाद से बहुत मुख्तलिफ

10:32है। अब यहां जदीद बाजार हैं, सनती यूनिट्स

10:37हैं, तालीमी इदारे हैं, बड़े कारोबार हैं

10:41और एक तेजी से बदलता हुआ शहरी माशरा है।

10:45लेकिन इस तमाम जदीदियत के बावजूद शहर की

10:49पुरानी शनाख्त खत्म नहीं हुई। आज भी पीतल

10:53की वर्कशॉप्स में हथौड़े की आवाज सुनाई

10:56देती है। आज भी कारीगर अपने हाथों से

11:00नक्शो निगार बनाते हैं। और आज भी कदीम

11:04मसाजिद, बाजार और पुरानी गलियां शहर के

11:08माजी की याद दिलाती हैं। यही मुरादाबाद की

11:12सबसे खूबसूरत बात है। यह शहर माज़ी को

11:16छोड़कर आगे नहीं बढ़ा बल्कि माज़ी को साथ

11:20लेकर मुस्तकबिल की तरफ बढ़ रहा है।

11:23मुरादाबाद को अक्सर मुस्लिम आबादी के

11:26हवाले से भी बयान किया जाता है और वाकई

11:30यहां मुसलमानों की आबादी बहुत बड़ी है। और

11:34शहर की तहजीब पर इस्लामी सकाफत का नुमाया

11:38असर मौजूद है। लेकिन तारीख और शुमारियाती

11:43दुरुस्तगी के लिए

11:44यह कहना ज्यादा मुनासिब है कि मुरादाबाद

11:49एक बड़ा मुस्लिम शहरी मरकज है ना कि

11:52मुकम्मल मुस्लिम अक्सरियती शहर।

11:562011 की मर्दूम शुमारी के आदाद के मुताबिक

11:59मुरादाबाद शहर में मुसलमान आबादी तकरीबन

12:0446.79%

12:06थी। जबकि हिंदू आबादी तकरीबन 51.68%

12:12थी। यह फर्क हमें एक अहम बात सिखाता है।

12:16किसी शहर की शनाख्त सिर्फ उसकी आबादी के

12:20आदाद से नहीं बनती बल्कि उसकी तारीख, उसके

12:25लोग, उसकी सकाफत, उसका फन और उसकी सदियों

12:29पुरानी रिवायत मिलकर एक शहर की असल शनाख्त

12:33बनाते हैं। तो मुरादाबाद की कहानी क्या

12:37है?

12:38यह एक मुगल दौर में उभरने वाले शहर की

12:42कहानी है। यह मुराद बख्श के नाम से जुड़ी

12:46हुई एक तारीखी शनाख्त की कहानी है। यह

12:50मसाजिद, बाजारों, कारीगरों और मुख्तलिफ

12:54तहजीबों के मेल की कहानी है। यह एक ऐसे

12:58हुनर की कहानी है जिसने आम धात को आलमी

13:02शोहरत में बदल दिया। और सबसे बढ़कर यह

13:06इंसानी हाथों की मेहनत की कहानी है।

13:10एक कारीगर जो सुबह अपनी वर्कशॉप में दाखिल

13:13होता है और शाम तक एक बेजान धात को जिंदा

13:17फन में बदल देता है। शायद इसीलिए

13:21मुरादाबाद को सिर्फ ब्रास सिटी कहना काफी

13:25नहीं। यह हुनर की नगरी भी है। तारीख की

13:31नगरी भी है और

13:33तहजीब की नगरी भी

13:37सदियां बदल गई, हुकूमतें बदल गई, बाजार

13:42बदल गए, टेक्नोलॉजी बदल गई।

13:45लेकिन मुरादाबाद के कारीगर के हाथ में आज

13:50भी वही तखलीकी ताकत मौजूद है। और जब पीतल

13:55पर हथौड़ा पड़ता है तो सिर्फ एक धात शक्ल

13:59नहीं बदलती बल्कि सदियों पुरानी एक रिवायत

14:04आज भी सदियां जिंदा रहती है।

14:08ये था मुरादाबाद

14:11हिंदुस्तान की पीतल की नगरी।

14:15एक ऐसा शहर जहां तारीख, तहजीब, फॉलो

14:21इस्लामी विरसा और इंसानी हुनर एक साथ चलते

14:27हैं। अगर आपको ऐसी तारीखी और मालूमाती

14:31डॉक्यूमेंट्रीज पसंद है तो एमटीपीडिया को

14:35जरूर सब्सक्राइब करें क्योंकि यहां तारीख

14:40सिर्फ सुनाई नहीं जाती बल्कि जिंदा की

14:45जाती

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