Full transcript
0:00राधे राधे राधे राधे राधे
0:03राधे राधे राधे राधे राधे राधे
0:08राधे राधे राधे राधे राधे राधे
0:12राधे राधे राधे राधे राधे राधे
0:17राधे राधे राधे राधे राधे राधे
0:38श्रीमद् पद वाक्य प्रमाण
0:42पाराणम
0:47वेद मार्ग प्रतिष्ठापनाचार
0:56निखिल दर्शन समन्वयचार्य
1:04सनातन वैदिक धर्म प्रतिष्ठावन
1:11सत संप्रदाय
1:15परमाचार्य
1:19भक्ति योग रसा
1:26भगवंत
1:27श्री विभूषित
1:31जगत गुरु एकज
1:36स्वामी श्री कृपालु जी महाराज
2:05हे सनातन धर्म की ध्वजा बाईिका हम सभी
2:10श्रद्धालु आपको शरणागत भाव से कोटि-कोटि
2:15नमन करते हैं, वंदन करते हैं। आज पूजनीय
2:20देवी जी के स्वागत हेतु मैं आमंत्रित करती
2:22हूं श्री श्रीकांत दुबे जी असिस्टेंट
2:26कमिश्नर रायगढ़ श्रीमती अर्चना दुबे
2:32श्री कृष्णकांत दुबे एंड आकृति दुबे जी
2:36मंच पर पधारे और देवी जी के स्वागत करें।
2:43श्री संदीप ठाकुर जॉइंट कलेक्टर जांजगीर
2:47चांपा श्रीमती भावना ठाकुर
2:59डॉक्टर यारार्क एडिशनल एसपी जांजगीर चांपा
3:04डॉक्टर मनीषा यारार्क मंच पर आए और देवी
3:08जी के स्वागत करें
3:30डॉक्टर जीपी दुबे रिटायर्ड आयुर्वेदिक
3:33जिला चिकित्सालय अधिकारी
3:37डॉक्टर दीपक अग्रवाल
3:40श्री प्रमोद सिंघानिया श्रीमती दीपा
3:43सिंघानिया
3:45मंच पर आए और देवी जी का स्वागत करें।
3:58हम्म
4:30हम्म
4:52अभी मैं देवी जी को विनम्र प्रार्थना करती
4:55हूं कि अपनी उपनिषद वाणी का प्रारंभ करके
5:00हम सब लोग को कृतार्थ करें। राधे राधे
5:29्म
6:14कस्तूरी
6:17तिलकम
6:20ललाट
6:23पटलेले
6:26वक्षस्थले
6:30कौस्तुभम
6:35नासाग्रे
6:38वर मुक्तिकम
6:41करतले
6:46वेणु
6:48करे
6:50कणम
6:54सर्वांगे
6:58हरि चंदनम सुललितम
7:03कठे
7:06चमुली
7:13गोपस्त्री
7:15परिवष्टितो
7:19विजयते
7:23गोपाल
7:26चूड़ामणि
7:32गुरुरा
7:36धनाष्ट
7:41गुरु परम दवतम
7:48गुरु
7:50परतरम
7:53नास्त
7:57कृपालु
8:00गुरुवे
8:03नमः
8:13जिज्ञासु जीवात्माओं
8:15दैनिक नियमानुसार पहले हरि नाम संकीर्तन
8:19कर लीजिए पश्चात आप सब की सेवा की जाएगी
9:31आजा आजा राधे आके
9:35ना जा मेरी राधे
9:39आजा आजा राधे आके ना जा मेरी राधे
9:46आजा आजा आजा राधे आके ना जा मेरी राधे
9:53आजा आजा राधे आके ना जा मेरी राधे
10:01आजा राधे आके ना जा मेरी राधे
10:07आजा आजा राधे आके ना जा मेरी राधे
10:14आजा आजा राधे राधे आके ना जा मेरी राधे
10:22आजा आजा राधे आके ना जा मेरी राधे
10:28अरे आजा आजा
10:30राधे
10:32अरे आजा आजा
10:34राधे
10:35अरे आजा आजा
10:37राधे
10:39आजा आजा राधे आके ना जा मेरी राधे
10:46आजा आजा राधे आके ना आजा मेरी राधे
10:53आजा राधे आके ना जा मेरी राधे
11:00आजा आजा राधे आके ना जा मेरी राधे
11:08सुख को भुलाया ऐसी कैसी मां तू राधे
11:14सुख को भुलाया ऐसी कैसी मां तू राधे
11:22सुत को भुलाया
11:25ऐसी कैसी मातु राधे
11:29सुत को भुलाया ऐसी कैसी मात राधे
11:36देखा कैसे जाए तो सो सुख दुख राधे
11:43देखा कैसे जाए तो सो सुख दुख राधे
11:50देखा कैसे जाए तो सो सुत दुख राधे
11:58देखा कैसे जाए तो सो सुत दुख राधे
12:04अरे आजा आजा
12:06राधे
12:08आजा आजा
12:10राधे
12:12आजा आजा राधे राधे आके ना जा मेरी राधे
12:19आजा आजा राधे आके ना आजा मेरी राधे
12:26आजा आजा राधे आके ना जा मेरी राधे
12:33आजा आजा राधे आके ना जा मेरी राधे
12:41आजा आजा राधे आके के ना जा मेरी राधे
12:48आजा आजा राधे आके ना जा मेरी राधे
12:55आजा आजा राधे आके ना जा मेरी राधे
13:02आजा आजा राधे आके ना जा मेरी राधे
13:09रोता रहूं तब दर्शन
13:14हित राधे
13:16रोता रहूं तब दर्शन हित राधे
13:23रोता रहूं तब दर्शन
13:28हित राधे
13:30रोता रहूं तब दर्शन हित राधे
13:38आजा आजा
13:39राधे
13:41आजा आजा आजा राधे
13:45आजा आजा राधे आके ना जा मेरी राधे
13:52आजा आजा राधे आके ना जा मेरी राधे
13:59आजा आजा राधे आके ना जा मेरी राधे
14:06आजा आजा राधे आके ना जा मेरी राधे राधे
14:13है प्रतीति एक दिन आएगी तू राधे
14:20प्रतीति एक दिन आएगी तू राधे
14:27है प्रतीति एक दिन आएगी तू राधे
14:34है प्रतीति एक दिन आएगी तू राधे
14:41तेरी कृपा में ना कमी मेरी कमी राधे
14:48तेरी कृपा में ना कमी मेरी कमी राधे
14:55तेरी कृपा में ना कमी मेरी कमी राधे
15:02तेरी कृपा में ना कमी मेरी कमी राधे
15:09आजा आजा
15:11राधे
15:12आजा आजा
15:14राधे
15:15अरे आजा आजा
15:18राधे
15:20आजा आजा राधे आके ना जा मेरी राधे
15:26आजा आजा राधे आके ना जा मेरी राधे
15:33आजा आजा राधे आके ना जा मेरी राधे राधे
15:39आजा आजा राधे आके आजा मेरी राधे
15:46आजा आजा राधे आके ना जा मेरी राधे
15:52आजा आजा राधे आके ना जा मेरी राधे
15:59आजा आजा राधे आके ना जा मेरी राधे
16:05आजा आजा राधे आगे ना जा मेरी राधे
16:12आजा आजा
16:13राधे
16:15आजा आजा
16:17राधे
16:18आजा आजा राधे आके ना जा मेरी राधे
16:24ओ आजा आजा राधे आके ना आजा मेरी राधे
16:31आजा आजा राधे आके ना आजा मेरी राधे
16:37आजा आजा राधे आके आजा मेरी राधे
16:44आजा आजा राधे आके ना आजा मेरी राधे
16:50आजा आजा राधे आके ना आजा मेरी राधे
16:56ओ राधे गोविंद
17:00गोविंद राधे
17:02राधे गोविंद
17:06गोविंद गोविंद राधे
17:09राधे गोविंद
17:12गोविंद राधे
17:15राधे गोविंद
17:18गोविंद राधे
17:21राधे गोविंद
17:24गोविंद राधे
17:27राधे गोविंद
17:30गोविंद राधे
17:33राधे गोविंद
17:36गोविंद राधे
17:39राधे गोविंद
17:42गोविंद राधे
17:44भजो राधे गोविंद
17:48गोविंद राधे
17:50भजो राधे
17:52गोविंद
17:54गोविंद राधे
17:56ओ राधे गोविंद गोविंद राधे राधे गोविंद
18:01गोविंद राधे राधे गोविंद गोविंद राधे राधे
18:05राधे गोविंद गोविंद राधे राधे गोविंद
18:09गोविंद राधे राधे गोविंद गोविंद राधे राधे
18:13गोविंद गोविंद राधे राधे गोविंद गोविंद
18:17राधे राधे गोविंद गोविंद राधे
18:21राधे गोविंद गोविंद राधे
18:26राधे गोविंद गोविंद राधे
18:32राधे गोविंद
18:35गोविंद राधे
18:38राधे गोविंद गोविंद राधे
18:45बोलिए वृंदावन बिहारी लाल की
18:49जय
18:50श्रीमत सतगुरु सरकार की
18:53जय
18:59ओम
19:20इसमें
19:50इसमें थोड़ा सा
20:05अब आप सब लोग
20:09एकाग्रचित होकर बैठे
20:15उत्तरा
20:21निबोधत
20:24कठोपनिषद
20:26एक तीन चौथा
20:31उपनिषद के इस मंत्र की व्याख्या करते हुए
20:37आप लोगों को यह बताया गया
20:41कि यह मंत्र संकेत करता है
20:46मनुष्यों की ओर।
20:51क्योंकि 84 लाख प्रकार के देहधारी जीवों
20:55में
20:56एकमात्र मनुष्य ही ऐसा सौभाग्यशाली
21:00जीव है
21:03जो ज्ञान प्रधान है
21:07पुरुषार्थ करने का अधिकार रखता है और इसी
21:10पुरुषार्थ से श्रेष्ठ कर्म संपादित करते
21:14हुए भगवत प्राप्ति तक कर सकता है। इतनी
21:19शक्ति है इस मनुष्य में कि यह भगवान को भी
21:23अपने वश में कर सकता है।
21:27इसीलिए कठोपनिषद का यह मंत्र कहता है
21:31उत्तष्
21:35जागृत
21:37प्राप्त वरान निबोधत
21:42यदि तुम मनुष्य शरीर पाके
21:47उसको जान सकते हो
21:53उससे मतलब भगवान को
21:56तो फिर जागो
21:59मोह की निद्रा से जागो उठो क्योंकि पशु
22:04पक्षी नहीं जागेंगे वो भोग योनि है उनके
22:08पास समझ नहीं
22:11उनके पास विवेक नहीं ज्ञान नहीं उनके पास
22:15उतना ही ज्ञान है जिससे वह अपना जीवन
22:18निर्वाह कर सके
22:23इसीलिए उत
22:28जागृत
22:29जागो कब जागोगे
22:32और इसके पश्चात उपनिषद का मंत्र कहता है
22:39भगवत प्राप्ति तुम अपने आप से नहीं कर
22:42पाओगे क्योंकि भगवान किसी साधन से नहीं
22:46मिलते और भगवान
22:49इंद्रिय मन बुद्धि जो हमें प्राप्त है
22:53उससे परे वाला तत्व
22:56हमारे पास जो इंद्रियां है, जो मन है, जो
23:00बुद्धि है, वह सीमित है।
23:04सीमित पैमाना असीम को नाप नहीं सकता।
23:08सीमित पैमाने से असीम को पा नहीं सकते।
23:14इसीलिए भगवान किसी साधन से नहीं मिलते।
23:18भगवान तो उनकी कृपा से मिलते हैं।
23:24परंतु इस कृपा को पाने के लिए
23:29हमें कुछ करना है।
23:34तो पहला काम उठना है। दूसरा मोह की निद्रा
23:39से जागकर निरंतर चलना है। और उस ओर बढ़ना
23:44है। किस ओर?
23:47प्राप्त वर बोध
23:50जिसके लिए यह मनुष्य शरीर मिला है। इसलिए
23:54कटोपनिषद कह रहा है जाओ
23:59किसी तत्वदर्शी की शरण में जाओ।
24:05तत्वदर्शी का मतलब होता है
24:09जिसने उस तत्व को जान लिया।
24:15संत
24:17महापुरुष
24:23केवल
24:26भगवत प्राप्त संत ही आपको भगवत प्राप्ति
24:31करा सकता है।
24:34पहला पॉइंट केवल भगवत प्राप्त संत ही
24:39हमारी
24:42जो यह मोह की निद्रा है
24:46इसको भंग कर सकता है। हमारी संसार की ममता
24:51आसक्ति छुड़ा सकता है।
24:55इसीलिए शास्त्र कहते हैं
25:01कि यदि कभी हरि की अनुकंपा हुई और तुम्हें
25:05तुम्हारे जीवन में विशुद्ध संत मिल जाए।
25:13अब मोहि भा भरोस
25:18हनुमंता
25:21बिनु हरि कृपा मिलह नहीं संता
25:27संत विशुद्ध
25:29मिलह पुनि तेह
25:32राम कृपा कर चितवह जेह
25:41तुलसीदास जी कह रहे हैं
25:45हरि अनुकंपा से किसी सौभाग्यशाली
25:49जीव को मनुष्य को विशुद्ध संत मिलते हैं।
25:54यहां विशुद्ध का मतलब है जिसको शास्त्रों
25:58का सम्यक ज्ञान हो और उस संपूर्ण ज्ञान के
26:02सार को जीव के
26:07भीतर धारण करवा दे।
26:11तत्व बोध करा दे। यह शक्ति रखता हो। यह
26:15ताकत रखता हो। प्लस
26:21जिसने भगवत प्राप्ति की हो
26:25ब्रह्मवेत्ता
26:27जिसने ब्रह्म का अनुभव भगवान के दर्शन किए
26:30हो तो शास्त्रों का ज्ञान हो प्लस भगवान
26:34का दर्शन किया हो यह दोनों बातें जिसमें
26:38होंगी वही आपको
26:42भगवत प्राप्ति करा सकता है। संसार की
26:46आसक्ति छुड़ा सकता है।
26:49ऐसे संत से ही जीव का कल्याण होगा।
26:54उसकी माया निवत्ति की बात बनेगी। भगवत
26:57प्राप्ति की बात बनेगी।
27:00भगवान कहते हैं मैंने संत को इसीलिए इस
27:05जगत में भेजा है। वह मेरा अपना जन है।
27:11क्योंकि मैं किसी को डायरेक्ट मिलता नहीं।
27:16मैं केयर ऑफ मिलता हूं। इसीलिए
27:20चैनल है संत।
27:23मैंने उसे सब शक्ति दे दी है।
27:28वो साधना बतलाएगा।
27:31तुम्हारे साथ रहेगा।
27:34प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में तुम्हारी
27:38साधना को देखता रहेगा। तुम जितनी जितनी
27:42मात्रा में आगे बढ़ते जाओगे वो अंतःकरण
27:46शुद्धि पर तद अनुसार कृपा करता जाएगा।
27:50कुसस्कार जीवन में आएंगे। उससे युद्ध
27:54करेगा।
27:56पतन होने से बचाएगा। हमारी रक्षा करेगा।
28:03और
28:05अंतःकरण शुद्धि पर जब पूर्ण रूप अंतःकरण
28:10शुद्ध हो जाएगा पात्र तैयार हो गया तो वह
28:14गुरु ही प्रेम भी दान करेगा यानी भगवत
28:19प्रेम देगा और भगवान की गोद में बिठा देगा
28:23यानी हरि से मिलन करा देगा
28:30भगवान ने इसी इसीलिए संत को भेजा है ताकि
28:34वह जीव की उंगली पकड़ के जीवों को भगवान
28:38की ओर चलाए।
28:41यही काम है संत का।
28:44इसीलिए श्रीमद् भागवत कहती है आचार्य माम
28:49विजानिया नाव मन्यत करित
28:54आचार्य को
28:59मेरे बराबर भी मत मानो
29:03वो तुम्हारा सद्गुरु
29:08वो मैं ही खड़ा हूं
29:12आचार्य रूप में सामने मुझ में और आचार्य
29:17में कोई भेद नहीं।
29:20आचार्यम माम
29:23वो आचार्य मैं ही हूं।
29:27इस भाव से अपने सद्गुरु की आराधना करो।
29:31अपनी आत्मा से भी अधिक उन्हें मानो।
29:37यहां तक कह दिया
29:39सदगुरु के लिए।
29:43अब प्रश्न यह उठता है
29:47हम कैसे जाने
29:53यदि कोई हमारे जीवन में ऐसा अवसर आता है
30:00और हमें कोई संत भी मिल जाते हैं
30:07बताए मार्ग पर भी चलते हैं।
30:12लेकिन अब हम तो अल्पज्ञ हैं।
30:17और हम कैसे जाने कि यह सामने वाला
30:21व्यक्तित्व जो है यह वास्तव में संत है।
30:29हो सकता है संत के भेश में कोई पाखंडी हो।
30:36और हम धोखे में पड़ जाए और अपना पूरा जीवन
30:41व्यर्थ में गवा दे। अरे यह तो आत्मा की
30:46बात है ना।
30:48तो यहां तो बहुत बड़ी सावधानी चाहिए।
30:52सही वैद्य हो तो इलाज हो।
31:00जीवन में यह जरूर याद रखना।
31:05कि वैद्य सही होना चाहिए। और दूसरी बात
31:11यदि वैद्य सही है और उसे हमने गुरु रूप
31:15में वरण कर लिया
31:20तो फिर वैद्य जो कहता है
31:25उसका पालन भी होना चाहिए। एक एक शब्द पर
31:28ध्यान दीजिए।
31:32केवल गुरु बना लेने से कुछ नहीं होने
31:35वाला।
31:37यदि हम
31:39गुरु बना लिए हैं लेकिन वो जो कहते हैं वह
31:43करते नहीं तो उससे क्या लाभ?
31:48रावण ने भी गुरु बनाया था।
31:51और किसको बनाया था?
31:54त्रिभुवन में शंभू जैसे कोई गुरु नहीं।
32:00भगवान शंकर को गुरु बनाया।
32:05लेकिन
32:08रावण ने कभी भगवान शंकर की आज्ञा का पालन
32:12नहीं किया।
32:15शंकर जो कहते थे वह रावण करते ही नहीं थे।
32:19कभी कभी हम लोग अपने जीवन में कुछ ऐसे ही
32:22करते हैं।
32:26हम लोग
32:29उसने बनाया है, इसने बनाया है। अरे वह
32:32बड़े नाम वाले हैं। उनका बड़ा नाम है। चलो
32:36हम भी बना लेते हैं गुरु।
32:40तो कभी कभी हम प्रदर्शन के लिए नाम वालों
32:46को गुरु बना लेते हैं।
32:52कहीं ऐसा तो नहीं कि रावण के समान हमने भी
32:56गुरु तो बनाया लेकिन वो गुरु केवल शोभा बन
33:00गया।
33:02किया कुछ नहीं। गुरु जो कह रहे हैं वो कुछ
33:06नहीं किया। बस शोभा है कि वह हमारे गुरु
33:09हैं।
33:13इसलिए
33:16भगवान शंकर तो थे रावण के गुरु लेकिन रावण
33:20क्या कहते थे पता है भगवान शंकर को?
33:25मेरी इच्छा तो होती है कि मैं रोज आपकी
33:28पूजा करूं।
33:31लेकिन क्या बताऊं आप तो जानते ही हैं कि
33:34मैं इतना
33:36राज कार्य में व्यस्त रहता हूं। समय ही
33:39नहीं है और आपको तो दिन रात फुर्सत है।
33:44तो आप ही क्यों नहीं आ जाते मेरे पास अपनी
33:47पूजा कराने?
33:51यह रावण बोल रहे हैं।
33:56ऐसे ही कुछ क्या हमने भी गुरु बनाए हैं
34:03कि बस बना लिया गुरु जी अपने घर बढ़िया हम
34:07अपने घर बढ़िया।
34:09शोभा बनी हुई है। ऐसे गुरु बनाने से कुछ
34:13नहीं होने वाला।
34:17आध्यात्मिक जगत की बात नहीं बनेगी। इस
34:21धोखे में मत रहिए।
34:27बड़ा गहरा विज्ञान है।
34:31गुरु संबंधित
34:34उसे
34:36गहराई से समझना होगा।
34:40भगवान कहते हैं
34:44मैं
34:46भगवत प्राप्त
34:48जीव जो संत है
34:51उसे अपनी सारी शक्तियां दे देता हूं।
34:58केवल जगत व्यापार वर्ज सृष्टि करने का
35:01अधिकार नहीं देता। बाकी सारी शक्तियां दे
35:05देता हूं। और तो और भगवान कहते हैं मेरी
35:09एक पर्सनल पावर है
35:13योग माया।
35:15अघटित घटना पटसी
35:20इसी योग माया की शक्ति से भगवान इंपॉसिबल
35:24को पॉसिबल करते हैं।
35:28जैसे
35:30हम आंख से देखते हैं, कान से सुनते हैं।
35:33लेकिन भगवान
35:36कान से सुनते भी हैं, देखते भी हैं,
35:40सूंघते भी हैं।
35:44आंख से देखते भी हैं, सुनते भी हैं,
35:47सूंघते भी हैं।
35:51बिनु पग चलई सुनै बिनु काना
35:56कर बिनु कर्म करै विधि नाना आनन रहित सकल
36:03रस भोगी बिनु वाणी वक्ता ब जोगी तन बिनु
36:11परस नयन बिनु देखा
36:15घई घण बिनु बास से
36:21अस सब भांति
36:24अलौकिक करनी
36:27महिमा जास
36:30जाई नहीं बरनी
36:36तो ये जो कार्य होते हैं पैर नहीं है
36:40दौड़ता है कान नहीं है सुनता है नाक नहीं
36:44है सूंघता है
36:46अनंत जीवों के अनंत पुकारों को सुन रहा
36:50है।
36:52चींटी के पग घुंघरू बाजे तो भी साहिब
36:56सुनते हैं।
36:58कबीर कहते हैं कि एक नन्ही सी चींटी के पग
37:03में भी घुंघरू की आवाज हो वह भी नाचे तो
37:08साहिब को सुनाई पड़ता है। ऐसा है वह
37:12साहिब।
37:16क्षमा
37:50तो मैं आप लोगों को यह बतला रही थी।
37:54इसीलिए
37:56हमें
37:59संत के विषय में
38:02बहुत सावधानी रखनी है।
38:06भगवान
38:08के पास योग माया शक्ति है। उस योग माया
38:12शक्ति से भगवान प्रत्येक कार्य करते हैं।
38:16वही योग माया शक्ति
38:20जो इंपॉसिबल को पॉसिबल करती है। वही योग
38:24माया शक्ति भगवान संत को भी देते हैं।
38:31संत के पास यह योग माया शक्ति होती है।
38:35विशुद्ध संत के पास।
38:40इसीलिए
38:44उस योग माया शक्ति से वह बहिरंग रूप से
38:48ऐसे ऐसे कार्य कर रहे हैं कि कोई साधारण
38:51देखे तो उसकी बुद्धि फिर जाए।
38:57प्रहलाद
39:01जिन्होंने बचपन में भगवत प्राप्ति कर ली।
39:05जिनके लिए नसिं अवतार हुआ। तो जिसने बचपन
39:09में ही बालपन में ही भगवान को प्राप्त कर
39:13लिया वही प्रहलाद राज्य कर रहे हैं। राजा
39:17बने
39:20एक मनवंतर
39:22तक राज्य किया।
39:2540 लाख 20 हजार वर्ष का चार युग 71 बार
39:31बीत जाए
39:33तो एक मनवंतर यानी हजारों वर्षों तक
39:38प्रहलाद राज्य करते रहे।
39:43अरे कोई इतने वर्षों तक राज्य करेगा
39:48तो भोगी है। आप कहेंगे थका नहीं
39:53अघाया नहीं। विरति नहीं हुई उसकी।
40:01प्या भी कर रहे हैं, बच्चे भी हो रहे हैं।
40:07और प्रहलाद
40:11सब दोषों से रहित है।
40:14काम दोष से रहित है। आप कहेंगे जब बच्चे
40:17हो रहे हैं तो क्या आकाश से टपके?
40:21पूरे सांसारिक नियमों से पैदा हुए तो फिर
40:24वह काम दोष से परे कैसे हैं?
40:28लेकिन यह फैक्ट है।
40:32कि प्रहलाद
40:34करोड़ों वर्षों तक राज्य करके भी
40:39विरक्त है।
40:41काम, क्रोध, लोभ, मोह से सबको जीत चुके।
40:46लेकिन उनकी क्रियाएं दिखाई नहीं पड़ती।
40:51यह है योग माया शक्ति।
40:56ऐसे अनेक उदाहरण है। तो जगत में हो सकता
41:02है कि कोई संत बहिरंग रूप से
41:08अलग कार्य कर रहा हो लेकिन वास्तव में संत
41:11हो और हो सकता है उसके पास योगमाय शक्ति
41:16है ही नहीं। वह बिल्कुल साधारण हमारी तरह
41:20है लेकिन संत की भेशभूषा में है और
41:25पाखंडी
41:29इसीलिए
41:31हमारे शास्त्रों में
41:35संतों के लक्षण बताए गए हैं कि वास्तविक
41:40संत के क्या लक्षण होते हैं और वास्तविक
41:44संत की क्या पहचान है
41:48और किन-किन बातों की सावधानी हमें रखनी है
41:52जब हम
41:54किसी को संत रूप में वरण करते हैं।
41:59पहले वह लक्षण होने चाहिए, वह बातें होनी
42:03चाहिए।
42:05यदि वह शास्त्र अनुसार वो सारी बातें
42:08उनमें है यह लक्षण दिखाई पड़ते हैं तो बस
42:14फिर कोई डाउट नहीं। आप उनकी शरण में चले
42:18जाइए। पक्का काम होगा। लेकिन वो लक्षण
42:23होने चाहिए। तो आइए
42:27हम लोग चर्चा करें
42:30कि वास्तविक संत
42:34में क्या पहचान है। देखिए मैंने आपको कल
42:38ही बता दिया था कि जैसे भगवान को कोई नहीं
42:42जान सकता बुद्धि से। ऐसे ही भगवान सदृश्य
42:47संत उन्हें भी कोई बुद्धि से नहीं जान
42:50सकता। वो भगवत प्राप्त है। हमारी बुद्धि
42:54वहां तक नहीं पहुंच सकती। तो बुद्धि से मत
42:56तोलिए संत को।
43:00लेकिन पहचाना जा सकता है। जानना अलग बात
43:04है। पहचानना अलग बात। पहचान लक्षणों से
43:09होता है।
43:12इसीलिए अपने जीवन में गांठ बांध लीजिए
43:16कि किसी के कहने पर किसी को गुरु मत
43:21बनाइए।
43:22कि अमुक ने गुरु बनाया है। वो हमें कह रहा
43:27था तुम भी बना लो। तो हमने सोचा हमारे
43:31मित्र ने तो बनाया ही है। तो चलो हम भी
43:34बना लेते हैं उसके कहने पर। अरे यह आत्मा
43:38की बात है।
43:42यहां अनुभव से काम कीजिए।
43:46किसी के कहने पर नहीं।
43:49क्योंकि जिसने आपको आज कहा कि उन्हें गुरु
43:53बना लो।
43:55मान लीजिए कल को उसी व्यक्ति का किसी कारण
44:00से
44:01उस गुरु के प्रति गलत भाव हो जाए
44:06दुर्भावना हो जाए
44:09और वो यह डिक्लेअ करे जजमेंट दे दे कि अरे
44:13सब गलत है सब बेकार है हम तो धोखे में पड़
44:18गए देखो तुम भी छोड़ दो अब ये सब धोखा है
44:23तो क्या होगा
44:25मान लीजिए कि वह संत ही रहे
44:31तो आप भी अपने मित्र के साथ साथ
44:36नाम अपराध के
44:39जंजाल में फस जाएंगे।
44:43तो इसलिए किसी के कहने पर किसी को गुरु मत
44:47बनाइए।
44:50जो शास्त्रों में लक्षण बताए गए हैं, जो
44:53पहचान बताई गई है, उसके अनुसार आपको अपने
44:59अनुभव से गुरु कहीं भागा नहीं जा रहा है।
45:06समय लीजिए। एक महीना, दो महीना, एक साल,
45:1110 साल अच्छे से परख लीजिए।
45:18और फिर देखिए कि आपके भीतर यदि परिवर्तन
45:23हो रहा है, कुछ विशेष लक्षण दिखाई पड़ते
45:27हैं वो मैं अभी आगे आपको बताऊंगी। तब आपको
45:33फिर पकड़ लेना है। फिर छोड़ना नहीं। लेकिन
45:36उससे पहले
45:39यह सारी जानकारी सारे पहचान देखने तो पहला
45:45लक्षण पहला लक्षण तो नहीं पहले मैं आपको
45:49पहचान बताऊंगी और सावधानियां बतलाऊंगी।
45:54देखिए जो भगवत प्राप्त संत होता है
46:01वह संसार के प्राणियों को
46:08भगीरथ प्रयत्न करके
46:12उसे ईश्वर की ओर उन्मुख करेगा
46:19ताकि
46:22उसके अनादि काल की बिगड़ी बने उसका जन्म
46:25सुधर जाए तो उसे ईश्वर की ओर उन्मुख करेगा
46:31और संसार
46:35से व्यवहार करना सिखाएगा। संसार की आसक्ति
46:40छुड़ाएगा।
46:42एक दिन तो इस जगत को छोड़ना ही है।
46:48हम नहीं चाहेंगे तो भी छूटेगा। मरना तो है
46:51ही। तो संत तत्व ज्ञान से वह आसक्ति को
46:57छुड़ाता है। संसार की असारता नश्वरता का
47:02ज्ञान करवाता है। बोध करवाता है। जिससे
47:06धीरेधीरे यह संसार से आसक्ति छूटती है। और
47:12वो ईश्वर की ओर उन्मुख करता है।
47:18नानक कहते हैं संत वही जो विषय छुड़ावे
47:25आप जपे औरन को जपावे
47:30विशुद्ध संत वही है जो आपके विषय छुड़ाएगा
47:38तो वास्तविक संत कभी भी किसी भी प्राणी को
47:45संसार संबंधित
47:48सामग्री नहीं दे सकता।
47:54अधिकांश रूप से हम लोगों में यह धारणा बनी
47:58हुई है।
48:00हम यह समझते हैं कि कोई संत मिले तो हम
48:05उनसे
48:08यही मांगे कि धन मिल जाए, पुत्र मिल जाए,
48:14कीर्ति मिल जाए, पदवी मिल जाए, प्रमोशन हो
48:18जाए। यह संसार रिलेटेड
48:22यह सामान, यह विषय हम संत से आशा रखते
48:26हैं।
48:31एक बात बताइए
48:34कोई भी जीव संत क्यों बना है? यह जो संत
48:40आपके सामने खड़ा है, आप उससे पूछिए कि आप
48:44संत क्यों बने?
48:48क्या आपको इस जगत में सुख नहीं मिल रहा
48:50था? वह संत कहता है भाई संसार तो असार है।
48:56वास्तविक सुख तो भगवान में है। इसीलिए
48:59हमने संसार में संसार को छोड़ हम भगवान की
49:04ओर चले।
49:06तो जिस संत ने स्वयं संसार को छोड़ा है जो
49:10जानता है कि यह संसार
49:14पोइजन है। इससे अनंत सुख नहीं मिलेगा। यह
49:18दलदल है। यह जन्म मरण के बंधन से नहीं
49:22छुड़ाएगा संसार। यह बंधन बढ़ाएगा। हमें
49:268रा के चक्कर में ही चक्कर लगाना पड़ेगा।
49:30तो बताइए जिस संत ने स्वयं संसार छोड़ा है
49:36वह आपको संसार कैसे दे सकता है?
49:41जो जगत में आया ही इसीलिए है जब भगवान ने
49:45उसको जगत में उनके पास जाने के लिए भेजा
49:49है। विषय छुड़ाने के लिए भेजा है तो वह
49:54विषय संबंधित सामान आपको कैसे दे सकता है?
49:57कॉमन सेंस की बात
50:01संसार संबंधित विषय आपको आपके संस्कार या
50:07पुरुषार्थ से मिलेंगे।
50:11वह महापुरुष वो संत चाहेगा तो भी नहीं दे
50:14सकता आपको।
50:19किसी के प्रारब्ध को काट के कोई सामान
50:21नहीं दे सकता संत।
50:27और फिर
50:30मुझे एक बात बताइए।
50:36हमें जो अभी संसार मिला हुआ है
50:41इसके मिलने में ऐसी दुर्दशा है हमारी अपने
50:45हृदय पर हाथ रख के पूछिए अपने आप से
50:52कि हम कितने आंसू बहाते हैं अपने प्रभु के
50:56लिए
50:57कितना याद करते हैं उनको
51:0124 घंटे में
51:08कच्चा चिट्ठा आपके सामने
51:11तो जब यह थोड़ा बहुत संसार मिला है हमको
51:16तो यह दयनीय स्थिति है हमारी कि हमारा मन
51:20भगवान में नहीं लगता।
51:23प्रयास करने पर भी नहीं लगता और वैसे भी
51:27कहते हैं समय नहीं है।
51:31तो बताइए
51:34जब थोड़ी बहुत समृद्धि से यह हालत है कि
51:38हमारा मन संसार में नहीं लग भगवान में
51:41नहीं लगता। यदि वह गुरु और आपको संसारी
51:45विषय दे देगा तो और बाढार हो जाएगा। तब तो
51:49हम कभी भगवान को याद ही नहीं करेंगे।
51:53तो क्या संत को भगवान इसीलिए भेजते हैं कि
51:58तुम खूब उनको संसार दो ताकि वो मुझसे दूर
52:02हो जाए।
52:04संत को तो भेजा है भगवान ने
52:09उनसे मिलाने के लिए। उसका वो काम है ईश्वर
52:13की ओर चलाना। ईश्वर के उन्मुख करना। तो वह
52:18ईश्वर से दूर करने का, ईश्वर से छुड़ाने
52:22का काम कैसे कर सकता है? सोचिए
52:28और हम यही आशा करते हैं।
52:31संसार मिल जाए हमको।
52:36ठीक है। हम लोग अबोध हैं। भोले हैं। नहीं
52:40जानते।
52:45लेकिन संत तो जानता है कैसे देगा आपको?
52:51किसी बच्चे ने यदि हाथ में पोइजन की शीशी
52:55पकड़ रखी है। छोटा सा बच्चा है वो नहीं
52:59जानता यह पोइजन है और वह भी खुली शीशी।
53:03डॉक्टर का बेटा है। डॉक्टर ने देखा
53:09दौड़ कर आया।
53:12गुर्रा आया गुस्से में और शीशी उसके हाथ
53:16से छीन ली।
53:20जैसे ही शीशी छीनी वो बेटा रोता है।
53:24जिद करता है मुझे वो शीशी चाहिए।
53:28इतने में मां आई। मां ने डॉक्टर से कहा
53:32क्यों जी? आप मेरे बच्चे को क्यों रुलाते
53:35हैं? क्या हो गया?
53:37अरे भाग्यवान इसने पोइजन की खुली शीशी
53:42पकड़ रखी थी।
53:46अब बताओ
53:49यदि खा लेता तो
53:52ओ अच्छा अच्छा अच्छा
53:55तो मां कहती है अपने पति डॉक्टर को
53:58बिल्कुल ठीक किया आपने और मां ने भी एक
54:01चपत लगाई
54:03अब वो बच्चा रोता है मां ने मारा पापा
54:07गुस्सा होते हैं फिर वो शीशी भी मेरे हाथ
54:10से ले ली
54:13और बच्चा मन ही मन यह सोचता है यह
54:16माता-पिता मेरे दुश्मन है। मुझे मारते
54:19हैं। मुझे वह शीशी नहीं देते। लेकिन फैक्ट
54:23क्या है? वो माता-पिता दुश्मन नहीं है। वो
54:27तो उस बच्चे के परम हितैषी है। पोइजन कैसे
54:31खाने दे सकते? बच्चा नहीं जानता।
54:35माता-पिता जानते हैं। ऐसे ही गुरु रूपी
54:40वो हमारे
54:42माता पिता हैं।
54:46ईश्वरीय जगत के हमारे माता पिता हैं गुरु
54:49तो वह तो जानते हैं ना कि यह संसार कितना
54:53डेंजरस है पोइजन
54:58तो भला आप बताइए कि कोई भी गुरु
55:02यह पोइजन हमें लेने कैसे दे सकता है?
55:08इसीलिए
55:10हमेशा
55:12इस पहचान को अपने साथ रखना कि जो वास्तविक
55:17संत होगा वह आपको
55:21ईश्वर से धनी बनाएगा। यानी ईश्वरीय धन
55:25देगा। ईश्वरीय धनी बनाएगा।
55:32आपकी ईश्वरीय राज्य की संपत्ति बढ़वाएगा।
55:36भगवान से प्रेम बढ़वाएगा। वही वास्तविक संत
55:41है। यह पहली पहचान। इसलिए आपको सावधान
55:46रहना है।
55:49ये जो आपको
55:53मिलते हैं ना जगत में बाबा लोग
55:57जो ये कहते हैं जा बच्चा तेरा यह बढ़ जाए
56:01तेरा वो हो जाए। यह सब
56:05ठगने का धंधा है। भोली भाली जनता को
56:10बेवकूफ बनाया जा रहा है। और जनता तो
56:14बेचारी भोली है ही वो जान नहीं पाती।
56:22दूसरी पहचान
56:28वास्तविक संत
56:31कभी
56:33किसी पर क्रोध नहीं करता। किसी का अहित
56:37नहीं करता। क्रोध से यहां मेरा मतलब अहित,
56:42अमंगल।
56:45शिष्य के अनुयाई के मार्गदर्शन के लिए वो
56:49क्रोध का अभिनय कर सकता है। लेकिन भीतर से
56:54उसका अमंगल कभी नहीं चाहेगा।
57:01वास्तविक संत कभी भी किसी का अमंगल नहीं
57:06करते।
57:11आप लोगों ने चैतन्य महाप्रभु जी के समय की
57:15घटना सुनी होगी।
57:19नित्यानंद प्रभु जब वो हरि बोल हरि नाम की
57:25भिक्षा मांगने
57:29एक गली में गए जहां ब्राह्मणों की का शासन
57:32था तो वहां जगाई मधाई
57:37उनकी असुर प्रवृत्ति हो गई थी सुरापान
57:41करते थे वैश्यावत्त करते थे तो नित्यानंद
57:45जी ने उसी गली में जाकर हरि नाम की भिक्षा
57:50मांगी हरि बोल हरि बोल और जगाई मधाई ने उन
57:55पर प्रहार किया
57:58पत्थर मारा उनको चोट लगी और आप जानते हैं
58:02उस समय
58:04चैतन्य महाप्रभु
58:07उन्होंने आवाहन कर दिया चैतन्य महाप्रभु
58:10और कोई नहीं साक्षात श्री कृष्ण है चक्र
58:15चक्र
58:17और महाप्रभु जी के उंगली में चक्र आ गया
58:23नित्यानंद जी ने देखा
58:26और चरण पकड़ के कहा प्रभु इस समय आप
58:31कंसारी या मुरारी नहीं
58:35यह आपका प्रेमा अवतार है ये आप क्या कर
58:38रहे हैं
58:42मेरे भक्त की यह दशा
58:46लेकिन नित्यानंद कह रहे हैं कोई बात नहीं
58:49प्रभु जगाई मधाई को उनके गलतियों का भान
58:53नहीं उनको पता नहीं
58:56आप क्षमा कर दीजिए।
58:59देखिए नित्यानंद चाहते तो उनका अमंगल करा
59:03सकते थे। लेकिन वो प्रभु से प्रार्थना कर
59:06रहे हैं। नहीं नहीं इन पर कृपा कीजिए।
59:09इन्हें प्रेम दीजिए। इन्हें पता ही नहीं
59:11ये क्या गलती कर रहे हैं।
59:16तो कोई भी संत कभी किसी का अमंगल नहीं कर
59:21सकता।
59:24और इसी के साथ साथ यह बात भी ध्यान रखिए
59:31कि वास्तविक संत
59:36कभी किसी को
59:39आशीर्वाद भी नहीं दे सकता।
59:47आशीर्वाद देना यह जो हमारी पुरातन प्रथा
59:51रही है परंपरा गुरुजन अपना हाथ बच्चे के
59:56शीश पर रख देते हैं
59:59वो एक प्रथा चली आ रही है
1:00:03बड़े बुजुर्ग हाथ रख देते लेकिन यह प्रथा
1:00:07तब से है जब वास्तव में गुरु
1:00:12वास्तविक आशीर्वाद देता था जब कोई
1:00:16आशीर्वाद लेने का अधिकारी होता था।
1:00:21लेकिन वो प्रथा चली आ रही है तो आज भी जो
1:00:26बड़े बूढ़े होते हैं, वृद्ध होते हैं वो
1:00:29अपना छोटों पर हाथ रख देते हैं।
1:00:34लेकिन ईश्वरीय जगत में यह जो आप कहते रहते
1:00:38हैं ना हमारे सिर पर हाथ रख दीजिए। जरा
1:00:42आशीर्वाद दे दीजिए।
1:00:46मैं आपको
1:00:50गहराई से बताना चाहती हूं। आप इसको
1:00:55बुद्धि से समझेंगे।
1:00:59यदि आशीर्वाद देने से ही हमारा काम बन
1:01:06जाता।
1:01:08यदि महात्मा के आशीर्वाद देने से हमारा
1:01:13काम बन जाता। हमको कुछ ना कुछ नहीं करना
1:01:17पड़ता।
1:01:18हमारी तरफ से कोई प्रयास नहीं। केवल संत
1:01:22आशीर्वाद दे दे और काम बन जाए। यदि ऐसा
1:01:26होता तो क्या आज तक किसी महात्मा के
1:01:31मस्तिष्क में यह बात नहीं आई
1:01:35कि मैं खड़ा होकर
1:01:38संपूर्ण जगत के
1:01:41प्राणियों को जो इतने दुखी है त्राहि कर
1:01:46रहे हैं। सबको आशीर्वाद दे दूं कि सबका
1:01:50दुख चला जाए। सब भगवान के धाम को पहुंच
1:01:54जाए। सदा के लिए आनंदमय हो जाए। क्या आज
1:01:59तक किसी महात्मा के दिमाग में यह बात नहीं
1:02:02आई?
1:02:05यदि आशीर्वाद से ही काम बनता है तो तब तो
1:02:08दे देना चाहिए था। हम इतने दुखी क्यों
1:02:11होते?
1:02:16अरे महात्मा की छोड़िए। भगवान भी अवतार
1:02:21लेकर आते हैं। उन्होंने भी यह नहीं किया।
1:02:25वरना क्या पड़ी थी संतों को इस जगत में
1:02:29आने की, इतना अपमान सहने की, इतनी गालियां
1:02:32सहने की।
1:02:35यदि आशीर्वाद से ही काम हो जाता।
1:02:41तो आज तक हम इस चीज को समझ नहीं पाए। बस
1:02:45यूं ही कह देते हैं आशीर्वाद दे दीजिए। तो
1:02:49आशीर्वाद देने का क्या मतलब होता है? इसको
1:02:54आपको समझना है।
1:03:00बिना
1:03:03अधिकारी हुए
1:03:07बिना पात्रता के कोई भी संत
1:03:12आशीर्वाद नहीं दे सकता।
1:03:19जगत में भी
1:03:23यह नियम है।
1:03:26ऐसे ही ईश्वरीय जगत में भी नियम
1:03:32जहां कहीं भी आपने संतों को आशीर्वाद देते
1:03:36हुए देखा है वहां अधिकारी को मिला है
1:03:40आशीर्वाद। अनाधिकारी को कभी आशीर्वाद नहीं
1:03:44मिला। क्योंकि यह जो आशीर्वाद देना कहिए
1:03:49या दीक्षा देना कहिए एक ही बात
1:03:55यह दीक्षा कब दी जाती है? यह आशीर्वाद कब
1:03:59दिया जाता है? हमारे गुरुदेव
1:04:05राधे गोविंद गीत में कहते हैं राधे राधे
1:04:11गोविंद
1:04:15गोविंद
1:04:18राधे
1:04:21राधे राधे गोविंद
1:04:27गोविंद
1:04:29राधे राधे
1:04:33दिव्य ज्ञान
1:04:36दिव्य प्रेम
1:04:40गोविंद
1:04:43राधे
1:04:46जब गुरुदेव
1:04:51दीक्षा
1:04:53बता
1:04:55दे
1:04:58जगतगुरु स्वामी श्री कृपालु जी महाराज कह
1:05:01रहे हैं
1:05:03दिव्य ज्ञान
1:05:05दिव्य प्रेम
1:05:09अर्थात
1:05:12वो साधक या वो अनुयाई
1:05:18जब उसको
1:05:21उसके सब पाप क्षय हो जाते हैं।
1:05:28उसका मन पवित्र हो जाता है। अंतःकरण शुद्ध
1:05:32हो जाता है। सारे पाप मिट गए। मन पवित्र
1:05:36हो गया।
1:05:38अब वो गुरु ने देखा कि पात्र बन गया। अब
1:05:42मेरा काम शुरू।
1:05:45वैसे तो वो साथ रहरह कर नोट करता रहता है।
1:05:48और जब पूरा मन साफ हो गया। अब गुरु देर
1:05:53नहीं लगाता। एक क्षण की भी।
1:05:58वह पूर्ण ज्ञान से युक्त कर देता है। उस
1:06:01ज्ञान को कहते हैं दिव्य ज्ञान।
1:06:06फिर वह दिव्य प्रेम भी देता है।
1:06:12और यह दिव्य प्रेम और दिव्य ज्ञान देना ही
1:06:15दीक्षा कहलाता है। यानी दीक्षा दे देने के
1:06:20पश्चात फिर उस साधक का कभी पतन नहीं हो
1:06:25सकता। उसको ईश्वर प्राप्ति हो गई। भगवत
1:06:30प्रेम मिल गया। इसी को आशीर्वाद देना कहते
1:06:33हैं।
1:06:36और ऐसा नहीं पद्यावली में बताया गया है
1:06:40दिव्यम ज्ञान
1:06:43दिव्यम दिव्यम ज्ञानम यतो ददात
1:06:50जब दिव्य ज्ञान दिया जाता है और क्या होता
1:06:54है कब दिया जाता है कुरियात पाप सक्षयम
1:07:01जब उसके सारे पाप क्षय हो जाते
1:07:06संक्षय सारे पाप क्षय हो जाते तस्मात
1:07:11दीक्ष सा
1:07:17उस समय दीक्षा दी जाती है। इसके पहले कोई
1:07:22भी वास्तविक संत दीक्षा दे ही नहीं सकता।
1:07:26दीक्षा देने का मतलब दिव्य प्रेम देना,
1:07:30भगवत प्राप्ति कराना।
1:07:37और आज
1:07:42आज हमारे
1:07:44देश में क्या हो रहा है?
1:07:49बाजार लगा हुआ है।
1:07:53जितना
1:07:54चेले लोग आतुर नहीं है दीक्षा लेने के लिए
1:07:58उससे अधिक गुरु लोग आतुर है दीक्षा देने
1:08:01के लिए। तुम भी आ जाओ, तुम भी आ जाओ, तुम
1:08:05भी आ जाओ, दीक्षा ले लो, दीक्षा ले लो।
1:08:10यानी
1:08:14कहीं वो दूसरे के पास ना चला जाए।
1:08:18हमारे पास भीड़ बनी रहे। हमारे पास जुड़े
1:08:21रहे। अरे यह क्या भीड़ बढ़ाने के चक्कर
1:08:26में पड़े हो। उसके अंतःकरण की चिंता नहीं।
1:08:29केवल गुरु को अपनी चिंता है कि खूब सारे
1:08:33लोग फॉलोअर्स बन जाए।
1:08:37यही दीक्षा का अर्थ है। इसलिए जगतगुरु
1:08:41स्वामी कृपालु जी महाराज उन्होंने कभी
1:08:45दीक्षा पर बल नहीं दिया।
1:08:50उन्होंने कहा
1:08:54कि जब शिष्य का अंतःकरण शुद्ध होता है तब
1:08:59गुरु दीक्षा देता है। उससे पहले गुरु
1:09:05तत्व ज्ञान देता है जिसको शिक्षा देना
1:09:08कहते हैं। पहले वो तत्व ज्ञान कराता है
1:09:11साधक को।
1:09:13ईश्वर क्या है? माया क्या है? जीव क्या
1:09:18है? गुरु तत्व क्या है? इससे सबसे यह तत्व
1:09:22बोध कराता है।
1:09:25और आज
1:09:27जो दीक्षा दे रहा है उसकी स्वयं की हालत
1:09:32फटीचर।
1:09:35खूब संसारी भोग चल रहा है। संसारी कार्य
1:09:39भी हो रहे हैं।
1:09:42अजी वो तो यह भी कहते हैं बढ़िया कथाएं भी
1:09:46कर रहे हैं और यह भी कहते हैं अजी हम तो
1:09:49मनोरंजन के लिए कथा करते हैं। हम कोई संत
1:09:53थोड़े ही हैं। अरे जब संत नहीं है मनोरंजन
1:09:57के लिए कथा कर रहे हो तो फिर दीक्षा कैसे
1:10:01दे रहे हो? एक और तो कहते हो संत नहीं है
1:10:05और दीक्षा भी दे रहे हो। अरे दीक्षा देने
1:10:09का अधिकार तो भगवत प्राप्त संत को है और
1:10:13किसी को नहीं। तुम संत भी नहीं। साधारण जो
1:10:20ईश्वरीय राज्य का क ख भी नहीं जानते।
1:10:25ईश्वर प्रेम का आस्वादन भी कभी नहीं हुआ।
1:10:30थोड़ा बढ़िया प्रवचन बोलने लगे और यह
1:10:33सोचने लग गए कि अब हम दीक्षा दे सकते हैं।
1:10:36अरे क्यों भोले भाले लोगों को ठग रहे हो?
1:10:42क्यों उनके साथ धोखा कर रहे हो?
1:10:46भोले भाले प्यारे जीव
1:10:51आज
1:10:52जगत में यही देखा जा रहा है और फिर
1:10:57जरा पूछना चाहिए कि अच्छा ठीक है आपने
1:11:01दीक्षा दी है हमें तो दीक्षा में आपने जो
1:11:05मंत्र दिया है उस मंत्र में तो शक्ति है
1:11:09ना हां बिल्कुल है
1:11:12अरे वह तो भगवान का नाम है तो भगवान के
1:11:15नाम में तो भगवान स्वयं बैठे हैं अपनी
1:11:18सारी शक्ति सहित तो क्यों जी जब आपने यह
1:11:22मंत्र मुझे दिया
1:11:25तो उस मंत्र में तो शक्ति रही तो उस शक्ति
1:11:30का कोई प्रभाव मुझ पर नहीं पड़ा।
1:11:34मुझे तो रोमांच भी नहीं हुआ।
1:11:39मेरा तो मन भी भगवान में नहीं लगता।
1:11:42संसारी वासनाएं दिमाग में आती है। काम,
1:11:45क्रोध, लोभ, मोह। मैं माला तो जपता हूं।
1:11:48मन संसार में जाता है, लड़की के पास जाता
1:11:52है, लड़के के पास जाता है। और माला भी जप
1:11:57रहे हैं। दीक्षा लिए हैं। तो संसार तो बना
1:11:59हुआ है।
1:12:02तो आपने फिर मुझे यह क्या मंत्र दिया
1:12:05जिसका कोई प्रभाव ही नहीं होता।
1:12:08तो गुरु जी कहते हैं देखो बेटा ऐसा है
1:12:11मंत्र में तो शक्ति है लेकिन तुम अधिकारी
1:12:14नहीं हो।
1:12:17अरे जब मैं अधिकारी नहीं हूं तो आप क्या
1:12:19गधे थे जो मुझे दे दिया।
1:12:24वो तो आपको देखना चाहिए कि मैं अधिकारी
1:12:27हूं या नहीं हूं। बिना अधिकारी के दीक्षा
1:12:30दे दी और अब कहते हो तुम अधिकारी नहीं हो
1:12:33तो क्यों दी?
1:12:36पहले अधिकारी बनाते
1:12:39ना इसकी चिंता नहीं है
1:12:42क्योंकि उन्हें अपनी चिंता है हमारे यहां
1:12:45खूब लोग हो जाए खूब चेले बने रहे 1111
1:12:50है तो फिर 112 जरूर हो लेकिन 10,000 ना हो
1:12:54जाए कोई दूसरा छीन के ना ले जाए
1:12:59और फिर देखा जाता है दीक्षा भी दे रहे हैं
1:13:02उसका पतन भी हो रहा है रोज दृष्टि गोचर
1:13:06है। और हम स्वयं भी यदि दीक्षा लिए हैं और
1:13:10देख रहे हैं कि हमारी कोई ईश्वरीय
1:13:12प्रोग्रेस नहीं हो रही तो इसका मतलब
1:13:16पावर हाउस सही नहीं है।
1:13:21इसीलिए हमारे गुरुदेव
1:13:27उनका कहना है
1:13:31कि पहले गुरु साधक को साधना बतलाकर
1:13:38तत्व ज्ञान कराकर तैयार करता है। फिर वो
1:13:43साधना करते हुए उस प्रोसेस में उस
1:13:46प्रक्रिया से वो साधक
1:13:50अपने अंतःकरण को शुद्ध करने का प्रयास
1:13:54करता है। जब अंतःकरण धीरेधीरे शुद्ध होता
1:13:58है। गुरु नोट कर रहा है
1:14:02और
1:14:04जब अंतःकरण पूर्ण रूपण पवित्र हो गया,
1:14:09शुद्ध हो गया, साधना करते करते तब तक गुरु
1:14:14साधना अवस्था में उसे शिष्य नहीं कहता। वो
1:14:18साधक है, अनुयाई है, शिष्य नहीं।
1:14:26तो वो साधना रथ है। जब धीरेधीरे अंतकरण
1:14:32शुद्ध हो रहा है। गुरु कृपा भी करते जा
1:14:34रहे हैं। और जब पूरा अंतकरण शुद्ध हो गया।
1:14:37शिव प्रम भवती धर्मात्मा फिर एक क्षण को
1:14:41भी देर नहीं लगाएंगे गुरु
1:14:44फिर तो आपको बोलने की भी जरूरत नहीं है
1:14:48कि दीक्षा दीजिए, कृपा कीजिए, प्रेम दीजिए
1:14:52ना।
1:14:54वह हिमालय में बैठे हो, जहां भी हो, वह तो
1:14:57आपके भीतर बैठे नोट कर रहे हैं। आपकी
1:15:00अवस्था बनी और उन्होंने तक्षण दिया। यह जो
1:15:04भगवत प्रेम दिया जाता है, ईश्वरीय शक्ति
1:15:08दी जाती है। यह है दीक्षा। यह है आशीर्वाद
1:15:12जो रामकृष्ण ने विवेकानंद को दिया।
1:15:16आशीर्वाद, दीक्षा प्रेम। वो ईश्वरीय शक्ति
1:15:22न्या
1:15:25ग्रवा
1:15:27से बहु
1:15:29शास्त्र कहते हैं
1:15:31जब तक अंतःकरण शुद्ध नहीं हुआ है तब तक
1:15:36गुरु
1:15:38वो प्रेम नहीं दे सकता और अंतःकरण शुद्धि
1:15:41पर जब वो प्रेम देता है तो वो सदा के लिए
1:15:45उसे अपना शिष्य बना लेता है और एक बार
1:15:49शिष्य बना लिया गुरु ने तो शिष्य का कभी
1:15:53पतन नहीं होता।
1:15:56ना शिष्यन बदनीत
1:15:59इसीलिए
1:16:02हमें अपना काम करना है। हमको गुरु बनाना
1:16:07है।
1:16:09हमें गुरु बनाना है। लेकिन गुरु हमें
1:16:15शिष्य कब बनाएंगे? यह गुरु का काम है।
1:16:19हमें उन्हें गुरु रूप में वरण करते हुए
1:16:21उनकी बताई साधना करनी है और अपने आप को
1:16:25तैयार करना है। जब हम अधिकारी हो जाएंगे
1:16:29वो दे देंगे। अरे संसारी जगत में भी देखिए
1:16:33नियम है।
1:16:35अब यदि किसी को लॉ कक्षा में दाखिला लेना
1:16:39है
1:16:41तो पूछा जाता है ना कि
1:16:45ग्रेजुएशन का सर्टिफिकेट लाओ।
1:16:48वहां भी देखा जाता है अधिकार देखा जाता है
1:16:52भाई तुम्हारे ग्रेजुएशन का सर्टिफिकेट दो
1:16:56अजी हमने तो ग्रेजुएट नहीं किया हम तो
1:16:58पांचवी पास नहीं है अरे तो जब तुम पांचवी
1:17:02पास भी नहीं हो तो तुम ये कैसे आशा कर रहे
1:17:05हो कि तुमको लॉ में एडमिशन मिलेगा
1:17:10अधिकार नहीं है
1:17:15तो इस प्रकार से
1:17:18इस बात को ध्यान रखना है सबको। यह आपके
1:17:22आत्मा का सवाल है।
1:17:26इसीलिए देखा देखी नहीं।
1:17:30और फिर क्या भगवान के यहां कोई भाषावाद है
1:17:34क्या कि तुम संस्कृत में मंत्र बोलोगे तभी
1:17:38भगवान खुश होंगे। यदि सीधे सीधे राम राम
1:17:41कृष्ण कृष्ण गाओगे तो वह नहीं खुश होंगे।
1:17:44ऐसा कहां लिखा है?
1:17:49वो तो भाव ग्राही जनार्दन है भाई।
1:17:53वह तो भाव के वश में है।
1:17:58भाव का भूखा हूं मैं और भाव ही बस सार है।
1:18:06भाव से मुझको भजे तो भव से बेड़ा पार है।
1:18:15भाव बिन सब कुछ दे डाले।
1:18:20मैं कभी लेता नहीं।
1:18:24भाव वाले भक्त का एक पुष्प भी स्वीकार है।
1:18:32भाव का भूखा हूं मैं और भाव ही बस सार है।
1:18:40बांध लेते भक्त मुझको
1:18:45भाव की जंजीर में।
1:18:49बांध लेते भक्त मुझको
1:18:53भाव की जंजीर में। इसीलिए
1:18:59इस भूमि पर होता मेरा अवतार है। भाव का
1:19:07भूखा हूं मैं और भाव ही बस सार है।
1:19:17तो इस प्रकार से
1:19:21पहले पात्र बनाना है। पहले
1:19:26अधिकारी होना है तब गुरु
1:19:30अधिकारी होने पर अंतःकरण शुद्धि पर दीक्षा
1:19:33देंगे
1:19:35और भगवत प्राप्ति होगी।
1:19:39तीसरी पहचान
1:19:41वास्तविक संत हा मैं आपको यह बताने वाली
1:19:45थी लगात मुझे याद आ गया
1:19:48कि
1:19:50गुरुदेव इसके फेवर में नहीं है। एक बार की
1:19:53घटना है वो घटना मैं आपको सुनाऊंगी कि
1:19:58गुरुदेव
1:20:00अनाधिकारी को ऐसे एक्टिंग भी नहीं करते।
1:20:04कोई लल्लू चप्पो नहीं
1:20:09मुंबई की बात है। एक बार गुरुदेव के पास
1:20:13वह वहां ठहरे हुए थे तो उनके पास एक
1:20:16म्यूजिक डायरेक्टर आए। वो फिल्मों में धुन
1:20:19देते थे। तो वह म्यूजिक डायरेक्टर
1:20:23उनको गुरुदेव के रचित पद दिए गए थे कि आप
1:20:29इसका स्वर दीजिए और इसको
1:20:33गवाया जाएगा।
1:20:36तो जब वह
1:20:39उन्होंने पढ़ा तो एक गुरुदेव का बहुत
1:20:41सुंदर पद है अपनापन रखना मेरे घनश्याम
1:20:46तो वो आए गुरुदेव के पास तो उन्होंने कहा
1:20:50कि महाराज जी हम लोग प्यार से गुरुदेव को
1:20:54महाराज जी कहते हैं। तो महाराज जी यह पद
1:20:58हम आपको सुनाना चाहते हैं। तो हारमोनियम
1:21:00ले बैठे और वह पद सुनाने लगे।
1:21:05तो जब गा रहे थे तो गाते गाते जब अंतिम
1:21:08पंक्ति गाने लगे तो भावुक हो गए
1:21:12और रोने लगे
1:21:15और रोरो के कहने लगे कि गुरुदेव आपने क्या
1:21:20पद लिखा है
1:21:22इन पदों में क्या भर दिया है आपने
1:21:28कि अपने आप ही भाव बनने लगता है
1:21:32तो गुरुदेव सुने और फिर कुछ समय बाद उठकर
1:21:35कमरे में चले गए। तो वो म्यूजिक डायरेक्टर
1:21:38भी पीछे पीछे गुरुदेव के साथ कमरे में चले
1:21:42गए। तो गुरुदेव बैठे थे। उन्होंने गुरुदेव
1:21:45से कहा कि गुरुदेव
1:21:48आशीर्वाद दे दीजिए।
1:21:51जैसे हम कॉमनली बोलते तो उन्होंने कहा कि
1:21:55आशीर्वाद दे दीजिए। चार बार बोले गुरुदेव
1:22:00यू मुस्कुरा दिए। कुछ बोले नहीं। तो जब
1:22:04चार बार उन्होंने कहा
1:22:08तो भी वह मुस्कुरा ही रहे हैं। तो फिर
1:22:10उन्होंने कहा गुरुदेव मुझे आशीर्वाद दे
1:22:13दीजिए।
1:22:15तो गुरुदेव ने लाड में एक ऐसे करके चपत
1:22:20लगा दी। ऐसे प्यार से कर दिया। तो
1:22:23उन्होंने गुरुदेव का हाथ पकड़ लिया और
1:22:26उनका हाथ ले अपने शीश पर धर लिया
1:22:30जबरदस्ती।
1:22:35तो वह तो अपना यू करके चले गए। लेकिन
1:22:39गुरुदेव हंसने लगे। बताओ
1:22:42यह जबरदस्ती मेरा हाथ रख देने से क्या
1:22:45आशीर्वाद मिल जाएगा?
1:22:48जब तू अधिकारी है ही नहीं तो मेरे चमड़े
1:22:52का हाथ भी रख लेगा तो तुझ पर कुछ नहीं
1:22:54होने वाला।
1:22:59तो इसके फेवर में ही नहीं गुरुदेव
1:23:04वो पहले अधिकारी बनाते हैं।
1:23:11भगवन नाम दिया है उन्होंने नाम रूप लीला
1:23:15गुण धाम
1:23:18कीर्तन बनाए भजन बनाए सूरदास मीरा
1:23:22तुलसीदास
1:23:24जैसे इन्होंने पद लिखे हैं ऐसे उन्होंने
1:23:27भी 108 ब्रज भाषा में पद लिखे हैं राधे
1:23:32गोविंद गीत लिखा है उसको गाओ
1:23:36पुकारो अपने मन को पवित्र करो मैं साथ में
1:23:40रक्षक रूप में हूं। निरीक्षक रूप में हूं।
1:23:44मैं देख रहा हूं। तुम साधना करो। करते
1:23:48करते जब तुम इस नाम से स्वयं के मन को
1:23:52पवित्र करते जाओगे। मैं देता जाऊंगा और
1:23:55पूर्णता पर सब कुछ दे दूंगा। लेकिन उससे
1:23:59पहले नहीं।
1:24:03अब तीसरी पहचान मैं आपको बताना चाहती हूं।
1:24:08वास्तविक संत कभी किसी को
1:24:12चमत्कार भी नहीं दिखाते।
1:24:16चमत्कार को नमस्कार वाला सिद्धांत
1:24:20विशुद्ध संत नहीं अपनाते। भले ही उनके पास
1:24:24वो सारी शक्तियां हैं। अिमा गरिमा लगिमा
1:24:28आदि रिद्धि सिद्धि सब उनके चरणों में
1:24:32लौटती रहती है। लेकिन मैंने तो आपको बताया
1:24:36भगवान अपनी सारी शक्ति दे देते हैं। लेकिन
1:24:39वास्तविक संत इन रिद्धि सिद्धियों का ना
1:24:43प्रदर्शन करते हैं ना प्रयोग करते हैं।
1:24:48इसलिए रामकृष्ण देव ने
1:24:52जीवों से कहा था
1:24:56यह जो रिद्धि सिद्धि दिखाने वाले लोग हैं
1:25:01इन बाबाओं के चक्कर में कभी मत पड़ना।
1:25:04इनमें और जादूगर में कोई अंतर नहीं है।
1:25:11जो इनके चक्कर में पड़ते हैं उन्हें वह
1:25:15बाबा भी नरक जाएंगे और जितने उनके अनुयाई
1:25:19बनेंगे उनको भी घोर यातनाओं वाला नरक
1:25:22प्राप्त होगा।
1:25:25यह सिद्धियां जो होती हैं,
1:25:28एक होती है तामस सिद्धि, एक होती है राजस
1:25:31सिद्धि, एक होती है सात्विक सिद्धि। यह
1:25:34तीन सिद्धियां
1:25:36माया के अंतर्गत मािक सिद्धि कहलाती है।
1:25:42तामस सिद्धि,
1:25:45कभी देखा हो आप लोगों ने? मैंने देखा है
1:25:51तामस सिद्धि में सामान प्रकट करके दिखा
1:25:54देना।
1:25:56देख बच्चा कमंडल में क्या है? बच्चे ने
1:25:58देखा कुछ तो नहीं है। अब देख लड्डू काजू,
1:26:03किशमिश, बादाम यह सामान प्रकट कर देना। ये
1:26:08तामसी सिद्धि।
1:26:10निंदनीय
1:26:13इससे ऊंची
1:26:15राजस सिद्धि दूसरों की रक्षा के लिए ऐसी
1:26:20सिद्धि तंत्र मंत्र किया जाता है।
1:26:23तीसरी सिद्धि होती है सात्विक सिद्धि।
1:26:29खड़े खड़े गायब हो जाना, आकाश में उड़ना।
1:26:33इतने हल्के हो जाना कि रुई की फाक से भी
1:26:36हल्के या इतने भारी हो जाना कि अंगद के
1:26:40पैर से भी भारी।
1:26:43यह सब सात्विक सिद्धि है।
1:26:47हो सकता है आप लोगों ने ना देखा हो
1:26:50आग पर चलना।
1:26:54अब कोई यदि इन सिद्धियों को देख ले
1:26:59तो पक्का है कि वह उस व्यक्ति को भगवान के
1:27:02बराबर मान लेगा।
1:27:06लेकिन यह माया के क्षेत्र की सिद्धियां है
1:27:11जिसके लिए रामकृष्ण देव कह रहे हैं नरक
1:27:14मिलता है। जो बाबा लोग ये सब सिद्धि विधि
1:27:18दिखाकर लोगों को आकृष्ट करते रहते हैं।
1:27:22अपनी प्रतिष्ठा के लिए
1:27:25ठगते रहते हैं। इन सबको नरक मिलता है। और
1:27:29जितने इनके पीछे दौड़ते हैं सब नरक जाते
1:27:32हैं। इनके चक्कर में नहीं पड़ना और यह
1:27:36माइक सिद्धियां आपको कभी भी भगवत प्राप्ति
1:27:41नहीं करा सकती।
1:27:44इससे ऊपर भी सिद्धि होती है जिसको कहते
1:27:47हैं गुणातीत सिद्धि जो माया से ऊपर
1:27:54मुक्तियां बताई जाती है ज्ञानियों की
1:27:58सालोक्य साप
1:28:02मान गती बिना मत सेवन जना
1:28:10ये सिद्धियां क्या है भगवान भगवान का लोक
1:28:14मिल जाना सालोक्य
1:28:17भगवान का समीप मिल जाना सामप्य भगवान का
1:28:23ऐश्वर्य मिल जाना साष्टि
1:28:27सायुज्य यानी भगवान में लीन हो जाना
1:28:31कैवल्य मोक्ष
1:28:37जो प्रेमी होते हैं जो विशुद्ध होते हैं
1:28:43वह तो यह मुक्तियां भी नहीं चाहते दमान
1:28:48नहीं चाहिए प्रभु हमको यह इसलिए श्रीमद्
1:28:52भागवत में बताया गया
1:28:55विित्रासर
1:28:57विित्रासुर वाणी में वित्रासुर कहते हैं न
1:29:02नाक पष्ठम न पारमेष्
1:29:08न सार्वभम
1:29:10न रसाधिप
1:29:12त्यम ना योग सिद्धि
1:29:17ना योग सिद्धि र पुनरभव
1:29:23वाछ
1:29:24य पाद रज प्रपना
1:29:30प्रभु ना तो मुझे इंद्र का पद चाहिए ना
1:29:34मुझे पृथ्वी का सम्राट बनना है ना मुझे
1:29:38योग बल चाहिए ना मुझे रिद्धि सिद्धि चाहिए
1:29:42यह सब निंदनीय चीज मुझे नहीं चाहिए।
1:29:47बाछती यत पाद रज प्रपन्ना मुझे तो आपके
1:29:52युगल चरणों का प्रेम चाहिए।
1:29:58तो जो विशुद्ध होते हैं, प्रेमी जन होते
1:30:02हैं, वो भगवान के अतिरिक्त यह माइक चीजें
1:30:06तो कभी चाहेंगे ही नहीं। वो तो भगवान का
1:30:10सालोक्य साष्टी सामप्य साज्य भी नहीं
1:30:13चाहते।
1:30:16वो केवल चाहते हैं प्रेम।
1:30:19तो बताइए ऐसे प्रेमी संत
1:30:23ये आपको क्या चमत्कार दिखाएंगे? चमत्कार
1:30:26से आकृष्ट करेंगे आपको? यह आपको एक ही चीज
1:30:32कराएंगे कि जो प्रेम के वह धनी है उसी
1:30:36प्रेम से युक्त कराएंगे। यह चमत्कार
1:30:39करेंगे।
1:30:42तो यह सारी पहचान है और सावधानियां है
1:30:46जिसको आपको सामने रखते हुए वास्तविक संत
1:30:50के शरणागत होना है।
1:30:57अब आइए आपको मैं संत के लक्षण बतलाऊं।
1:31:04पहला लक्षण
1:31:07वास्तविक संत जो होता है उसकी वाणी में
1:31:10अलौकिकता होती है।
1:31:15हो सकता है बहुत वर्षों से
1:31:20आपको आध्यात्म संबंधित कोई कंफ्यूजन हो जो
1:31:26कोई सॉल्व नहीं कर पा रहा हो। भ्रांति बनी
1:31:30हुई है। लेकिन जो वास्तविक संत होगा आपकी
1:31:35इस भ्रांति को क्षणों में दूर कर देगा।
1:31:39आपको अपनी वाणी से निर्भ्रांत कर देगा।
1:31:44और उसकी वाणी में ऐसी शक्ति होती है कि जब
1:31:50आप उस अलौकिक वाणी का श्रवण करेंगे तो वह
1:31:54आपके हृदय में जाकर छू जाएगी
1:31:58और घर कर जाएगी।
1:32:00कोई साधारण व्यक्ति वही बात बोलेगा तो
1:32:04इतना असर नहीं करेगी। लेकिन यदि वास्तविक
1:32:07संत वही बात कहेगा तो वो छू जाएगी।
1:32:12यह कमाल होता है संत की वाणी का और इसके
1:32:18साथ साथ उनमें ऐसी अलौकिकता होती है उनकी
1:32:22वाणी में
1:32:26मान लीजिए आप ईश्वरीय मार्ग में चल रहे
1:32:29हैं अचानक बीच में कुछ डिफिकल्टीज आ गई
1:32:34साधना संबंधित
1:32:39यह फिजिकल
1:32:41आपकी डिफिकल्टीज जो है साधना संबंधित आपकी
1:32:44पर्सनल डिफिकल्टीज है
1:32:48और यह ऐसी होती है कि कभी-कभी
1:32:52यह गुथियां आप सुलझा नहीं पाते हैं और
1:32:56आपकी साधना बीच में ही रुक जाती है।
1:33:01वास्तविक संत के पास वह ताकत है
1:33:05कि वह अपनी वाणी से अपने संग से
1:33:10सेकंड्स में आपकी गु्थियों को सुलझा
1:33:12देंगे। यह पहला लक्षण
1:33:17दूसरा लक्षण
1:33:24अनुभव
1:33:28अनुभव प्रमाण। यह तो मैंने आपको प्रत्यक्ष
1:33:31प्रमाण बताया।
1:33:34वाणी आप महसूस कर सकते हैं।
1:33:38अनुमान भी लगा सकते हैं। अब मैं आपको
1:33:42अनुभव प्रमाण बता रही हूं।
1:33:45जो आप खुद अनुभव करेंगे।
1:33:49जब आप वास्तविक संत का संग करेंगे, उनके
1:33:53एसोसिएशन में रहेंगे, बार-बार उनका संग
1:33:57करेंगे, तो आप यह पाएंगे
1:34:01कि आपका ईश्वर के प्रति अनुराग बढ़ रहा
1:34:07है।
1:34:08और संसार के प्रति विरक्ति हो रही है।
1:34:15यह सबसे बड़ा एक्सपीरियंस है किसी भी संत
1:34:20वास्तविक संत को
1:34:23पहचानने का।
1:34:25जैसे आपको यदि ठंड लग रही है
1:34:31और आप अग्नि के निकट जाते हैं तो थोड़ी
1:34:35दूर पर हैं तो अग्नि कहती आ जाओ। यदि ठंड
1:34:38भगाना चाहते हो तो जैसे जैसे आप अग्नि के
1:34:42निकट जाते जाएंगे वो ठंड आपकी दूर होती
1:34:46जाएगी और गर्मी प्रविष्ट हो जाएगी और
1:34:49बिल्कुल पास जाते ही ठंड गई।
1:34:53ठीक ऐसे ही जैसे जैसे आप विशुद्ध संत का
1:34:58संग करेंगे तो उनके संग से ईश्वर के प्रति
1:35:03प्रेम बढ़ता जाएगा और संसार के प्रति जो
1:35:07आसक्ति है वह घटती जाएगी।
1:35:12यह पक्का प्रमाण है क्योंकि यह आप खुद
1:35:16रियलाइज करेंगे इसको।
1:35:19हां, एक बात ध्यान रखिए।
1:35:24यह प्रभाव सब पर एक जैसा नहीं होता।
1:35:29आप यह मत समझ लेना कि हम गए और ईश्वर में
1:35:33अनुराग हो जाएगा। संसार से वैराग्य हो
1:35:36जाएगा। ऐसा नहीं है। सबके अंतकरण की
1:35:39स्थिति अलग-अलग है।
1:35:42यह ध्यान रखिए।
1:35:44भगवान और संत
1:35:47शुद्ध अंतःकरण वालों को खींचते हैं।
1:35:53भगवान और संत शुद्ध अंतकरण वालों को
1:35:57खींचते हैं। अब जिसका अंतःकरण जितनी
1:36:02मात्रा में शुद्ध होगा जितना परसेंटेज
1:36:06शुद्ध होगा उतना गुरु का उसकी वाणी का
1:36:10उसके संग का प्रभाव पड़ेगा उस पर।
1:36:16यह हमारे अंतःकरण की शुद्धता पर निर्भर
1:36:20करता है।
1:36:23एज अ नेल कैन नॉट बी ड्रिवन इनू द स्टोन
1:36:27बट इट एंटर्स इजीली इनू द मड।
1:36:33सिमिलरली एन एडवाइस ऑफ एस मैन डस नॉट
1:36:36इफेक्ट द होल वर्ल्ड।
1:36:39बट इट इफेक्ट्स टू द बिलीवर।
1:36:43जैसे
1:36:45आप अपने नाखून को दीवाल से धसाइए।
1:36:52क्या वो धसेगा?
1:36:55नहीं।
1:36:56क्यों?
1:36:59दीवाल कठोर है। नाखून आपका टूट जाएगा
1:37:04लेकिन धसेगा नहीं।
1:37:07अब उसी नाखून को आप गीली मिट्टी में
1:37:09धसाइए। मिट्टी नरम
1:37:14धस जाएगा।
1:37:17ठीक इसी प्रकार यह कोई जरूरी नहीं है कि
1:37:20संत की वाणी का प्रभाव सब पर बराबर रूप से
1:37:24पड़ेगा। जिसका अंतःकरण जितना कोमल होगा उस
1:37:29गीली मिट्टी के समान जितना शुद्ध होगा
1:37:32उतना अधिक प्रभाव पड़ेगा उस पर उस शरणागत
1:37:37पर।
1:37:39अब यदि किसी का अंतःकरण इतना कुसंस्कारी
1:37:44है, इतना गंदा है वो दीवाल के समान
1:37:50तो कितना भी संत बोले
1:37:54ज भी नहीं रगगी।
1:37:56जैसे
1:37:59साक्षात भगवान
1:38:02साक्षात भगवान स्वयं समझाने गए दुर्योधन
1:38:07को।
1:38:09और शांति दूत बनके बड़े प्यार से समझा रहे
1:38:14हैं कि देखो हमें युद्ध आदि करना अच्छा
1:38:17नहीं लगता। इतने लोग मारे जाएंगे। यह
1:38:20युद्ध अच्छी बात नहीं है। झगड़ा करना
1:38:22अच्छी बात नहीं है। हिंसा नहीं करनी हमको।
1:38:26तुम बस पांच गांव दे दो अपने भाइयों को।
1:38:30इतना ही तो तुमको करना है
1:38:34और दुर्योधन
1:38:36भगवान की वाणी का भी उस पर असर नहीं हो
1:38:40रहा।
1:38:42संत छोड़िए भगवान की वाणी और शांति से कह
1:38:47रहे हैं तो भी कोई असर नहीं पड़ रहा।
1:38:49बल्कि दुर्योधन क्या कहता है?
1:38:53एक गाय का चरैया गाला चुप रह।
1:39:00तूने कभी राज्य किया है?
1:39:04तेरे बाप दादाओं ने कभी राज्य किया है? तू
1:39:08क्या जाने राजनीति क्या होती है।
1:39:13ऐसे शब्दों का प्रयोग किया दुर्योधन ने।
1:39:21और फिर
1:39:25दुर्योधन कहते हैं कृष्ण को अरे तुम पांच
1:39:31गांव की बात करते हो राज्य भीख में नहीं
1:39:35मिलता।
1:39:38परिश्रम से मिलता है।
1:39:42हमारे देश में जैसे आई थी ना ईस्ट इंडिया
1:39:45कंपनी
1:39:48धीरे धीरे धीरे पांव जमाया पांव जमाया और
1:39:52जमाते जमाते जमाते शासन करने लग गए।
1:39:56दुर्योधन कहते हैं आज तुम पांच गांव मांग
1:40:00रहे हो। फिर धीरे-धीरे पांच गांव से 50
1:40:03गांव एकत्रित कर लोगे। फिर 500 गांव को
1:40:06अपना बना लोगे। तुम्हारा क्या भरोसा?
1:40:10मैं नहीं दूंगा। सुई की नोक के बराबर भी
1:40:13जमीन नहीं दूंगा।
1:40:16युद्ध तो होगा ही। और भगवान ने विराट
1:40:21स्वरूप दिखाया।
1:40:24तब दुर्योधन ने क्या कहा? हे जादूगर अपनी
1:40:29जादूगरी अपने पास रख।
1:40:33तो यदि अंतःकरण इतना गंदा है तब तो फिर
1:40:39भगवान की वाणी का असर नहीं पड़ा तो हमारा
1:40:42भी अंतःकरण यदि इतना कुसंस्कारी इतना
1:40:45दूषित तो संत बोलते रहे कोई असर नहीं
1:40:50पड़ेगा। तो यह डिपेंड करता है कि हमारा
1:40:54अंतःकरण कितने परसेंटेज शुद्ध है।
1:41:00जैसे
1:41:02प्योर लोहे की सुई है तो तुरंत चुंबक से
1:41:07मिल जाएगी। आपको बोलना नहीं पड़ेगा।
1:41:11तुरंत धावित होगी चुंबक से मिलने के लिए
1:41:15क्योंकि शुद्ध लोहा है। लेकिन यदि उसमें
1:41:19दूसरी धातु है। आधा लोहा आधी दूसरी धातु
1:41:22थोड़े देर से धावित होगी।
1:41:28देर में चुंबक से मिलेगी और जो
1:41:32ऐसी सुई है जिसमें लोहा है ही नहीं दूसरी
1:41:37धातु की है आप उसको चुंबक से रगड़ डालिए।
1:41:42चुंबक उसको अपने में नहीं मिलाएगा।
1:41:47तो इसी प्रकार से
1:41:51संत
1:41:53के संग से बार-बार संग से इसका यह मतलब
1:41:58नहीं है कि आप सोचे भाई हम में तो श्रद्धा
1:42:01ही नहीं है। अब श्रद्धा नहीं है तो हम जाए
1:42:04तो हम पर तो महात्मा के वाणी का असर ही
1:42:09नहीं पड़ेगा। ऐसा नहीं शास्त्र एक बात और
1:42:13कहते हैं
1:42:16सता प्रसंगान
1:42:19मम वीर्य संविदो
1:42:22भवती हित रसायना कथा तजणादा
1:42:28स्वपवर्ग वनी
1:42:31श्रद्धा रति भक्ति अनुक्रमति
1:42:36देखिए प्यासे सब है
1:42:41शांति सबको चाहिए बशर्त है कि कोई सही
1:42:44देने वाला मिल जाए। अब कोई ऐसे ही आपको
1:42:48बता दे इतना जाप कर लो, इतनी किताब पढ़
1:42:51लो। अरे पढ़ते भी हैं, करते भी हैं। कुछ
1:42:53होता तो है नहीं।
1:42:56हां, पावर हाउस ने सही नहीं बताया।
1:42:59गड़बड़ी है। लेकिन यदि सही पावर हाउस है
1:43:06तो फिर आप में यदि श्रद्धा नहीं भी है।
1:43:09शास्त्र कहते हैं कि बिना श्रद्धा के जाओ।
1:43:13सत्संग करो, संत का संग करो।
1:43:18संत में वह पावर है कि बार-बार अश्रद्धा
1:43:23से भी जाने पर बार-बार उनके पावन सानिध्य
1:43:28से, पावन दर्शन से, दिव्य वाणी से यह
1:43:33प्रभाव पड़ेगा कि तुम्हारे भीतर
1:43:37श्रद्धा रति सब अपने आप पैदा हो जाएगी।
1:43:42अनुक्रमति
1:43:45इसलिए यह नहीं सोचना कि हम जाए कैसे
1:43:50अपने आप होगा वो यह कमाल होगा
1:43:56तो
1:43:58यह अनुभव प्रमाण है कि जितना जितना आप
1:44:02वास्तविक संत का संग करेंगे
1:44:06उनके संग से उनकी कृपा से ईश्वर में
1:44:09अनुराग और संसार से वैराग्य होगा और यही
1:44:14कार्य है उनका। इसीलिए वह जगत में आए हैं
1:44:18कि आपको
1:44:20इन विषयों से छुड़ाकर भगवतीय प्रेम दिलाकर
1:44:24अपने घर पहुंचा दे। जो हमारा अपना घर है।
1:44:29यह जन्म मरण का बंधन छुड़ा दे।
1:44:34और सबसे अंतिम लक्षण
1:44:40देखिए वैसे तो मैं आपको बता देना चाहती
1:44:42हूं कि जो वास्तविक संत होते हैं उनमें
1:44:48तीन प्रकार की अवस्थाएं होती हैं।
1:44:51बालवत
1:44:54उन्मादवत
1:44:56पिशाचवत
1:45:01कचित शिष्टा कचित भ्रष्टा क्वचित भूत
1:45:05पिशाचवत
1:45:08बालवत माने जो वास्तविक संत होते हैं वो
1:45:13बिल्कुल
1:45:15भोले बालक के समान सरल होते हैं बच्चे के
1:45:20समान होते
1:45:22बिल्कुल सहज बिल्कुल सरल
1:45:27कॉम्प्लिकेटेड नहीं होते
1:45:32बच्चे के समान और उसके साथ साथ उनका
1:45:37वक्तव्य स्पष्ट होता है वो स्पष्ट बोलते
1:45:42हैं
1:45:44और उनके जीवन में भी स्पष्टता होती है।
1:45:48उनकी वाणी में स्पष्टता, उनकी सोच में
1:45:52स्पष्टता, उनके वक्तव्य में स्पष्टता।
1:45:58वो किसी की निंदा आदि नहीं करते। ना निंदा
1:46:01ना स्तुति। कोई लल्लू चप्पो नहीं।
1:46:05स्पष्ट होते हैं।
1:46:07और कोई यदि उनका अपमान करता है, उनकी
1:46:13निंदा करता है, इसका भी संत पर कोई प्रभाव
1:46:18नहीं पड़ता। इतिहास साक्षी है।
1:46:23इतिहास साक्षी है। चाहे तुलसी को ले
1:46:26लीजिए, सुर को ले लीजिए, मीरा को लीजिए,
1:46:28नानक को लीजिए, सबके इतिहास की गाथाएं आप
1:46:32पढ़े। कितना कष्ट सहा, कितना अपमान, कितनी
1:46:36निंदा
1:46:38लेकिन इसका प्रभाव उनके जीवन पर नहीं
1:46:41पड़ा।
1:46:42कोई असर नहीं होता। वो बालवत होते हैं।
1:46:47बालकवत।
1:46:51आइए मैं आपको अपने गुरुदेव की एक घटना
1:46:54सुनाती हूं।
1:46:58अचानक याद आ गई।
1:47:04बहुत पुरानी बात है। उस समय गुरुदेव जगत
1:47:08गुरु नहीं बने थे और जगह जगह जाकर छोटा
1:47:13छोटा सत्संग करते थे। लोगों को आंख बंद
1:47:17करके प्रवचन सुनाते थे। भगवान की बातें
1:47:20बतलाते थे।
1:47:23और उनका स्वभाव था कि एक थैला तक भी अपने
1:47:28साथ नहीं रखते थे।
1:47:30जिसके घर गए जो कपड़ा मिला उसको पहन लिया।
1:47:34अब कोई उनके नाप का तो कपड़ा रखेगा नहीं।
1:47:37तो टाइट है तो टाइट ही पहन लिया। लूज है
1:47:40तो लूज ही पहन लिया। जैसा मिला उस घर से
1:47:44पहना। दूसरे घर में पहुंचे। वहां उतार
1:47:46दिया। उसका पहन लिया। आगे बढ़ गए। तो यह
1:47:51हाल था गुरुदेव का।
1:47:54तो एक बार वह फर्स्ट क्लास
1:47:58में बैठकर ट्रेन में कानपुर से इलाहाबाद आ
1:48:02रहे थे।
1:48:05तो टीटी आया
1:48:09टीसी टिकट कलेक्टर चेक करने के लिए तो
1:48:12उसने गुरुदेव से टिकट मांगी।
1:48:16तो गुरुदेव ने उससे कहा अच्छा एक बात बताओ
1:48:21तुम अपने पिता से टिकट मांगोगे
1:48:26तो उसने कहा
1:48:29क्यों नहीं तुम्हारे पिता टिकट लेकर इसमें
1:48:32बैठेंगे
1:48:34तो टीसी ने कहा नहीं नहीं भाई मैं रेलवे
1:48:38का कर्मचारी हूं मुझे पास मिलता है तो
1:48:40मेरे पिताजी क्यों टिकट लेकर बैठेंगे
1:48:44तो गुरुदेव ने कहा
1:48:50तो ठीक है फिर
1:48:54यदि तुम्हारे पिता
1:48:56टिकट ले नहीं बैठेंगे
1:49:00तो मैं भी टिकट ले नहीं बैठता।
1:49:04अरे
1:49:06मेरे बात से आपकी बात का क्या मतलब है?
1:49:15तो गुरुदेव ने कहा
1:49:18वो मतलब यह है कि जो मेरा बेटा है ना
1:49:24वो डीएस है
1:49:27डिवीजनल सुपरिटेंडेंट रेलवे में
1:49:31अब यह व्यक्ति सोचे
1:49:35यह तो 30 31 साल का युवक है और जो डीएस
1:49:39होंगे वह तो इतनी उम्र वाले होंगे यह कहता
1:49:42है कि मैं उनका पिता हूं। वह मेरा बेटा
1:49:46है।
1:49:48तो इस टीसी ने समझा कि यह कोई पागल है।
1:49:54तो उसने कहा कि आप होश में तो हैं आप क्या
1:49:58बोल रहे हैं? बोले हां वो मेरा बेटा है।
1:50:02तो टिकट कलेक्टर ने क्या किया और टीसी को
1:50:05बुला लिया मजाक बनाने के लिए। बोले देखो
1:50:09देखो एक आए हैं जरा देखो फर्स्ट क्लास में
1:50:12बैठे हैं मैं टिकट मांगता हूं तो कहते हैं
1:50:14कि डीएस जो है वो मेरे बेटे हैं अब उस समय
1:50:20श्री के बी माथुर जी थे वो डीएस थे बाद
1:50:23में वो चेयरमैन भी बन गए और चेयरमैन पोस्ट
1:50:26से ही उन्होंने रिटायरमेंट ली तो वो
1:50:30सत्संगी थे वो महा जी का प्रवचन सुनते थे
1:50:32और महाराज जी से बहुत प्यार था उनका
1:50:35खैर अब ये टीसी एक दो तीन चार सबको ले आए
1:50:41और सब मजाक बनाए
1:50:44कि अच्छा अच्छा डीएसजी आपके बेटे हैं।
1:50:50अब स्टेशन आया तो एक टीसी ने कहा यदि वो
1:50:56डीएसजी आपके बेटे हैं तो फिर आपको स्टेशन
1:50:58भी लेने जरूर आएंगे।
1:51:01तो महाराज जी ने कहा कि यदि मैंने सूचना
1:51:04दी होती तो आ जाते लेकिन मैंने तो खबर ही
1:51:08नहीं दी। मैं तो अचानक ही जा रहा हूं। खैर
1:51:10कोई बात नहीं जब मैं उतरूंगा तो मैं फोन
1:51:13लगा दूंगा रेलवे स्टेशन से तो मेरा बेटा आ
1:51:16जाएगा।
1:51:18अब तो इनको और मजा आया। देखें अब उतरे
1:51:21स्टेशन।
1:51:24स्टेशन आ गया। यह उतर गए। अब यह सब के सब
1:51:27लेकर गए उनको। फोन लगाओ। तो नंबर तो था ही
1:51:31तो उन्होंने नंबर लगा दिया और उधर से आवाज
1:51:35भी आ रही है। इधर से इन्होंने कहा मैं
1:51:37स्टेशन में हूं आ जाओ। अब उधर क्या आवाज
1:51:40हो रही इन हटी सी सबको किसी को पता ही ना
1:51:44चले। नंबर तो सही लगाया है लेकिन वहां
1:51:47किसने उठाया है क्या पता। ऐसे ही बेवकूफ
1:51:51बना रहा है। देखते हैं जरा। तो कुछ देर
1:51:54वेट किया तो इतने में देखा कि वो डीएस जी
1:51:58सामने से आ रहे हैं। अब तो यह जितने
1:52:02टीसी सबकी हालत खराब और वह डीएस जी आए आए
1:52:06और तुरंत महाराज जी के चरण पकड़ के बोले
1:52:09अरे आप बता तो देते
1:52:12बताए नहीं अचानक आ गए
1:52:15महाराज जी खैर हाथ में फर्स्ट क्लास का
1:52:19टिकट पकड़े थे
1:52:21तो जब जाने लगे तो हाथ खोल के टिकट किसी
1:52:24को दे दिया ये लो टिकट
1:52:28अब उसको उसको और बुरा लगे कि यह तो टिकट
1:52:31लेकर बैठे थे। मैं कुछ बोल भी नहीं सकता।
1:52:33ऊपर से मैंने इन इनका बहुत अपमान किया है।
1:52:37बहुत मजाक बना दिया इनका। अब क्या होगा?
1:52:40मेरी तो नौकरी गई।
1:52:43अब महाराज जी तो मुस्कुरा के चले गए।
1:52:47अब इधर इनको रात भर नींद ना आए। अब ये
1:52:51टीसी ने जिसने बहुत मजाक बनाया था। इसने
1:52:54अपनी पत्नी से कहा कि मैं क्या करूं? मुझे
1:52:57तो लगता है मेरी नौकरी गई।
1:53:00पत्नी ने कहा कोई बात नहीं कल सवेरे अपन
1:53:03वो गुरुदेव के पास जाएंगे। उनसे क्षमा
1:53:06मांग लेंगे और सारी बात कह देंगे आप घबराओ
1:53:09मत। तो दूसरे दिन
1:53:12पति पत्नी ये दोनों डीएस के घर पहुंचे। तो
1:53:17गुरुदेव बाहर आंगन में बैठे हुए थे और वह
1:53:20दरवाजे पर खड़े हैं गेट पे और अंदर नहीं आ
1:53:24रहे। संकोच के कारण अचानक गुरुदेव ने देखा
1:53:27तो उठ के गए और अपनी दोनों भुजाएं फैलाई।
1:53:31एक हाथ टीसी के कंधे पर और एक हाथ उसकी
1:53:35पत्नी के कंधे पर बोले आओ आओ आओ आओ अंदर
1:53:38आओ आओ।
1:53:41और बैठाया अपने साथ और ये घबराए अपना।
1:53:46इतने में डीएस जी आ गए।
1:53:50तो गुरुदेव ने कहा इनको जानते हो ना उस
1:53:53दिन स्टेशन में मिले थे किसी ने कहा हो
1:53:57गया बंटा ढार ये बता देंगे कि मैंने इनके
1:54:00साथ क्या किया तो गुरुदेव ने कहा देखो
1:54:03बेटा
1:54:06इसने
1:54:09हमारी बहुत सेवा की थी ट्रेन में
1:54:14इसका
1:54:16हमारे ऊपर ऋण है
1:54:22अब वह तो सोच रहा था कि यह असलियत बता
1:54:25देंगे और यह भी महाराज जी भी कह रहे हैं
1:54:30कैसी सेवा की थी। इसने हमारी बहुत सेवा की
1:54:34थी इसीलिए देखो तुम इसका विशेष ख्याल
1:54:37रखना।
1:54:39हमारी यह इच्छा है कि इसका प्रमोशन करा
1:54:42दो।
1:54:45सोचिए
1:54:48डीएस जी ने प्रमोशन कराया उनका।
1:54:51यह है संत।
1:54:55उनको अपने अपमान से कोई मतलब नहीं। कितना
1:54:58अपमान किया। पांच पांच टीसी आके अपमान कर
1:55:01रहे हैं। जबकि उनकी टिकट उनके हाथ में है।
1:55:04उन्होंने दिखाई नहीं। लेकिन उनको मजा आ
1:55:06रहा है अपना अपमान कराने में।
1:55:10और उतर के टिकट भी दी। फिर उसकी प्रमोशन
1:55:13भी कराई। यह नहीं शिकायत की कि इसने हमारा
1:55:16अपमान किया तो देख लेना इसको।
1:55:21तो बालवत
1:55:25वास्तविक संत जो होते हैं उनके पास
1:55:29ईश्वरीय प्रेम होता है।
1:55:33वह ईश्वरीय प्रेम से युक्त होते हैं।
1:55:38लेकिन वह प्रेम को छिपाए रखते हैं।
1:55:42हमेशा उसका प्रदर्शन नहीं करते। परंतु जब
1:55:47भगवान के नाम, रूप, लीला, गुण आदि का
1:55:50वातावरण दिया जाता है।
1:55:54उस वातावरण में जब वो रहते हैं तब फिर वो
1:55:58जो अंदर अघात समुद्र है, प्रेम का जो
1:56:03हिलोरे ले रहा है, जब वो वातावरण मिलता है
1:56:07तो फिर वो प्रेम टिकता नहीं। वो लक्षणों
1:56:11से प्रकट होता है।
1:56:14स्तंभद
1:56:15रोम स्वर वेदवे पथ व प्रलय
1:56:22सात्विका
1:56:25यह एक वेदना है भगवान के प्रति जो हर किसी
1:56:29में नहीं होती।
1:56:32यह मत समझना कि कोई बहुत बढ़िया प्रवचन
1:56:35देता है तो उसमें यह ईश्वरीय प्रेम होगा।
1:56:39यह एक अलौकिक वस्तु है ईश्वरीय प्रेम। जिस
1:56:43प्रेम के पीछे पीछे भगवान चलते हैं।
1:56:48वो प्रेम
1:56:50वो जिस संत के पास है वो प्रेम वातावरण
1:56:56देने पर किन लक्षणों से प्रकट होता है?
1:57:00उनके नेत्रों से अविरल अश्रु बहते हैं।
1:57:04उनको पसीना आता है। उनको रोमांच होता है।
1:57:08उनके शरीर का रोंगटा एक एक रोया खड़ा हो
1:57:12जाता है। उनको कंपन होता है। उनका जो स्वर
1:57:16है वह बदल जाता है। उनके शरीर का रंग कभी
1:57:20तो फीका पड़ जाता है और कभी ददीप्यमान हो
1:57:24जाता है। ऐसे लक्षण प्रेम समाधि में देखे
1:57:29जाते हैं। जब भगवान के नाम रूप लीला आदि
1:57:34का संकीर्तन या सत्संग होता है तब कभी-कभी
1:57:39यह प्रेम के लक्षण बाहर दिखाई पड़ते हैं।
1:57:43जिसको प्रेम समाधि बताया जाता है।
1:57:46रामकृष्ण देव में यह लक्षण देखे गए।
1:57:49चैतन्य महाप्रभु में यह लक्षण देखे गए और
1:57:53कृपालु जी महाराज में यह लक्षण देखे गए और
1:57:57इन्हीं लक्षणों को देखकर काशी विद्वत
1:58:01परिषद में काशी के विद्वानों ने भक्ति योग
1:58:04रसावतार की उपाधि से विभूषित किया था कि
1:58:09यह देव पुरुष है। यह साधारण नहीं है।
1:58:12इनमें वो ईश्वरीय प्रेम विद्यमान।
1:58:16तो यह सारे लक्षण है विशुद्ध संत के जिसको
1:58:21देखकर चतुर चालाक बुद्धिमान जीव को अपने
1:58:25आत्म कल्याण के लिए
1:58:28ऐसे वास्तविक संत की शरणागति करनी है। तब
1:58:33उस शरणागति से अंतकण शुद्धि पर वही संत
1:58:38वही गुरु वही सद्गुरु उन्हें ईश्वर
1:58:42प्राप्ति कराएगा और सदा सदा के लिए माया
1:58:46से मुक्ति करा देगा। तो यह मैंने आपको आज
1:58:51वास्तविक संत के लक्षण बतलाए। कुछ पहचान
1:58:55बताई। कल से नया विषय प्रारंभ होगा।
1:59:00जब आपको जीवन में वास्तविक संत मिलेंगे तो
1:59:04वह आपको बतलाएंगे भगवान को प्राप्त करने
1:59:08के कितने मार्ग हैं और हम कलयुगी जीवों के
1:59:13लिए कौन सा मार्ग
1:59:16उपयुक्त है। इन सब बातों पर आज नहीं कल
1:59:22विचार किया जाएगा। देखिए आज रविवार है।
1:59:26मैं आपसे 10 मिनट का समय मांग रही हूं और
1:59:32आज आप 10 मिनट के लिए रुकेंगे। आज कीर्तन
1:59:35नहीं होगा।
1:59:39कुछ
1:59:40साधकों ने
1:59:42स्टॉल में
1:59:45जानकारी लेनी चाही और पूछना चाहा कि हम
1:59:50देवी जी के बारे में जानना चाहते हैं।
1:59:52उनका आश्रम कहां पर है और
1:59:58क्या-क्या आध्यात्मिक एक्टिविटीज होती
2:00:02हैं? एक प्रकार से आपको जानकारी चाहिए।
2:00:07तो इतना समय तो नहीं है मेरे पास कि मैं
2:00:10आपको डिटेल में बताऊं।
2:00:13वो तो जब आप मेरे साथ जुड़ेंगे मेरे साथ
2:00:18साथ
2:00:20इस यात्रा में चलेंगे
2:00:22तो अपने आप आपको सारी जानकारी मिल जाएगी।
2:00:28गुरुदेव के विषय में तो मैं आपको बता ही
2:00:30रही हूं। इस प्रकार से आपको हर एक्टिविटीज
2:00:34की जानकारी मिलेगी। लेकिन फिर भी
2:00:38थोड़ी सी जानकारी के लिए यहां पर अभी 10
2:00:41मिनट के लिए डॉक्यूमेंट्री दिखाई जाएगी।
2:00:46उस डॉक्यूमेंट्री में संक्षेप में
2:00:50गुरुदेव मेरे बारे में और आश्रम के बारे
2:00:54में और आश्रम की एक्टिविटीज के बारे में
2:00:59सब कुछ बताया गया है।
2:01:02तो आप लोगों से अनुरोध है कि आप लोग कृपया
2:01:06मेरे कहने पर आज कीर्तन नहीं हो रहा है तो
2:01:09उतना ही टाइम आप लोग कृपया डिवोट करेंगे
2:01:13यहां बैठेंगे और उस डॉक्यूमेंट्री को देख
2:01:17लेंगे ताकि आपको अनुमान हो जाए।
2:01:22सवेरे जैसे आज कीर्तन हुआ था रूप ध्यान
2:01:27संकीर्तन जिसमें आपको जो यह थ्योरी का
2:01:31ज्ञान दे रही हूं।
2:01:33सवेरे मैं क्रियात्मक साधना कराती हूं।
2:01:37प्रैक्टिकल
2:01:38जो आपके अंतःकरण शुद्धि हेतु जो गुरुदेव
2:01:43ने साधना पद्धति बतलाई है उसे मैं करवाती
2:01:47हूं। तो जिनको यह लाभ लेना है तो सवेरे
2:01:52इसी स्थान पर 7:30 बजे आप लोग उपस्थित हो
2:01:56जाएंगे। आज रविवार था इसीलिए
2:02:01मैंने अधिक देर तक कराया था लेकिन कल 7:30
2:02:05से 9 बजे तक होगा सवेरे ऑफलाइन क्विज
2:02:09विनर्स मीनाक्षी दास अपर्णा राठौड़
2:02:13शिवकांत रोशनी शर्मा धर्मिन गढ़वाल ऑनलाइन
2:02:19क्विज विनर्स गोवर्धन जैन कोलकाता समर्थ
2:02:24हैदराबाद लीलावती बहरा भुवनेश्वर
2:02:28भावना पोरबंदर
2:02:30शुभम द्विवेदी हैदराबाद हरिश्चंद्र बहरा
2:02:33बेंगलुरु प्रिया मिश्रा रायपुर
2:02:38मुझे आप आज्ञा देंगे लेकिन आप कृपया 10
2:02:43मिनट के लिए बैठे और अभी डॉक्यूमेंट्री
2:02:46लगा दी जाएगी और आप लोग एलईडी में वो
2:02:49डॉक्यूमेंट्री को देखेंगे।
2:02:52बोलिए वृंदावन बिहारी लाल की। श्रीमत
2:02:57सतगुरु सरकार की
2:03:08राधेधे। आप जो सामने हैं आपको उठना नहीं
2:03:11पड़ेगा। यहां पर प्रोजेक्टर लगाया जाएगा।
2:03:14तो आप लोग यहां बैठ के देख सकते
2:03:18एलईडी लगी हुई है उनको उसमें दिखाई पड़
2:03:20जाए।