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DAY-11 | LIVE Upanishad Gyanamrit | Janjgir, Chhattisgarh | Raseshwari Devi Ji

Raseshwari Devi Ji · 10,775 words · 49 min read

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0:00मेरे युगल किशोर मेरे युगल किशोर मेरे

0:07युगल किशोर मेरे युगल किशोर

0:12मेरे युगल किशोर मेरे युगल किशोर

0:18मेरे युगल किशोर मेरे युगल किशोर

0:23मेरे युगल किशोर मेरे युगल किशोर मेरे

0:30युगल किशोर मेरे युगल किशोर

0:35मेरे युगल किशोर मेरे युगल किशोर

0:41मेरे युगल किशोर मेरे युगल किशोर

0:46मेरे युगल किशोर

0:49मेरे युगल किशोर

0:52मेरे युगल किशोर

0:55मेरे युगल किशोर

0:58मेरे युगल युगल किशोर मेरे युगल किशोर

1:03मेरे युगल किशोर मेरे युगल किशोर

1:09मेरे युगल किशोर मेरे युगल किशोर

1:15मेरे युगल किशोर मेरे युगल किशोर

1:20मेरे युगल किशोर मेरे युगल किशोर

1:26मेरे युगल किशोर

1:29मेरे युगल किशोर

1:31मेरे युगल किशोर गोपी जन चित चोर

1:37मेरे युगल किशोर गोपी जन चित चोर

1:43मेरे युगल किशोर गोपी जन चित चोर

1:49मेरे युगल किशोर गोपी जन चित चोर

1:54गोपी जन चित चोर गोपी गोपी जन चित चोर,

2:00गोपी जन चित चोर, गोपी जन चित चोर, मेरे

2:06युगल किशोर गोपी जन चित चोर, मेरे युगल

2:13किशोर गोपी जनित चोर, मेरे युगल किशोर

2:20मेरे युगल किशोर, मेरे युगल किशोर मेरे

2:26युगल किशोर, किशोर मेरे युगल किशोर मेरे

2:32युगल किशोर मेरे युगल किशोर मेरे युगल

2:38किशोर

2:40मेरे युगल किशोर दो ठाकुर मोर

2:45मेरे युगल किशोर दो ठाकुर मोर

2:51मेरे युगल किशोर दो ठाकुर मोर श्री युगल

2:58किशोर दो ठाकुर मोर

3:02दो ठाकुर मोर

3:05दो ठाकुर मोर

3:08मेरे युगल किशोर

3:10मेरे युगल किशोर

3:13मेरे युगल किशोर दो ठाकुर मोर

3:19मेरे युगल किशोर दो ठाकुर मोर

3:24मेरे युगल किशोर किशोर मेरे युगल किशोर

3:30मेरे युगल किशोर मेरे युगल किशोर

3:35मेरे युगल किशोर मेरे युगल किशोर

3:41मेरे युगल किशोर मेरे युगल किशोर

4:06तुम्ही

4:19मेरे युगल किशोर मेरे युगल किशोर

4:25युगल किशोर मेरे युगल किशोर मेरे युगल

4:32किशोर मेरे युगल किशोर मेरे युगल किशोर

4:38मेरे युगल किशोर

4:41मेरे युगल किशोर एक श्याम एक बार मेरे

4:48युगल किशोर

4:50श्याम गा मेरे युगल किशोर एक श्याम एक गा

4:58मेरे युगल किशोर एक श्याम गाओ

5:03एक श्याम एक गाओ

5:06एक श्याम एक गाओ

5:09एक श्याम एक गाओ

5:12एक श्याम एक गाओ

5:14मेरे युगल किशोर एक श्याम एक बार

5:20मेरे युगल किशोर एक श्याम एक मेरे युगल

5:27किशोर रसिकन

5:30सिर माग

5:33किशोर रसिकन

5:35सिर

5:36रसिकन

5:38सिर रसिकन सिर मो रसिकन

5:43सिर

5:45रसिकन सिर मेरे युग युगल किशोर रसिक

5:51सिर हो, मेरे युगल किशोर रसिक

5:57सिर मोर, मेरे युगल किशोर मेरे युगल

6:03किशोर,

6:04मेरे युगल किशोर मेरे युगल किशोर, मेरे

6:10युगल किशोर मेरे युगल किशोर, मेरे युगल

6:16किशोर मेरे मेरे युगल किशोर

6:20मेरे युगल किशोर मेरे युगल किशोर मेरे

6:27युगल किशोर मेरे युगल किशोर

6:31मेरे युगल किशोर मेरे युगल किशोर

6:37मेरे युगल किशोर मेरे युगल किशोर

6:42मेरे युगल किशोर मेरे युगल किशोर

6:48मेरे युगल किशोर मेरे युगल किशोर मेरे

6:54युगल किशोर मेरे युगल किशोर मेरे युगल

7:00किशोर मेरे युगल किशोर

7:28भजो प्यारो प्यारो प्यारो प्राणन प्यारो

7:34भजो प्यारो प्यारो प्यारो प्राणन प्यारो

7:40भजो प्यारो प्यारो प्यारो प्राणन प्यारो

7:46भजो प्यारो प्यारो प्यारो प्राणन प्यारो

7:52भज ब्रज गोपिन

7:55नैनन तारो

7:58भज ब्रज गोपिन

8:01नैनन तारो

8:04भज ब्रज गोपिन

8:07नैनन तारो

8:10भज ब्रज गोपिन

8:13नैनन तारो

8:15नैन

8:17तारो

8:18नैन तारो

8:21नैन

8:23तारो नैन तारो

8:27भज ब्रज गोपी

8:30नैनन तारो

8:33भज ब्रज गोपिन

8:36नैनन तारो

8:38भजो प्यारो प्यारो प्यारो प्राणन प्यारो

8:44भजो प्यारो सब लोग प्राणन प्यारो

8:49भजो प्यारो प्यारो प्यारो प्राणन प्यारो

8:55भजो प्यारो प्यारो प्यारो प्राणन प्यारो

9:06सब लोग ताली बजाइए

9:33भजो प्यारो प्यारो प्यारो प्राणन प्यारो

9:39भजो प्यारो प्यारो प्यारो प्यारो प्राणन

9:43प्यारो

9:45भजो प्यारो प्यारो प्यारो प्राणन प्यारो

9:50भजो प्यारो प्यारो प्यारो प्राणन प्यारो

9:56भज मोर मुकुट

9:59मुरली वो

10:01भज मोर मुकुट मुरली वालो भज मोर मुकुट

10:10मुरली वालो भज मोर मुकुट मुरली वालो मुरली

10:20वालो

10:21मुरली वालो

10:24मुरली वालो

10:27मुरली वालो

10:29भज मोर मुकुट मुरली वालो

10:35भज मोर मुकुट मुरली वालो

10:40भजो प्यारो प्यारो प्यारो प्राणन प्यारो

10:46भजो प्यारो प्यारो प्यारो प्राणन प्यारो

10:52भजो प्यारो प्यारो प्यारो प्राणन प्यारो

10:57भज प्यारो प्यारो प्यारो प्राणन प्यारो

11:08जय हो

11:11जय हो

11:19जय

11:36राधे राधे

11:38अलबेली सरकार की

11:41जय

11:42श्रीमद् सतगुरु सरकार की

11:45जय

11:47उपनिषद ज्ञानमृत के 11वें दिवस पर ब्रज

11:51गोपिका सेवा मिशन के तरफ से आप सभी

11:55जिज्ञासु श्रोताओं को हार्दिक स्वागत है।

11:59कल के प्रवचन में हम पूजनीय देवी जी के

12:03श्री मुख से यह सुने कि भगवत प्राप्त संत

12:07महापुरुष व गुरु ही हमारे सांसारिक मोह को

12:12छुड़ा सकते हैं। शास्त्रों का सम्यक ज्ञान

12:16को हमारे भीतर धारण करा सकते हैं। एवं

12:21केवल वे ही हमारे कल्याण कर सकते हैं।

12:25इसके साथसाथ हमने यह भी समझा कि किन-किन

12:30लक्षणों से हम वास्तविक महापुरुष या संत

12:35को पहचान सकते हैं। तो आइए अपने मन को

12:40एकाग्र कर इस ज्ञान के गंगा में डुबकी

12:44लगाने के लिए हम सब प्रस्तुत हो जाए। सबसे

12:48अनुरोध है कि अपने अपने मोबाइल फोन

12:51साइलेंस मोड में रखेंगे एवं जो लोग बीच

12:56में उठकर जाने की संभावना है वे लोग कृपया

13:00पीछे बैठे एवं जो लोग बच्चों के साथ आए

13:04हैं वे उन लोगों से भी अनुरोध है कृपया

13:07साइड में या फिर पीछे बैठे

13:11आप सब जानते हैं

13:14लास्ट दो दिन से मॉर्निंग में पूज पूजनीय

13:17देवी जी के तत्वावधान में डिवाइन रूप

13:21ध्यान मेडिटेशन सेशन आयोजित होता है। सुबह

13:247:30 से 9 बजे तक। आप सबसे अनुरोध है

13:30ज्यादा संख्या में इसमें भाग ले एवं देवी

13:33जी के सानिध्य प्राप्त करें।

13:39ब्रज गोपिका सेवा मिशन द्वारा

13:42जो आध्यात्मिक पुस्तकें पब्लिश होता है वह

13:46स्टॉल में अवेलेबल है और जो सुमधुर

13:49संकीर्तन आप श्रवण करते हैं हमारे प्यारे

13:52दीदियों से एवं पूजनीय देवी जी के श्री

13:55मुख से वो संकीर्तन पुस्तिका प्रेम रस

13:58माधुरी के नाम से हमारे पुस्तक स्टॉल में

14:02अवेलेबल है। आप लोग उसको अवश्य लें।

14:13म्यूजिक म्यूजिक कंटिन्यू करो।

14:37जिस क्षण का हमें इंतजार था वो आ चुका है।

14:41पूजनीय देवी जी हमारे मध्य पधार चुके हैं।

14:45आप सबसे अनुरोध है खड़े होकर उनको अभिवादन

14:50करें।

15:29श्रीमद् पद वाक्य प्रमाण

15:34पवार

15:39वेद मार्ग प्रतिष्ठापनाचार्य

15:48निखिल दर्शन समन्वयचार्य

15:55सनातन वैदिक धर्म प्रतिष्ठावन

16:02सत संप्रदाय

16:06परमाचार

16:11भक्ति योग रसावतार

16:17भगव अनंत श्री विभूषित

16:22जगत गुरु

16:27स्वामी श्री कृपालु जी महाराज

16:33की

16:54पंचम मूल जगतगुरुत्तम

16:57स्वामी श्री कृपालु जी महाराज जी की विशेष

17:01कृपा पात्री पूजनीय रासेश्वरी देवी जी की

17:06श्री चरणों में हम सभी श्रोता गणों का

17:10कोटि कोटि वंदन एवं अभिनंदन।

17:14देवी जी के स्वागत हेतु मैं आमंत्रित करना

17:17चाहूंगी श्री अजय केसरवानी जी फॉर्मर

17:22प्रेसिडेंट डिस्ट्रिक्ट बार एसोसिएशन

17:25जांजगीर वे कृपया मंच पर पधारे

17:29एवं देवी जी का स्वागत करें।

17:34श्री मनोज पांडे जी फाउंडर विवेकानंद

17:38स्कूल जांजगीर एवं श्रीमती सुषमा पांडे जी

17:51श्रीमती मनीषा गोपाला जी पार्षद जांजगीर

17:57एवं एडवोकेट श्री रामचंद गोपाला जी

18:21श्री मनोज अग्रवाल जी प्रेसिडेंट चेंबर ऑफ

18:25कॉमर्स जांझर

18:34श्री मनोज अग्रवाल जी एवं रीतू अग्रवाल जी

18:51पूजनीय देवी जी से विनम्र अनुरोध है कि वे

18:55कृपया उपनिषद ज्ञानामृत का धारा प्रवाह

18:59प्रारंभ करने की कृपा करें।

19:14हम्म

19:29हम्म

20:14ध

20:20सदा सदा

20:25परिभवन

20:26भीष्ट

20:29दोम

20:34तीथास्पदम

20:39शिव विचुतम

20:43शरण्यम

20:48भृत्या

20:51म

20:53प्रणत पाल भवाि

20:58पोतम

21:03वंदे

21:05महा

21:07पुरुषते

21:11चरणारविंदम

21:20गुरुरा

21:25धना

21:31गुरु

21:33परम दवतम

21:39गुरु

21:42परतरम

21:46नास्त

21:51कृपा

21:54गुरुवे

21:58नमः

22:06जिज्ञासु जीवात्माओं

22:08दैनिक नियमानुसार

22:11पहले थोड़ी देर भगवन नाम संकीर्तन कर लीजिए

22:15पश्चात

22:17कतिपय शब्दों द्वारा आप सब की सेवा करने

22:21का य किंचित प्रयास किया जाएगा। नाम

22:25संकीर्तन में आप सभी लोग उदारता का परिचय

22:29देंगे। ऐसा

22:32भरोसा है।

23:20ओम

23:47मेरे नंद नंदन

23:51मेरे नंद नंदन

23:56अपना बना ले मोहे

24:00मेरे नंद नंदन

24:04मेरे नंद नंदन

24:08मेरे नंद नंदन

24:12अपना बना ले कोई मेरे नंद नंदन

24:18मेरे नंद नंदन

24:22मेरे नंद नंदन

24:26अपना बना ले मोहे

24:30मेरे नंद नंद

24:33मेरे नंद नंदन

24:37मेरे नंद नंदन

24:40अपना बना ले मोहे मेरे नंद नंदन

24:48अपना बना ले मोहे अपना बना ले मोहे मेरे

24:55नंद नंदन

24:58अपना बना ले मोहे मेरे नंद नंदन

25:05अपना बना ले मोहे मेरे नंद नंदन

25:12अपना बना ले मोहे मेरे नंद नंदन

25:19मेरे नंद नंदन

25:23मेरे नंद नंदन

25:27अपना नाम ले मोहे मेरे नंद नंदन

25:34मेरे नंद नंदन

25:38मेरे नंद नंदन

25:41अपना बना ले मोहे मेरे नंद नंदन

25:49मेरे नंद नंदन

25:52मेरे नंद नंदन

25:55मेरे नंद नंद नंदन

25:59मेरे नंद नंदन

26:03मेरे नंद नंदन

26:07मेरे नंद नंदन

26:10मेरे नंद नंदन

26:14मेरे नंद नंदन

26:17दरस दिखा दे टुक मेरे नंद नंदन

26:24दरस दिखा दिखा दे टुक मेरे नंद नंदन

26:32दरस दिखा दे टुक मेरे नंद नंदन

26:38दरस दिखा दे टुक मेरे नंद नंदन

26:45ओ मेरे नंद नंदन

26:50मेरे नंद नंदन

26:53अपना बना

26:55मोहि मेरे नंद नंदन

27:00मेरे नंद नंदन

27:04मेरे नंद नंदन

27:07अपना बना ले

27:11मेरे नंद नंदन

27:14मेरे नंद नंदन

27:18मेरे नंद नंदन

27:22अपना बना ले मोह

27:25मेरे नंद नंदन

27:28मेरे नंद नंदन

27:32मेरे नंद नंदन

27:36अपना बना ले मोहे मेरे नंद नंदन

27:43मेरे नंद नंदन

27:46मेरे नंद नंदन

27:50मेरे नंद नंदन

27:53मेरे मेरे नंद नंदन

27:57मेरे नंद नंदन

28:00मेरे नंद नंदन

28:04मेरे नंद नंदन

28:07मेरे नंद नंदन

28:11तू ही मेरा मैं भी तेरा तू ही मेरा मैं भी

28:17तेरा मेरे नंद नंदन

28:21तू ही मेरा मैं भी तेरा मेरे नंद नंदन

28:28तू ही मेरा मैं भी तेरा मेरे नंद नंदन

28:35तू ही मेरा मैं भी तेरा मेरे नंद नंदन

28:43मेरे नंद नंदन

28:46मेरे नंद नंदन

28:49मेरे नंद नंदन

28:53मेरे नंद नंदन

28:56मेरे नंद नंदन

29:00मेरे नंद नंदन

29:03मेरे नंद नंदन

29:07मेरे नंद नंदन

29:10जग छूटे तू ना छूटे जग छूटे तू ना छूटे

29:17मेरे नंद नंदन

29:20जग छूटे तू तू ना छूटे मेरे नंद नंदन

29:27जग छूटे तू ना छूटे मेरे नंद नंदन

29:34जग छूटे तो ना छूटे मेरे नंद नंदन

29:41मेरे नंद नंदन

29:45मेरे नंद नंदन

29:48अपना बना ले मोहे

29:52मेरे नंद नंदन

29:55मेरे नंद नंदन

29:58मेरे नंद नंदन

30:02अपना बना ले

30:05मेरे नंद नंदन

30:08मेरे नंद नंदन

30:12मेरे नंद नंदन

30:16अपना बना ले

30:19मेरे नंद नंद नंदन

30:22मेरे नंद नंदन

30:26मेरे नंद नंदन

30:29अपना बना ले मोहे मेरे नंद नंदन

30:36अपना बना ले मोहे मेरे नंद नंदन

30:43अपना बना ले मोहे मेरे नंद नंदन

30:50अपना बना ले मोहे मेरे नंद नंद

30:56अपना बना ले मोहे मेरे नंद नंदन

31:04बोलिए वृंदावन बिहारी लाल की

31:08जय

31:09श्रीमद् सतगुरु सरकार

31:12की जय

31:16ओम

31:51अब आप सब लोग

31:55एकाग्रित होकर बैठे।

32:01उतष्

32:04जागृत

32:06प्राप्त्य वरान निबोधत

32:12कठोपनिषद एक तीन 14

32:18उपनिषद के इस मंत्र की व्याख्या करते हुए

32:24अब तक आप लोगों को यह बताया गया

32:30कि जगत का हर प्राणी

32:33अनंत सुख चाहता है

32:37और उस असीम सुख को प्राप्त करने के लिए

32:42अविछिन्न रूप से प्रयत्नशील है

32:47किंतु

32:50अनंतानंत जन्मों के अनवरत प्रयत्न के

32:53पश्चात भी

32:56इस जीव को अध्यावधि

32:59आनंद का

33:02लवलेश भी प्राप्त नहीं हुआ।

33:06अभी तक आनंद क्यों नहीं मिला पता लगाया

33:09गया तो पता चला आनंद अनंत मात्रा का होता

33:15है। असीम होता है।

33:19और यह अनंत आनंद भगवान को प्राप्त करके ही

33:27पूर्णता को प्राप्त होगा।

33:30यानी जब जीव भगवान को प्राप्त करेगा तभी

33:35वह आनंदमय होगा।

33:39प्रश्न उठा भगवान को कैसे जाने? क्योंकि

33:44हम

33:45सदा के लिए आनंदमय होना चाहते हैं। जब

33:51भगवान को जानने चले तो वेदादों ने बतलाया

33:55कि भगवान

33:58जीव की इंद्रिय मन बुद्धि से परे वाला

34:02तत्व है। यह जीव प्राकृत है और भगवान

34:09दिव्य है।

34:11उस दिव्य भगवान को प्राकृत इंद्रिय मन

34:15बुद्धि से प्राप्त नहीं किया जा सकता।

34:20बड़े निराश हुए

34:24लेकिन पुनः वेदों ने बताया

34:28कि भगवान किसी साधन से नहीं मिलते।

34:32भगवान तो कृपा से मिलते हैं।

34:36वह साधन साध्य नहीं है।

34:40कृपा साध्य है।

34:44तो पता लगाया गया कि वह कृपा

34:47कैसे होगी जीव पर।

34:51तो मालूम हुआ भगवत कृपा को प्राप्त करने

34:55के लिए जीव को भगवत शरणागति करनी पड़ेगी।

35:02अब यह भगवत शरणागति

35:05क्या होती है? तो पता चला

35:09शरणागति अर्थात समर्पण और समर्पण होता है

35:14मन एवं बुद्धि का।

35:18अर्थात जब जीव स्वयं के कर्तापन को त्याग

35:22कर

35:25अपने मन के संकल्प विकल्प

35:29अपने निश्चय को

35:32हरि गुरु के निश्चय से जोड़ देता है और

35:35हरि गुरु जो कहते हैं यानी शास्त्र जो

35:39कहते हैं या गुरु जो आज्ञा देते हैं बस

35:42उसका अक्षरश पालन करता है। गुरु की आज्ञा

35:47से चलता है। उसी को समर्पण कहते हैं। यानी

35:52गुरु की बुद्धि से अपनी बुद्धि को जोड़

35:55देना।

35:57गुरु के मन से स्वयं के मन को जोड़ देना।

36:01उदाहरण के तौर पर जैसे हम रोज जगत में

36:05शरणागत होते हैं एक टीचर के एक डॉक्टर के

36:11तो हम डॉक्टर के एडवाइस को जब मानते हैं

36:15तो फिर अपने मन और बुद्धि का प्रयोग नहीं

36:18करते।

36:20डॉक्टर जैसा कहता है अक्षरश उसकी एडवाइस

36:24मानते हैं और रोग का निदान हो जाता है।

36:29इलाज हो जाता है।

36:32तो शरणागति प्रमुख है। शरणागति से भगवत

36:37कृपा होगी।

36:39अब भगवान तो हमारे सामने है नहीं। तो उनकी

36:44शरणागति कैसे करें? तो बताया गया वैसे भी

36:49भगवान का यह अकाट्य कानून है।

36:55भगवान किसी भी जीव को डायरेक्ट नहीं

37:00मिलते।

37:02भगवान का यह नियम है।

37:06भगवान ने अपने निज जन

37:09संतों को इस जगत में भेजा है।

37:14और संत की शरणागति करके ही कोई जीव संत

37:20कृपा से जब उस संत को गुरु रूप में वरण कर

37:24लेगा

37:26तब गुरु कृपा से

37:30वो भगवत प्राप्ति करेगा।

37:33गुरु के विषय में मैंने आप लोगों को

37:36बतलाया

37:39संत

37:42जिसमें

37:44शाब्दिक ज्ञान भी हो एवं अनुभवात्मक ज्ञान

37:49भी हो।

37:51शाब्दिक ज्ञान से मतलब है जिसको शास्त्रों

37:54का संपूर्ण ज्ञान हो। लेकिन केवल संपूर्ण

37:59ज्ञान होने से नहीं चलेगा।

38:02उस संपूर्ण ज्ञान के सार को निचोड़ को वह

38:07अपने शरणागत अनुयाई के अंतःकरण में धारण

38:14करवा दे

38:17प्लस

38:20वो संत ब्रह्मदर्शी हो

38:24भगवत प्राप्ति किए हो जिसने भगवान को जाना

38:28हो देखा हो उनमें प्रविष्ट हुआ हो ऐसा

38:32ब्रह्मदर्शी

38:34तो शास्त्रों का ज्ञाता एवं ब्रह्मदर्शी

38:38भगवत प्राप्त संत ही

38:42हमें लक्ष्य की प्राप्ति करा सकता है।

38:45भगवान से मिला सकता है। तो कल संत की

38:50पहचान आपने जानी और संक्षेप में मैंने आप

38:55लोगों को कुछ लक्षण और सावधानियां बतलाई।

38:59मैंने आप लोगों को बतलाया

39:02कि जो वास्तविक संत होते हैं उनका लक्षण

39:06है कि उनकी अलौकिक वाणी होती है। दूसरा

39:11आपको बताया कि वास्तविक संत का जब हम

39:14निरंतर संग करते हैं तो उनके संग से उनके

39:18एसोसिएशन से उनके सानिध्य में रहने से एक

39:24चमत्कार होता है और वह चमत्कार है आपकी

39:28ईश्वर में अनुरक्ति बढ़ती जाती है और

39:31संसार से वैराग्य होता जाता है। वास्तविक

39:36संत वही है जो ईश्वर में अनुरक्ति बढ़ा दे

39:42और संसारी विषयों से ममता हटा दे।

39:48यह सबसे बड़ा प्रमाण है वास्तविक संत का।

39:54वास्तविक संत किसी को चमत्कार नहीं

39:57दिखाते।

39:59वास्तविक संत किसी का अमंगल नहीं करते और

40:03वास्तविक संत अंतःकरण शुद्धि पर ही दीक्षा

40:09देते हैं। और दीक्षा देने का अर्थ होता है

40:13भगवत प्रेम देना।

40:16इसके पहले जो वास्तविक विशुद्ध संत होगा

40:20वे अपने शरणागत को शिक्षा देगा। शिक्षा

40:25देने का मतलब तत्व ज्ञान से परिचित

40:29कराएगा। ईश्वर क्या है? जीव क्या है? माया

40:33क्या है? कृष्ण तत्व क्या है? आदि।

40:38इसका तत्व ज्ञान

40:41कराते हुए

40:44जीव के मन में भगवान के प्रति व्याकुलता

40:48लालसा पैदा करवाएगा

40:51और जब जीव भगवान को पाने की व्याकुलता में

40:56आगे बढ़ेगा तो उसके साथ प्रत्यक्ष या

41:00अप्रत्यक्ष रूप में रहकर उसका रक्षण और

41:04निरीक्षण करेगा और जैसे जैसे जैसे उसका

41:08साधना में उसकी प्रगति होती जाएगी उसका

41:12अंतःकरण शुद्ध होता जाएगा वैसे वैसे गुरु

41:16कृपा करता जाएगा और पूर्ण अंतःकरण शुद्धि

41:20पर वो गुरु ही उस साधक को ईश्वरीय प्रेम

41:26प्रदान करेगा और ईश्वरीय प्रेम जैसे ही

41:29मिलेगा माया निवृत्ति होगी पापों का क्षय

41:34हो गया होगा माया से छुट्टी मिलेगी

41:37और उसे भगवत प्रेम प्राप्त हो गया होगा।

41:42यू कह लीजिए कि अंतकरण शुद्धि पर गुरु

41:46स्वयं उस जीव को हरि की गोद में बिठा देते

41:50हैं।

41:52अस्तु

41:54जो गुरु होते हैं

41:57उनकी बहुत बड़ी जिम्मेदारी है।

42:04साधक को सिद्ध बनाने तक की जिम्मेदारी

42:08साधक को भगवत प्राप्ति कराने तक की

42:11जिम्मेदारी

42:14गुरु की होती है। वह सद्गुरु अपने शरणागत

42:18को साधना भी सिखाता है। अपने शरणागत के

42:22साथसाथ रहता है। उसके कुसंस्कारों से

42:26लड़ता है। उसकी रक्षा करता है। उसका

42:30योगक्षेम वहन करता है।

42:33जब संस्कारों से लड़ता है मानो करोड़ों

42:37महाभारत के युद्ध कर रहा हो। यह तो जब जीव

42:41को भगवत प्राप्ति होगी तभी उसको पता चलेगा

42:45कि गुरु एक जीव के पीछे कितना परिश्रम

42:49करता है।

42:51इस प्रकार से हरि अनुकंपा से जब जीव को

42:56जीवन में कोई विशुद्ध संत मिलते हैं।

43:00वह विशुद्ध संत उन्हें

43:06भगवत प्राप्ति के मार्ग बतलाते हैं

43:12और यह भी बतलाते हैं कि भगवान को

43:16शास्त्रों में

43:18भगवान को प्राप्त करने के लिए शास्त्रों

43:21में कितने मार्ग बताए गए हैं और कौन सा

43:24मार्ग कलयुग के जीवों के लिए उपयुक्त है।

43:31तो आइए

43:34शास्त्र क्या कहते हैं मार्ग के विषय में

43:42भागवत में कहा गया योगायो मया प्रोणा श्रे

43:48विध सया ज्ञानम कर्मक्त

43:52नो पायो पुत्रित

43:58देवी भागवत पुराण में कहा गया मार्ग में

44:04विख्याता मोक्ष प्राप्त नगाधिप कर्म योगो

44:09ज्ञान योगो भक्ति योगस सत्तम

44:14तीन मार्ग है कुल जमा टोटल

44:19कर्म योग ज्ञान योग भक्ति योग

44:25चौथा कोई मार्ग नहीं यदि आपको जगत में और

44:30मार्ग दिखाई पड़ते हैं तो वह इनहीं तीनों

44:33की शाखा उपशाखा है। मार्ग तीन ही है।

44:38क्यों? चौथा कोई मार्ग क्यों नहीं?

44:43क्योंकि

44:46भगवान का स्वरूप है सच्चिदानंद।

44:53तो सच्चिदानंद स्वरूप के तीन प्रकाश

45:00और

45:02तीन ही रूप में वह प्रस्तुत होते हैं।

45:06सत ब्रह्म, चित ब्रह्म, आनंद ब्रह्म।

45:12तो सत ब्रह्म

45:16इसका रिएक्शन है कर्म।

45:19चित ब्रह्म

45:22इसका रिएक्शन है ज्ञान।

45:25आनंद ब्रह्म।

45:29इसकी प्रस्तुति है भक्ति

45:33तो सत

45:36उसकी प्रस्तुति कर्मित

45:39माने होता है अखंड ज्ञान

45:42या चैतन्य तो उसकी प्रस्तुति है ज्ञान

45:47आनंद प्रेम

45:49उसकी प्रस्तुति या प्राप्ति या मार्ग

45:53भक्ति

45:55तो तीन ही मार्ग

45:58कर्म ज्ञान एवं भक्ति क्योंकि भगवान के

46:03सच्चिदानंद स्वरूप ये तीन सच्चित आनंद

46:10आइए

46:12पहले हम

46:15कर्म मार्ग पर चलते हैं।

46:19आप लोगों ने नाम सुना है।

46:22कोई कर्म कहता है, कोई कर्म धर्म कहता है।

46:26यह आपको सुनने को मिलता है।

46:30यह कर्म धर्म क्या है?

46:34मैं बड़े सरल ढंग से आपको बताती जाऊंगी।

46:41कठिन क्लिष्ट बातें बताने का कोई मतलब

46:45नहीं है।

46:47मुझे आपको समझाना है।

46:53यह जो कर्म धर्म आप सुनते हैं क्या कर्म

46:57अलग है धर्म अलग है या दोनों एक है क्या

47:04देखिए

47:06आप लोगों ने सुना होगा

47:10निषेधात्मक

47:11कर्म

47:14विधि और निषेध

47:17तो जो निषेधात्मक कर्म है

47:21अर्थात जिसको करना नहीं है वो कौन-कौन से

47:26हैं? वो सार्वभौमिक है। यूनिवर्सल

47:31पृथ्वी के किसी भी कोने में चले जाइए,

47:33किसी भी देश में

47:36निषेधात्मक कर्म सब जगह एक।

47:40जैसे

47:43झूठ नहीं बोलना।

47:47यह निषेध तो कहीं भी चले जाइए एक ही नियम

47:53झूठ नहीं बोलना है अनाचार पापाचार दुराचार

47:58करप्शन आदि यह सब निषेधात्मक

48:03कर्म है

48:07दूसरे होते हैं विधि

48:10विधि मतलब

48:12डूज

48:14निषेधात्मक

48:16डोंट

48:17जो नहीं करना है

48:20और विधि यह सात्विक कर्म होते हैं।

48:28इसे धर्म भी कहते हैं। इसे सात्विक कर्म

48:33भी कहते हैं और इसी को वर्णाश्रम धर्म भी

48:38कहते हैं। उसी को कर्मकांड भी कहते हैं।

48:45हम यह जो नित्य कर्म करते हैं

48:51स्नान ध्यान संध्या वंदन आदि

48:57अपने अपने वर्ण के अनुसार

49:01ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र

49:05अपने अपने आश्रम के अनुसार

49:10ब्रह्मचारी गृहस्ती

49:13वानप्रस्थी सन्यासी तो ये जो वर्ण और

49:17आश्रम है इसके अनुसार

49:21जो जो वेदों में

49:25कर्म बताए गए हैं ब्राह्मण के लिए अलग

49:29कर्म क्षत्रिय के लिए अलग कर्म वैश्य के

49:34लिए अलग कर्म ब्रह्मचारी के लिए अलग

49:37गृहस्थ के लिए अलग तो ये जो बताए गए हैं

49:41इसको जो हम करते हैं।

49:45यही

49:47धर्म है। यही इसी को धर्म कहते हैं। इसी

49:51को वर्णाश्रम धर्म कहते हैं। इसी को

49:54कर्मकांड कहते हैं। ये सब एक ही है।

49:59इसी से संबंधित जो अनुष्ठान किए जाते हैं

50:03वो कर्मकांड। तो वर्णाश्रम धर्मों का पालन

50:08इसको धर्म कहा जाता है। विधि कहा जाता है।

50:12सात्विक धर्म कहा जाता है। सात्विक कर्म

50:15कहा जाता है।

50:19तो पहले इसको थोड़ा समझते हैं।

50:23कि यह जो वर्णाश्रम धर्म है यह है क्या?

50:30इसको थोड़ा समझिए।

50:34क्योंकि

50:38इस वर्णाश्रम धर्म कर्मकांड को लेकर

50:45बड़ा डाउट है।

50:48हमारे शास्त्रों में भी देखिए एक और बताया

50:51गया कर्म धर्म का पालन करो। कर्म धर्म

50:55यानी जो अभी मैंने बताया आपको वर्णाश्रम

50:58धर्म इसके पालन की बकायदा आज्ञा देते हैं।

51:04श्रुति स्मृति मवाग्य

51:07यस्त उल्लंघ्य वर्तते आज्ञेदी मद्वश

51:13मद भक्तोपन प्रिय

51:18शास्त्र कहते हैं श्रुति स्मृति यानी

51:21वेदों में जो कर्म धर्म करने की बात कही

51:27गई है उसका पालन सबको करना है। कॉमन मैन

51:32सुन लो यह कहा जा रहा है

51:38सबको करना है यदि कोई इसका पालन नहीं करता

51:45तो उसको नरक मिलेगा

51:48बहुत ध्यान से सुनिए एक और तो यह कहा गया

51:53कर्म धर्म के लिए

51:58सुर श्रुति निंदक

52:02जे अभिमानी

52:05रव नरक परह ते प्राणी

52:11गोसाई भी कह रहे हैं तुलसीदास जी

52:16जो वेदों में कर्मकांड बताया गया है यदि

52:19उसका कोई पालन नहीं करता तो उसको रौरव नरक

52:24मिलता है।

52:26अजी तो इसका मतलब हुआ हम सबको वह

52:29वर्णाश्रम धर्मों का पालन करना है।

52:33ऐसा शास्त्र कह रहे हैं।

52:37लेकिन दूसरी ओर

52:40वही शास्त्रों में दूसरी बात बताई गई।

52:46भगवत प्राप्त संत आचार्य

52:50वो यह कहते हैं प्लवा ते अ यज्ञ रूपा

52:57अरे यह कर्म धर्म की चिकनी चुपड़ी बातों

53:02के चक्कर में मत पड़ना।

53:06यह तो ऐसा पुल है कि इस पर चढ़े तो मत

53:11समझना कि कर्मकांड करके वर्णाश्रम धर्मों

53:15का पालन करके तुम भवसागर पार कर लोगे भगवत

53:19प्राप्ति हो जाएगी ऐसा नहीं है।

53:27अविद्याया मंतरे वर्तमाना स्वयं धीरा

53:31पंडितम मन्यमाना दम्य माना परियंत मूढ़ा

53:36अंधे नमाना

53:39यथांधा

53:42वेदों में बताया गया

53:45कि देखो यदि तुम ये वर्णाश्रम धर्मों का

53:48पालन करते हो तो इसका फल है स्वर्ग और जो

53:53स्वर्ग में गया तो पुण्य क्षीण होने के

53:56पश्चात साथ उसको मृत्यु लोक में पटका जाता

54:00है और वह भी कुत्ता, बिल्ली, गधा आदि की

54:03योनियों।

54:06तो यह भूल मत करना आचार्य लोग कह रहे हैं

54:11हमने जान लिया

54:13कि वर्णाश्रम धर्मों के पालन से भगवत

54:16प्राप्ति नहीं होती। भगवान नहीं मिलते।

54:20और यही बात श्री कृष्ण जी ने अर्जुन से

54:26कही

54:28त्रुण्य विषय वेदा निय गुण्यो भवर्जुन

54:34अर्जुन ये जो वर्णाश्रम धर्म आदि है ना ये

54:39त्रिगुणात्मक है त्रगुण्य विषय वेदा

54:45माना कि वेदों में बताया गया है लेकिन

54:47इससे स्वर्ग मिलता

54:50यामा पुष्पिताम वाचम प्रदंत विपश्चित वेद

54:56वादता पार्थ ना दस्त वादन हे पार्थ

55:06ये कर्म धर्म के चक्कर में मत पड़ना

55:10वरना स्वर्ग मिलेगा मैं नहीं मिलूंगा

55:14यदि मुझे पाना चाहते हो तो इन चक्करों में

55:17मत पड़ो

55:19अब बताइए

55:21वही वेद कह रहे हैं

55:25कर्म धर्म का पालन करो वरना नरक मिलेगा और

55:30वही दूसरी ओर यह भी बताया जा रहा है वेदों

55:34में भी आचार्य भी कह रहे हैं अरे इसके

55:36चक्कर में मत पड़ना

55:41और आपने इतिहास में यह भी सुना होगा

55:46प्रसंग आता है रामायण में प्रसंग आता है

55:51श्रीमद् भागवत में

55:53रामायण में देखिए प्रसंग आता है भरत

56:01भरत अपनी मां को

56:05गाली दे रहे

56:07ह्या महमाम पापा कैके दुष्टचारणी

56:14यदि मैं धार्मिक रामो नासुएन

56:18मात घातकम

56:20हे दुराचारिणी

56:22पति की हत्यानी कुल्टा

56:27तेरे मुंह में कीड़े क्यों नहीं पड़ गए जब

56:30तूने मेरे प्रभु को वनवास के लिए कहा यह

56:35वाक्यों का प्रयोग

56:39भरत कर रहे हैं अपनी मां के लिए जहां धर्म

56:44कहता है मात देवो भव

56:48पित्री देवो भव

56:51जहां धर्म यह कह रहा है मां के लिए वही

56:55भरत अपनी मां के लिए कैसे शब्दों का

56:59प्रयोग कर रहे कहां गया भरत का धर्म

57:05वहीं लक्ष्मण जी को लीजिए

57:11प्रभु राम बार-बार समझा रहे हैं कि

57:14लक्ष्मण वनवास मुझे मिला है तुम्हें नहीं

57:18मिला। तुम्हारा धर्म है माता-पिता की सेवा

57:22करना। इसीलिए मैं वनवास जाऊंगा और तुम

57:28यहां रह के अपने माता-पिता की सेवा करो।

57:33यह तुम्हारा धर्म है। और प्रभु राम स्वयं

57:35धर्म के बारे में कह रहे हैं। धर्म उपदेश

57:39दे रहे हैं। और लक्ष्मण क्या कर रहे हैं?

57:42सीधा मना कर दिया। सीता जी ने सीधा मना कर

57:46दिया।

57:52अब बताइए देखिए खुल्लम खुल्ला

57:56धर्म का उल्लंघन हो रहा है।

58:00ब्रज की गोपियां

58:03जिनके लिए नारद जी कहते हैं यह भक्ति की

58:07आचार्य है। यथा ब्रज गोपिका नाम

58:12वही ब्रज की ब्रजांगनाएं

58:17जो भक्ति की ध्वजा ध्वजा कहलाती हैं वो कर

58:22क्या रही है धर्म का उल्लंघन

58:26आधी रात में ठीक 12 बजे

58:31अपने पतियों को छोड़कर श्री कृष्ण के

58:34सामने खड़ी हो गई

58:37बताइए

58:39तो

58:43समझ में नहीं आता। एक और बताया जाता है

58:46कर्म धर्म का पालन करो। दूसरी ओर बताया जा

58:50रहा है आचार्यों के द्वारा वेदों के

58:53द्वारा कि कर्म धर्म के पालन से स्वर्ग

58:56मिलता है। स्वर्ग नश्वर है। इसीलिए इसके

58:59चक्कर में मत पड़ना।

59:02और वही धर्म का उल्लंघन भी दिखाई पड़ रहा

59:06है लक्ष्मण, भरत आदि के द्वारा।

59:13तो वास्तव में

59:16हम लोग ये जो कहते हैं ना कि गीता में

59:18कर्म का निरूपण है। रामायण में कर्म का

59:22निरूपण है। प्रभु राम ने धर्म का पालन

59:26किया। वास्तव में हम लोग कर्म धर्म की सही

59:29परिभाषा जानते ही नहीं।

59:32नहीं जानते।

59:35हमें यही नहीं पता कि वास्तविक

59:39कर्म क्या है। कौन सा कर्म

59:44निंदनीय है?

59:47कौन सा कर्म वंदनीय है। किस धर्म को

59:51त्यागना है और किस धर्म को अपनाना है।

59:55इसको समझना बहुत आवश्यक है। वही मैं आपको

1:00:00समझाऊंगी।

1:00:03यही प्रश्न

1:00:06उद्धव जी ने

1:00:09श्री कृष्ण जी से पूछा

1:00:14गव स्कंध के 14व अध्याय का पहला श्लोक है

1:00:22वती कृष्ण श्रेया

1:00:25बहु ब्रह्मवादी

1:00:29तेशा विकल्प प्राधान

1:00:32मुता

1:00:34एक मुख्यता

1:00:37उद्धव जी पूछते हैं श्री कृष्ण जी से कि

1:00:41भगवन

1:00:42ये कल्याण के इतने सारे मार्ग क्यों चले

1:00:49कोई एक मार्ग क्यों नहीं

1:00:53एक वक्ता आया वो कुछ कह गया श्रोता बेचारे

1:00:58सुने सिर हिलाए हां ये ठीक ठीक है। यही

1:01:02करना है। फिर दूसरा वक्ता आया। उसने कहा

1:01:06यह ठीक है। तीसरा आया। उसने कहा यही ठीक

1:01:10है। अरे श्रोता बेचारे परेशान क्या ठीक

1:01:14है? क्या ठीक नहीं है? जो आता है वो यही

1:01:18कहता है यही ठीक है। तो आखिर ठीक है क्या?

1:01:26तो आज ये निश्चय हो जाए भगवन मुझे बताइए।

1:01:30कि आखिर कल्याण के इतने सारे मार्ग क्यों

1:01:33चले

1:01:35और क्या यह सारे मार्ग सही है

1:01:38या कोई एक मार्ग सही?

1:01:44श्री कृष्ण जी ने कहा

1:01:49शास्त्रों में भी बताया गया है

1:01:53काल नष्ट प्रलय वाणी वेद संगीता मया

1:01:58ब्रह्मणो प्रोक्त धर्मो यस्या मदात्मक

1:02:08कृत प्रोक्त

1:02:12अर्थात

1:02:14उद्धव

1:02:16मैंने अपनी वेद वाणी में

1:02:21एक ही मार्ग का निरूपण किया है।

1:02:27वही मार्ग वही उपाय वास्तविक है।

1:02:32वही धर्म वास्तविक है जो मेरी प्राप्ति

1:02:36कराए। धर्मो मत भक्ति कृत प्रोक्त

1:02:41मैंने तो एक ही बात कही

1:02:44लेकिन इस जगत में मेरी वेद वाणी को पढ़ने

1:02:51वाले

1:02:54चार प्रकार के लोग

1:03:00मन माया मोहित ध पुरुष पुरुषभ श्रे वदंत

1:03:06नेकांतम

1:03:07यथा कर्म यथा रुचि

1:03:11नेकांत यथा कर्म यथा रुचि

1:03:17तुलसीदास जी कह रहे हैं मार्ग सोई

1:03:22जा कहहु जोई भावा

1:03:25पंडित सोई जो गाल बजावा

1:03:33वेद वाणी में जो बताया गया है

1:03:36अब उसको पढ़ने वाले एक तमोगुणी, एक

1:03:41रजोगुणी, एक सतगुणी और एक इन तीनों गुणों

1:03:47से परे गुणातीत।

1:03:50अब तमोगुणी ने वेद वाणी को पढ़ा तो

1:03:53तमोगुणी अर्थ कर दिया। रजोगुणी ने पढ़ा तो

1:03:57रजोगुणी अर्थ कर दिया। सत्वगुणी ने पढ़ा

1:04:01तो उसने सत्वगुणी अर्थ कर दिया। संत ने

1:04:04पढ़ा गुणातीत

1:04:07तो उसने गुणातीत अर्थ किया। इस प्रकार से

1:04:11अनेक

1:04:12मार्ग निकल गए।

1:04:15जैसे

1:04:22हम जिस समय जिस गुणों से युक्त होते हैं,

1:04:29हम वैसा निश्चय करते हैं।

1:04:35वैसी हमारी थॉट प्रोसेस होती है। वैसा

1:04:39हमारा चिंतन होता है।

1:04:44मान लीजिए

1:04:49मैं प्रवचन देते देते अचानक

1:04:54बीच में

1:04:56चुटकी बजा दूं। फिर एक लाइन बोलूं। फिर

1:05:00चुटकी बजा दूं।

1:05:03तो आप कहेंगे

1:05:06देवी जी ने चुटकी क्यों बजाई?

1:05:11देखिए यह चुटकी मैंने बजाई है तो क्यों

1:05:15बजाई है इसका सही अर्थ मैं जानती हूं।

1:05:19सही अर्थ मैं जानती हूं। फिर भी जब बजाई

1:05:24तो यहां जितने बैठे हैं सब अपने अपने

1:05:26हिसाब से अर्थ करेंगे ना।

1:05:32तो वास्तविक अर्थ तो मैं जानती हूं।

1:05:36वास्तविक रीजन तो मैं जानती हूं।

1:05:40फिर भी हमारा स्वभाव है। हम अपने अपने

1:05:44हिसाब से सोचते हैं। कोई सोचेगा

1:05:48अच्छा देवी जी ने चुटकी बजाई।

1:05:53लगता है यह बोलते बोलते ना भूल जाती है तो

1:05:58चुटकी बजाकर याद कर लेती है

1:06:02तो कोई दूसरा सोचेगा

1:06:05अरे नहीं बोलते बोलते चुटकी बजाने की आदत

1:06:10होगी अब वो पहली बार आज आए हैं पता नहीं

1:06:14था उनको रोज तो सुने नहीं मैंने आज बजा दी

1:06:17तो उनको लगता होगा यह रोज यही करती हैं

1:06:20इनका अभ्यास

1:06:22आदत बहुत सी आदतें होती है लोगों को।

1:06:27हां जैसे

1:06:31बहुत से लोग ऐसा होते हैं ऐसे होते हैं एक

1:06:35वाक्य बोलेंगे उसमें एक शब्द को कई बार

1:06:38प्रयोग करेंगे।

1:06:41देवी जी

1:06:43आपका स्वागत है। आप हमारे जाजगी आई समझे

1:06:47कि नहीं? तो रुकी कहां है? आप कभी हमारे

1:06:50घर आइएगा ना समझे कि नहीं वैसे हम बिल्कुल

1:06:53पास ही रहते हैं आपको ज्यादा दूर आना नहीं

1:06:56पड़ेगा समझे कि नहीं अरे क्या समझे कि

1:06:58नहीं समझे कि नहीं समझे कि नहीं

1:07:03समझे कि नहीं ये तकिया कलाम है एक ही शब्द

1:07:07को बार-बार आदत होती है बहुत सी आदतें

1:07:11होती है लोगों को कुछ लोगों की आदत होती

1:07:13है अपना कंधा यूं यूं करने की बोलते भी

1:07:18जाएंगे और यू यू भी करते जाएंगे। देखा

1:07:20होगा आप लोगों ने। कुछ लोग बात करते करते

1:07:24अपनी नाक यू यू करते रहते हैं। इतना संकोच

1:07:27होता है मानो नाक ही कहीं उड़ के चली

1:07:29जाएगी।

1:07:30वो नाक पकड़ के बात करते हैं। तो बहुत

1:07:33सारी आदतें हैं। तो ऐसे ही देवी जी की भी

1:07:36आदत होगी। ये बोलने के समय चुटकी बजाती

1:07:46तो रीजन मैं जानती हूं तो जब मेरी एक

1:07:51चुटकी बजाने का ढेरों रीजन बन सकता है तो

1:07:56क्या भगवान की वेद वाणी के हजार अर्थ नहीं

1:08:01हो सकते? आप ही बताइए।

1:08:06इस प्रकार से अनेक प्रकार के अर्थ हो गए।

1:08:12एक पेड़ पर एक तोता बैठा है।

1:08:17बढ़िया बोलता है।

1:08:22तो उसी पेड़ के नीचे एक

1:08:25सेठ जी

1:08:28बैठे हैं।

1:08:32अब वो तोता बोल रहा है।

1:08:36सेठ जी सुन रहे हैं। क्या बोल रहा है?

1:08:39सोंठ मिर्च अदरक सोंठ मिर्च अदरक सोंठ

1:08:41मिर्च अदरक

1:08:44सेठ जी को यह सुनाई पड़ रहा है यह बोल रहा

1:08:48है सोंठ मिर्च अदरक

1:08:51क्यों सेठ जी उसी का व्यापार करते

1:08:56इतने में सेठ जी का मित्र दौड़ता हुआ आया

1:08:58वह पहलवान है तो वहीं पर वह पहलवानी शुरू

1:09:02की उसने व्यायाम शुरू किया तो उसको भी

1:09:05आवाज गई उसने भी सुना

1:09:09सेठ जी ने कहा सुनो सुनो तोता क्या बोल

1:09:12रहा है तो पहलवान ने सुना

1:09:17उसने कहा हां सुनाई पड़ा दंड बैठक कसरत

1:09:20दंड बैठक कसरत दंड बैठक कसरत

1:09:25अब पहलवान को सुनाई दे रहा है दंड बैठक

1:09:28कसरत

1:09:31इतने में

1:09:34एक तीसरे व्यक्ति आए वहां पर घूमते हुए वह

1:09:38भी इनके मित्र ही हैं। भक्त हैं। भक्त

1:09:44उन्होंने सुना

1:09:47उसी तोते की आवाज तो उनको सुनाई दिया उस

1:09:51भक्त को राम सीता दशरथ राम सीता दशरथ

1:09:58अब तीनों आपस में लड़ बैठे।

1:10:03सेठ कहता है सोंठ मिर्च अदरक

1:10:07पहलवान कहता है दंड बैठक दंड बैठक कसरत और

1:10:11भक्त कहता है राम सीता दशरथ

1:10:14तो सबको अपने अपने हिसाब से उस तोते की

1:10:19आवाज सुनाई पड़ रही है लेकिन फैक्ट में

1:10:22तोता क्या बोल रहा है यह तोता जानता है

1:10:27तो इसी प्रकार से

1:10:30वास्तव में वेद वाणी में क्या मार्ग बताया

1:10:35गया है जो सही है जिसका अनुकरण सबको करना

1:10:39है। यह गुणातीत ने बताया। बाकी माया के

1:10:43आीन तीन गुण वालों ने जो अर्थ किया वो

1:10:47अपने अपने हिसाब से कर दिया। श्री कृष्ण

1:10:50कह रहे हैं उद्धव से इस प्रकार से अनेक

1:10:54प्रकार के मार्ग निकले। पारंपरण के शंचित

1:10:58पाखंड मतयो परे अनेक प्रकार की परंपराएं

1:11:02निकल गई। अनेक प्रकार के पाखंड निकल गए और

1:11:06वास्तविकता

1:11:10समाप्त हो गई।

1:11:12वास्तव में जीव को क्या करना है? यह नहीं

1:11:16किया जीव ने बाकी सब उलटपटांग करता रहा।

1:11:24तो इस प्रकार से

1:11:28वास्तव में कौन सा धर्म वंदनीय है और कौन

1:11:34सा धर्म निंदनीय है किसको अपनाना है और

1:11:38किसको नहीं अपनाना यह समझना है। तो यदि हम

1:11:43सबसे पहले कर्म के विषय में समझते हैं

1:11:47जिसको हम कर्मकांड कहते हैं या वर्णाश्रम

1:11:51धर्म कहते हैं

1:11:53तो उसके लिए

1:11:56आपको यह जानना होगा कि वेदों में

1:12:00वर्णाश्रम धर्म के पालन के अंतर्गत

1:12:05बहुत बड़ी बड़ी शर्तें बतलाई गई।

1:12:10बहुत बड़े-बड़े नियमों का पालन करना होता

1:12:13है। यदि उन विधि नियमों का पालन करने में

1:12:19त्रुटि हो जाए

1:12:22तो यजमान का नाश भी हो सकता है। यजमान को

1:12:28गलत उपाय का गलत फल मिलेगा। दंड भी मिलता

1:12:32है।

1:12:34इसीलिए बताया गया

1:12:37डवे संपदते धर्मस

1:12:40यथा

1:12:42दुर्लभ कलम।

1:12:46छह उपकरण हैं कलयुग में कर्म धर्म के पालन

1:12:51के अंतर्गत उन छह उपकरणों को सही सही विधि

1:12:58नियम से उसका पालन करना है।

1:13:04देश

1:13:05काल पदार्थ कर्ता मंत्र और कर्म ये छह

1:13:11चीजें

1:13:13बहुत ध्यान से सुनिए।

1:13:15मान लीजिए आप यज्ञ करने जा रहे हैं

1:13:20तो यज्ञ कर रहे हैं। यह कर्मकांड है तो अब

1:13:24यज्ञ के अंतर्गत यह छह उपकरण सही होने

1:13:29चाहिए।

1:13:30जैसे देश

1:13:35अर्थात स्थान।

1:13:39अब आप यज्ञ कर रहे हैं तो वेद के अनुसार

1:13:45पृथ्वी को सही करो। आप कहेंगे पृथ्वी को

1:13:49क्या सही करना है? पृथ्वी तो सही है

1:13:54और फिर पृथ्वी के कण-कण में प्रभु व्यापक

1:13:58सर्वत्र समाना

1:14:00समान रूप से भगवान व्याप्त है। तो पृथ्वी

1:14:03को क्या दोष है? पृथ्वी का क्या दोष है?

1:14:07पृथ्वी तो सही है। अरे नहीं नहीं नहीं

1:14:12कर्मकांड के अंतर्गत

1:14:16यह नियम नहीं चलेगा कि सियाराम में सब जग

1:14:19जाने।

1:14:21आप यज्ञ करने जा रहे हैं तो आपको वेदों के

1:14:24अनुसार कर्मकांड के अंतर्गत नियम है।

1:14:30आपको वह स्थान शुद्ध करना पड़ेगा। तभी आप

1:14:34यज्ञ क्रिया कर सकते हैं।

1:14:37आप शशान में यज्ञ नहीं कर सकते वह भी

1:14:41पृथ्वी लेकिन आप यज्ञ नहीं कर सकते नियम

1:14:45तो देश

1:14:52समय

1:14:54अमावस्या को करना है या पूर्णमासी को करना

1:14:57है सोमवार को करना है या मंगलवार को करना

1:15:00है इसको भी आपको तय करना होगा

1:15:05विधि नियम के अनुसार

1:15:10तो देश काल

1:15:13कर्ता

1:15:18पदार्थ देश काल पदार्थ पदार्थ अर्थात आप

1:15:23जो सामग्री यज्ञ में लगा रहे हैं

1:15:28वो शुद्ध कमाई की होनी चाहिए शुक्ल यव तस

1:15:33यज्ञम

1:15:36शुद्ध कमाई का पैसा और उस शुद्ध कमाई के

1:15:40पैसे से लाई गई सामग्री वो द्रव्य शुद्ध

1:15:45कमाई का हो सामग्री भी शुद्ध कमाई की हो

1:15:49तभी यज्ञ होगा।

1:15:53शुक्लम

1:15:55ब्लैक मार्केटिंग के पैसे से यज्ञ नहीं हो

1:15:58सकता।

1:16:00काले धन से यज्ञ नहीं हो सकता। यह वेद कह

1:16:04रहा है यह वेदों के नियम

1:16:08शुद्ध कमाई मतलब

1:16:10ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र।

1:16:15अब इनके लिए जिस प्रकार से वेदों में कमाई

1:16:20करना बताया गया। जैसे उदाहरण के लिए

1:16:23ब्राह्मण तो ब्राह्मण पैसा कैसे कमाए? तो

1:16:28ब्राह्मण के लिए बताया गया

1:16:31वो वेद पढ़े। वेद पढ़ाए,

1:16:35यज्ञ करे, यज्ञ कराए,

1:16:41दान ले, दान दे। इस प्रकार से वो

1:16:48अपने वर्ण के अनुसार जब पैसा कमाएगा उस

1:16:52पैसे से वो यज्ञ कर सकता है। क्षत्रिय के

1:16:55लिए अलग नियम, वैश्य के लिए अलग नियम,

1:16:58सबके लिए अलग-अलग नियम है।

1:17:02इतने नियम है तब जाकर आप यज्ञ कर सकते

1:17:06हैं। तो देश, काल, पदार्थ, कर्ता यानी

1:17:13यज्ञ करने वाला पंडित

1:17:16वो कैसा है? उसकी श्रद्धा कितनी है? उसका

1:17:20विश्वास कितना है? जब वो यज्ञ में आहुति

1:17:25डालता है। इंद्र इ्द्राय नमः स्वाहा। जब

1:17:29यह आहुति डालता है तो क्या उसको इंद्र

1:17:34सामने खड़े दिखाई पड़ते हैं?

1:17:39प्रकट रूप में

1:17:42अरे छोड़ो जी। वो पंडित तो इस हड़बड़ी में

1:17:46रहते हैं कि एक का काम हम करें खत्म

1:17:49कर्मकांड यज्ञ आद तो दूसरे के पास जाए

1:17:52फटाफट। यहां इंद्र को देखने की फुर्सत

1:17:55कहां है?

1:17:58बताइए

1:18:02तो करता भी सही हो। फिर मंत्र

1:18:07यह पंडित जी जो मंत्र पढ़ रहे हैं

1:18:12क्या उन्हें मंत्रों का ज्ञान है?

1:18:18क्या सही गुरु से

1:18:23मंत्रो उच्चारण सीखा है? क्योंकि वेदों के

1:18:28मंत्र के

1:18:31प्रत्येक शब्द के प्रत्येक अक्षर के ऊपर

1:18:35नीचे स्वर होता है

1:18:38और उस स्वर के उच्चारण में यदि जरा भी

1:18:43त्रुटि हो जाए

1:18:46तो अर्थ बदल जाएगा।

1:18:49यजमान

1:18:51का नाश हो सकता है।

1:18:56इसीलिए

1:18:57यदि संस्कृत नहीं आती

1:19:01तो सीधा सीधा भगवान का नाम बोलो कोई

1:19:04प्रॉब्लम नहीं।

1:19:07लेकिन यदि मंत्र उच्चारण कर रहे हो तो सही

1:19:10वास्तविक संत की कृपा से ही वेदों का

1:19:14ज्ञान होगा। मंत्र उच्चारण आएगा।

1:19:19तो इतने नियम

1:19:22यह जो वेद मंत्र होते हैं

1:19:26इसमें स्वर होता है

1:19:29विष्णुरामस

1:19:32विष्णु हो

1:19:35विष्णु

1:19:37सरस विष्णु ध्रुवोस

1:19:40वैष्णव मस विष्णवे

1:19:44उद्वयम तमस्परिश

1:19:48पश्यंत उत्तरम देवम देवत्रा

1:19:53सूर्य मगन मज ज्योति रुत्तमम

1:19:58उदत जात वेदसम देवम व्तिकेत

1:20:04तव दश विश्वा सूर्यम

1:20:09त चक्षुर देवहितम

1:20:12पुरस्ता शुक्रत

1:20:15पश्च शरद

1:20:17शतम जी

1:20:20शरद शतम शणुयाम

1:20:23शरद

1:20:25शत मदीनाम

1:20:29शरद शतम भू शरद शतात

1:20:38स्वस्त इंद्रो वृद्ध श्रवा स्वस्त पुखा

1:20:43विश्व दा स्वस्ता

1:20:47अरिष्ट नेम इत्यादि इत्यादि

1:20:52तो यह वेद मंत्र है।

1:20:56इसके ऊपर नीचे स्वर है।

1:20:59यदि इसका उच्चारण गड़बड़ हो गया तो अर्थ

1:21:03बदल जाएगा। अर्थ बदल जाएगा तो दंड मिलेगा

1:21:08या यजमान का यज्ञ खराब हो जाएगा। वो नष्ट

1:21:13हो जाएगा।

1:21:17दुष्ट शब्द

1:21:20मिथ्या प्रक्तो न सज

1:21:25यजमानम हस्त यथेंद्र शत्रु स्वरतो पराधार

1:21:33शास्त्रों में कथा आती है भागवत में

1:21:52एक

1:21:56राक्षस ने साधुओं को पकड़ लिया।

1:22:01उसे इंद्र के खिलाफ यज्ञ कराना था। अब यह

1:22:05असुर राक्षस वो बेचारा कहां यज्ञ आद

1:22:08क्रिया जाने। तो उसने जबरदस्ती साधुओं को

1:22:11पकड़ लिया और कहा इंद्र के खिलाफ यज्ञ करो

1:22:15और देखो आहुति डालना जिससे हम राक्षस बढ़े

1:22:21और इंद्र और देवता सब घट के मर जाए।

1:22:28अब

1:22:30इन साधुओं ने सोचा कि हम इंद्र के खिलाफ,

1:22:35देवताओं के खिलाफ यज्ञ कैसे करें और यदि

1:22:39हम

1:22:41यज्ञ नहीं करते तो यह राक्षस हमारा सबका

1:22:45वध कर देगा।

1:22:48और यदि हम राक्षस की बात मान लेते हैं

1:22:53तो इन असुरों का राज हो जाएगा। देवता सब

1:22:58समाप्त हो जाएंगे।

1:23:01बड़ी चिंता की बात थी, चिंता का विषय।

1:23:06खैर वो असुर ने कहा राक्षस ने कि जल्दी

1:23:09करो नहीं तो मैं सबका वध कर दूंगा।

1:23:13तो इन साधुओं ने क्या किया? यज्ञ में

1:23:21शब्द जो था इंद्र शत्रु विवधस

1:23:26जिसका अर्थ था

1:23:29इंद्र का

1:23:31शत्रु बढ़े।

1:23:35यह डालना था यज्ञ में आहुति।

1:23:39लेकिन इन साधुओं ने क्या किया? शब्द वही

1:23:43रहने दिया। उसका स्वर बदल दिया। अब जब

1:23:47स्वर बदल दिया तो उसका अर्थ हो गया उल्टा।

1:23:54अर्थ होना था इंद्र का शत्रु बढ़े लेकिन

1:23:58अर्थ हो गया इंद्र का शत्रु घटे इंद्र का

1:24:02शत्रु घटे तो घटे घटे में क्या हुआ

1:24:06धीरेधीरे जितने राक्षस थे सब मर गए अब

1:24:10जिसने यज्ञ करवाया था वो भी मर गए तो वो

1:24:14भगवान के पास पहुंचा और भगवान से उसने

1:24:18शिकायत की कि प्रभु हम भी आपकी संतान है।

1:24:22यह देवता भी आपकी संतान है और आप पक्षपात

1:24:26करते हैं।

1:24:29आहुति तो यही डली थी

1:24:33कि इंद्र का शत्रु बढ़े फिर हम मारे कैसे

1:24:36गए? तब भगवान ने कहा कि देखो

1:24:41कर्मकांड के अंतर्गत

1:24:45जो आहुति डली है और उसमें जो विधि नियम

1:24:49अनुसार मंत्रो उच्चारण हुआ है और मंत्र

1:24:53उच्चारण में जो स्वर निकला उसके अर्थ

1:24:56अनुसार ही मैं फल देता हूं। इसलिए वो फल

1:25:00मिला। तो इतने नियम है

1:25:06कर्म धर्म के पालन में

1:25:10तो अनुष्ठान कर्म भी सही हो मंत्र भी सही

1:25:14हो तब जाकर कलयुग में यज्ञ होगा अब आप

1:25:19बताइए इतने छे छे उपकरण पूरे पूरे ठीक आज

1:25:23कलयुग में कहां

1:25:26इसलिए यज्ञ का वो फल भी नहीं मिलता बस हम

1:25:31कर रहे हैं। ठीक है? लेकिन वह वास्तविक फल

1:25:35नहीं मिलता।

1:25:39तो

1:25:41कर्म के अंतर्गत चार चीजें होती हैं।

1:25:45कर्म,

1:25:46कर्म योग, विकर्म और कर्म सन्यास।

1:25:53कर्म जो होता है जिसके बारे में मैं अभी

1:25:55आपको बता रही हूं। वर्णाश्रम धर्म

1:26:00यह चार प्रकार का है। नित्य कर्म, नैमितिक

1:26:04कर्म, काम्य कर्म, प्रायश्चित कर्म।

1:26:09नित्य कर्म क्या?

1:26:11जो रोज आप करते हैं स्नान ध्यान आदि अपने

1:26:16अपने वर्ण के अनुसार संध्या वंदन आदि सब

1:26:19कर रहे हैं। सबको करना कंपलसरी है।

1:26:26अच्छा जी हम यह सारी चीजें करते हैं तो

1:26:29हमको इनाम मिलेगा ना भगवान से? नहीं।

1:26:35कोई इनाम नहीं मिलेगा। अच्छा जाओ नहीं

1:26:38करते। नहीं करोगे तो दंड मिलेगा।

1:26:43आप कहेंगे यह तो बड़ी गंदी बात है। भगवान

1:26:46को ऐसा तो नहीं करना चाहिए। यदि हम नित्य

1:26:49कर्म आदि करने में मेहनत कर रहे हैं तो

1:26:52फिर वह हमें पुरस्कार दे। भगवान ने कहा

1:26:56भाई तुम जब देखो हम पर अटैक कर देते हो।

1:27:00तुम्हारी

1:27:01मटेरियल गवर्नमेंट में भी देखो तुम जिस

1:27:04देश के नागरिक हो वहां उस देश के जो

1:27:08राइट्स एंड ड्यूटीज हैं जो नियम है उसका

1:27:11सब सिटीजन पालन करते हैं। सारे नागरिक

1:27:14पालन कर रहे हैं। तो आप जो नियमों का पालन

1:27:18करते हैं तो क्या आपको कोई पुरस्कार मिलता

1:27:22है? नहीं वो आपकी ड्यूटी है।

1:27:25जाओ नहीं करते देश के नियम का पालन। हां

1:27:30जेल में डाल दिए जाओगे।

1:27:34एक व्यक्ति ट्रेन में जा रहा है।

1:27:38टीटी आया

1:27:40टिकट दिखाओ। साहब ये लो टिकट लो। हां बहुत

1:27:45बढ़िया। हां। अच्छा अच्छा कोलकाता जा रहे

1:27:47हो। ठीक है। साहब हां बोलो। साहब हमने

1:27:52टिकट ली है तो तो पुरस्कार मिलना चाहिए।

1:27:57हमने

1:27:58हम टिकट ले बैठे हैं। हम देश के नियम का

1:28:03कानून का पालन करते हैं। टीटी ने कहा तो

1:28:06इसमें क्या है? सब कर रहे हैं। तुम्हारी

1:28:10ड्यूटी है।

1:28:13आगे बढ़े टीटी। तुम्हारी टिकट दिखाओ।

1:28:17हम नहीं लिए टिकट। क्यों? क्यों जरूरी है

1:28:21क्या? देश हमारा है, ट्रेन हमारी है। बैठ

1:28:24गए हम। टिकट लेना जरूरी है क्या?

1:28:28टीटी ने कहा

1:28:30यह ड्यूटी है।

1:28:33ये कानून है। तुमको लेना ही पड़ेगा। नहीं

1:28:37लोगे पेनाल्टी लग जाएगी। तो देखिए हम टिकट

1:28:42ले बैठते हैं। कोई पुरस्कार मिलता है?

1:28:45नहीं। नहीं ले बैठेंगे उतार दिए जाएंगे या

1:28:49फाइन लगेगा है ना तो जैसे जगत में भी यह

1:28:53नियम है ऐसे ही भगवान के यहां भी यह नियम

1:28:57है यदि आप कर्मकांड करते हैं तो कर्मकांड

1:29:02के अंतर्गत यह जो नित्य कर्म करते हैं

1:29:06वो सबको करना है। नैमितिक कर्म जन्माष्टमी

1:29:12है, राम नवमी है, सूतक है। तो आप लोग जो

1:29:16कर्मकांड करते हैं वह नैमितिक कर्म काम्य

1:29:20कर्म किसी कामना को लेकर आप यज्ञादिक

1:29:24क्रियाएं करते हैं वह काम्य कर्म

1:29:26प्रायश्चित कर्म मान लीजिए

1:29:30आपसे कोई पाप हो गया

1:29:34आप नहीं चाहते थे अनजाने में आपसे गौ

1:29:37हत्या हो गई मान लीजिए

1:29:40अब गौ हत्या तो पाप है।

1:29:44तो वेदों में जो गौ हत्या के लिए

1:29:48प्रायश्चित बताया गया है तो हम विधि नियम

1:29:53से यदि वो प्रायश्चित कर्म कर लेते हैं तो

1:29:57फिर उस पाप से हमको मुक्ति मिल जाती है।

1:30:00यानी मरने के बाद हमको वो पाप भोगना नहीं

1:30:04पड़ेगा।

1:30:06हमको उस पाप से छुट्टी मिल गई। धर्म पाप

1:30:11मपन दती धर्म के पालन से यह प्रायश्चित

1:30:15धर्म कर्म के पालन से आपको उस पाप से

1:30:19मुक्ति मिल गई। आपने प्रायश्चित धर्म का

1:30:22पालन किया। तो यह है कर्म।

1:30:28अब यदि विधि नियम से कोई इस कर्मकांड का

1:30:32वर्णाश्रम धर्मों का आज कलयुग में पालन

1:30:36करता है

1:30:38वो छह उपकरण के साथ देश काल पदार्थ कर्ता

1:30:42मंत्र कर्म ये हर कर्म के साथ यदि इसका

1:30:46पालन करता है तब जाकर कर्मकांड के पालन

1:30:51में उसको स्वर्ग मिलेगा

1:30:54बताओ इतनी मेहनत की और अंत में मिला क्या

1:30:59स्वर्ग जो नश्वर

1:31:02तो इसको कहते हैं कर्म

1:31:05दूसरा होता है विकर्म

1:31:09विकर्म उसको कहते हैं ऐसा जीव जो ना तो

1:31:15वर्णाश्रम धर्मों का पालन करता है और ना

1:31:19ही भगवान की भक्ति करता है मन से दोनों ही

1:31:24काम नहीं करता

1:31:27उसको आप कह सकते हैं आवारा उत श्रृंखल

1:31:31जो यह कहता है अजी हम यह सब चक्कर में

1:31:34नहीं पड़ते।

1:31:36हम तो आजाद तयत के इंसान हैं। आराम से रात

1:31:40को 12 एक बजे सोते हैं। सवेरे 10 बजे उठते

1:31:44हैं। हम तो सब बंधनों से मुक्त हैं।

1:31:50हमारा कोई फेथवे नहीं है। यह वर्णाश्रम

1:31:53धर्म में ये कर्म धर्म में और ना ही भगवान

1:31:57में। ये सब बेकार चीज है। हम कोई फेथ नहीं

1:32:01रखते। इसमें हम तो आजादी से रहते हैं। खाओ

1:32:04पियो, मौज करो।

1:32:10इनको कहते हैं विकर्मी।

1:32:14लेकिन विकर्मी महोदय को यह नहीं पता। यह

1:32:18जो कह रहे हैं कि हम सब बंधन से मुक्त

1:32:21हैं। वह महोदय जी कौन से बंधन से मुक्त

1:32:24हैं। क्या काल के बंधन से मुक्त हैं। क्या

1:32:28अमरता का सर्टिफिकेट लेकर आए हैं? एक दिन

1:32:32मरना है।

1:32:35कर्म, गुण, दोष सब तो उनके पीछे लगे हैं।

1:32:40काम, क्रोध, लोभ, मोह सारे विकार

1:32:44जरा सी प्रतिकूल परिस्थितियां आ जाए तब

1:32:48देखिए

1:32:50ये महोदय जी जो यह कह रहे हम आजाद तयत के

1:32:56जरा सी तकलीफें आ जाए, प्रतिकूल परिस्थिति

1:33:00आ जाए

1:33:02तो सब आजादी दिखाई पड़ जाएगी। चिंता बढ़

1:33:06जाएगी। फिर

1:33:09वासनाओं के गुलाम है हम लोग। कामनाओं के

1:33:12गुलाम हैं। तो जब कामनाओं की पूर्ति करनी

1:33:16है तो फिर गिड़गिड़ा के जिसकी कामना की है

1:33:19उसके पैरों में गिरेंगे। स्त्री की कामना

1:33:23की है तो स्त्री के पैरों में। धन की

1:33:25कामना की है तो धनी के पैरों में। कौन से

1:33:30बंधन से मुक्त है हम?

1:33:33यह वासनाएं यह तो दिन रात परेशान करती

1:33:37हैं।

1:33:39लेकिन वो विकर्मी

1:33:42जो ऐसी बड़ी-बड़ी बातें करते हैं बेहोश

1:33:46हैं। नशा है, मद है या तो पैसे का या पदवी

1:33:53का या युवावस्था का यह नशा उन्हें डूबाए

1:33:58हुए हैं।

1:34:00ऐसे विकर्मियों को नरक की प्राप्ति होती

1:34:04है। आसुरी यो मापना मूढ़ा जन्मनी जन्मनी

1:34:09माम प्राप्त कते ततो या धमा

1:34:14श्री कृष्ण कह रहे हैं

1:34:18कि ऐसे लोगों को मैं आसुरी योनियों में

1:34:21पटक देता हूं

1:34:24ऐसे उ्रंखल विकर्मी आवारा लोगों को

1:34:28नरको की यातनाएं मिलती

1:34:34तो कर्मी को मिलता है स्वर्ग विकर्मी को

1:34:38मिलता है नरक।

1:34:40अब तीसरा चलिए। तीसरा है कर्म योग या

1:34:47अकर्म।

1:34:50कर्म योग का मतलब होता है

1:34:56मन से

1:34:58ईश्वर की भक्ति की जाए।

1:35:01और शरीर से वर्णाश्रम धर्मों का यथाशक्ति

1:35:06पालन किया जाए। जितना जरूरी है। लोकाचार

1:35:12के लिए जगत में रह रहे हैं तो जितना

1:35:15वर्णाश्रम धर्म पालन करना आवश्यक है। शरीर

1:35:20से कर दो व्यवहार कर दो। लेकिन मन से

1:35:25भगवान की भक्ति

1:35:27और वो भक्ति में निर निरंतरता

1:35:34इसलिए श्री कृष्ण जी ने कहा एवं सतत युक्त

1:35:38नाम

1:35:39सतत मन तुम्हारा मुझ में लगा रहे और

1:35:43इंद्रियों से तुम संसार में व्यवहार करो।

1:35:48यह है कर्म योग।

1:35:51योग का मतलब होता है लगाव संयोग

1:35:56योग इतो जीवात्म परमात्मनो

1:36:02अर्थात

1:36:05प्यार योग माने लगाव आसक्ति नहीं तो प्यार

1:36:10कह लीजिए

1:36:12कैसे पता चलेगा कि हमारा यहां प्यार है

1:36:19तो सीधी सीधी बात है

1:36:23जहां आपका मन चला जाए

1:36:27वही आपकी आसक्ति है और जहां आपका मन जाता

1:36:33है

1:36:36उसी को कर्म माना जाता है।

1:36:40जिस कर्म में आपका मन है वही कर्म माना

1:36:45जाएगा। उसी का फल मिलेगा। जिस कर्म में

1:36:50आपका मन नहीं है उसका कोई फल नहीं मिलता।

1:36:56तो कैसे जाने कि हमारा यहां प्यार है।

1:37:00बच्चे की तोतली भाषा सुनना बहुत अच्छा

1:37:04लगता है। मन वहां है। मन की आसक्ति वहां

1:37:08है। छोटे छोटा बच्चा आके मां से लिपट जाए।

1:37:14वो स्पर्श से जो वात्सल्य अनुभूति होती

1:37:19है। अच्छा लगता है। प्यार आसक्ति

1:37:25ठीक इसी प्रकार जैसे संसार संबंधित

1:37:30यह आसक्तियां हैं हमारी

1:37:35हमारा लगाव हमारा प्यार ऐसे ही शब्द

1:37:40स्पर्श रूप रस गंध ये पांचो

1:37:43ज्ञानेंद्रियों का लगाव

1:37:46यदि भगवान संबंधित हो जाए जैसे अभी संसार

1:37:51में

1:37:52यही भगवान संबंधित हो जाए तो भगवान में

1:37:55प्यार है। लगाव भगवान में है। सीधी सीधी

1:38:00बात।

1:38:04तो कर्म योग का मतलब होता है मन का निरंतर

1:38:10योग।

1:38:12निरंतर प्यार भगवान में होना। निरंतर

1:38:16आसक्ति भगवान में होना।

1:38:22अर्जुन की क्रियाएं देखिए।

1:38:26अर्जुन क्या कर रहा है? अर्जुन को श्री

1:38:30कृष्ण कह रहे हैं युद्ध करो। अर्जुन युद्ध

1:38:34कर रहा है।

1:38:36अब बहिरंग क्रिया देखिए। लोगों की हत्या

1:38:40कर रहा है। वध कर रहा है।

1:38:44लेकिन भगवान अर्जुन की फाइल में क्या लिख

1:38:46रहे हैं?

1:38:49अर्जुन का युद्ध तब युद्ध माना जाता यदि

1:38:54उसकी अपने कर्म में आसक्ति होती। लेकिन

1:38:58अर्जुन की तो निरंतर आसक्ति कृष्ण कह रहे

1:39:02हैं मुझ में है। वो तो बस मेरी आज्ञा का

1:39:06पालन कर रहा है। इसीलिए उसके किए हुए

1:39:10कार्य को मैं नहीं देख रहा। कृष्ण कह रहे

1:39:13हैं उसकी आसक्ति मुझ में है। इसीलिए

1:39:20उसके मन का लगाव

1:39:22शत प्रतिशत मुझ में है। इसीलिए अर्जुन

1:39:26कृतार्थ हो गया।

1:39:29अर्जुन को उसकी क्रिया का कोई फल नहीं मिल

1:39:32रहा क्योंकि उसका मन क्रिया में नहीं है।

1:39:35उसका मन निरंतर श्री कृष्ण में है। इसी को

1:39:38कहते हैं कर्म योग।

1:39:43लेकिन निरंतर होना चाहिए। ऐसा नहीं कि

1:39:46सवेरे भगवान का नाम ले लिया। दोपहर को मन

1:39:49चला गया स्त्री के पास और शाम को चला गया

1:39:52बेटे के पास। फिर रात्रि में सोने से पहले

1:39:55थोड़ा भजन कर लिया। यह घपड़ सपड़ नहीं

1:39:58चलेगा।

1:40:02यहां भी मन वहां भी मन वहां भी मन। ऐसे

1:40:04नहीं।

1:40:09कर्म योग का मतलब

1:40:12शरीर से आप जो कार्य कर रहे हैं वह

1:40:16व्यवहार हो और मन की निरंतर आसक्ति

1:40:22भगवान में हो।

1:40:27आप कहेंगे

1:40:29तो क्या हम जो संसार में

1:40:33व्यवहार करेंगे तो फिर प्यार ना करें।

1:40:37किसी से

1:40:42आप कह रहे हैं शरीर से व्यवहार करो तो

1:40:45क्या प्यार ना करें? अरे

1:40:50जगत में

1:40:52कोई प्यार नहीं चाहता।

1:40:56जगत में सब व्यवहार चाहते हैं। नहीं जी हम

1:41:00नहीं मानते। अच्छा उदाहरण बताऊं आपको।

1:41:07सवेरे सवेरे पतिदेव ने देखा कि आज तो

1:41:11हमारी पत्नी उठी ही नहीं। चाय पिलाई ही

1:41:14नहीं उसने। भाई क्या हो गया? रोज तो

1:41:17बढ़िया गरम गरम चाय हमारे लिए लाती है। आज

1:41:21क्या हो गया? तो पतिदेव ने उठकर देखा तो

1:41:25पत्नी लेटी हुई है।

1:41:30क्यों जी? क्या हो गया? आज आपने चाय नहीं

1:41:33बनाई हमारे लिए। चलो हम बना के ले आए आपके

1:41:37लिए चाय लीजिए पीजिए हमारे हाथ की चाय

1:41:40पीजिए

1:41:42पत्नी लेटी है

1:41:44उठी नहीं पतिदेव थोड़ी देर बाद आए अपना

1:41:48नित्य कर्म निपटा के देखा उठी नहीं अरे

1:41:52क्या बात है मूड ऑफ है क्या भाई कुछ तो

1:41:56रीजन होगा उठो उठती क्यों नहीं कुछ नहीं

1:42:00कहा पत्नी ने

1:42:02पतिदेव अपना बिना नाश्ता किए ऑफिस चले गए।

1:42:07शाम को लौटे ऑफिस से। सोचा किसी बात से

1:42:11मूड ऑफ हुआ होगा। नहीं बात कर रही। अब तक

1:42:14तो सब ठीक-ठाक हो गया होगा। खानावाना बना

1:42:17के रखी होगी। तो शाम को लौटे पतिदेव देखा

1:42:21तो पत्नी वैसे ही लेटी है। तो पति ने

1:42:24प्यार से पास में बैठकर पूछा भाई क्या बात

1:42:28है?

1:42:30तुमने आज हमारे लिए ना चाय बनाई, नाश्ता

1:42:34बनाया, ना दोपहर का टिफिन भेजा, ना अभी

1:42:38कुछ बनाया।

1:42:41पत्नी ने कहा नहीं मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं

1:42:43है।

1:42:45तो फिर तुम लेटी क्यों हो?

1:42:48पत्नी ने कहा, नहीं मैंने सोचा

1:42:52मैं कुछ करूंगी नहीं। सिर्फ आपसे प्यार

1:42:56करूंगी।

1:43:01पतिदेव ने कहा तेरे प्यार को मैं ओढूंगा,

1:43:06खाऊंगा, बिछाऊंगा,

1:43:08प्यार करेगी।

1:43:13अरे प्यार अपनी जगह है, कार्य अपनी जगह

1:43:16है।

1:43:19तुम कुछ नहीं करोगी और प्यार ये सब नहीं

1:43:21चलेगा कल से। देखिए

1:43:28कार्य चाहिए सबको। सबको वर्क चाहिए। कैसे

1:43:33नहीं चाहिए?

1:43:39तो इसीलिए यह मत कहिए कि हमको सिर्फ प्यार

1:43:44चाहिए।

1:43:47सबको कार्य चाहिए। सबको व्यवहार चाहिए।

1:43:53बहन कहती है

1:43:56मेरा ना बड़ा वाला भाई जो है वो अच्छा

1:43:59नहीं है। छोटा वाला बहुत अच्छा है। कैसे?

1:44:02वो जो बड़ा वाला है मैं जागती हूं कुछ

1:44:07नहीं देता।

1:44:10ऐसे कहता रहेगा मैं तुझसे बहुत प्यार करता

1:44:13हूं। ना मुझे कुछ देता है ना बच्चों को

1:44:15कुछ देता है। लेकिन छोटा वाला जो है वो

1:44:19मेरे बच्चों के लिए भी कपड़े देता है।

1:44:22गहने देता है मुझको मेरे लिए बढ़िया

1:44:25बढ़िया कपड़े देता है।

1:44:27छोटा वाला बहुत अच्छा है।

1:44:30अब देखिए

1:44:33उस बहन का प्यार वस्तुओं में छिपा है।

1:44:38यानी बड़ा वाला कहता है मैं प्यार करता

1:44:41हूं वो नहीं चाहिए। लेकिन छोटा वाला भले

1:44:44ही ना बोले प्यार करता हूं और एक्टिंग में

1:44:47कपड़े दे दे, गहने दे दे, छुट्टी कर वो

1:44:49अच्छा है।

1:44:53तो देखिए हमें वस्तु चाहिए, व्यवहार

1:44:57चाहिए। यह बहिरंग चीजें चाहिए।

1:45:01तो भगवान कहते हैं मुझे मन दे दो।

1:45:07संसार वालों को तुम्हारा मन नहीं चाहिए।

1:45:11उनको कार्य चाहिए, उनको व्यवहार चाहिए,

1:45:16उनको वस्तुएं चाहिए। वह जो चाहते हैं उनको

1:45:19दे दो। मुझे तो सिर्फ मन चाहिए। तो मन की

1:45:23आसक्ति यह मन मुझे दे दो। बाकी जगत मिला

1:45:27है तुमको व्यवहार करने के लिए। करो कौन

1:45:30रोकता?

1:45:35तो कहने का तात्पर्य कि जो कर्म योगी होते

1:45:39हैं अर्जुन ने अपने जीवन में क्या किया?

1:45:42कौन सी क्रिया या कौन सा कार्य नहीं किया?

1:45:46वो गृहस्थ हर कार्य कर रहे हैं

1:45:51और बढ़िया से कर रहे हैं। लेकिन उनके मन

1:45:55की आसक्ति

1:45:58सारे नाते अंदर से भीतर से कृष्ण से बना

1:46:02रखे हैं। मन का लगाव शत प्रतिशत कृष्ण में

1:46:07है। और देखिए यदि आप अपने दैनिक जीवन का

1:46:12निरीक्षण करें तो हम लोग मैक्सिमम टाइम

1:46:17एक्टिंग ही करते हैं।

1:46:21जी हां, अभिनय

1:46:23चाहे मित्रों के साथ हो, चाहे ऑफिस में

1:46:27हो,

1:46:30मित्र के साथ आप

1:46:32बोलते कुछ हैं।

1:46:35बीवी के साथ बैठे हैं। सवेरे सवेरे और मान

1:46:40लीजिए दरवाजे पे आपका मित्र दरवाजा

1:46:45खटखटाता है और आपने देखा

1:46:48तो आप क्या कहते हैं इसको भी अभी आना था

1:46:54अभी क्यों आ गया ये

1:46:57लेकिन अब आ तो गया है तो जैसे ही सिटनी

1:46:59आइए आइए श्रीवास्तव जी कम से कम थोड़ा

1:47:03इनफॉर्म तो कर देते

1:47:06देखिए ये एक्टिंग शुरू

1:47:10हम देखिए व्यवहार कर रहे और वो जो

1:47:12श्रीवास्तव जी आए हैं वो भी सोचते हैं ये

1:47:15कितना प्यार करते हैं

1:47:19ये भी एक्टिंग वो भी एक्टिंग तो सब तो

1:47:21एक्टिंग कर रहे हैं हम लोग सबके साथ

1:47:24व्यवहार

1:47:29प्रधानमंत्री कहीं आ जाए

1:47:33जब प्रधानमंत्री आते हैं और जब सारे पुलिस

1:47:38वालों की ड्यूटी लगती है। सिक्योरिटी और

1:47:41जब ऑफिसर्स लोगों की ड्यूटी लगती है, अब

1:47:44ड्यूटी देनी पड़ती है।

1:47:47तो वो ऑफिसर क्या बोलता है। पता नहीं कहां

1:47:51से मुसीबत आ गई।

1:47:53यह दिल्ली वाले आके सही सही वापस चले जाए

1:47:56तो हम प्रसाद चढ़ाएं। बाबा यह प्राइम

1:48:00मिनिस्टर के लिए प्यार है। यह प्यार है।

1:48:05ये बड़े-बड़े होर्डिंग्स लग रहे हैं। ये

1:48:09बड़े-बड़े बैनर्स लग रहे हैं। प्राइम

1:48:11मिनिस्टर जी भी आए। चीफ मिनिस्टर जी भी

1:48:14आए। देखो हमारे लिए होर्डिंग खाक। वो अंदर

1:48:18ही अंदर सब चाहते हैं ये सही सही चले जाए

1:48:21तो हमें छुट्टी मिले।

1:48:25यह सब अभिनय हो रहा है। लेकिन जब वो सामने

1:48:28बुलाते हैं तो जी हुजूरी सब अभिनय चल रहा

1:48:31है। तो यह व्यवहार से तो जगत चल रहा है।

1:48:35सब व्यवहार कर रहे हैं। सब एक्टिंग कर रहे

1:48:38हैं। और मनाई भी नहीं है। करना पड़ेगा।

1:48:42करो। भगवान कहते हैं बस मेरे साथ एक्टिंग

1:48:45मत करो। तो आप यदि दैनिक जीवन का निरीक्षण

1:48:50करें तो मैक्सिमम प्लेसेस आप यह अभिनय

1:48:55करते हैं। यह व्यवहार करते हैं। उसी को

1:48:58कहिए एक्टिंग करते हैं। बस 10 20

1:49:05परसेंट

1:49:07ऐसे स्थान है जहां पर हमारी

1:49:12आसक्ति है। मन का लगाव है। बाकी सब जगह हम

1:49:16अच्छे से अभिनय व्यवहार कर लेते हैं। यह

1:49:1910 20%

1:49:21अपना परिवार या रिश्तेदार आदि।

1:49:26इसमें भी यदि हम जो बाकी जगह कर रहे हैं

1:49:30वही यहां भी करना प्रारंभ कर दें कि भाई

1:49:34हमारी स्त्री को जो चाहिए, बच्चों को जो

1:49:37चाहिए, जिसको जो चाहिए हम दे देते हैं।

1:49:41बाबा कोई बात नहीं। खुश रहो, अच्छे रहो।

1:49:44बढ़िया है। जिसको जो चाहिए बस देते जाओ और

1:49:48मन ही मन

1:49:51प्यार श्याम सुंदर से करो। मन ही मन लगाव

1:49:54उनसे रखो।

1:49:58आप मन से कितना अटैचमेंट किए हैं। हमारे

1:50:02मन की स्थिति तो कोई नहीं जानता ना। कोई

1:50:05अंदर घुस के थोड़ी जानता है और बाहर से आप

1:50:08सब कुछ करो जो आपको प्रारब्ध अनुसार मिला

1:50:11है।

1:50:13मृदु भाषी रहो अच्छा व्यवहार करो। जिसकी

1:50:17जो आवश्यकता है उसको कर दो तो जगत भी खुश

1:50:21और आप अंदर ही अंदर अपने प्रभु से खूब

1:50:25प्यार करो। लगाव बढ़ाते जाओ।

1:50:29क्या दिक्कत है? इसी को कहते हैं कर्म

1:50:33योग। यदि आप इस प्रकार से व्यवहार करना

1:50:37प्रारंभ कर देंगे तो आपकी आधे से ज्यादा

1:50:42परेशानियां समाप्त हो जाएंगी। यह जो

1:50:45अनावश्यक झंझटों में आप पड़ते हैं।

1:50:49ऐसा क्यों? वैसा क्यों? यह क्यों?

1:50:53क्या आवश्यकता है?

1:50:56काम कर दो सबका।

1:51:01जितना हो सके झंझट पालो मत।

1:51:07हम झंझट पालते हैं।

1:51:11तो जो कर्म योगी होता है विकर्मी को मिलता

1:51:15है नरक।

1:51:17कर्मी को मिलता है स्वर्ग। लेकिन कर्म

1:51:21योगी के मन की आसक्ति निरंतर भगवान में

1:51:24होती है। इसलिए कर्म योगी को भगवान की

1:51:29प्राप्ति होती है।

1:51:32जैसे अर्जुन का मैंने उदाहरण बताया।

1:51:40और कर्म सन्यास अर्थात

1:51:43कर्म सन्यासी वह होते हैं जो शरीर से कर्म

1:51:49योगी की तरह यथाशक्ति वर्णाश्रम धर्मों का

1:51:52भी पालन नहीं करते। वह केवल मन से भगवान

1:51:56की भक्ति करते हैं। कर्म सन्यासी को भी

1:52:00भगवत प्राप्ति होती है।

1:52:03लेकिन

1:52:05हमको यह समझना है कि वास्तविक धर्म क्या

1:52:10है? यह तो जिसको भगवान को कर्म सन्यासी

1:52:15बनाना था तो उसको कर्म सन्यासी का उपदेश

1:52:18दे दिया। उद्धव को अर्जुन को कर्म योगी

1:52:21बनाना था तो कर्म योगी का उपदेश दे दिया

1:52:25लेकिन वास्तविक धर्म क्या है

1:52:28तो बताया जाता है सपसा

1:52:32परो धर्मो यतो भक्ति रक्षजे

1:52:39प्रतिहता यत्मा समसति

1:52:46श्रीमद् भागवत में वेदभ्यास जी कह रहे हैं

1:52:51जीव का वास्तविक धर्म है सब पुसा परो धर्म

1:52:59देखो ये जो वर्ण और आश्रम है

1:53:04ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र ये वर्ण

1:53:08ब्रह्मचर्य गृहस्थ वानप्रस्थ सन्यास ये

1:53:12आश्रम

1:53:14तो ये वर्ण और आश्रम ये शरीर संबंधित है।

1:53:20शरीर नश्वर इसीलिए वर्णाश्रम धर्म भी

1:53:25नश्वर। इसीलिए इसका फल भी नश्वर।

1:53:31तो वर्णाश्रम धर्म के पालन से

1:53:37हां हमें हमारा जो वर्ण है जो आश्रम है हम

1:53:40धर्म का पालन कर रहे हैं। ठीक है लेकिन वो

1:53:44शारीरिक धर्म है।

1:53:47हम एक नहीं हम दो हैं। एक शरीर और एक

1:53:52आत्मा।

1:53:53तो वर्णाश्रम धर्म शरीर का धर्म है। आत्मा

1:53:58का धर्म नहीं।

1:54:01आत्मा का धर्म

1:54:06आत्मा क्या ब्राह्मण है? क्या क्षत्रिय

1:54:09है? ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य सबकी आत्मा

1:54:13एक।

1:54:15तो आत्मा का धर्म क्या है? आत्मा का धर्म

1:54:20या आत्मा जिसका अंश है परमात्मा।

1:54:26तो इसीलिए आत्मा का धर्म परमात्मा को पाना

1:54:30है। वही हमारा वास्तविक धर्म है। इसलिए

1:54:35वेदव्यास जी कह रहे हैं

1:54:38अपर धर्म है शारीरिक धर्म

1:54:42और पर धर्म यानी भगवान का धर्म आध्यात्मिक

1:54:46धर्म वो है आत्मा का धर्म। तो सव पुसा परो

1:54:52धर्म आत्मा के धर्म का पालन करना ही

1:54:57वास्तविक धर्म है। उसका पालन करो।

1:55:02हमें वो धर्म अपनाना है जिसके पालन करने

1:55:06से हमें भगवत प्राप्ति हो। सीधी सीधी बात

1:55:12तो आप कहेंगे मनुस्मृति में बताया गया

1:55:16ऋणान्य प्राकृत मनोमोक्ष निवेशत

1:55:21ये जो ऋण है

1:55:25ऋषि ऋण पित्री ऋण देव ऋण आदि तो यह तो

1:55:30मनुस्मृति में कहा गया है कि जो इन ऋणों

1:55:34से उत्तीर्ण नहीं होगा उसको मोक्ष नहीं

1:55:37मिलेगा

1:55:39तो जैसे पित्री ऋण यदि हम पितृ ऋण से उण

1:55:45नहीं होते तो पितृ ऋण से उण कैसे होंगे

1:55:48भाई पितृ ऋण का

1:55:51उण होने के लिए बच्चा पैदा करो तो बच्चा

1:55:54पैदा करने के लिए ब्याह करना आवश्यक है तो

1:55:59अजी जो ब्रह्मचर्य में है

1:56:04तो वो तो बच्चा पैदा नहीं कर पाएगा तो

1:56:06क्या उसका मोक्ष नहीं होगा

1:56:11और इसके लिए तो फिर उसको गृहस्थ में जाना

1:56:14पड़ेगा। यदि पित्री ऋण से उण होना है। यह

1:56:17मनुस्मृति कह रही है। तो वेदाभ्यास जी ने

1:56:21कहा

1:56:22और श्री कृष्ण भी कह रहे हैं भगवान कह रहे

1:56:25हैं

1:56:30देव्ष भूता निणाम

1:56:34पितणा

1:56:37न कि करोना मणी चराजन

1:56:43सर्वात्मनाय

1:56:45शरणम शरण्यम

1:56:48गतो

1:56:49मुकुंदम

1:56:51परिम

1:56:55चातुर वर्णम

1:56:58मया सृष्टम

1:57:01भगवान कह रहे हैं चातुर वर्ण्यम मया

1:57:06सृष्टम

1:57:09गुण कर्म

1:57:12विभाग से देखो ये जो

1:57:16चार प्रकार के वर्ण हैं।

1:57:21यह मैंने ही बनाए हैं। भगवान कह रहे हैं

1:57:27ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, चातुर,

1:57:30वर्णम मया सष्टम ये मैंने बनाए।

1:57:36और क्यों बनाए हैं? यह भी मैं बता देता

1:57:38हूं।

1:57:41भगवान कह रहे हैं मैंने यह इसीलिए बनाए।

1:57:45यह उनके लिए बनाए हैं जो विकर्मी है।

1:57:50वो लोग जो ना तो भक्ति करते हैं ना

1:57:55वर्णाश्रम धर्मों का पालन करते हैं उंखल

1:57:59है आवारा है तो मैंने जान के यह बनाया कम

1:58:04से कम वो

1:58:07ये वर्णाश्रम धर्मों का पालन करेंगे तो

1:58:10बंधे रहेंगे लगे रहेंगे

1:58:14और यह करते करते

1:58:17धीरे धीरेधीरे जब उनका अभ्यास हो जाएगा तब

1:58:20फिर वो शारीरिक धर्म से अपने आप को आत्मा

1:58:25के धर्म में बदलेंगे कभी तो बदलेंगे

1:58:32कि बहुत शारीरिक धर्म का पालन कर लिया अब

1:58:35आत्मा के धर्म के लिए हमें आगे बढ़ना है

1:58:39लेकिन यदि मैंने यह ना बनाया होता

1:58:42वर्णाश्रम धर्म तब तो वह आवारा ही हो गए

1:58:47इसीलिए

1:58:49जीवों को चलाने के लिए

1:58:52यह वर्ण और आश्रम शारीरिक धर्म बनाए गए।

1:58:57परंतु वेदव्यास जी कहते हैं

1:59:03जो ऐसा जीव है

1:59:07जो ईश्वर की शरणागति करता है

1:59:12जो मन बुद्धि से समर्पित होकर भगवान कहते

1:59:16हैं मेरी भक्ति करता है

1:59:24यह तक्ता

1:59:26लोक धर्मा

1:59:29मद तेन

1:59:34व्यभ

1:59:36श्री कृष्ण कह रहे हैं कि

1:59:39ऐसा जीव

1:59:42जिसने

1:59:45धर्म वर्णाश्रम धर्मों को त्याग दिया लोक

1:59:49धर्मों को भी त्याग दिया जो वेदों में

1:59:52बताया गया है लेकिन यदि वो मेरी भक्ति

1:59:55करता है

1:59:58तो फिर वर्णाश्रम धर्मों को छोड़ना अपराध

2:00:02नहीं।

2:00:04ध्यान दीजिए यदि कोई भगवान की भक्ति करता

2:00:07है और यदि वह वर्णाश्रम धर्म छोड़ देता

2:00:12है। भगवान कह रहे हैं वह अपराध नहीं बल्कि

2:00:15मैं

2:00:18मैं उसको पालता हूं। मैं उसका पोषण करता

2:00:22हूं। वो मुझ जैसा बन जाता है। यहां तक कह

2:00:26रहे हैं भगवान यदि कोई मेरी भक्ति करता है

2:00:32तो यदि हम भक्ति करते हैं और भक्ति करने

2:00:35के साथसाथ वर्णाश्रम धर्म का पालन कर रहे

2:00:39ठीक है। लेकिन भक्ति कर रहे हैं और

2:00:42वर्णाश्रम धर्म नहीं हो पा रहे तो अपराध

2:00:45नहीं। यह भागवत कह रहे हैं। यह भगवान

2:00:49स्वयं कह रहे हैं।

2:00:52तो असली धर्म है आत्मा का धर्म,

2:00:57आध्यात्मिक धर्म। उस धर्म का पालन मृत्यु

2:01:02से पहले होना चाहिए। यानी हमको भगवान की

2:01:07भक्ति करनी है। भक्ति से भगवान मिलते हैं।

2:01:11कर्म योग में भी वही बताया गया कि मन का

2:01:16योग मन से भक्ति निरंतर भगवान की हो। तो

2:01:21कर्म योगी को भी भगवत प्राप्ति और भक्ति

2:01:25से तो प्राप्ति होती ही है। तो यह था

2:01:29आज कर्म का विषय। केवल कर्मी को स्वर्ग,

2:01:34विकर्मी को नरक, कर्म योगी को भगवान की

2:01:39प्राप्ति, कर्म सन्यासी को भी भगवान की

2:01:43प्राप्ति। लेकिन वास्तविक धर्म जो वंदनीय

2:01:47है, जिसे अपनाना है वह धर्म है आत्मा का

2:01:52धर्म।

2:01:53आत्मा का धर्म अपनाने पर हमें भगवत

2:01:58प्राप्ति होगी और लक्ष्य की प्राप्ति

2:02:02होगी। तो कल आगे के मार्गों पर विचार किया

2:02:06जाएगा। बोलिए वृंदावन बिहारी लाल की

2:02:11श्रीमद् सतगुरु सरकार की

2:02:15जय।

2:02:16थोड़ा बैठे रहिए। कुछ अनाउंसमेंट करना है।

2:02:28देखिए कुछ लोग बार-बार पूछ रहे हैं

2:02:34कि हम देवी जी के साथ कांटेक्ट में रहना

2:02:40चाहते हैं और

2:02:43देवी जी से जुड़ने के लिए हमें क्या-क्या

2:02:45करना होगा।

2:02:48आपको कुछ नहीं करना है। मुझे अपना मानना

2:02:51है बस

2:02:53और कोई बड़ी बात नहीं है। मैं एक ही चीज

2:02:57कराना जानती हूं। वो है

2:03:01हम सबको मिलकर आत्मा के धर्म का पालन करना

2:03:05है। यानी भगवत प्राप्ति करनी है। तो भगवत

2:03:09प्राप्ति कैसे होगी? वो हम सबको साथ मिलकर

2:03:13भक्ति मार्ग में चलना है। वही मैं सबको

2:03:16सिखाती हूं। जो गुरुदेव ने कृपा करके

2:03:21मुझे

2:03:22शिक्षण दिया है। वही शिक्षा वही सेवा मैं

2:03:26आप लोगों की कर रही हूं। लेकिन फिर भी आप

2:03:29लोग

2:03:31मेरे साथ कांटेक्ट में रहना चाहते होंगे।

2:03:36और देखिए

2:03:39सवेरे जो मैं भगवन नाम संकीर्तन कराती हूं

2:03:42साधना पद्धति

2:03:45तो यही साधना कैंप्स मैं समयसमय पर लगाती

2:03:49हूं जितने

2:03:51मेरे डिवोटीज हैं ऑल ओवर इंडिया एवं

2:03:54अब्रॉड में जहां जहां मेरा प्रवचन होता है

2:03:58और जितने लोग मुझसे जुड़ते हैं

2:04:02वे सब जिस स्थान में होते हैं वहां पर भी

2:04:07सत्संग करते हैं और वो सत्संग केंद्र बनता

2:04:13है और उसके साथ-साथ समय-समय पर मैं जो

2:04:19कैंप्स कराती हूं मेडिटेशन कैंप्स रूप

2:04:22ध्यान शिविर उसमें भी वही सब जगह से

2:04:28सत्संगी आते हैं और वह साधना शिविर को

2:04:31अटेंड करते हैं।

2:04:33अभी इस

2:04:35प्रकार से करीब

2:04:39हमारे

2:04:41150 से भी अधिक सत्संग केंद्र हैं जो चल

2:04:47रहे हैं प्रति रविवार वे लोग एक स्थान में

2:04:51एकत्रित होकर सत्संग करते हैं।

2:04:56ऐसे ही

2:04:59जांजगीर में भी

2:05:02ऐसा नहीं है कि इस बार मैं प्रवचन देने आ

2:05:05गई तो फिर और नहीं आऊंगी।

2:05:08प्रवचन देने तो दोबारा हो सकता है लंबा

2:05:11गैप हो जाए। दो-तीन साल के बाद आऊं लेकिन

2:05:16जो लोग मुझसे जुड़ना चाहते हैं जो मेरे

2:05:19बनेंगे उनके लिए तो मैं कई बार आ जाऊंगी।

2:05:22जांच के

2:05:25मेरा बार-बार आना होगा

2:05:28और मैं उनको बार-बार आकर सत्संग दूंगी।

2:05:33इसीलिए

2:05:37जांजगीर में अभी जो

2:05:41सवेरे सत्संग का कार्यक्रम हो रहा है। यह

2:05:45लगातार चलेगा। आठ तारीख प्रवचन का अंतिम

2:05:49दिन है और

2:05:529 10 11 ये तीन दिन स्पेशल सत्संग होगा

2:06:00या फिर 10 11

2:06:04रविवार को और शनिवार को स्पेशल सत्संग

2:06:08दिया जाएगा जो लोग मुझसे जुड़ेंगे यह

2:06:12सत्संग उनके लिए होगा

2:06:17और फिर यहां एक केंद्र बन जाएगा सत्संग

2:06:20केंद्र और उसको गाइड करने के लिए मैं एक

2:06:25महीने के बाद फिर आऊंगी। मैं अभी

2:06:30यहां के जाजगीर प्रवचन के बाद यूके जा रही

2:06:34हूं। वहां मेरा प्रवचन है और यूके से लौट

2:06:37के मैं फिर आप लोगों के पास आऊंगी। जो

2:06:40मेरे सत्संग केंद्र में जुड़ेंगे यहां पर

2:06:43उनको सत्संग देने के लिए उनको गाइड करने

2:06:46के लिए।

2:06:48तो जो जो लोग जुड़ना चाहते हैं

2:06:52वे लोग कृपया

2:06:54बस उनकी जानकारी के लिए आप लोगों का

2:06:58एड्रेस आप लोगों का फोन नंबर

2:07:01हमारे पास होगा हेड ऑफिस में रहेगा तो

2:07:05समय-समय पर हम आपको जानकारी भी दे पाएंगे

2:07:08और हमारे पास रिकॉर्ड होना चाहिए। इसीलिए

2:07:11एक सदस्य

2:07:15सदस्यता फॉर्म मेंबरशिप फॉर्म आपको भरना

2:07:18है। तो उस फॉर्म में ज्यादा कुछ बातें

2:07:21नहीं कुछ चीजें पूछी गई हैं। बस उसको भरकर

2:07:26आपको रजिस्ट्रेशन काउंटर यहां पर है। वहां

2:07:31पर जमा कर देना है। चार दिन आप लोगों के

2:07:33पास है और यह फॉर्म आपको सुबह शाम स्टॉल

2:07:37में मिलेगा। तो आप लोग स्टॉल से ले लेंगे

2:07:40इस फॉर्म को और जमा करके इसे अंतिम दिन से

2:07:46पहले पहले दे दीजिए ताकि उसके बाद आप

2:07:50लोगों को कार्ड मिल जाएगा जो लोग स्पेशल

2:07:54सत्संग में आएंगे

2:07:56तो आप लोग इस फॉर्म को ले सकते हैं।

2:08:02ऑफलाइन क्विज विनर्स

2:08:06युवनेश्वर प्रसाद तिवारी, मनोज अग्रवाल,

2:08:11प्रियंबदा पांडे, परमानंद साहू, आर्या

2:08:17यादव।

2:08:19ऑनलाइन क्विज विनर्स देवेश मिश्रा मुंबई,

2:08:23साहिबा गुर्जर, जोधपुर, अर्चना सिंह

2:08:27कोलकाता, प्रवीण पुणे, स्नेहलता उदयपुर

2:08:33संचित बेंगलुरु अरनव जगदलपुर

2:08:44आज मुझे क्षमा करेंगे आज मैं कीर्तन नहीं

2:08:49करूंगी

2:08:52इसलिए आप लोग अब खड़े हो जाइए आरती कर

2:08:55लीजिए

2:09:11आरती प्रीतम प्यारी की बनवारी

2:09:17नखवारी

2:09:18की आरती प्रीतम प्यारी की बनवारी

2:09:26नखवारी

2:09:29सिर मन तुम मुकुट धर के दो शत कुंडल भर हर

2:09:36के दो प्रेम सहा के रसीले में रसीले में

2:09:45रसीले से तल में नन मन हारी

2:09:52जीवन वाली

2:09:59परवारी

2:10:01दुनिस

2:10:03छवि न्यारी दुरी भवन कर अति प्यारी रस मुख

2:10:12हसन मुस्कान

2:10:14सलग दम धोनी बेसन छवि न्यारी कीवारी

2:10:22नवा

2:10:24की ये लीला पर

2:10:29ये दूर लीला पर लारे

2:10:34उर

2:10:37सारे कनन कनक की जनक पुरन वन धुन रन झुन

2:10:46धुन प्यारी की जीवन

2:10:51नवारी

2:10:53की एक सिर मोर मुकुट राजे

2:10:58एक सिर चुनर श

2:11:03सिर तिरछे मन राजे संग ब्रज बाल लाडली लाल

2:11:11बाल लाल कृपालु धुन दग जाई की ये बनवारी

2:11:20आप लोग इसी स्थान में उपस्थित होंगे बोलिए

2:11:24वृंदा वृंदावन बिहारी लाल की जय श्रीमत

2:11:29सतगुरु सरकार की जय जय जय श्री राधे

2:11:36जय जय श्री राधे

2:11:41जय जय श्री राधे

2:11:56की जय।

2:12:13राधेधे

2:12:16सदस्यता फॉर्म

2:12:20रजिस्ट्रेशन काउंटर में अवेलेबल है। सब

2:12:24लोग सदस्यता फॉर्म अवश्य ले जाएं। कल

2:12:28प्रातः 7:30 से 9 बजे तक

2:12:33स्पेशल मेडिटेशन सेशन देवी जी के सानिध्य

2:12:37में

2:12:38किया जाएगा। उसमें सभी लोग अवश्य उपस्थित

2:12:42होंगे।

2:12:46ब्रज गोपिका सेवा मिशन द्वारा प्रकाशित

2:12:50पुस्तकें पुस्तक स्टॉल में अवेलेबल है।

2:12:53कीर्तन पुस्तिका प्रेम रस माधुरी

2:12:57पुस्तक स्टॉल में अवेलेबल है। आप लोग

2:13:01अवश्य ले जाएं।

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