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0:00तो हम
0:02श्रीमद् भागवत के प्रथम स्कंद
0:0714 अध्याय धृतराष्ट्र का ग्रह त्याग से
0:11पाठ कर रहे हैं
0:13और हम देख रहे हैं किस प्रकार
0:15नारद मुनि युधिष्ठिर महाराज को समझा रहे
0:19हैं
0:20की धृतराष्ट्र का ग्रह टी
0:24उनके लिए शुक्र कारण नहीं होना चाहिए
0:27सर्वप्रथम उन्होंने बताया कैसे भगवान के
0:31एलएसआर रूप से सब कार्य सिद्ध होते हैं
0:34भगवान की इच्छा से ही सब कार्य होते हैं
0:37है और फिर उन्होंने बताया की कैसे शारीरिक
0:40चेतना से ऊपर उठकर
0:43आध्यात्मिक चेतना तक हमें जाना है
0:46और अभी वो कर्म के जो
0:50अनुरूप कार्य होते
1:18हरे कृष्ण गुरुजी दंडवत प्रणाम
1:21जो बिना हाथ वाले हैं वह हाथ वालों के
1:24शिकार है जो
1:28उपाय के शिकार है निर्बल के भोज्य और
1:34सामान्य नियम यह है की जीव दूसरे जीव का
1:37भोजन बना हुआ है हर एक कृष्ण तो यह कर्म
1:41के जो नियम है उसके बारे में अब नारद मुनि
1:44बता रहे हैं की किस प्रकार
1:47हर व्यक्ति हर जीव आत्मा जीवन जीने के लिए
1:50संघर्ष करता है और एक जीव दूसरे जीव के
1:54लिए भोजन समान है तो ऐसे कर्म के फेरों
1:57में किसी भी प्रकार से शो करने का कोई
2:00कारण नहीं
2:03मध्य माधवी प्यारी माता जी पड़ी है
2:10रखने के लिए जीवन संघर्ष का नियम भगवान की
2:13परम इच्छा से है और कितनी भी योजनाओं के
2:17द्वारा किसी के लिए भी इससे छुटकारा नहीं
2:19मिल सकता जो जीव इस संसार में परम पुरुष
2:23की इच्छा के विपरीत आए हैं वे माया शक्ति
2:26के शक्ति नामक उच्चतर शक्ति के अधीन कहते
2:30हैं और जो भगवान द्वारा नियुक्त होती है
2:33यह देवी माया buddhijivon को तीन प्रकार
2:36के टेपों से सताती रहती है जिम से एक की
2:40व्याख्या श्लोक में हुई है निर्बल सबल का
2:44आहार है कोई भी अपने से अधिक सफल के हमले
2:48से अपने रक्षा नहीं कर सकता भगवान की
2:51इच्छा से निर्बल सफल तथा सर्वाधिक ये तीन
2:55कोटियां बनी हुई हैं यदि बाग निर्बल पशु
2:59को जिसमें मनुष्य भी सम्मिलित है तो इसमें
3:03करने की कोई बात नहीं क्योंकि यह तो
3:06परमेश्वर का नियम है
3:09की मनुष्य को किसी अन्य के जीवन पर जीवन
3:14निर्वाह करना होता है लेकिन सद्भाव का भी
3:18नियम है क्योंकि मनुष्य को शास्त्रों के
3:21नियमों का पालन करना होता है अन्य जीवधारी
3:24द्वारा ऐसा करना संभव नहीं होता मनुष्य
3:28आत्मा साक्षात्कार के लिए आया है इसलिए
3:31उसे भगवान को अर्पित किए बिना कोई भी
3:34वस्तु नहीं खानी चाहिए भगवान अपने भक्तों
3:37से शार्प फल पट्टी और उन के बने विभिन्न
3:41व्यंजन स्वीकार करते हैं अतः फल पट्टी तथा
3:44दूध के विविध पकवान भगवान को अर्पित किए
3:48जा सकते
3:51इस प्रसाद को ग्रहण कर सकता है जिससे जीवन
3:55संघर्ष के सारे क्लेश कर्म शाह दूर हो
3:58जाएंगे इसकी पुष्टि भागवत गीता 96 में हुई
4:02है
4:03जो लोग पशुओं का भाषण करने के आदि हो गए
4:06हैं बेबी सीधे भगवान को भोज्य पदार्थ ना
4:09अर्पित कर धार्मिक अनुष्ठानों की कटी पे
4:13दशाओं में भगवान के किसी दूध को अर्पित कर
4:17सकते हैं शास्त्रों का आदेश मांस पशुओं को
4:20प्रोत्साहित करना नहीं अपितु नियमों के
4:24द्वारा उन पर प्रतिबंध लगाना है यहां पर
4:28बताया जा रहा है इस प्रकार बाकी सारे जो
4:32जीवात्मा है जो अलग-अलग योनियों में है वह
4:35तो अपना आहार शरीर के हिसाब से खाएंगे
4:38लेकिन मनुष्य को भगवान ने यह बुद्धि विवेक
4:41दिया
5:01नहीं तो वह भी पशुओं के समान दूसरे दूसरे
5:05अगर जानवरों को खाएगा तो कर्म बंधन में
5:08पड़ता चला जाएगा
5:20पक्ष होता है किसी को किसी भी परिस्थिति
5:23में अपने जीवन निर्वाह के लिए चिंतित नहीं
5:25होना चाहिए क्योंकि सर्वत्र ही जीव है और
5:27कहीं पर भोजन के अभाव में एक ही जीव को
5:30नहीं मार्ता मारा ज्योतिर्लिंग को
5:32श्रृंगार
5:33की भोजन के अभाव में अपनी चर्चाओं के कष्ट
5:36होने की चिंता ना करें क्योंकि वे जंगल
5:38में उपलब्ध शकों को श्री भगवान के प्रसाद
5:40के रूप में प्राप्त करके जीवित रह सकते
5:42हैं और इस प्रकार मोक्ष मार्ग प्राप्त कर
5:45सकते हैं सफल द्वारा दुर्बल का शोषण
5:47प्राकृतिक अस्तित्व का नियम है जीवन के
5:50विभिन्न samrajyon में निर्बल को निगल
5:52जाने का सदैव प्रयास होता है
5:55भौतिक परिस्थितियों में किसी कृत्रिम साधन
5:57से इस प्रवृत्ति को रोके गए जाने की कोई
6:00संभावना नहीं है
6:02इसे मनुष्य के आध्यात्मिक भाव को
6:04आध्यात्मिक नियमों के अभ्यास द्वारा जागा
6:06कर ही रोका जा सकता है किंतु आध्यात्मिक
6:08विधि विधान का एक और मनुष्य को निर्बल
6:10पशुओं का वध करने तथा दूसरी ओर शांतिपूर्ण
6:13सह अस्तित्व की शिक्षा नहीं देता यदि
6:15मनुष्य पशुओं को शांतिपूर्ण की अनुमति
6:17नहीं देता तो फिर वह किस प्रकार मानव समाज
6:20में शांतिपूर्ण की उम्मीद कर सकता है अतः
6:23अंधे नेताओं को चाहिए की वे परम पुरुष को
6:25जाने और कब ईश्वर के राज्य सत्ता को लागू
6:27करने का प्रयास करें विश्व के जैन समुदाय
6:30के मैन में इस चेतना को जगाए बिना ईश्वर
6:32का राज्य या रामराज्य असंभव
6:36तो यहां पर सिर्फ बता रहे हैं किस प्रकार
6:39हमें तो किसी एन किसी जो-जो जीवन हम किसी
6:44ना किसी को खाना है लेकिन किसको खाना है
6:46वह शास्त्रों से निर्णय होता है शास्त्रों
6:50में बताएं
6:54लेकिन अगर कोई दूसरी तरफ बहिर रूप से तो
6:58बोले की नहीं विश्व में शांति होना चाहिए
7:00सब जगह अच्छे-अच्छे होना चाहिए और उनके
7:03डिनर टेबल पर पशु खा रहे हैं तो इस प्रकार
7:06से आडंबर करने से वह स्वयं ही शांति से
7:10बहुत दूर समाज को ले जा रहे हैं और इस
7:13प्रकार के pashuvat की यहां पर
7:15आलोचना हुई है
7:18तो प्रॉपर बता रहे हैं की युधिष्ठिर
7:21महाराज को नारद मुनि मानो यह सनटैन भी दे
7:24रहे हैं की आपको चिंता करने की आवश्यकता
7:27नहीं है भगवान ने बहुत अच्छा आयोजन किया
7:29है हर जीव आत्मा की भोजन के लिए तो आपके
7:32चाचा चाची के लिए भी कोई चिंता नहीं है
7:34आपको किसी प्रकार का भाई नहीं होना चाहिए
7:38तब एकदम भगवान राजन एक आत्मा आत्मन
7:42स्वीडिश अंतर और भांति
7:46pakshatamay युद्ध
7:49सविता माताजी अनुवाद पड़ी
7:57एकमात्र परमेश्वर को देखना चाहिए जो
8:00आदित्य है और जो विभिन्न
8:03शक्तियों से साक्षात प्रकट होते हैं और
8:06भीतर तथा बाहर दोनों में है
8:10इसीलिए एकमात्र भगवान के बारे में सोचिए
8:13इधर उधर अपना ध्यान मत लगाइए अभी हम कुछ
8:17दिन पहले एक स्थान पर गए द तो एक भक्त ने
8:20बहुत अच्छा रसोई की है उनका उम्र हो गया
8:2265 65 के आसपास
8:27लेके आए द तो हमने जो प्रसाद लिया उनको
8:31बोला करो
9:01अनीता माताजी तात्पर्य पढ़िए
9:07पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान
9:11शक्तियों के द्वारा स्वयं प्रकट होते हैं
9:13क्योंकि वह स्वभाव से आनंद में हैं सारे
9:17जीवन की तत्सत शक्ति के प्रकट है जो गुना
9:20में भगवान के समान और भगवान की बजरंग
9:24शक्तियों के भीतर तथा बहा दोनों ही जगह
9:27असंख्य जीव हैं क्योंकि आध्यात्मिक जगत
9:30भगवान के अंतरंग शक्ति की अभिव्यक्ति हैं
9:39दूषित हुए बिना गुण में भगवान
9:42से गुना में एक होकर भी भौतिक जगत के कर्म
9:47के कारण विकृत रूप में दिखता है
9:54ऐसे अनुभव
9:57पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता ऐसे शारीरिक सुख
10:00तथा दुख के अनुभूति अपने भगवान के समान
10:03गुण की
10:05के कारण होती है किंतु भगवान से भीतर तथा
10:08बाहर एक नियमित धारा प्रवाहित होती रहती
10:11है जिससे जीव अपनी पतित अवस्था को सुधार
10:15सकता है भीतर से वे अंतर्यामी परमात्मा के
10:18रूप में इच्छा करने वाले जीवन को सुधारते
10:21हैं और बाहर से वे गुरु तथा शास्त्रों के
10:25रूप में अपनी अभिव्यक्ति द्वारा sudhate
10:27रहते हैं मनुष्य को भगवान की ओर ही दृष्टि
10:30लगानी चाहिए उसे तथाकथित सूक्त तथा दुख
10:33प्रकट होने पर विचलित नहीं होना चाहिए
10:44मनुष्य को आध्यात्मिक गुरु बनकर उनको
10:46सहयोग देना चाहिए किसी को अपने लिए निजी
10:50किसी को अपने निजी लाभ के लिए आजीविका
10:53कमाने के लिए थोड़ा धंधे के साधन के लिए
10:55गुरु नहीं बन्ना चाहिए
11:02गुणात्मक रूप से भगवान एक होते हैं और
11:06भुलक्कड़ जी केवल विकृत pratibimbhat होते
11:09हैं अतः डिजिटल महाराज को नारद उपदेश देते
11:12हैं की वे तथाकथित सूक्त तथा दुख के
11:15मामलों से तनिक भी विचलित ना हो तभी तो
11:18भगवान के उसे दे को पूरा करने के लिए
11:20भगवान को देखें जिसके लिए भगवान अवतरित
11:24हुए हैं यही उनका मूल कर्तव्य हरे कृष्ण
11:28चक्रवर्ती ठाकुर बोलते हैं की जिस प्रकार
11:31एक गे चराने वाला अपने हाथ में लाठी
11:35पकड़ता है यदि गे गायों का समूह इधर-उधर
11:39जाता है तो लाठी से उनको ठीक मार्ग पर ले
11:42आता है उसी प्रकार गुरु गुरु
11:46निकलता है अपनी चेतना में तो गुरु का
11:49कार्य पुनः उसको अपनी चेतना को सही करने
11:52में मदद करें
11:57यह हमें बहुत मीठी मीठी बात बोलकर की खुश
12:01करना नहीं है कई बार करेंगे भी लेकिन
12:04यह कम है गुरु हमारे पथ से अगर हम चुप हो
12:08तो हमें दोबारा पथ पर लाइन तो नारद मुनि
12:11यहां पर वही बोल रहे हैं दृश्य महाराज का
12:13भगवान पर ध्यान लगाइए यह सब शोक विलाप
12:16करके आपको कोई लाभ नहीं होने वाला है
12:21भगवान भूत भावना कलरू
12:28शाम विनोद प्रभु अनुवाद पढ़िए
12:37यही पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान श्री कृष्ण
12:40sarvbhakshi कल के वेश कलरू में अब संसार
12:45में देसी लोगों का सर्वनाश करने के लिए
12:48पृथ्वी पर अवतरित हुए हैं हरे कृष्ण
12:53आपके साथ हैं जब आप उनको अपने
12:58मार्गदर्शक के रूप में स्वीकार किए हैं तो
13:01तो आपको किसी प्रकार का विलाप होना ही
13:03नहीं चाहिए क्योंकि वही स्वयं कल रूप है
13:04उनकी इच्छा से सब कुछ हो रहा है यदि वह
13:08किसी को विनाश भी कर रहे हैं धर्म की
13:10स्थापना के लिए कर रहे हैं तो आपके लिए
13:12गुलाब करने की आपको कोई आवश्यकता नहीं है
13:15मुकुल प्रभु तात्पर्य पढ़िए
13:19मनुष्य की दो श्रेणियां है देवीशी तथा
13:22aagyapalat की परमेश्वर एक है
13:30किंतु जो
13:31जीव सर्वोपरि पिता के प्रति आज्ञाकारी के
13:35भी देवता कहलाते क्योंकि वे जीवन की भौतिक
13:38अवधारणा द्वारा दूषित नहीं होती असुर लोक
13:41एन केवल भगवान के
13:43द्वेष दिखाते हैं apituven अन्य समस्त
13:46जीवन से भी द्वेष रखते हैं जगत में असुरों
13:50के प्रावधान को कभी-कभी भगवान उनके पुरी
13:53तरह vinasht करके ठीक करते ही और पांडव
13:56जैसे देवताओं का राज्य स्थापित करते हैं
13:59चंद्र रूप में कल नाम की उनकी उपाधि
14:02महत्वपूर्ण है वेलांचा मात्रा
14:11उनके सामने उनका वास्तविक रूप प्रकट होता
14:14है
14:15कर सकते हैं उनके लिए वे काजू रूप में
14:17प्रकट होती है जो उनका काजल रूप
14:22असुरों को तनिक भी सुहावना नहीं लगता अतः
14:25भगवान को nilaakar मैन लेते हैं जिससे
14:28उनको झूठी सुरक्षा की भावना अनुभव हो और
14:31वे ऐसा सूझ सके की अब उन्हें वैन द्वारा
14:34नष्ट नहीं किया जाएगा
14:37तो माता जिस प्रकार दोनों ही रूप लेती हैं
14:39कभी बालक को प्रेम से भी बात करती है कभी
14:43माता बालक को dantati भी है उसी प्रकार
14:46भगवान के दोनों ही रूप हैं एक उनके कारण
14:49ने रूप है जो सच्चिदानंद स्वरूप है भक्तों
14:52के साथ वह प्रेम में अदन प्रदान करते हैं
14:56और जो vidveshi हैं जो असुर लोग हैं जो
14:59भगवान के अस्तित्व को ना करते हैं जो
15:03भगवान के नियमों को तोड़ते हैं ऐसे लोगों
15:05को भी भगवान सुधारने का प्रयास करते हैं
15:08कल के माध्यम से दोनों ही भगवान की कृपा
15:11है लेकिन अलग-अलग ग्रुप में कोई बच्चा यह
15:14नहीं बोल सकता की माता जब मेरे ऊपर गुस्सा
15:16होती है तो वह मेरे से द्वेष करती है माता
15:18का द्वेष नहीं है वह भी कृपा है लेकिन
15:21दूसरे रूप से उसी प्रकार से भगवान
15:25करते हैं भक्तों को आनंदमय रूप से आनंद
15:29प्रदान करके और जो विदेशी हैं उनको सुधार
15:33करके
15:36nishpadak devkrit एवं
15:43pratishtham भवेत् yavatheshwara
15:47पायल माता जी अनुवाद
15:52[संगीत]
15:54की सहायता करने का अपना करते हुए पहले ही
15:58पूरा कर लिया कर दिया है और जो विशेष है
16:02उसके लिए वे प्रतिष्ठान
16:08कर सकते हो जब तक भगवान इस धारा पर
16:13उपस्थित
16:15तो नारद मुनि एक प्रकार से उनको संकेत भी
16:19कर रहे हैं की आज आप धृतराष्ट्र के लिए
16:21विलाप कर रहे हो लेकिन आपको भी बहुत
16:25जल्दी-जल्दी जाना है
16:27क्योंकि भगवान श्री कृष्ण यहां पर आए
16:30उन्होंने धर्म की स्थापना करने के लिए
16:34देवताओं की सहायता करने के लिए
16:36अभी महाभारत के युद्ध में पहले से ही बहुत
16:40सारे दोस्तो का वध करवा चुके हैं अभी
16:42थोड़े बहुत दुष्ट बच्चे हैं उनका वक्त
16:45करने के बाद भगवान भी अपने धाम में जाने
16:47वाले हैं अगला जो अध्याय है वही है भगवान
16:50श्री कृष्ण का अपने धाम को वापस लौटना
16:53बहुत जल्दी भगवान भी वापस जाने वाले हैं
16:56तो आपको भी जाना है तो आपके खिलाफ करें
16:59आपको स्वयं को भी महल छोड़कर जल्दी-जल्दी
17:01जाना है तो आप इस प्रकार से अपने बारे में
17:04सोचिए की कैसे आप आध्यात्मिक उन्नति
17:07करेंगे
17:08अजय प्रभु
17:15श्री भगवान अपने धाम कृष्ण लोक से जो
17:19आध्यात्मिक आकाश का सर्वोच्च लोग इस भौतिक
17:23विश्व के devtasakon की सहायता करने हेतु
17:26तब तक अवतरित होते हैं जब जब उन असुरों
17:30द्वारा अधिक सताया जाते हैं जो एन केवल
17:32श्री भगवान से अपनी तो उनके भक्तों से भी
17:35द्वेष रखते हैं
17:37जैसा की ऊपर कहा जा चुका है बद्दी जी अपनी
17:40ही रुचि से भौतिक जगत के साधनों पर प्रभु
17:44जताने की अपनी प्रबल इच्छा द्वारा प्रेरित
17:47होकर भौतिक संसद में आते हैं और वे सभी
17:50वस्तुओं के और वास्तविक स्वामी बन बैठते
17:52हैं प्रत्येक व्यक्ति ईश्वर बन्ना चाहता
17:55है ऐसे कृत्रिम ishwaron में प्रबल होड़
17:59लगी रहती है
18:03जब संसार में असुरों की संख्या बढ़ जाती
18:06है तब यह जगत भागवत
18:09बन जाता है असुरों की वृद्धि के कारण जनता
18:13तो स्वाभाविक रूप से श्री भगवान की भक्ति
18:15को समर्पित होती है और उच्च लोक के देवता
18:18सहित श्री भगवान के शुद्ध भक्त उद्धार की
18:22जय श्री भगवान से प्रार्थना करते हैं तब
18:24श्री भगवान या तो स्वयं अपने धाम से नीचे
18:27आते हैं या अपने भक्तों में से किसी को
18:29मानव या पशु समाज की गिरी दशा सुधारने
18:33हेतु
18:34नियुक्त करते हैं ऐसी अशांति केवल मानव
18:37समाज में ही नहीं अपितु पशु पक्षियों या
18:40उच्च लोकों के देवता से अन्य जीवन के बीच
18:44भी मस्ती रहती है भगवान श्रीकृष्ण तब कंस
18:48जरासंध तथा शिशुपाल जैसे असुरों का वध
18:51करने हेतु स्वयं अवतरित होते हैं महाराज
18:54युधिष्ठिर के शासनकाल में लगभग इन समस्त
18:57असुरों का वध श्री भगवान
19:01के विनाश की प्रतीक्षा में द जो इस संसार
19:04में उनकी अपनी इच्छा से ही प्रकट हुआ था
19:07वह अपने nityadham जानने के पूर्व इस वंश
19:10को समेत लेना चाहते द श्री नारायण मुनि ने
19:13महात्मा विदुर की इस तरह यदुवंश के आसान
19:16विनाश की बात प्रकट नहीं होने दी किंतु आप
19:20प्रत्यक्ष रूप से उन्होंने राजा तथा उनके
19:22भाइयों से संकेत कर दिया
19:34जिससे वह
19:36विदेशी जनों का विनाश करें और भक्तों के
19:39लिए रहने के लिए सहायता करें उनके जीवन से
19:43कठिनाइयों को हटा देते हैं लेकिन यहां पर
19:47नारद मुनि अप्रत्यक्ष रूप से यह संकेत कर
19:50चुके हैं की भगवान बहुत जल्दी अपने लीला
19:52करने वाले हैं और उनके जाते ही आपको भी
19:56जाना है तो आप धृतराष्ट्र के लिए गांधारी
20:00के लिए विदुर के लिए
20:01मिला मत कीजिए आप जाने की तैयारी कीजिए
20:07धृतराष्ट्र भ्राता गंधारिया
20:14दक्षिणतम आश्रम
20:18पढ़िए अनुवाद
20:22हरे कृष्ण
20:29उनकी पत्नी गांधारी हिमालय के दक्षिण की
20:33ओर गए हैं जिधर बड़े-बड़े ऋषियों की आश्रम
20:36हरे कृष्ण
20:38[संगीत]
20:51में जाने का मतलब है
20:59और वहां पर जाने का मतलब है अब वापस आने
21:03का कोई प्लान नहीं
21:20दृष्टि से उपदेश दिया और फिर अपनी दिव्या
21:24दृष्टि से देखते हुए उनके बड़े चाचा की
21:27bhagidariyon का वर्णन करना प्रारंभ किया
21:30जो इस प्रकार है हर एक सदन में अब उनको
21:33लाइव टेलीकास्ट दिखा रहे हैं की उधर क्या
21:35चल रहा है क्या उधर हो रहा है उनको लाइव
21:38टेलीकास्ट
21:41श्रोता दिवस सप्त भेड़िया
21:47सतनाम प्रिया नाना सप्त श्रोता पाच पाचन
21:52kshate
21:53सुमन माताजी
22:13[संगीत]
22:51[संगीत]
22:58इस समय
23:10स्नान करके
23:13तथा
23:24मिलती है
23:49इस प्रकार से कठिन तपस्या में धृतराष्ट्र
23:52लगे हुए हैं
23:54बसंतपुर तात्पर्य पड़ी
23:58हरे कृष्ण प्रभु
24:01पढ़ती इंद्रियों तथा मैन को वश में करने
24:05तथा उन्हें पदार्थ से आत्मा की ओर मोड़ने
24:09की यांत्रिक विधि है इसकी प्रारंभिक
24:12विधियां
24:13आध्यात्मिक विचार प्राणायाम समाधि तथा परम
24:18पुरुष परमात्मा की ओर उन्मुख होना इस तरह
24:21की यांत्रिक विधि से आध्यात्मिक पद तक ऊपर
24:25उठने के लिए कुछ विधान नियत किए गए हैं
24:28दिन में तीन बार स्नान करना जहां तक संभव
24:32हो उपवास करना आसान मारकर मैन को
24:35आध्यात्मिक विषयों में एकाग्र करना तथा इस
24:39प्रकार धीरे-धीरे विषय अर्थात भौतिक देश
24:42से मुक्त होना भौतिक जगत का अर्थ है भौतिक
24:46विषय में लिप्त होना जो ब्रह्म मात्रा है
24:49घर देश परिवार समाज संतान संपत्ति तथा
24:54व्यापार
24:56कटी पर आवरण है योग पढ़ती इन मोह विचारों
25:01से मुक्त होने और क्रमशः परम पुरुष
25:04परमात्मा की ओर मुड़ने में सहायक होती है
25:07भौतिक संगति तथा शिक्षा द्वारा हम व्यर्थ
25:11की वस्तुओं में केंद्रित होना सीखते हैं
25:13लेकिन योग ऐसी विधि है जिससे हम इन्हें
25:16पुरी तरह से भूल जाते हैं आधुनिक तथा गठित
25:20योगी तथा योग पद्धतियां कुछ जादू जैसे
25:23करतब दिखाती है और अज्ञानी लोग ऐसे झूठी
25:26बातों के प्रति आकृष्ट हो जाते हैं अथवा
25:28ये स्थूल vyastul शरीर के रोगों को अच्छा
25:31करने के लिए इस एक
25:34सस्ती विधि के रूप में मानते हैं लेकिन
25:37वास्तव में योग पढ़ती वह विधि है जिससे
25:40हमने जीवन संघर्ष के दौरान जो कुछ सिखा है
25:45उसे हम बुला सके धृतराष्ट्र आजीवन अपने
25:48पुत्रों के लिए पांडवों के संपत्ति छीन कर
25:51उनका जीवन स्टार ऊंचा करके पारिवारिक
25:54मामलों को सुधारना में सुधार में व्यस्त
25:57रहे नितांत भौतिकवादी एवं आध्यात्मिक
26:00शक्ति के ज्ञान से रहित व्यक्ति के लिए
26:03यही सामान्य व्यापार है वह यह नहीं देख
26:06पता की ये किस तरह उसे स्वर्ग से नरक में
26:09घसीट कर ले जा सकते हैं किंतु अपने छोटे
26:12भाई विदुर के अनुग्रह से तलाश को ज्ञान
26:15हुआ और वह अपने निपट युक्त व्यापार को देख
26:20पाया और ऐसे ज्ञान के कारण ही वे आत्मा
26:23अनुभूति के लिए अपना घर छोड़ सके श्री
26:27नारद देव ऐसे स्थान पर जो स्वर्ग गंगा के
26:31प्रवाह से पवित्र था उनकी आध्यात्मिक
26:33प्रगति की भविष्यवाणी कर रहे द बिना भोजन
26:36किए केवल जलपरी का रहना उपवास करना माना
26:39जाता है आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्ति के लिए
26:42आध्यात्मिक ज्ञान आध्यात्मिक ज्ञान
26:46प्राप्ति के लिए यह आवश्यक है मूर्ख
26:48व्यक्ति विधि-विधानों का पालन किए बिना
26:51सस्ता योगी बन्ना चाहता सर प्रथम जिस
26:54व्यक्ति की अपनी जीव पर लगाम नहीं है वह
26:57कभी योगी नहीं बन सकते
27:03जो खाता पिता मौज करता है और वह योगी नहीं
27:08बन सकता क्योंकि योगी को मनमाना खाने तथा
27:11पीने की छूट कभी भी नहीं है हमें इस बात
27:15पर ध्यान देने से लाभ होगा की धृतराष्ट्र
27:17ने केवल जल पीकर तथा एकांत में बैठकर
27:21भगवान हरि के विचारों में तन्मय होकर कैसे
27:25अपना योग प्रारंभ किया था हरे कृष्ण
27:29यहां पर वास्तविक योग क्या
27:34अर्थ है इंद्रियों को दमन करके भगवान के
27:38साथ अपने संबंध को स्थापित करना योग का
27:40मतलब होता है जोड़ना
27:42तो जीवात्मा भोग करने के लिए योग नहीं कर
27:46सकती यह भोगी और योगी दोनों विपरीत शब्द
27:49है आजकल जो योग के नाम पर चल रहा है वह
27:52केवल एक्सरसाइज एक्सरसाइज
28:07यहां पर योग पढ़ती में लगे हैं जिनका
28:11एकमात्र उद्देश्य अपने इंद्रियों का दमन
28:14करके आध्यात्मिक उन्नति करना
28:18जीता सुनो जीता श्वास
28:21pratyaharta सदा इंद्रिय हरि भावनाएं
28:26ध्वस्त राजा सतवत मोह माला
28:30सुमन माताजी पढ़िए अनुवाद
28:40लेने की विधि को वश में कर लिया
29:07नियंत्रण कर लेता है तो प्रकृति के तीन
29:10गुना से ऊपर उठ जाता है प्रकृति के तीन
29:13गुण उसको फिर प्रभावित नहीं कर पाते मित्र
29:17विंध्य माता जी
29:21हरे कृष्ण प्रभु
29:24गतिविधियां मैं आसान प्राणायाम प्रत्याहार
29:28ध्यान धरना इत्यादि महाराज भ्रष्टाचार
29:33में सफलता प्राप्त करनी थी क्योंकि वे
29:36पवित्र स्थान पर और एक ही लक्ष्य अर्थात
29:40हरि पर ध्यान लगाए हुए द इस तरह की सारी
29:43हिंदी है भगवान की सेवा में लगी थी यह
29:45विधि भक्त को भौतिक प्रकृति के तीन करोड़
29:48से मुक्त मुक्ति दिलाने में सहायक होती है
29:52जब भौतिक शत्रुघ्न भी जो की सर्वोच्च गुण
29:55है
29:56तो अनापुर तथा मुख्य विषय में क्या कहा
29:59जाए
30:30किंतु जिसने उपयुक्त बुद्धि से भगवान हरि
30:34की चरण चरणों में आत्म समर्पण कर दिया है
30:36वह भौतिक इन प्रकृति के गुना के प्रभाव को
30:39पार कर सकता है और भगवान की सेवा में
30:41स्थित हो सकता है अतः भक्ति योग विधि
30:44इंद्रियों को सीधे भगवान की प्रेम में
30:46सेवा में लगती है इससे करता भौतिक कार्य
30:50लबों में नहीं लग पता इंद्रियों को भौतिक
30:53आसक्ति ऐसे मोर कर भगवान की दिव्या में
30:58लगाने की यह विधि प्रत्याहार कहलाती है और
31:02यह सारी प्रक्रिया प्राणायाम कहलाती है
31:04इसका अंत समाधि के समाधि में अर्थात सभी
31:08प्रकार से परमेश्वर हरि को प्रसन्न करने
31:10के लिए
31:25रूप से आंख बंद कर सकते हैं लेकिन देखने
31:27की प्रवृत्ति को तो बंद नहीं कर सकते
31:30हम लोग बोलने के बोलना बंद कर सकते हैं
31:33लेकिन बोलने की प्रवृत्ति को तो बंद नहीं
31:35कर सकते अंदर ही अंदर मैन तो बोल ही रहा
31:37है मैन तो देख ही रहा है उसे प्रकार से
31:40वास्तविक योग क्या है प्रत्याहार मतलब
31:42इंद्रियों को विषय से हटाकर के भगवान की
31:45सेवा में जॉब लगाते हैं तो तीन गुना से
31:48ऊपर उठ जाते हैं
31:49सामान्यतः योगी ज्यादा से ज्यादा सतोगुण
31:52में जा सकता है लेकिन सतोगुण भी तो भौतिक
31:54गुण हैं उसमें भी व्यक्ति पूर्ण रूप से
31:57शुद्ध नहीं होता है तो भगवान की सेवा में
32:00तीनों गुना से ऊपर उठ जाता है ऐसा योग का
32:03परी कष्ट को यहां पर वर्णन किया जा रहा है
32:13[संगीत]
32:19माता जी पढ़िए
32:29सत्ता को बुद्धि में संयोजित करके तब परम
32:33पुरुष के साथ जीव के रूप में घोड़ा के एक
32:37आत्मकथा के बौद्ध सहित परम ब्रह्म के साथ
32:40sadaakar होना होगा
32:59है और उसी की तैयारी में धृतराष्ट्र लगे
33:07प्रणाम
33:23बुद्धिमान तथा इंद्रियों के साथ उसकी झूठी
33:26पहचान बनती है इससे उसकी शुद्ध आध्यात्मिक
33:29पहचान धक जाती है योग विधि से जब आत्मा
33:33साक्षात्कार में उसकी शुद्ध पहचान के
33:36अनुभूति हो जाती है तब उसे पंच स्कूल
33:39तत्वों और बुद्धि नामक सूक्ष्म तत्वों को
33:42संयोजित करके मूल स्थिति में अर्थात
33:46होता है इस प्रकार
33:52होना होता है
33:55[संगीत]
34:05और इस गायत्री भगवान की दिव्या प्रेम
34:08भक्ति में लग जाता है महाराज धृतराष्ट्र
34:10ने महात्मा बिहार तथा श्री भगवान की कृपा
34:13से आध्यात्मिक पहचान की यह सर्वोच्च
34:16सिद्धि अवस्था प्राप्त कर ली
34:19महात्मा विदुर के व्यक्तिगत संपर्क से
34:22उन्हें श्री भगवान की कृपा प्राप्त हो सके
34:25और जब वे महात्मा विदुर के उपदेशों का
34:27वास्तव में पालन कर रहे द तब श्री भगवान
34:30ने सिद्ध अवस्था प्राप्त करने में उनकी
34:32सहायता की श्री भगवान का शुद्ध भक्त ना तो
34:36भौतिक आकाश के किसी ग्रह पर रहता है ना ही
34:40वह भौतिक तत्वों से किसी प्रकार के समय
34:44ही उद्देश्य की आध्यात्मिक धारा से
34:48paripurit होने के कारण उसके तथाकथित
34:52भौतिक शरीर का अस्तित्व नहीं रहता
34:57के लिए मुक्त हो जाता है
35:02जिसे वह अपने भक्ति में शिव भक्ति प्रभाव
35:05से
35:06बहुत ही आवरण को भेजकर भेद कर प्राप्त
35:09करता है
35:13जबकि मुक्त जीव इनसे परे होते हैं
35:21स्थिति पर पहुंच गया महात्मा विदुर की
35:25संगति और उससे भी महत्वपूर्ण उनके
35:28निर्देशों को पालन करके तो उसी प्रकार
35:31हमारे जीवन में भले कोई योग्यता ना हो हम
35:34बहुत सारे कलमा शुरू
35:35[संगीत]
35:37भक्तों की सानिध्य में और उनके निर्देशों
35:41को पालन करके
35:50दोस्तों
35:52निरुद्ध करना
35:57हरा असते स्थान और युवा चला
36:04[संगीत]
36:08सुमित जी ना प्रभु पड़ी
36:12अनुवाद
36:16उन्हें इंद्रियों के सारे
36:20होंगे और भौतिक प्रकृति के गुना से
36:23प्रभावित होने वाली इंद्रिय की अंत क्रियो
36:26के प्रति भी
36:35हो जाएंगे और मार्ग से
36:38पार कर जाएंगे
36:56हरे कृष्ण प्रभु
37:00धृतराष्ट्र ने योग विधि के द्वारा सब
37:02प्रकार की भौतिक प्रतिक्रिया का निषेध
37:04करने का स्टार प्राप्त कर लिया था प्रकृति
37:07के भौतिक गुना के प्रभाव का शिकार बना जीव
37:10पदार्थ को भोगने की दुर्ग में इच्छा की
37:13वर्ष हो जाता है किंतु योग विधि से मनुष्य
37:16योग से बच सकता है प्रत्येक इंद्रेश सदा
37:20अपने भोजन की तलाश में रहती है और इस तरह
37:23बज्जू पर चारों ओर से हमला होता है और उसे
37:26किसी भी कार्य में स्थिर होने का अवसर
37:28नहीं मिल पता
37:31दे की वे अपने ताऊ को घर वापस लाने का
37:35प्रयास करके उन्हें विचलित ना करें
37:41भौतिक प्रकृति के गुना के कार्य करने की
37:45विभिन्न विधियां हैं किंतु प्रकृति के
37:47भौतिक गुना के भी ऊपर आध्यात्मिक गुण हैं
37:49जो parampool है निर्गुण का अर्थ
37:53प्रतिक्रिया
37:54आध्यात्मिक गुण तथा इसका प्रभाव समान है
37:57अतः आध्यात्मिक गुण को निर्गुण का कर उसे
38:00भौतिक गुण से भिन्न दिखाया जाता है
38:02प्रकृति के भौतिक गुना से पूर्णतया
38:05अवरुद्ध होने पर मनुष्य आध्यात्मिक मंडल
38:08में प्रवेश करता है और आध्यात्मिक गुना से
38:11प्रेरित कर्म भक्ति कहलाता है अतः भक्ति
38:14parampun के सीधे संपर्क द्वारा प्राप्त
38:16किया गया निर्गुण है जिसे परम पूर्ण
38:19संपर्क द्वारा प्राप्त किया जाता है
38:23जिस प्रकार किसी व्यक्ति की मानव पंच
38:26पटिया हो और पांचो उसको 5 दिशाओं में खींच
38:30रहे हो इस प्रकार पांचो इंद्रिय अपने अपने
38:33भोग के लिए जीवात्मा को अलग-अलग दिशा में
38:35खींचती हैं
38:36युधिष्ठिर महाराज से नारद बोल रहे हैं की
38:39आप दोबारा से इनको महल में बुलाकर की क्या
38:41पुनः स्थिति में डालना चाहते हैं अभी तो
38:44इंद्रियों से मुक्त होकर के आध्यात्मिक
38:47आकाश की ओर अग्रसर हो रहे हैं अब उनको आप
38:50मत रॉकी अब उनको आगे बढ़ाने दीजिए
38:55सब अध्ययन
38:59adrajan प्रताप पंच में हनी काले वरम
39:04hasthin
39:07भविष्यति आशीष प्रभु पड़ी
39:13हरे कृष्ण
39:19छोड़ देंगे और उनका शरीर प्राप्त हो जाएगा
39:23अरे कृष्ण प्रभु की बात बता रहे हैं की
39:26अभी जो परिस्थिति है वो तो योग अभ्यास कर
39:28रहे हैं आज से पंच दिनों बाद वह अपने शरीर
39:31को छोड़ देंगे
39:34संजय प्रभु तात्पर्य पढ़िए
39:43नारद मुनि के भविष्यवाणी ने युधिष्ठिर
39:46महाराज को संस्थान को जाने से रोक दिया
39:48जहां उनके ताऊ रह रहे द क्योंकि अपनी योग
39:52शक्ति से अपना शरीर त्यागने के बाद भी
39:55धृतराष्ट्र को किसी दास संस्कार की
39:58आवश्यकता नहीं थी
39:59नारद मुनि ने संकेत किया की उनका शरीर
40:02स्वत जलकर भस्म हो जाएगा योग पढ़ती की
40:06सिद्धि ऐसी ही योग शक्ति से प्राप्त की
40:09जाती है
40:10योगिता समय में अपना शरीर त्याग कर सकता
40:13है और अपने शरीर को खुद के लिए सृजित की
40:17हुई अग्नि से भस्म करके एक चित ग्रह को
40:20प्राप्त कर सकता है हरे कृष्ण
40:23योगी को अपने दाह संस्कार स्वयं व्यवस्था
40:27कर लेते हैं नरेंद्र मोदी बोल रहे हैं
40:33वह उनकी योग शक्ति से ही अपने शरीर को
40:36भस्म कर लेंगे
40:43वही स्थित thapatem साध्वी तम अग्नि
40:46मनोविज्ञान
40:51भर से अपने पति को अपनी योग शक्ति की
40:54अग्नि में अग्नि में अपनी कुटिया समेत
40:57जलता हुआ देखकर उसकी साध्वी पत्नी
41:00एकाग्रता पूर्वक ध्यान मग्न होकर अग्नि
41:03में प्रवेश
41:05पूछ सकते हैं की तो फिर क्या गांधारी को
41:08बचाने के लिए जाऊं धृतराष्ट्र को तो आपने
41:09बता दिया तो नारद मुनि बोला नहीं गांधारी
41:12भी अपने पति को ही पालन करते हुए उनके
41:16पीछे अग्नि में प्रवेश कर जाएंगे
41:18विनीत प्रभु
41:23हरे कृष्ण
41:25[संगीत]
41:26गांधारी एक आदर्श
41:30सती नारी थी वे अपने पति के जीवन संगिनी
41:35थी अतः
41:36जब उन्होंने देखा की उनके पति योग की
41:42अग्नि
41:44कुटी समय जल रहे हैं तो वे निराश हो गई
41:47उन्होंने अपने शो पुत्र खोने
41:52होने के बाद घर छोड़ दिया था और अब जंगल
41:57में अपने अत्यंत प्रिया पति को भी
42:00जलते हुए देख रही थी अब वह वास्तव में
42:04अकेली अनुभव कर रही थी अतः
42:09है अनुभव कर रही थी अतः वह भी अपने पति की
42:13अग्नि में प्रवेश कर पति का अनुबंध करते
42:16हुए मार गई सती स्त्री का अपने पति की
42:21अग्नि
42:25अग्नि में प्रवेश
42:26करना सती संस्कार कहलाता है और यह कर्म
42:30स्त्री के लिए
42:33अति उत्तम माना जाता है
42:39यह सत्य प्रथा अत्यंत गणित अपराध
42:42apradhikrit बन गई थी क्योंकि यह प्रथा
42:45अनिश्चित
42:47अनिश्चित स्त्री पर भी थोपी जाने
42:51लगी इस प्रतीत युग में किसी भी स्त्री के
42:54लिए गांधारी तथा anyayon के समान सती
42:59संस्कार का शुद्ध विधि से पालन करना संभव
43:02नहीं है गांधारी जैसी सती नारी को पति का
43:06योग वास्तविक
43:09दहक प्रतीत होता है
43:16किंतु किसी के द्वारा बाल प्रयोग नहीं
43:19किया जाता
43:22बन गई तो इस
43:25नियम के पालन करने के लिए
43:28नारी का बाल प्रयोग किया जाने लगा तब यह
43:33तब यह सचमुच अपराध पूर्ण बन गई
44:20सती प्रथा में तो इस प्रथा का मुख्य
44:24उद्देश्य खत्म हो गया
44:48कौन पढ़ेंगे
44:50विष्णु प्रभु
45:21तट पर यह कौन पड़ेंगे
45:25हरे कृष्ण प्रभु
45:39के कारण उनके भाई को जीवन की वंचित गति
45:42प्राप्त हुई अतः यह जानकर विधु परम
45:45प्रसन्न द लेकिन उन्हें दुख था की वह अपने
45:48भाई को शुद्ध भक्त ना बना पाए
45:50विदुर ऐसा ना कर पाए क्योंकि धृतराष्ट्र
45:53पांडवों से शत्रु भाव रखते द जो सारे
45:56भगवान के भक्त द वैष्णव के चरण कमल पर
45:59किया गया अपराध भगवान के चरण कमल पर किए
46:01गए अपराध से अधिक घटक होता है
46:05तुरंत कृपालु द जिनका पिछला जीवन अत्यंत
46:09bhautiktavadi था किंतु ऐसी कृपा का
46:12वर्तमान जीवन में फल टाटा परमेश्वर की
46:15इच्छा पर निर्भर होता है
46:25और मृदुल अपने भाई तथा भाभी की मृत्यु से
46:27अत्यंत chaukatur द और ऐसे शोक को दूर
46:30करने का एकमात्र उपाय था की वह तीर्थ
46:33यात्रा के लिए निकल पड़े मतलब महाराज
46:35युधिष्ठिर के पास अपने जीवित चाचा विदुर
46:38को वापस बुलाने का अवसर ना हो
46:41यहां पर इतना महत्वपूर्ण सिद्धांत propany
46:44तात्पर्य बताया है
46:46ये हमारे आध्यात्मिक जीवन के लिए बहुत
46:49बड़ी प्रेरणा बन सकता है
46:51धृतराष्ट्र को विदुर का सानिध्य मिला
46:54धृतराष्ट्र घर छोड़कर गए इतना अष्टम योग
46:58किया कठिन तपस्या की केवल जैन जल का आहार
47:01लिया उसके बाद भी
47:04अपने तपोबल से केवल मृत्यु को प्राप्त
47:08केवल मुक्ति को प्राप्त कर पाए भक्ति को
47:11प्राप्त नहीं कर पाए क्यों नहीं कर पाए
47:13क्योंकि पांडव ityadiyon के चरणों में जो
47:16अपराध किया था उसका शोधन नहीं की एक बार
47:20भी पांडवों के पास जाकर के रुदन करके यह
47:22नहीं बोला की मैंने अपराध क्या है
47:27यह वैष्णव अपराध से मुक्त नहीं हुए इसलिए
47:29विदुर के सानिध्य मुक्ति तक पहुंच पाए
47:32लेकिन भक्ति नहीं प्राप्त कर पाए भागवत
47:35धाम नहीं जा पाए इसीलिए हमारे जीवन में भी
47:38हमको देखना है कितना ही अच्छा साधन कर लें
47:40कुछ भी कर ले वैष्णव अपराध यदि करेंगे तो
47:44हम कभी भी भक्ति प्राप्त नहीं कर पाएंगे
47:46हम मुक्त हो जाएंगे तीन गुना से ऊपर भी उठ
47:49सकते हैं लेकिन शाश्वत संबंध भगवान के साथ
47:52आध्यात्मिक संसार में जो शुद्ध रक्त लीला
47:55में भाग लेते हैं वह पद तक नहीं पहुंच
47:59पाएंगे
48:00आखिरी श्लोक इस अध्याय
48:03का इतिहास
48:05स्वर्गम नारद swasthtam बुरा
48:10yudhishthirovastay सूचा
48:15ऐसा कहकर महाराज ऐसा कहकर महर्षि नारद
48:20अपनी वीणा समेत भाई आकाश में चले गए
48:23युधिष्ठिर ने उनके उपदेश को अपने हृदय में
48:27धारण किया जिससे वह सारे मुक्त हो गए तो
48:32भागवत भक्तों की वाणी से हमारे सुख का दमन
48:35होता है और उसे प्रकार युधिष्ठिर महाराज
48:37यहां पर नारद मुनि सुनकर श्रवण करकर पूर्ण
48:41रूप से शोक से मुक्त हो गए
48:53श्री नारद श्री नारद जी शाश्वत अंतरिक्ष
48:57पुरुष है जिन्हें भागवत कृपा से
48:59आध्यात्मिक शरीर प्राप्त हुआ है वे बिना
49:02किसी प्रतिरोध के भौतिक तथा आध्यात्मिक
49:05दोनों ही जगत के बाएं आकाश में विचरण कर
49:08सकते हैं और देखते ही देखते दूर सुदूर के
49:11किसी भी ग्रह में तत्क्षण पहुंच सकते हैं
49:15दासी पुत्र के रूप में हम उनके विगत जीवन
49:18का वर्णन पहली कर चुके हैं शुद्ध भक्तों
49:21की संगति करने से ही उन्हें शाश्वत
49:24अंतरिक्ष पुरस्कार
49:52बन्ना होगा और नारद म्युनिक चरण कॉन पर
49:56चलना होगा इस प्रकार श्रीमद् भागवत के
49:59प्रथम ashkandh के अंतर्गत धृतराष्ट्र
50:02द्वारा gritya नामक 13वें अध्याय के
50:05bhaktivedantaat पर पूर्ण हुए हरे कृष्ण
50:09उदाहरण इस अध्याय में देखे हैं किस प्रकार
50:12धृतराष्ट्र विदुर के संगति में अपने जीवन
50:17को सफल बना पाए
50:19युधिष्ठिर नारद मुनि के सानिध्य में अपने
50:22शोक को दूर कर पाए नारद मुनि स्वयं पिछले
50:25जीवन में दासी पुत्र होते हुए
50:27bhaktivedantaon के सानिध्य में नारद मुनि
50:30जैसे व्यक्ति बन गए
50:43समापन हुआ कल से हम अगला अध्याय शुरू
50:46करेंगे जहां भगवान श्री कृष्ण
50:51तंतर-दान होना अपने धाम को वापस जाने के
50:53लीला का वर्णन किया गया है हरे कृष्ण आज
50:57कृष्ण नहीं लेंगे जिनके प्रश्न है वह
50:59लिखकर रख सकते हैं कल्चर क्या करेंगे